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"तू सूअर तेरा बाप सूअर"

हमको गूगल ट्रांसिलेटर की करतूते देखकर एक पुराने समय की घटना याद आ रही है. यानि गूगल ट्रांसिलेटर का छोटा भाई टेलीग्राम भी कुछ कुछ ऐसा ही था. आज आपको एक सच्ची घटना सुनाते हैं. घटना १९७२-७३ की है. तूवर दाल आज कल १०० रुपये किलो है और उस समय १ रुपये से सवा रुपये किलो थी.



उस जमाने मे अनाज दलहन का थोक व्यापार करने वाले व्यापारी अपने जानकार नुमाईंदे को इनकी खरीदी करने उन मंडियों मे भेजते थे जहां इनकी उत्पादकता होती है. उस साल मे उत्तरप्रदेश मे तूवर (अरहर) की जबरदस्त फ़सल हुई थी. और सारे हिंदुस्थान के थोक व्यापारी या उनके प्रतिनिधी यू.पी. की अनाज मंडियों मे तूवर खरीद कर रहे थे.

हम भी वहां गोंडा, बहराईच, बलरामपुर की मंडियों मे थे. हमारे साथ बंगलोर के एक बडे व्यापारी के नुमाईंदे शकूर मियां भी थे. जाहिर है उन दिनों मे सूचना का जबरदस्त अभाव था. सो बडे व्यापारियों की देखा देखी ही काम चलता था. हम भी शकूर मियां की चिलम भरते रहते थे और कारण साफ़ था कि वो एक बडी फ़र्म के प्रतिनिधी थे सो तेजी मंदी की खबर उनसे बडी सटीक मिलती थी.

उन दिनों मे टेलीफ़ोन तो बहुत मुश्किल से मिलता था. सारा काम टेलीग्राम और पोस्टकार्ड के द्वारा ही चलता था. अब टेलीग्राम मे भी बडी मजेदार भूले हो जाया करती थी. एक दिन सुबह सुबह शकूर मियां को उनके सेठ का टेलीग्राम मिला और टेलीग्राम पढते ही शकुर मियां तो लाल पीले हो उठे. हमने उनसे पूछा कि - शकूर साहब क्या बात है? कुछ माल वाल खराब चला गया ..या सेठ ने कुछ कह दिया...या तूवर मे मंदी की वजह से परेशान हो? बात क्या है?

शकूर मियां ने टेलीग्राम हमारे हाथ मे पकडाते हुये कहा - लो ताऊ..पढो तुम खुद ही...इस स्साले सेठ की तो ऐसी की तैसी...स्साले को अभी जवाब का टेलीग्राम करता हूं.

शकूर मियां तो हमारे रोकने से भी नही रुके...और हमने उनका पकडाया हुआ टेलीग्राम पढा. उसमे लिखा था...अबे शूकर, मत खरीद तूवर, अब हमारे को लगा कि शकूर मियां का गुस्सा होना जायज है. उस जमाने मे टेलीग्राम के प्रति शब्द आठ आने लगते थे सो सब कुछ शार्ट्कट ही लिखा जाता था.

हमने सोचा कि दसौंध के लालच मे शकूरमियां ने कुछ ज्यादा खरीद कर ली होगी और बाजार कुछ मंदी में आगया था..रेल्वे ने सारे वागन एक रेक मे ही गंतव्य तक पहुंचा दिये थे सो हुंडी बिल्टियां छुडवाना मुश्किल हो रहा था. अत: माल को खप जाने और भुगतान की व्यवस्था सुधरने तक खरीद करने को मना किया होगा. पर शूकर (सूअर) कह कर संबोधित करना कुछ जमा नही.

थोडी देर बाद ही शकूर मियां वापस आते दिखे. हमने आते ही उनसे कहा - भाईजान, आपके सेठ ने ये अच्छा नही किया. सेठ कोई इस तरह गाली गलोज थोडे कर सकता है? शकूर मियां बोले - ताऊ, तुम देखते जावो. जब सेठ को मेरा टेलीग्राम मिलेगा तब उसको समझ आयेगा कि शकूर मियां से पाला पडा है.

हमने पूछा कि शकूर साहब, आपने ऐसा क्या जवाब लिख दिया टेलीग्राम में?
शकूर मियां बोले - ताऊ, मैने लिख दिया है कि- "तू सूअर तेरा बाप सूअर, शकूर तो खरीदेगा तूवर ही तूवर"
जब ये टेलीग्राम की भाषा को शकूर मियां ने लयबद्ध होकर पढा तो हमारे दिमाग की घंटी टनटना उठी. हम समझ गये कि ये सारी गल्ती की जड टेलीग्राम भेजने मे हुई जरासी भूल का है. इसमे सेठ की कोई गल्ती नही है.

हुआ यो था कि शकूर मियां द्वारा ज्यादा माल खरीद लेने की वजह से सेठ को वहां से पेमेंट भेजने में दिक्कत आ रही थी, अत: सेठ ने शकूर मियां को टेलीग्राम मे लिखा था कि "अबे शकूर मत खरीद तूवर" और टेलीग्राम मे "ऊ" की मात्रा "क" की बजाये "श" पर लग गई. और शकूर की जगह लिखा गया शूकर..और शकूर मियां ने इसे समझा सूअर...और सेठ को लिख दिया ये छंद "तू सूअर तेरा बाप सूअर, शकूर तो खरीदेगा तूवर ही तूवर"

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मग्गाबाबा का चिठ्ठाश्रम

मिस.रामप्यारी का ब्लाग
ताऊजी डाट काम

ताऊ गया बाबा समीरानंद के हिमालय आश्रम में

ताऊ ने एक रोज अपने गुरु बाबा समीरानंद जी से कहा - बाबा अब मैं ब्लागिंग छोडने वाला हूं?
बाबा समीरानंद बोले - वत्स शुभ शुभ बोलो ! ऐसी अशुभ वाणी नही बोलनी चाहिये, ऐसा क्या कष्ट है?
ताऊ : क्या बताऊं गुरुजी....बात ही ऐसी है. मुझे एक नम्बर ब्लागर बनना है. मैं जरा सा उपर जाता हूं और चिठ्ठाजगत वाले मुझे घसीट घसाट कर वापस वहीं ला पटकते हैं. क्या करुं अब तो थक हार इसको बंद कर देने मे ही भलाई है.
बाबा समीरानंद - वत्स ऐसी बाते करके खुद भी निराश होते हो और दुसरों को भी निराश करते हो? फ़िर ये हमारी ब्लागरी की राजगद्दी को कौन संभालेगा? हम तो तुमको हमारे ब्लागर मठ का अपना उतराधिकारी मान कर चल रहे थे. ठीक है तुम हमारे साथ हिमालय पर्वत पर चलो. हम तुमको वहीं ब्लागर ज्ञान की संपुर्ण दिक्षा देंगे.

और दोनों ने बाबा समीरानंद आश्रम जाने का फ़ैसला किया. बाबा समीरानंद तो अपने योगबल से उनके हिमालय आश्रम पहुंच गये और ताऊ वाया गौहाटी-सिक्किम होते हुये जाने के लिये राजधानी एक्सप्रेस में बैठ गया. साथ मे अपने गुरु की फ़ोटो भी रख ली. और ट्रेन मे ही अपने लेपटोप को खोलकर ब्लागरी के गहन अध्ययन मे लग गया.



साथ की सीट पर एक कुछ ज्यादा ही पढा लिखा सा आदमी बैठा था. जो वैज्ञानिक होने के साथ साथ घोडे पालने और घुडसवारी का भी शौकीन था. वो बोर होरहा था. बार बार ताऊ को डिस्टर्ब कर रहा था.

