मैने भी ऐसे ही कुछ डुडल्स के रुप मे अपने भाव, मेरी डायरियों मे समय समय पर बेतरतीब रुप से लिख रखे हैं ! उनमे से चंद कविताएं मैने सुश्री सीमा गुप्ता जी को ठीक करने के लिये भेजी थी ! जो उन्होने बडे अनुग्रह पुर्वक ठीक करके भेजी हैं ! मैं उनका बहुत आभारी हूं ! बिना उनके मार्गदर्शन के ये कविताएं यहां तक इस रुप मे पहुंचना मुश्किल था !
ये मेरी पहली कविता है हवा और चांदनी
रात के आँचल तले,
खिड़की दरवाजों को सुला
खामोशी की चादर में सिमटा
ख्बाबों मे खोया था
कांच की खिड़की पे
चुपके से कदम रख
चाँद की चांदनी
मेरे पास उतर आई
और असहाय हवा
सारी रात दरवाजे पर खडी
दस्तक देती रही....
( मार्गदर्शन हेतु माननिया सीमा गुप्ता जी का आभार )