"बगल में लौटा मुंह में पान, बनकर रहेंगे बर्बादिस्तान"
हमने रामप्यारे से पूछा कि भाई अबकि बार तो सर्दी निपटा कर ही छोडेगी क्या? अब रामप्यारे ने जो जवाब दिया वो आश्चर्य चकित करने वाला था. वो बोला - ताऊ, तुम तो लगता है सठिया गये हो...अरे सर्दी है कहां?
उसके द्वारा हमारे लिये सठियाना, संबोधन हमे नागवार गुजरा अत: हमने उसकी तरफ़ आंखे तरेर कर कहा - अबे गधे, ज्यादा मत उछल..कहीं ठंड में पिटा गया तो सारी दुल्लतियां झाडना भूल जायेगा.
वो बोला - ताऊ, जरा रजाई से बाहर निकल कर देखो...तुम तो उल्लू की तरह घर में दुबके रहते हो. अरे देखो..दिल्ली के शाहीन बाग में कितनी गर्मी है? दिल्ली का चुनाव तक गर्मा गया है. कसम से मैं तो रोज वहां चला जाता हूं और वहां इतनी गर्मी मिलती है कि अबकि बार मैंने स्वेटर मफ़लर वगरैह कुछ भी नहीं खरीदा. बस मजे ही मजे हैं.... चलो आज मेरे साथ तुम भी चलो...सारी ठंड नहीं भाग जाये तो मेरा नाम रामप्यारे नहीं.
हमने कहा - ये शाहीन बाग तुम्हें ही मुबारक हो, हम तो यहीं अच्छे..... वो बोला फ़िर ताऊ एक काम करो जरा ईरान अमेरिकी पंगों के बारे में पढा करो....वहां तो इतनी गर्मी है कि तुम बर्फ़ के पानी से नहाने लग जावो तो भी गर्मी नहीं मिटेगी.
हम रामप्यारे का मुंह ताकते जा रहे थे कि यह बक क्या रहा है? हमने कहा तू पागल हुआ है क्या? बेवकूफ़ आदमी, ईरान अमेरिका कितनी दूर हैं? भला वहां के बारे में पढकर गर्मी कैसे आयेगी?
वो बोला - वहां परमाणु बम फ़ोडने की बाते हो रही हैं तो सोचो कितनी गर्मी होगी? जरा महसूस करके देखो.....
हमने कहा - परमाणु बम तो पडौस में पाकिस्तान भी रोज फ़ोडने की धमकियां देता है और वो तो कहता है कि पाव आध सेर छंटाक दो छटांक के बम भी फ़ोड देगा....उससे ही गर्मी नहीं आ रही तो वहां से कैसे आयेगी?
वो बोला - ताऊ, अब ये पक्का तय हो गया कि तुम पक्के सठिया गये हो. कम से कम इतना तो समझो कि उसके पास परमाणु की जगह फ़ुस्सी बम है जो कभी गर्मी नहीं देगा. वो तो खाली पीली चमकाने का काम करते हैं. पाकिस्तान का तो नारा हि यही है कि "बगल में लौटा मुंह में पान, बनकर रहेंगे बर्बादिस्तान". उनकी अर्थ व्यवस्था देखो, जनता का हाल देखो....वो क्या बम फ़ोडेंगे?