ताऊ अपने लेपटोप मे खोया था. आखिरकार सहयात्री ने ताऊ से कहा - श्रीमान आपका नाम क्या है? आप तो कुछ बोलते ही नही हैं? आपको मालूम होना चाहिये कि आपस मे बातें करते रहने से रास्ता आसानी से कट जाता है.

ताऊ का इतनी बाते सुनकर खोपडा खिसक गया. फ़िर भी ताऊ के साथ बाबा समीरानंद जी की फ़ोटो थी..उस फ़ोटो मे साक्षात गुरुजी बोलते हैं. तो उस बोलने वाली फ़ोटो ने इशारों इशारों में ताऊ को दिमाग शांत रखने की सलाह दी.

अब ताऊ बोला - श्रीमान मेरा नाम ताऊ रामपुरिया है. मैं रामपुरा का रहने वाला हूं और आजकल ब्लागरी करता हूं..और अब ब्लागरी मे Phd करने मेरे गुरुजी के पास हिमालय जा रहा हूं.

सहयात्री बोला - वाह श्रीमान वाह, आप तो काफ़ी ज्ञानी पुरुष लगते हैं. आपके साथ सफ़र करने मे काफ़ी आनंद आयेगा. क्यों ना हम नैनो टेक्नोलाजी के बारे मे बातें करे? या फ़िर एंटी मैटर के बारे में?

ताऊ ने सोच लिया कि आज ये बुद्दिजीवी की औलाद दिमाग का दही बना कर छोडेगा, ऐसे मानेगा नही. इसका इलाज तो ताऊ पने से ही करना पडेगा वर्ना इससे माथाफ़ोडी मे मेरे ब्लागरी के सारे पाठ धरे रह जायेंगे.

अब ताऊ बोला - श्रीमान मुझे आपके साथ इन विषयों पर चर्चा करके वाकई बडा आनंद आयेगा..आखिर एंटी मैटर की अवधारणा स्थापित करने के पीछे तो मुझे नोबल पुरुष्कार भी मिल चुका है. पर उससे पहले मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहूंगा.

सहयात्री को तो यह सुनकर मानों स्वर्ग मिल गया हो. वो बोला - श्रीमान आप अपना सवाल पूछिये..मुझे भी आपके सवाल का जवाब दे कर बडी प्रशन्नता होगी.

ताऊ बोला - श्रीमान ये बताईये कि मेरी चंपाकली (भैंस) भी घास खाती है और आपका घोडा भी घास खाता है. तो फ़िर मेरी भैंस तो गोबर करती है और आपका घोडा लीद करता है? इस विषय मे आप क्या कहेंगे?

यह सवाल सुनकर उस वैज्ञानिक के पसीने आगये और वह सर खुजाने लगा. उसने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की.

अब ताऊ बोला - अरे बावलीबूच, ''जब तेरे को गोबर और लीद के बारे में भी जानकारी नहीं है तो तू ताऊ से एंटीमैटर और नैनो टेक्नोलाजी के बारे में क्या खाक चर्चा करेंगा? इब जाकर पहले गोबर और लीद का फ़र्क समझ के आ..और इब चुपचाप बैठ और मुझे अपना काम करने दे.''

परिचयनामा में 23 जुलाई गुरुवार को मिलिये : पारूल…चाँद पुखराज का से. शाम 3:33 PM पर

मग्गाबाबा का चिठ्ठाश्रम

मिस.रामप्यारी का ब्लाग

गाने वाला तोता बिकाऊ है.

डाक्टर ताऊनाथ होस्पीटल का काम काज काफ़ी मंदा चलने लग गया था. होस्पीटल के खर्चे भी चलने मुश्किल होगये. डाक्टर पूजा उपाध्याय ने भी पेशेंट भेजने बंद कर दिये सो रामप्यारी द्वारा किये जाने वाले कैट स्केन की कमाई भी बंद होगई थी.

अब राज भाटिया जी ने ताऊ को सलाह दे दी कि ताऊ एक बढिया धंधा है. वो करले तू तो, बस समझ ले निहाल हो जायेगा. सो मरता क्या ना करता? ताऊ तैयार होगया और धंधे की स्कीम समझने भाटिया जी के पास पहुंच गया. भाटिया जी ने सब स्कीम समझा दी और एक जंगली तोता पकडा दिया.



अगले दिन ताऊ उस तोते को लेकर सडक किनारे बैठ गया. थोडी देर मे वहां से एक सुथरी सी छोरी निकली और उसको देखकर वो तोता गाने लगा...रुकजा ओ जाने वाली रुकजा..मैं तो राही हूं तेरी मंजिल का...और एक जोरदार सीटी मारकर बोला...ए पलट...और जाकर ताऊ के पीछे छुप गया...उस छोरी ने पलट कर देखा तो वहां सिवाए ताऊ के कोई दिखा नही...

वो लडकी भडक कर बोली--ए बुढऊ..तेरे को शर्म नही आती क्या?
ताऊ बोला - ए छोरी तैं लाल ताती क्युं होण लाग री सै? मन्नै के कर दिया?
वो बोली - इस उम्र मे लडकियों को देखकर ऐसे ऐसे गाने गाते हुये तुमको थोडी तो शर्म आनी चाहिय. तुम्हारे घर मे मां, बहन, बेटियां नही हैं क्या? और वो तो एकदम काली का अवतार होने लग गई.

ताऊ ने कहा - देख छोरी, मेरे मां, बहन और बेटी सब हैं और ये गाने मैं नही गा रहा था. और मैं इस तरह की छिछोरी हरकते नही करता. मेरा धंधा जरा दुसरे टाईप का है. अब ये सुनकर वो बालिका तो सैंडिल निकालने लग गई...और बोली - यहां तेरे सिवाय और कोई है नही. फ़िर क्या भूत प्रेत गाने गा रहे थे.

अब ताऊ बोला - गाने तो ये मेरा तोता गा रहा था. और अपनी पीठ पीछे से हाथ मे पकडकर तोते को सामने किया. उस लडकी ने कहा --तुम खुद इसका बहाना बनाकर गा रहे थे...ताऊ ने लाख कोशीश की..पर तोते ने लडकी के सामने सिर्फ़ कांय कांय के कुछ नही बोला. लडकी बुरा भला कहती हुई चली गई..और ताऊ को बडी शर्मिंदगी ऊठानी पडी.

उस लडकी के जाने के बाद ताऊ ने तोते से पूछा कि उसने ऐसा क्युं किया? तोता बोला - मुझे तो मेरे मालिक राज भाटिया ने ऐसा ही कहा था. ताऊ बोला - फ़िर क्या तुम मेरी इज्जत लुटवाने यहां आये हो?

तोता बोला - ताऊ देख तेरी क्या तो इज्जत और क्या इज्जत की पूंछ? कहां लटक रही है तेरी इज्जत? मुझे तो कहीं नही लटकती दिख रही है. तू तो बस मेरे को बेच डाल..फ़िर देख तमाशा.

अब इतनी ही देर मे एक धनवान मेमसाहिबा आगयी..थोडी उम्रदराज थी....उसको देखते ही तोते महाराज ने तान छेड दी... ए मेरी जोहरा जबीं तुझे मालूम नही...तू ...मेमसाहिबा वहीं ठिठक रुक गई...ताऊ ने मन मे सोचा कि बस अब पिटाई पक्की है...इतनी ही देर मे में तोते ने अगला गाना शुरु कर दिया...हम तुझसे मुहब्बत करके सनम, हंसते भी रहे रोते भी रहे...वाकई तोते की आवाज इतनी दिलकश और सुरीली थी..जैसे जन्मों के बिछडे प्रेमी को मिल लिया हो.

उस महिला ने यह दर्द भरा नगमा गाते हुये तोते को देख लिया और ताऊ से पूछा - यह तोता तुम कहां से लाये?
ताऊ बोला - मैडम जी, ये तोता तो मैने ठेठ मियां तानसेन से खरीदा था..बहुत ही पक्का गायक है. और बस यही मेरा सहारा है...और तोते जी ने अगला राग छेड दिया....चौदवीं का चांद हो या आफ़्ताब हो.....

