हर रूप मे जीती है नारी
कभी पिता , कभी पति,
भाई और संतान के लिए
रूप धर माँ बेटी
बहन और पत्नी का
कभी पिता , कभी पति,
भाई और संतान के लिए
रूप धर माँ बेटी
बहन और पत्नी का
नही जान पाती
कभी अपनी निजता
गुम हो जाती है रिश्तो में
और खो जाते है स्वपन उसके
भूल जाती है पहचान अपनी
रिश्तों की इस अंधी दौड में
और खो जाते है स्वपन उसके
भूल जाती है पहचान अपनी
रिश्तों की इस अंधी दौड में
रात के सूनेपन में
पुकारती है उसकी निजता
उसे कोमलता से
उसे कोमलता से
और वो अश्रु पुर्वक
विदा कर देती है
अपनी पहचान को
अगली रात तक
अगली रात तक
क्या यही नारी है
जिसने
मुझे जन्म दिया है?
जिसने
मुझे जन्म दिया है?