हम रामप्यारे का मुंह देखते रह गये और लगा कि उसकी बातों से थोडी बहुत तो गर्मी आने लगी है.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
नार्थ कोरिया अमेरिका सुलह वार्ता में पंच ताऊ
कल दुनियां के शेयर बाजारों में मंदी की बहार छाई रही। हड़कम्पियाने पर कारण पता चला कि ट्रम्प चच्चा ने सूमो पहलवान भतीजे जिसे दुनियां मोटू पहलवान या किम जोंग-उन के नाम से जानती है, को झन्नाट चेतावनी जारी कर दी कि अब सुधर जाओ वरना तेरे घर में घुसकर तेरी ऐसी तैसी कर दूंगा।
अब भतीजा भी कोई कम नही है, पक्का ठस पहलवान ठहरा सो बोला - ओए चच्चा, अपनी औकात में रह वरना तू तो मेरे घर क्या खाके आएगा बल्कि मैं घर में बैठे बैठे ही तुझ पर परमाणु मिसाईल डाल दूँगा फिर तू रोने लायक भी नही बचेगा।
बात कुछ ज्यादा ही बढ़ गई तो जैसा कि सब युद्धों से पूर्व होता आया है, पहले शांति वार्ता अवश्य करवाई जाती है जैसा कि राम रावण युद्ध या महाभारत युद्ध के पहले करवाई गई थी। नियम मुताबिक किसी शांति दूत की तलाश की जाने लगी।
एक प्रस्ताव इस कार्य के लिए चीन का आया की मोटू पहलवान चीन का दोस्त है उसे वही समझा सकता है जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि नार्थ कोरिया और पाकिस्तान तो चीन के ही बिगाड़े हुए हैं। चीन ने मोटू को कह रखा है कि तू अमेरिका को चमकाता रह और पाकिस्तान को भारत को चमकाने का जिम्मा दे रखा है अतः कोई तटस्थ को ढूंढा जाए।
सारी दुनिया पर नजर डालने के बाद आखिर पंचों की सहमति ताऊ के नाम पर बन गई। इन दोनों के मध्य सुलह करवाने के लिए ताऊ ने अथक प्रयत्न करके ट्रम्प और किम मोटे को शांति वार्ता के लिए एक टेबल पर अपने दाएं बाएं बैठा लिया।
बहुत मशक्कत के बाद भी दोनों में से कोई टस से मस होने को तैयार नही हुआ। ट्रम्प ऐसे आंखे मिच मिचा रहा था जैसे आंखों से ही लेजर बम, पहलवान पर डालकर उसे खत्म कर देगा और उधर किम पहलवान किसी घुटे हुए व्यंगकार के पंचों जैसा ताल ठोक कर चुनौती देरहा था। ताऊ परेशान होकर सोचने लगा कि ये दोनों तो मानने वाले हैं नही और अब दुनियां की तबाही पक्की समझो।
दोनों पक्ष पहलवानों की तरह अखाड़े में डटे थे, इधर ताऊ की बुद्धि तेजी से सोचने का काम कर रही थी। अचानक उन दोनों को ताल ठोकते देखकर ताऊ के दिमाग में आइडिया कौंधा और ताऊ बोला - देखो भाई पहलवानों, तुम अपनी झक और दादागिरी जमाने के चक्कर में क्यों इस दुनिया को मिटाने पर तुले हो? तुम एक काम करो कि आपस में फ्री स्टाइल कुश्ती लडलो, जो कुश्ती जीत जाएगा, यह दुनियां उसी की दादागिरी स्वीकार कर लेगी और परमाणु तबाही से भी बच जाएगी।
ताऊ का प्रस्ताव दोनों ने मान लिया और दोनों अखाड़े में कूद पड़े। कुश्ती शुरू करने के लिए...रेफरी ताऊ ने व्हिसल बजाई....दोनों अखाड़े में ऐसे गोल गोल घूमने लगे जैसे कुत्तों की पूंछ के नीचे पेट्रोल लगा फाया रख दिया गया हो....तभी किम ने फुंफकारते हुए ट्रम्प की तरफ किसी सधे हुए व्यंगकार के जैसा पंच मारने के लिए दौड़ लगादी, ऐसा लगा कि इस पंच से अब ट्रम्प का बचना मुश्किल ही नही नामुमकिन है....तभी पुराने चावल ट्रम्प ने ना केवल पंच बचाया बल्कि मोटू के सीने पर एक घुटे हुए व्यंगकार के पंच जैसा मुक्का जमा दिया…........ ये लो...ये क्या क्या हुआ? हमारी नींद ताई के लठ्ठ से खुली जो लठ मारते हुए बोले जा रही थी कि सबेरे के साढ़े आठ बज गए....आफिस कौन जाएगा?
ये ताई का लठ्ठ भी हमारे उन सपनों को चकनाचूर कर देता है जिनमें हम कोई अंतरराष्ट्रीय महत्व का काम करके नोबल शांति पुरस्कार पाने का जुगाड़ कर रहे होते हैं।
#हिन्दी_ब्लागिंग
कुछ आर्थिक चिंताए भविष्य की
आज कल सब जगह दास केपिटल , पूंजीवाद और मार्क्स वाद की बाते और उनको समझने की चिंताएं सब तरफ़ लगी हुई हैं ! और ताजा विषय या समस्या भी आज कल यही है ! जाहिर सी बात है की चर्चा भी इसी पर होगी ! अनवरत पर श्री द्विवेदी जी भी लगातार दास केपिटल को याद कर रहे हैं ! भाई पित्सबर्गिया ने फिरंगियों के यहाँ आए इन खतरनाक परिणामो की तरफ़ ध्यान खींचा है !