यह गाना तोते ने इतना सुरीला गाया कि बस गजब होगया...वो बीरबानी तोते पर फ़िदा हो गई और ताऊ से बोली - ताऊ हमको यह तोता चाहिये..किसी भी कीमत पर..

ताऊ यों चाहे जितना बेवकूफ़ हो..पर उडती चिडिया के पर पहचानता है....बस अड गया कि तोता तो वो नही ही बेचेगा..महिला ने बहुत कोशीश की...आखिर महिला दस लाख रुपये देने को तयार होगई....ताऊ ना ..ना..करता रहा......इतनी ही देर मे तोता राम ने गाना शुरु कर दिया...ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे....और ये इशारा था ताऊ को --कि बस सौदा नक्की करो..और नोट गिनकर घर पहुंचो. आसामी में इससे ज्यादा कश नही है. बस बहुत हो गया..

ताऊ बोला - ठीक है बहणजी, मेरी इच्छा तो नही है पर आपकी संगीतप्रियता को देखते हुये मैं इसे बेच रहा हूं. ये आपका मन हमेशा गाने गाकर बहलाता रहेगा...महिला भी अकेली थी..तोते का साथ पाकर निहाल हो ऊठी...उसने ताऊ को भुगतान करवा दिया घर ले जाकर और तोते को घर के अंदर ले गई..तोते ने अच्छा चकाचक नाश्ता पानी किया.

अब महिला ने फ़ुरसत पाकर तोते को हुक्म सुनाया कि वो वाला गाना सुनाओ..तोता तो चुप..महिला ने बहुतेरी कोशीश की पर तोते ने चूं चपड भी नही किया.

शुरु के पांच सात दिन तो महिला ने समझा कि नई जगह की वजह से इसका मन नही लगा होगा...पर जब देखा कि खाना तो तोता पेट भरकर ठूंस ठूंस कर ऐसे खाता है जैसे किसी भुक्कड के घर से आया हो? और गाने का कहते ही इसकी नानी मर जाती है.

कुछ दिन बाद तक भी यही हाल रहा तो थक हार कर वो बीरबानी तोते को लेकर ताऊ के पास पहुंच गई..और बोली - ताऊ तुमने मेरे साथ दगाबाजी की है. यह तोता तो गूंगा है...ताऊ ने कहा - नही बहणजी..इसका मन नही लगा होगा..कुछ दिन मे लग जायेगा...

महिला बोली- मैने दो हाथ जोडे तुम्हारे और तुम्हारे इस तानसेन के.. तुम मेरे रुपये वापस करो और ये संभालो अपना तोता..

इस बात पर ताऊ आंखें दिखाकर बोला - देखो बहणजी..बिका हुआ माल वापस नही होता..ये मैने पहले ही लिख रखा है..पर चूंकी आप काफ़ी शरीफ़ दिख रही हैं तो मैं आपसे फ़िफ़्टी परसेंट काटकर तोता वापस ले सकता हूं.

महिला ने काफ़ी हा हुज्जत की..पर ताऊ से पार पाना भी आसान तो नही है..सो जब कोई चारा नही देखा तो तोते को ताऊ के हवाले किया और अपने पांच लाख वापस लेकर चलती बनी.

ताऊ बडा खुश था...एक झटके मे ही पांच लाख कमाकर..और तोते को धन्यवाद देने लगा.

तोता बोला - अब ज्यादा धन्यवाद देने की भी जरुरत नही है..ये तो पार्टनरशिप का मामला है...पांच लाख मे से मेरे ढाई लाख मुझे दो और अगला ग्राहक फ़ंसाने की जुगाड लगाओ.

तो भाइयों और बहनों ..आप अगर गाने वाला तोता खरीदने की सोच रहे हों और ताऊ तोते के साथ दिख जाये तो जरा सोच समझ कर सौदा करना. आगे आपकी मर्जी.

ताऊ की अक्ल बडी या भैंस?

ताऊ रिटायर हो गया था. जीवन मे काफ़ी आपाधापी के बाद अब शांति से रहने का सोच रखा था. ब्लागिंग से लाखों रुपये महिने कमा चुका था ( ये हम नही कह् रहें है. यह नवभारत टाईम्स की खबर पर आधारित है.)

एक नदी किनारे की शांत कालोनी, घर के सामने ही पार्क, बस ताऊ ने देखते ही घर पसंद करके खरीद लिया और उसमे रहने आगया. ताई भी खुश. अब एक आधा सप्ताह तो घर जमाने मे लग गया. पार्क से आती आवाजों पर ताऊ ने ध्यान नही दिया.

फ़िर एक दिन दोपहर मे ताऊ सोने लगा तो पार्क मे से जोर जोर से कनस्तर पीटने की आवाज आरही थी जो ताऊ की नींद मे खलल डाल रही थी. खिडकी से बाहर झांक कर देखा तो कुछ बच्चे कनस्तर पीट कर पार्क मे मस्ती कर रहे थे. इतनी देर मे ताऊ की खिडकी पर आकर क्रिकेट की बाल टकराई..उधर ताई का दिमाग सातवें आसमान पर. जाहिर है ताऊ की कालोनी मे इन बच्चों का उत्पात था. पर अब क्या किया जा सकता था?

तभी एक बच्चा आया..अपनी बाल मांगने. ताई चिल्लाकर बोलने ही वाली थी कि ताऊ ने हाथ के इशारे से उसे मना किया और बाल दे दी. ताई के पूछने पर बताया कि ये बच्चे ऐसे नही मानेंगे..इनके साथ तो फ़ार्मुला उल्टा सीधा लगाना पडेगा.

अब ताऊ बाहर खडा होकर उन बच्चों को बुलाने लगा. बच्चे पहले तो डरे..फ़िर वो धीरे २ ताऊ के पास आगये. ताऊ ने उनको बैठाया और सबको मिल्क चाकलेट खिलाई. बच्चे बडे प्रशन्न हो गये. अब ताऊ बोला - बच्चों मैं तुम्हे खेलते देखता हूं तो मुझे मेरा बचपन याद आ जाता है. और मुझे बडी खुशी होती है तुम लोगों को रोजाना यहां खेलते देखकर.

बच्चे भी खुश..अब ताऊ बोला - देखो बच्चों अगर तुम लोग रोज यहां आकर खेलोगे तो तुमको मैं रोज एक सौ रुपये दूंगा. बच्चों को तो समझो कि आनंद ही आगया. उधर ताई ने ताऊ को आंखे दिखाई कि ये क्या कर रहे हो? बुढापे मे तुम सठिया गये हो? कहां से दोगे इनको रोज सौ रुपये?

ताऊ बोला - भागवान तू चिंता मत कर..अरे ये तो इंवेस्टमैंट है. मल्टिपल रिटर्न देगा. तू तो हुक्का भरकर लादे और मुझे सोचने दे आराम से.

अब ये रोज का क्रम होगया. बच्चे वहां खेलते..रोज रुपये ले जाते..चाकलेट खाते....और पढाई लिखाई बंद...बच्चों के मा - बाप परेशान..बच्चे ना तो पढें ना होमवर्क करे...स्कूल से आये और सीधे पार्क में.

आखिर बच्चों के मां बाप ताऊ से मिलने आ गये और बुरा भला कहने लगे कि ताऊ तुम हमारे बच्चों को बिगाड रहे हो.

ताऊ बोला - भाई इब मैं क्या करुं? तुम्हारे बच्चे हैं ही खिलाडी.. बच्चों के मा .बापों के बहुत अनुनय विनय करने पर ताऊ बोला - भाई देखो, मैं तुम्हारे बच्चों को दो हजार रुपये तो दे चुका हूं ..और मेरी बीस दिन की नींद खराब हो गई...वो मुफ़्त में.

