थम भी सुण ल्यो ! म्हारै स्कूल म्ह एक मास्टर जी थे ! मास्टर का नाम था
किशन लाल ! और भई म्हारै मास्टर जी थे एक दम सफ़ाचट यानी बिल्कुल
गन्जे ! और हम भी मास्टर जी को उनके पीछे से गन्जे मास्टर या गन्जे सर ही
बुलाया करै थे !
और मास्टर जी की घर आली को सारे गाम के लोग मास्टरनी कह कै बुलाया करते थे ! और इब थमनै के बताऊं ? यो मास्टरनी जी थी एक आंख तैं काणी ! मास्टर जी का रहण का कमरा भी वहीं स्कूल म्ह ही था ! इब एक बार नु हुया कि सर्दी के दिन थे ! मास्टर जी ने बाहर धूप म्ह ही क्लास लगा रखी थी ! और भई वो जनवरी फ़रवरी पढाण लाग रे थे ! |
इब मास्टर जी रामजीडा लन्गड तैं पुछण लागे - अर लन्गड नु बता की अक्टुबर म्ह
कितने दिन हुया करैं ?
लन्गड बोल्या - मास्टर जी १३ दिन हुया करैं !
गन्जा मास्टर बोल्या - अर क्युं कर ?
लन्गड बोल्या - अजी मास्टर जी , इस महिने म्ह १८ दिन तो दिवाली
और दशहरे की छुट्टी ही पड ज्यावै सैं ! तो पिटने के दिन तो १३ ही हुये ना !
इब मास्टर जी ने लन्गड को २ रैपटे बजाये और सब लडकों को
ये कविता , अन्ग्रेजी के महिनों के दिन, याद करने को दे दी !
और इस कविता को याद करने मे मास्टर नै हमको कितने ही
बार तो मुर्गा बणाया और भई रैपटे कितने बजाये होंगे ?
इसका हिसाब ही कोनी ! म्हारी हड्डी आज भी गन्जे मास्टर जी
की याद आते ही कडकडाने लगती हैं ! और न्युं समझ ल्यो कि
हमको गन्जे आदमी से ही चिढ हो गई ! जो आज तक नही गई !
याने अपने आप से भी चिढ हो गई !
अप्रैल सितम्बर नवम्बर जूना, पन्द्रह दिन के कहिये दूना, और मास इकतीसा मानूं, केवल फ़रवरी अठ्ठाइसा जानू, चौथे साल लिपियर जब आवे, दिन उन्तीस फ़रवरी कहावै, भाग ४ का जिसमै जाता, लिपियर सन वही कहलाता ! |
इब हम बालक तो ये हाड्ड तुडवाण आली कविता के रट्टे मारण लाग गे !
और मास्टर जी इबी आया हुया अखबार उठाकै बांचण लाग गे !
इतनी ही देर म्ह काणी मास्टरनी चाय ले के आगी और गन्जे मास्टर को
चाय दे के बोली - मास्टर जी कोई नई खबर आई सै के अखबार म्ह !
इब गन्जा मास्टर उसकी काणी आंख की तरफ़ देखता हुआ बोला -
हां, काणीपुर मे आग लाग गी सै !
काणी मास्टरनी भी हाजिर जवाब थी ,
मास्टर के गन्जे सर की तरफ़ देखते हुये तुरन्त जवाब दिया -
फ़ेर तो गन्ज के गन्ज जल गये होंगे !
हम बालक मन ही मन काणी मास्टरनी की बात समझ कै खूब हंसे
और गंजे मास्टर जी खिसिया कर ऊठ कर चले गये !
अच्छा भाई इब ताऊ की राम राम !