ये पोस्ट मैं ३० अक्टूबर भाई दूज को लिख रहा हूँ ! आज छुट्टी है ! दीपावली की व्यस्तता भी निपट गई है ! बिल्कुल फुर्सत है ! और आज जम कर आराम करने का दिन है ! ब्लॉग जगत में पोस्ट का अकाल पडा है ! इसी कमी को पूरा करने के लिए हम लगातार यह छठी पोस्ट आज लिख रहे हैं ! :) वैसे अनूप शुक्ल जी ने आज भी चिठ्ठा चर्चा का क्रम नही टूटने दिया ! आज चिठ्ठा चर्चा करना था हमारे गुरुदेव समीर जी को ! पर वो आज सुबह सुबह सुदर्शनाओं के पीछे निकल लिए और भूल ही गए चिठ्ठा चर्चा भी करना है ! पर ये मैं किधर निकल लिया ? अनर्थ (अर्थ) की बात करते २ कहाँ आ गया ?
आज ही कई ऐसे ब्लाग्स पर भी जाने का समय मिला जहाँ व्यस्तता की वजह से जाना नही होता ! एक ब्लॉग पर चिंता दिखाई गई है की अमेरिका की बेवकूफियों की सजा हम क्यों भुगते ? बात तो देखने में बिकुल सही लगती है ! पर मैं एक बात कहना चाहूँगा की जब दुनिया की जी. डी. पी. का २५ प्रतिशत अमेरिका से आता है तो आप अमेरिका की परेशानियों से ख़ुद को अलग कैसे कर सकते हैं ! तो आप को ये समझना चाहिए की समस्या तो पैदा हो चुकी है अब वो चाहे जिसकी भी बेवकुफ्फियाँ रही हों ! आख़िर आज हमको इस मुकाम तक या कहे इस मंजिल तक पहुंचाने में भी इन्ही बेवकूफों का हाथ है ! आप या मैं इससे इनकार नही कर सकते ! इस स्थिति को आप मा. चंद्रशेखर जी के समय गिरवी रखे गए सोने से अच्छी तरह समझ सकते हैं ! वो समय हर भारतीय के लिए बड़ा पीडा दायक था ! आप कहाँ से कहाँ आ गए हैं ! ज़रा सोचिये इन्ही बेवकूफों का डालर आप पर बरसा था ! ये अलग बात है की आई.टी. के बदले बरसा ! पर बरसाने वाले बादल तो इन बेवकूफों के ही थे !
आज कल बैंको के बारे में भी अच्छी खासी चर्चा हो रही है ! और इस बारे में श्री द्विवेदी जी की उपरोक्त पोस्ट में और टिपनीयो में भी अच्छी चर्चा है ! लाख टके का सवाळ है की हमारे बैंक वर्त्तमान परिदृश्य में कितने सुरक्षित हैं ! एक निजी बैंक की संभावित समस्याओं के बाद रिजर्व बैंक और वित्-मंत्री जी ने उनके सुरक्षित होने की बात कही ! इस बात पर कितना विश्वास करे और इस ग्लोबलाइजड दुनिया में हमारे बैंक वाकई कितने सुरक्षित हैं ? इस प्रश्न का उत्तर मुझे साफ़ तो नही ही दीख रहा है !
क्या किसी ने कल्पना की थी की अमेरिका की तेजी से बढ़ती गिरवी संपतियां एक बारूद का ढेर थी जो किसी भी वक्त फट सकती थी ! ज्यादातर आर्थिक मुसीबतों के साथ यही होता है ! तुंरत रिजर्व बैंक ने सभी बैंको से उनके लीमन से प्रभावित होने का आंकडा पूछा की वो कितने खड्डे में हैं ? लेकिन लीमन तो इस मुसीबत का एक ज़रा सा हिस्सा भर ही है !