बच्चों के मा बाप बोले - ताऊ आपको हम दो हजार रुपये वापस देदेंगे पर हमारे बच्चों का पीछा छोडो.

ताऊ बोला - अरे भाई बात दो हजार की होती तो कोई बात नही थी. दो हजार तो नगदी गये...बीस दिन की नींद के पिस्से कुण देगा? अगर १५०० रुपये रोज से भी लगाओगे तो तीस हजार रुपये तो मेरी नींद के ही होगये..

अब तो पालक गण खुसर पुसुर करने लग गये कि ये किस ताऊ के चंगुल मे फ़ंस गये? फ़िर भी उन्होने आपस मे सलाह करके, चंदा करके ताऊ को तीस हजार नींद के और दो हजार नगदी यानि कुल बत्तीस हजार वापस देने की हामी भर ली.

ताऊ बोला - अरे बावलीबूचों..३२ हजार से क्या होगा?

कालोनी वाले बोले - ताऊ इब के म्हारी जान लेगा?

ताऊ बोला - देखो भाईयो, इसमे जान लेने देने की बात नही है. आपके बच्चे शैतान हो रहे हैं और आप लोग खुद सोने के लिये उनको घर से बाहर पार्क मे भेज देते हो. और वो हम जैसे बुढ्ढों की नींद खराब करते हैं. अब तो मैं तभी उपाय करुंगा जब तुम लोग मुझे पूरे एक लाख रुपये दोगे.

वो लोग बोले - ताऊ, तुमने क्या लूट समझ रखी है? और मानलो कि तुमको हम चंदा करके एक लाख रुपये दे भी दें तो तुम उन बच्चों को कैसे रोकोगे खेलने से?

ताऊ बोला - देखो भाईयो. ताऊ कोई ऊठाईगिरा तो है नही. अगर मैने उनको एक ही दिन मे खेलने से बंद नही किया तो तुमको एक के बदले दो लाख वापस करुंगा.

अब तो वो सारे सोच विचार मे पड गये. ताऊ का आफ़र भी कोई बुरा या गलत नही दिख रहा था और बच्चों को सुधारने के लिये जहां स्कूलों मे इतनी फ़ीस भर रहे थे वहीं ये ताऊफ़ीस भी उन्होने चंदा करके ताऊ को जमा करवा दी.

ताऊ बोला - भाईय़ो, इब आप लोग आराम से घर जाओ. कल बच्चे आयेंगे तो मैं उनको समझा दूंगा फ़िर उसके बाद वो पार्क मे कभी नही आयेंगे खेलने.

दुसरे दिन बच्चों ने स्कूल से घर आकर स्कूल बैग फ़ेंका और रोज की आदत अनुसार पार्क मे . और बच्चों के माता पिता ने देखा कि आज तो बच्चे बिना खेले ही तुरंत घर वापस आगये.

बच्चों से जब पूछा गया कि वो आज इतनी जल्दी घर वापस कैसे आगये?

बच्चे बोले - अरे आप तो पूछते हो कि आज जल्दी वापस कैसे आगये? कल से तो हम पार्क मे भी नही जायेंगे.

बच्चों के मा - बाप के आश्चर्य का तो ठीकाना ही नही रहा. उन्होने आखिर बच्चों से पूछा कि - ऐसा क्या हुआ है? ताऊ ने तुमको डराया है या कोई भूत प्रेत की कहानी सुनाई है?

बच्चे बोले - अरे उस ताऊ का तो नाम मत लो आप. वो एक नंबर का झूंठा और धोखेबाज है.

पहले तो हमको रोज खेलने के सौ रुपये दिया करता था आज बोला कि - बच्चों मेरे पिछले घोटालों का आफ़िस मे पता चल गया है..और मेरी पेन्शन बंद हो गई है तो अब से मैं तुमको पांच रुपये रोज ही दिया करुंगा.
अब हम कोई पागल हैं कि इतने सारे बच्चे सिर्फ़ ५ रुपये मे उसके लिये रोज खेले. अब तो वो जब रोज के दौ सौ रुपये देगा तभी वहां जाकर खेलेंगे. उससे कम मे नही.

बच्चों के मा बाप ने जाकर ताऊ को धन्यवाद दिया तो ताऊ बोला - अब समझे कि नही? अक्ल बडी होती है या भैस? सारे कालोनी वाले बोले - ताऊ अक्ल बडी होती है.

इस पर ताऊ हंसकर बोला - इब अगली बार आना फ़िर बताऊंगा कि भैंस भी कभी कभी अक्ल से कैसे बडी हो जाती है?



इब खूंटे पै पढो : -

ताऊ सेठ समीरलालजी के यहां ड्राईवर था.  जब समीरजी कलकता जाने लगे तो ताऊ को भी साथ लेगये कि ताऊ वहां का जानकार है, रास्ते वगैरह सब पहचानता
है. कलकता मे पहुंचकर समीर जी होटल मे  शिवकुमार जी मिश्र के साथ
बैठे थे.

समीर जी बोले – यार मिश्रा जी मेरा ड्राईवर ताऊ एक नम्बर का मुर्ख है, और
ताऊ को बुलाकर एक सौ रुपया का नोट देकर बोले – ताऊ जाकर एक लिमोजिन कार खरीद लाओ.

ताऊ ने नोट लिया और – लाया मालिक..कहकर चला गया.

अब शिवकुमार मिश्रजी बोले – अरे समीर जी, आपका ताऊ तो कुछ भी नही. जरा मेरे ड्राईवर गब्बूलाल का हाल देखो, और आवाज लगाई – गब्बूलाल..

जी मालिक..गब्बूलाल आकर बोला.  शिवजी मिश्र ने उसको कहा – गब्बू जा
जरा जल्दी से देखकर आ कि मैं घर पर हूं या नही?

गब्बूलाल – जी मालिक अभी देखकर आता हूं.

बाहर गब्बूलाल को ताऊ खडा मिल गया.  अब ताऊ बोला – अरे यार गब्बू
भाई..मेरा सेठ भी एक नम्बर का सिरफ़िरा है.  मुझे कहता है कि ताऊ…जा
एक लिमोजिन कार खरीद कर ले आ..और अब कहां से खरीदूं लिमोजिन?
आज रविवार होने से लिमोजिन का शोरूम ही बंद है.

अब गब्बू बोला – ताऊ आप सही कहते हो, पर मेरा सेठ भी कोई कम
सिरफ़िरा नही है. मुझे जबरन दौडा दिया कि – गब्बू जा घर पर देख कर आ
मैं हूं या नही? अरे पास मे मोबाईल फ़ोन था.उसीसे फ़ोन करके पूछ लेते कि
वो घर पर हैं या नही? अब ये बडे लोगों को क्या कहो?

महा बाबाओं के तांत्रिक अनुष्ठान और आरती

ब्लाजगत मे राष्ट्रिय आपदा की तरह राहु केतुओं का आतंक छाया हुआ है. अब आप पूछेंगे कि ये राहु केतु कौन? तो भाई ये हैं अनाम कुमार और अनामिका कुमारी.

पीछले कुछ दिनों से आपने देखा होगा कि इन्होने सबको थर्र्रा रखा है. और सही है नंगे के नौ ग्रह बलवान. उडनतश्तरी जी तो इतने भयभीत हो गये कि "बाबा समीरानंद आश्रम में" इनके नाम की सुबह शाम आरती ही शुरु होगई है. आप भी पहुंचिये वहां जाकर आरती मे शामिल हो कर प्रसाद लिजिये.

महाबाबाश्री समीरानंद महाराज


ॐ जय बिन नामी देवा, स्वामी जय बे नामी देवा
तुमको पकड़ न पाये, गुगल की सेवा.

ॐ जय बिन नामी देवा....


