हर चीज है आनी जानी
मेरे साथ मगर प्रकृति ने
अपना नियम नही निभाया
मैने किया स्वागत जब
बुढापे ने द्वार मेरा खटखटाया
मैं नादान समझे बैठा था
नियम के तहत ही तो है आया
कुछ दिन करेगा बसेरा अपना
और छोड चला जायेगा
पर हाय रे प्रकृति का दगा
बुढापा अपना घर समझ
साथ मेरे था रहने आया
(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)