जब बैंक सीधे कर्ज देते हैं तो उनको कर्जदार की हैसियत और जोखिम पता होती है ! लेकिन बैंक जब डेरेवेटिव में पैसा लगाता है या इनमे काम करने वाले को पैसा देता है तो वो यह अधिकार खो बैठता है ! सीधे शब्दों में उसे रिस्क की डिग्री ही पता नही चल पाती ! जयादा से ज्यादा नॉन फंड आमदनी करने के लिए अपनी बेलेंस शीट से भी ज्यादा देनदारिया खरीद लेते हैं !
और असली चिंता की बात यहीं से शुरू होती है ! इसके अलावा भी प्रतिस्पर्धा के नाम पर बैंको ने जिस तरह क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन बांटे हैं ! उनका बैंको पर क्या प्रभाव होगा ! असल में बैंक थोक कर्जे की डिमांड कम होने पर रिटेल कर्जो की तरफ़ आकर्षित हुए उसके पीछे कारण यही था की रिटेल कर्जे एक साथ नही डूब सकते ! और दुर्भाग्य से अमेरिका में हुबहू यही हुवा और वहाँ मौजूद वर्तमान सब प्राईम संकट की ये ही शुरुआत थी !
क्या भारतीय परिपेक्ष्य में क्रेडिट कार्ड का लोन कोई संकट तो नही खडा करेगा ? रिटेल लोन के चक्कर में जिस मुक्त हस्त से क्रेडिट कार्ड बांटे गए हैं , और बांटे जा रहे हैं वो अगर विस्फोटक हुए तो बड़ी मुश्किल हो सकती है ! इनकी वजह से खर्चो में बढोतरी हुई है ! कितने कार्ड्स का लोन इधर से उधर ट्रांसफर हो रहा है ! ये भी कहना मुश्किल होगा की कितना पैसा लौटेगा और कितना डूबेगा ? अगर इस में कोई तीन /चार लाख करोड़ बेलेंसशीट का बैंक डूब गया तो क्या होगा ! एक लाख तक की राशि बीमित है ! इस अनुमान से अगर ऊपर की बेलेंसशीट का बैंक राम नाम सत्य कह देता है तो क्या वो बीमा कम्पनी इतनी बड़ी राशि चुकाने की भी हैसियत रखती है ? मुझे लगता है की आगे पीछे समस्या कहीं ना कहीं से तो मुंह उठायेगी ही !
अभी कुछ समय पहले तक सरकारी बैंको में कुछ की हालत काफी ख़राब थी पर वहाँ कोई भी कभी पैसा निकालने नही पहुंचा ! आज भी सरकारी बैंको में आदमी का ज्यादा भरोसा है ! इस संकट के पैदा होने के बाद की एक रिपोर्ट के अनुसार कुछ सरकारी बैंको की फिक्सड डिपाजिट में १५ से २० % की तेज बढोतरी दर्ज की गई है ! जाहिर सी बात है यह रकम शेयर बाजार या निजी बैंको से निकल कर आ रही होगी !
परन्तु हाल के सब प्राईम घोटाले के उजागर होते ही हमारे यहाँ के एक निजी बैंक के बाहर लाइन लग गयी थी जमा रुपया वापस पाने को ! सारे एटीएम भरने से पहले खाली होने लगे थे ! जबकि वो मात्र अफवाह ही थी ! ऎसी ही अफवाहे किसी रोज बड़ी आफत भी खडी कर सकती हैं ! यहाँ एक बात यह भी सोचने लायक है की इन निजी बैंको के बोर्ड में एक प्रतिनिधी रेग्युलेटर की तरफ़ से भी नियुक्त होना चाहिए , जिससे समय रहते किसी अनहोनी का पता चल जाए ! अब ये अलग बात है की इसमे कानूनी दांव पेच हो ! अपनी आजादी पर कौन अंकुश चाहेगा !
असल में दो और दो तो चार ही होते हैं पर यहाँ वर्त्तमान खेल में दो और दो को पाँच सिद्ध करने की कवायद है ! इसीलिए इसको समझना और समझाना भी थोड़ी टेडी खीर ही है !
क्या ये आर्थिक मंदी की शुरुआत है ?