यह आरती भी चेचक के टीके की तरह असरकारक हो सकती है. तो जल्दी किजिये वर्ना फ़िर कहेंगे कि आपको खबर ही नही थी और आप भी कहीं आजावो लपेटे मे.

आप सोच ही सकते हैं कि कितना परेशान सब हो रहे हैं. जैसे बारिश के लिये सभी बाबा लोग यज्ञ हवन पूजन शुरु कर देते हैं उसी तरह सभी आश्रमों मे अनाम / अनामिकाओं के इलाज के लिये उपाय शुरु हो गये हैं. राज भाटिया जी ने तो पूरा वैज्ञानिक खोजतंत्र ही शुरु कर दिया. अब शाश्त्री जी का फ़ोन आया ताऊ के पास. और ताऊ से जब राय मांगी गई तो ताऊ बला - इन अनाम अनामिकाओं को पकडने का काम हमारे लिये तो बांये हाथ का खेल है.

शाश्त्री जी बोले - यार ताऊ तुम तो वाकई कोरे हरयाणवी लठ्ठ ही हो? अरे क्या जब हमारी बारात निकल जायेगी तब पकडोगे?

ताऊ बोला - बात ऐसी है कि इसके लिये शमशान साधना करनी पडेगी. अब तक राज भाटिया भी आ चुके थे. वो बोले ताऊ करो जरुर करो.

ताऊ बोला - श्मशान साधना अकेले से नही होगी. साथ मे तुम दोनों को भी चलना पडेगा नहा धोकर और बाबाजी बनकर एक तांत्रिक अनुष्ठान करवाना पडेगा. तब देखना - अनुष्ठान पुर्ण होते होते वो अनाम कुमार या अनामिका कुमारी वहां खुद चल कर आजायेगे. और माफ़ी मांगेंगे..पर हम उसे बोतल मे बंद करके दरिया में डाल देंगे.

अब राज भाटिया जी और शाश्त्री जी इन दकियानुसी बातों मे विश्वास नही करते थे. पर क्या करें? डर के मारे दोनो ने आपस मे विचार विमर्श किया और यह समझा कि लगता है ताऊ इस बहाने हमसे कुछ रुपया पैसा वसूल करेगा. बाकी इन तांत्रिक अनुष्ठानों से कुछ होने वाला नही है. दोनों ने आकर ताऊ से पूछा - इस अनुष्ठान मे खर्च कितना आयेगा?

ताऊ बोला - अरे यारों , आपने मुझे हमेशा के लिये ही ऊठाईगिरा समझ लिया क्या? अरे ठीक है मैं कभी कभी चोरी बेईमानी डकैती कर लेता हूं पर ब्लाग जगत से ऐसा नही कर सकता . खर्चा सब मेरे जिम्मे. बस अगर आप लोगों का काम हो जाये तो आश्रम मे सब लोग मिलकर जितना चाहो लगा देना. पर काम होने के बाद.

तो अब तीनों तैयार होकर यानि बाबा बनकर दुसरे दिन अमावस को श्मशान मे आधी रात को पहुंच गये. गीदडों की हुआं..हुआं की डरावनी आवाज....के बीच तीनों महातपस्वी बाबा पहुंच गये शमशान साधना के लिये. महाबाबाश्री ताऊ आनंद के आचार्यत्व मे अनुष्ठान करवाने के लिये. और क्या करें? आखिर ब्लाग जगत को तबाही से बचाने का भारी बीडा जो ऊठा लिया था.

श्मशान साधना करते हुये तीनों बाबा

बाबा श्री ताऊ आनंद ने हवन मे नमक मिर्च लोबान की पहली ही आहुति डाली तो भाटिया जी और शाश्जीत्री को खांसी छुट गई पर बाबाश्री ने बीच मे बोलने को मना किया हुआ था. और ताऊ बाबा ने उनको सब विधी समझा कर अनुष्ठान चालु कर दिया.

ताऊ बाबा - खट स्वाहा: स्वाहा ..स्वाहा..खट खटाखट आहा.
बाबा भाटिया - ला पकड ला अनाम और अनामिका फ़ट फ़टाफ़ट स्वाहा...
बाबा शाश्त्री - पी जहर का घूंट गट गटागट स्वाहा..

तीनों बाबाओं का सम्मिलित स्वर : हाजिर कर..अनाम/अनामिका को... टपा टप.. शमशान भवानी...डाकिनी..काकिनी..जय श्मशान माई...जल्दी कर..बुला..बुला..फ़ट स्वाहा..स्वाहा..स्वाहा..आहा...

बाबा ताऊ : जल्दी प्रकट होजा...वर्ना मारुंगा चांटा..चट चटाचट स्वाहा..
बाबा भाटिया : मार ही दे ताऊ पट पटापट स्वाहा..
बाबा शाश्त्री : कुछ आवाज आई ठक ठकाठक स्वाहा..

तीनों बाबाओं का सम्मिलित स्वर : हाजिर कर..अनाम/अनामिका को... टपा टप.. शमशान भवानी...डाकिनी..काकिनी..जय श्मशान माई...जल्दी कर..बुला..बुला..फ़ट स्वाहा..स्वाहा..स्वाहा..आहा...

तीनों बाबाओं का सम्मिलित स्वर : हाजिर कर..अनाम/अनामिका को... टपा टप.. शमशान भवानी...डाकिनी..काकिनी..जय श्मशान माई...जल्दी कर..बुला..बुला..फ़ट स्वाहा..स्वाहा..स्वाहा..आहा...

और इस तरह तीनों विभुतियों ने अपने प्राणों कि बाजी लगाकर तांत्रिक अनुष्ठान शुरु कर दिया..तीनों के सम्मिलित स्वर मे गजब का तांत्रिक अनुष्ठान चल रहा था. फ़ट फ़टाफ़ट स्वाहा ....गट गटागट स्वाहा.... चट चटाचट स्वाहा.. ओम गटागट आहा...स्वाहा...

....... फ़ट फ़टाफ़ट स्वाहा ....गट गटागट स्वाहा.... चट चटाचट स्वाहा......... फ़ट फ़टाफ़ट स्वाहा ....गट गटागट स्वाहा.... चट चटाचट स्वाहा.

....... फ़ट फ़टाफ़ट स्वाहा ....गट गटागट स्वाहा.... चट चटाचट स्वाहा. ....... फ़ट फ़टाफ़ट स्वाहा ....गट गटागट स्वाहा.... चट चटाचट स्वाहा.

अब भाटिया जी अचानक चिल्लाये..ताऊ बाबा देखो जरा कोई कट कटाकट स्वाहा..करता हुआ आरहा है. अब ताऊ बाबा आनंद बोले - अरे भाटिया जी..आपने अनुष्ठान के बीच मे बोल कर सारा अनुष्टान ही खराब कर दिया.. बीच मे नही बोलना चाहिये था. अब अगली अमावस पर फ़िर से आकर करना पडॆगा.

शाश्त्री जी बोले - तो ताऊ अगली अमावस तो एक महिना बाद आयेगी?

ताऊ - तो क्या हुआ ? जब तक अनाम कुमार और अनामिका कुमारी को मजे लेने दो. तब तक हम साधना करके अपनी शक्ती बढायेंगे.

भाटिया जी - मुझे मालुंम था ताऊ. तुम ऐसा ही कोई दोष मेरे मत्थे लगाओगे और उनको पकडने नही दोगे.
ठीक है ताऊ अब तुम करते रहना अपना अनुष्ठान..मैं तो अरविंद मिश्रा जी के पास बनारस जारहा हूं वहीं वैज्ञानिक विधि से खोज बीन करुंगा.

अब किसी को अगली बुधवारी अमावश को अनुष्ठान मे शामिल होना हो तो सूचना देवे. हमको विश्वस्त भक्तों की नितांत आवश्यकता है.

और चलते चलते पुछल्ला यह है कि पुरुषों को अब चुगलखोरी के रस का पान करने की आदत डाल लेनी चाहिये. भाईयों उठो जागो और इस पर महिलाओं का एकाधिकार तोड दो. आज यही आपकी सबसे बडी जरुरत है. इस रस के पान से बडी अनन्य तृप्ति प्राप्त होती है यह सु. शेफ़ाली पांडे तो आज कह रही हैं किंतु हरीशंकर जी परसाई वर्षों पहले कह गये हैं. अगर फ़ुरसतिया जी अमेरिका से भारत आये हुये हों तो वो भी इस बात का समर्थन करेंगे.


और अब देखिये यह प्रसिद्ध हरयाणवी लोक गीत, जिसे परफ़ोर्म कर रही हैं प्रसिद्ध रशियन कत्थक नृत्यांगना सुश्री स्वेतलाना निगम. और फ़िर इस गीत को सुन देख कर ताजा दम होकर अनाम /अनामिकाओं की आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना किजिये. क्युंकि अगली अमावस को तो बाबाश्री उसको पकड ही लेंगे और बोतल मे बंद करके दरिया मे बहा देंगे.




परिचयनामा में २ जुलाई गुरुवार को मिलिये : श्री अंतर सोहिल से. शाम 3:33 PM पर

ताऊ को हवाईजहाज मे बैठाने से इन्कार

ताऊ को एक जरुरी कार्य से दिल्ली जाना था और शाम को ही लौटकर आना था. ताई ने सुबह सात बजे ही ताऊ को एयरपोर्ट के बाहर ड्रोप कर दिया. आजकल एयरपोर्ट पर पार्किंग का पैसा ज्यादा लगता है सो ताई बाहर से ही टाटा बाय बाय करके निकल गई और ताऊ एयरपोर्ट के अंदर.

ताऊ के पास कैट एयरवेज ( नोट करें कि यह रामप्यारी की माल्कियत की एयर लाईन नही है.) का कन्फ़र्म टिकट था. सीधे जाकर बोर्डिंग पास लिया और वेटिंग लाऊंज में जाकर जहाज मे बैठने की घोषणा होने का ईंतजार करने लगा.

ताऊ अपने विचारों मे खोया था कि दो मुस्टंडे आये..दिखने मे तो मुस्टंडे नही थे पर उन्होने ताऊ के साथ व्यवहार मुस्टंडों जैसा ही किया .इसलिये अभी से उनको मुस्टंडे कहना कोई गैर वाजिब नही है. पर थे वो कैट एयरवेज के एयरपोर्ट पर तैनात कर्मी ही.

उनमे से एक ने ताऊ के कंधे पर हाथ रखा और कहा : आप इस फ़्लाईट से नही जा सकते. ताऊ एक बार तो सन्न रह गया...सोचा कहीं..राज भाटियाजी ने अपने पैसे वसूली के लिये कोई भाई को सुपारी तो नही दे दी? अब ताऊ क्या करे? ताऊ का लठ्ठ तो सिक्युरिटी चेक करते समय बाहर ही रखवा लिया गया था. अब बिना लठ्ठ तो ताऊ भी पढे लिखों जैसा शरीफ़ लग रहा था...तो उनकी इतनी हिम्मत तो होनी ही थी.

ताऊ ने फ़िर शांति से सोचा और उनसे पूछा : भाई, क्या तुम्हारे पास मेरे नाम का वारंट हैं? जो मैं इस फ़्लाईट से नही जा सकता?

वो बोले - ताऊ देख, इस फ़्लाईट मे जगह नही है.

ताऊ बोला - भाई, ये क्या बात हुई? कन्फ़र्म टिकट खरीदा...बोर्डिंग पास लिया...सिक्युरिटी चेक करवाया..और इब तुम ये बात बता रहे हो?

वो बोले : देख ताऊ, तेरी सब बात सही है. बात ये है कि आज की इस खेप के टिकट ज्यादा बिक गये..और तेरे जैसे सारे ही आगये बैठने के लिये..तो अब तू शराफ़त से बाहर निकल ले.

ताऊ को तो उपर से नीचे तक मिर्च लग गई पर बिना लठ्ठ सब बेकार. ताऊ बोला : देख भाई मन्नै जाना जरुरी है और इब तू किसी दूसरे को मत लेजा..मुझे तो ले चल यार.

वो बोला : ताऊ अब बहुत होगया..अब सीधे से बाहर की तरफ़ प्रस्थान करले.

फ़िर ताऊ ने उनको बताया कि देखो मैं बहुत बडे वाला महाताऊ हूं..सारे ब्लाग जगत का ताऊ हूं..मेरे से मत उलझो..

वो बोले - ठीक है यार ...होगा..तू होगा महाताऊ किसी ब्लाग इलाग जगत का..उससे हमको क्या? ..अब फ़टाफ़ट बाहर निकल ले.

ताऊ बोला - ठीक है लिखकर दे दे तब निकलूंगा बाहर तो.

वो बोले - ये ले ताऊ, लिख कर देदेते हैं. तू हमारा क्या कर लेगा...

ताऊ को बडा बेआबरू करके वेटिंग लाऊंज से बाहर कर दिया गया....ताऊ को अब समझ आया कि ये हवाईजहाज मे हथियार वगैरह क्युं नही लेजाने देते? आदमी को एक दम बकरा बनाकर ले जाते हैं. बिना लठ्ठ ताऊ भी अपने आपको निरीह बकरा ही समझ रहा था.

ताऊ को जाना जरुरी था सो बाहर निकल कर एक दुसरी कंपनी की टिकट लेकर उसके जहाज मे बैठ गया.



अब ताऊ को बडी ग्लानि होरही थी. जहाज उपर करीब ३० से ३५ हजार फ़ीट ( मैने नापा नही, अंदाज से बता रहा हूं. अब कोई सरकारी बस तो है नही, जहाज है तो इतनी ऊंचाई पर तो उड ही रहा होगा. ) की ऊंचाई पर उड रहा है...ताऊ की इच्छा हो रही है कि जहाज के गलियारे में चहल कदमी करने की...पर ताऊ को इजाजत नही है...ताऊ मन ही मन सोचता है..अरे बावलीबूच ताऊ..५० फ़ीट के गलियारे मे क्या चक्कर काटेगा? कहीं काफ़ी पिलाती एयर-होस्टेस से टकरा गया तो? पहले तो वेटिंग लाऊंज से ही बाहर धकेला गया था अब उपर से ही नीचे धकेले जाने का सोच कर ही ताऊ के ठंडे पसीने छूट गये.

ताऊ सोचने लगा कोई कानूनी कार्यवाही तो करनी ही पडेगी.


तीन लाईना :-

ताऊ ने सोचा, आज तो अपनी इज्जत का फ़ालूदा होगया
अरे बावलीबूच, जरा ये तो सोच कि फ़ोकट मे मूंह मीठा होगया.
लोग क्या कहेंगे? कहने दो, अपना तो नाम होगया.



अच्छा भाई जाता हूं अब किसी समझदार से सलाह करने. और इब खुंटे पै देखो यो हरयाणवी रामायण.



कल मिलिये हमारे मेहमान से:-

परिचयनामा मे मिलिये श्री योगेश समदर्शी से
पढिये ताऊ के साथ एक दिलचस्प मुलाकात का ब्योरा
और सुनिये उनकी कविता :

 

उग आई आंगन कई, मोटी सी दीवार
कितना निष्ठुर हो गया, आपस में परिवार
चिडिया सब चुप हो गई, कग्गे भये निराश
अबकी लौटा गांव तो, बरगद मिला उदास


गुरुवार २५ जून २००९  शाम ३:३३ PM
 

लोमड जी की पूंछ

प्यारे भतिजों और भतिजियों आप सबको घणी रामराम.