आज के सभी अखबार बाजार के पिछले दो साल के न्यूनतम स्तर दस हजार के नीचे बंद होने को लेकर रंगे पड़े है ! कल फिरंगियों के साथ २ म्युच्युअल फ़न्डो ने भी जम कर बिकवाली की ! आन लाइन ट्रेडिंग की शुरुआत से ही मैं कंप्यूटर स्क्रीन देखने का अभ्यस्त रहा हूँ , पर कल जिन शेयर्स को मैं स्क्रीन पर देख रहा था उनमे आई बिकवाली किसी भूचाल से कम नही लग रही थी ! कंपनियों के कमजोर नतीजे, बढ़ती बेरोजगारी, और चरमराती अर्थव्यवस्था कुछ चिंताएं तो अवश्य पैदा कर रही है ! कुछ बाजार विश्लेषक यह भी मान रहे हैं की ज्यादातर वितीय संस्थान अपनी स्थिति सपष्ट नही कर रहे हैं इस वजह से ये मंदी कितनी भयावह हो सकती है इस बात का अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल हो रहा है !
कुछ लोग इस मंदी की तुलना १९३० की महा मंदी से करने लगे हैं ! वो मंदी भी अमेरिका से शुरू हुई थी ! अमेरिकी शेयर बाजार ने १९२३ में चढ़ना शुरू किया था और निरंतर बढ़ते हुए २४ अक्टूबर १९२९ धराशायी को हो गया था ! उस दिन उस समय के ५ अरब डालर साफ़ हो गए थे ! इसी क्रम में २९ अक्टूबर को फ़िर १४ अरब डालर लुट पिट गए ! १९३२ तक यह क्रम चला ! करीब ४० अरब डालर का नुक्सान और अनेकों बैंको का दीवाला निकल गया ! हर तरह के उपाय किए गए पर कोई भी उपाय काम नही आया ! इस मंदी का असर सारे विश्व पर पडा ! और ये मंदी अभी तक महामंदी के नाम से जानी जाती रही है !
आज सुबह छुट्टी के मूड में यह तय किया था की अगले सप्ताह के २ हरयाणवी पोस्ट तैयार करके फीड कर देंगे, क्योंकि आने वाला सप्ताह दिवाली की वजह से कुछ व्यस्त रहेगा ! जैसे ही मेल बॉक्स खोला तो आई हुई रिपोर्ट्स पढ़ने के बाद आपसे गप-शप करने को बैठ गया !
और अंत में मुझे यहाँ आपसे एक बात और कहनी है की आज अचानक मुझे श्री राकेश झुनझुनवाला के एक इंटरव्यू की याद आगई ! राकेश झुनझुनवाला वो सख्स है जिसने उस समय शेयर बाजार में कचरे के भाव ब्ल्यू-चिप शेयर खरीदे थे जब सब लोग शेयर बाजार से दूर रहने की सलाह दे रहे थे ! उस समय इस शख्श ने कहा था की आज शेयर बाजार खरीदी के काबिल है ! और लोग मुझे बेवकूफ समझ रहे हैं ! आज मैं खरीदने का कह रहा हूँ और लोग बेचे जा रहे हैं ! जिस समय मैं बेचने का कहूंगा उस समय भी लोग मुझे बेवकूफ ही कहेंगे क्योंकि मैं उस समय शेयर बेच रहा होवुंगा और लोग खरीदी कर रहे होंगे ! और ये का ये ही हुवा ! पिछले साल जब ये शेयर बाजार अपने पीक पर था , तब एक टी.वी. साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया की आपने अपनी इन्वेस्टमेंट से करोड़ों रुपये कमा लिए हैं और आप एक सफलतम शेयर व्यवसायी सिद्ध हुए हैं ! आप अब क्या टिप देंगे ?
उन्होंने कहा - मेरे हिसाब से अब बिकवाली करनी चाहिए ! अब खरीदने की सोचना तो आत्महत्या करने जैसा कदम होगा ! और लोग अब मुझे फ़िर बेवकूफ कहेंगे ! और ये ही हुवा ! लोग रुपये की पोटली उठाये शेयर बाजार में भागे चले आ रहे थे और राकेश झुनझुनवाला जैसे दूरदृष्टा अपना माल बेच कर चैन की बाँसुरी बजा रहे थे ! शायद इसी को दूरदृष्टी कहते होंगे !