एक बार एक लोमड जी, छुट्टी के दिन, दोपहर मे चकाचक खा पीकर सोये. शाम को ५ बजे ऊठे और तभी उनकी अर्द्धांगिनी श्रीमती चंपा देवी लोमडी चाय ले कर आगयी. वैसे रोज शाम को दोनों पति पत्नि चाय पीने के बाद शाम की सैर पर जाया करते थे. लोमड जी की अच्छी तगडी कमाई वाली यानि मलाईदार सरकारी नौकरी थी. दोनो पति पत्नि घणे मजे मे चकाचक दिन काट रहे थे.

आज शाम को कूछ मेहमान आने वाले थे सो लोमड जी के साथ चंपा लोमडी नही गई. वो घर पर ही मेहमानवाजी की तैयारियों के लिये रुक गई और लोमड जी बन ठन कर शाम की सैर को निकल गये. कई दिनों से लोमड जी पर जंगली कुत्तों की नजर थी. बडे हट्टे कट्टे थे सो कुत्ते भी उनको चखने की ताक मे थे. आज अकेले दिख गये सो जंगली कुत्तों ने घेर लिया. और अपने को घिरा देखकर घंमंड मे डूबे लोमड जी भाग लिये. आगे आगे लोमडजी और पीछे २ जंगली कुत्ते.

सामने एक छोटी सी गुफ़ा नजर आई , लोमडजी जान बचाने को उसमे घुस गये. वहां जैसे तैसे उनकी जान मे जान आई तो उन्होने अपने आप को चेक किया कि कहीं कोई सा अंग कुत्ते चबा तो नही गये? अपने पूरे शरीर को सुरक्षित पाकर लोमड जी खुश हो गये. अब उनकी दिलचस्पी इस बात मे बढ गई कि उनके शरीर के किस अंग ने उनको जान बचाने मे सहायता की और किसने उनको इस आफ़त मे फ़ंसाया? यानि लोमड जी अपने शरीर से ही कुंठित और लुंठित हो गये.

सबसे पहले लोमड जी ने अपने पैरो को पूछा - ऐ मेरे पैरों, ये बताओ कि मेरी जान बचाने मे तुम्हारा क्या योगदान है?

चारों पैर जानते थे कि लोमड जी ठहरे सरकारी सांड. क्या पता क्या फ़रमान सुना डालें? कहीं पैर कटवाने का ही फ़रमान ना दे डालें? सो चारो पैरों ने एक साथ गुहार लगाई - माई बाप, नदी नाले और चट्टानों को पार करते कराते आपको इस सुरक्षित जगह पर हम ही लाये हैं हुजुर.

लोमड जी : शाबाश मेरे शेरों. जियो और इसी तरह हमारी सेवा करते रहो. और अब उनका धयान अपने कानों की तरफ़ गया. उन्होने अपने कानों से पूछा : ऐ मेरे कानों , बताओ, तुमने भी कुछ किया या युं ही मेरे सर पर भार बन कर बैठे हो?

कान बेचारे घबरा गये. क्या पता यह सनकी सिलेंडर लोमडजी उनको कटवाने का ही फ़रमान ना दे डाले? सो वो बोले - हुजुर, सबसे पहले खतरे को भांप कर हमने ही पैरों को भाग निकलने का इशारा दिया और बाद मे किस दिशा से खतरे की आवाजे आ रही हैं? उनको सुनकर उनसे बचाते हुये हम ही आपको यहां ले आये हैं माई बाप.

लोमड जी : अच्छा अच्छा वैरी गुड..वैरी गुड. तुमने बहुत अच्छा काम किया है. और अब उन्होने अपनी आंखों से यही सवाल किया. अरे मेरी बटन जैसी आंखों तुमने मेरी जान बचाने को कुछ किया या खतरा देखकर आंखे बंद कर बैठ गई थी?

दोनों आंखे भी इस पागल से डर गई कि कहीं हमको निकलवा कर फ़ेंकने का ही हुक्म ना दे डाले. सो वो हाथ जोडकर बोली : सरकार, हमने ही चारों तरफ़ देख कर रास्ता सुझाया और इस सुरक्षित गुफ़ा तक हम ही आपको लाई हैं सरकार.

लोमडजी ने आंखों की भी प्रसंशा की.

अब लोमड जी किसी मे भी दोष नही निकाल पाये और ये उनकी शान के भी खिलाफ़ था. हर बात का दोष मातहतों पर डालने की आदत जो थी. अपने सभी अंगों की प्रसंशा करने के लिहाज से वो अपनी पीठ थपथपाया चाहते थे कि उनकी नजर अपनी पूंछ पर पडी.

बस लोमड जी को अपना गुस्सा निकालने का बहाना मिल गया. बडे व्यंग से से बोले - क्यों प्यारी पूंछ रानी? तुमने क्या किया? तुम तो बोझ बनकर मेरी पीठ से चिपकी रही? अरे तुम्हारा बस चलता तो तुमने तो मुझे कुत्तों से पकडवा ही दिया होता ? और लोमड जी ने बेचारी पूंछ को इतनी जली कटी सुनाई जैसी नई बहु को उसके सास और ससुर सुनाया करते हैं.

अब क्या था? पूंछ रानी भी नई बहु की तरह आखिर कब तक गालियां खाती? वो भी नई बहु समान अपनी औकात मे आगई. ठीक है इतनी गालियां खाने के बाद और इतनी जलालत ऊठाने के बाद तो नई बहु भी अपनी जान की परवाह छोड देती है. सो उसी तरह पूंछ भी बोली - हां... हां... मैने ही कुत्तों को कहा था कि तुझे आकर खा डालें. अब करले क्या कर लेगा मेरा?

बस सास ससुर की तरह लोमड जी के तन बदन मे आग लग गई और जैसे नई बहु को धक्के दे के बाहर निकाला जाता है वैसे ही लोमड जी ने अपनी पूंछ को हुक्म सुनाया : दफ़ा हो जाओ मेरी नजरों से. चलो बाहर निकलो यहां से अभी.

और जैसे नई बहु को धक्के देकर बाहर निकाला जाता है उसी तरह से लोमड जी ने अपनी पूंछ को धक्के मार कर गुफ़ा से बाहर दिया.

बाहर तो कुत्ते घात लगाये तैयार ही बैठे थे. उनको मालूम था कि आखिर इस छोटी सी गुफ़ा मे लोमड जी कितने देर रुक सकेंगे? पूंछ के बाहर दिखाई देते ही तुरंत कुत्तों ने पूंछ को पकड कर लोमड जी को बाहर खींच लिया और उनको देखते ही देखते चट कर गये.



इब खुंटे पै पढो :-

एक सीधे साधे आदमी को एक नेताजी ने कुछ ज्यादा ही तंग किया तो उस आदमी ने गुस्से मे
आकर नेताजी को उल्लू का पठ्ठा कह दिया. नेताजी गुस्से मे लाल पीले होगये और उस आदमी
को सबक सिखाने की ठान ली.

लिहाजा नेताजी ने श्री दिनेश राय द्विवेदी जी को वकील बना लिया और उस आदमी पर अदालत
में मुकदमा ठोक दिया. वकील साहब ने नेताजी को कहा कि गवाह पक्का होना चाहिये.

नेताजी बोले - वकील साहब, आप फ़िक्र ही मत करो. उस समय ताऊ वहां मौजूद था, और उसके
सामने ही उसने मुझे उल्लू का पठ्ठा कहा था. और ताऊ तो युं भी मेरा ही आदमी है उसके सारे
उल्टे सीधे धंधे मेरी कृपा से ही चलते हैं.

वकील साहब ने तसल्ली के लिये ताऊ से पूछा तो ताऊ बोला - सच को सच कहने मे क्या दिक्कत है? उस आदमी ने नेताजी को सरे आम उल्लू का पठ्ठा कहा था, मैं पक्की गवाही दूंगा.

अदालत मे मुकदमा शुरु हुआ. बचाव पक्ष के वकील ने जिरह शुरु की. उसका तर्क था कि मेरे
मुव्वकिल ने उल्लू का पठ्ठा शब्द अवश्य इस्तेमाल किया था पर वो नेताजी के लिये नही था.

वहां पर सैकडों लोग और भी थे और उसने हाथ वगैरह का कोई इशारा भी नही किया था.

द्विवेदी जी को बस इसी मौके की तलाश थी. उन्होने ताऊ को बतौर गवाह पेश किया और उससे पूछने लगे कि क्या माजरा हुआ था?

ताऊ : हुजुर जज साहब, मैं कसम ऊठाकर कहता हुं कि इस आदमी ने सरे आम नेताजी को
उल्लू का पठ्ठा कहा था.

उस आदमी का वकील बोला कि - ताऊ, क्या इस आदमी ने कोई हाथ से इशारा किया था?

ताऊ बोला - बिल्कुल नही.

वकील साहब - वहां और भी सैकडों लोग थे तो तुम कैसे कह सकते हो कि इसने नेताजी को ही उल्लू का पठ्ठा कहा था?

ताऊ - क्योंकि वहां नेताजी को छोडकर दुसरा कोई उल्लू का पठ्ठा था ही नही.


कल गुरुवार को पढिये डा. रुपचन्द्र शाश्त्री " मयंक" से ताऊ की अंतरंग

बातचीत

गुरुवार 4 जून 2009 को सुबह 5:55 AM पर

मुरख से भगवान बचाये : ताऊ

ताऊ का लंबा चौडा कारोबार था जिसमे खेतीबाडी, बसों की माल्कियत आदि कई धंधे शामिल थे. ताई भी घरेलू महिला थी. एक लडकी, पढा लिखा कर उसकी शादी करदी. वो अपनी दुनियां में मस्त. और एक लडका था ताऊ को.

ताऊ के पास रुपया कमाने वाली अक्ल तो बहुत ही थोक मे थी पर पढने लिखने वाली अक्ल से ताऊ का पाला नही पडा था. पर ताऊ के लडके मे पढने लिखने की अक्ल कुछ पैदायशी तौर पर ही थी सो वो किम्मै घणा पढ लिख गया.छोरा पढ लिख लिया तो स्वाभाविक रुप से कन्याओं के माता-पिताओं के कान भी खडे होने लग गये. इतना पढा लिखा होनहार लडका और ताऊ जैसे धन्ना सेठ का जैसा खानदानी पैसा वाला घर. और क्या चाहिये किसी कन्या के बाप को?

ताई को भी बडा चाव था बहु का. वो भी सही था. क्योंकि जिंदगी मे पहली बार सास बनने का सुख किसी स्वर्ग के सुख से कम नही होता. और ये तो कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है. ताई ने अनेक सुशील संभ्रांत घरानों की लडकियां देखी पर ताऊ ने सबको मना कर दिया. आखिर ताऊ का राज समझ मे आया…ताऊ उसी लडकी से अपने लडके का रिश्ता करना चाहता था जिस लडकी का बाप ताऊ से ऊंची हैसियत रखता हो.

अब ताऊ ने अपना लठ्ठ ऊठाकर और मूंछों पर ताव देते हुये एक चौधरी साहब की बेटी ढूंढ ही ली जिसके बाप के पास अथाह दौलत थी. यानि ताऊ से पांच गुनी हैसियत थी लडकी के बाप की. लडकी बिल्कुल अंगूठा छाप..और रईस बाप की औलाद….ताई ने भी मना किया….लडके ने बहुत मना किया. लडका किसी कीमत पर ही तैयार नही हुआ.

उसे ताऊ ने समझाया – अरे बावलीबूच..क्यों आई लक्ष्मी को ठोकर मारता है? तेरे को कौन सी नौकरी करवाने की जरुरत है? घर ही तो संभालना है. भगवान का दिया सब कुछ है…लडकी सुंदर है..थोडी उज्जड और गंवई है सो यहां रहेगी तो सब फ़रवट हो जायेगी. और फ़िर इस खानदान की लडकी से ब्याह करने को तो बडे बडे लोग भी तरसते हैं.

ताऊ के सामने देवताओं कि नही चली तो ताई और लडके का विरोध ताऊ के सामने क्या चलता? सो ताऊ ने तगडा माल वसुलते हुये धूमधाम से शादी कर दी. अब लडकी अनपढ थी . ससुराल मे सबसे तू तडाक से बात करती थी. ताऊ को सीधे ही..ओ ताऊ..चल रोटे पाड ले..घणी देर तैं ठण्डे हो रे सैं….बात तो ताऊ को चुभती थी..कि ये मुझे पिताजी क्यों नही पुकारती? पर ताऊ बोले तो किसको बोले?

और ताई को पहले ही दिन कुछ युं बुलाया – अरे ओ बुढिया..तैं के बैठी बैठी माला फ़ेरण लाग री सै? चल जल्दी तैं यो भरोटा ( गठ्ठर ) ऊठा और सानी ( पशुओं का चारा ) काट ले. ताई ने उसको समझाया कि बेटी, इस तरह तू तडाक से मत बोला करो. ये अच्छी बात नही है. सबको आप और जी लगा कर बुलाया करो. बहु बोली - जी ठीक सै माताजी. इब इसी तरियां सम्मान पुर्वक ही बुलाऊंगी सबको.

एक दिन पशुओं के बाडे मे से भैंस का पाडा सांकल तुडाकर भीतर घर के आंगन मे आगया. उसके अंदर आते ही बहु जोर से चिल्लाकर बोली – अरे सास जी, देखोजी भैंस जी का पाडा जी खुल कर घर मे आगया जी.

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ताई ने आकर भैंस के कटडे को पकडा और बोली – बिनणी, भैंस और पाडे को जी लगाने की जरुरत नही है. समझी?

बहु बोली - जिस्यो सासुजी को लाडोजी, बिस्यो भैंस जी को पाडोजी. तो मैने क्या गलत कहा सासुजी? बहुत बहस के बाद ये बात अनपढ बहु के समझ आयी. और बहु की तेज और ऊंची आवाज से चिढकर ताई बोली – बिनणी, जरा धीरे बोला करो. बहु बेटी को इतनी जोर से चिलाकर बात करना शोभा नही देता. बहु बोली – बिल्कुल सासुजी, इब मैं बिल्कुल दबी जबान मे ही बात किया करुंगी.

अब एक दिन लम्बे चौडे घर मे एक तरफ़ आग लग गई. बहु चुपचाप खडी तमाशा देख रही है. धुंआ जब ज्यादा फ़ैला तब ताई को खबर हुई और वो आकर चिल्लाई – अरे बिनणी, तू इतनी देर से खडी तमाशा देख रही है? जब आग लगी थी तभी चिल्लाकर सबको बुलाना था ना? अब आग कितनी फ़ैल चुकी है?

बहु बोली - सासुजी, आपने ही तो कहा था कि बहु बेटियों को आहिस्ता २ बोलना चाहिये? मैं कितनी देर से धीरे धीरे बुला रही हूं सबको – कि कोई आजाओ..हमारे यहां आग लगी है. पर कोई सुनता ही नही ? यहां सब कैसे लोग हैं?

ताई ने अपने भाग्य को कोसते हुये कहा - मुर्ख को टका (रुपया) देदेना चाहिये पर अक्ल नही देनी चाहिये.



कल गुरुवार सुबह ५:५५ AM पर परिचयनामा मे मिलिये प.डी.के. शर्मा “वत्स” से.

ताऊ के साथ पंडितजी कि अंतरंग बातचीत.

इंतजार की घडियां खत्म. कल सुबह ५:५५ AM

भूलियेगा मत.

पंडित जी से बिल्कुल सीधी बातचीत