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काका योगिंद्र मौदगिल ताऊ के खूंटे पै टंगा

पिछले बुधवार को आपने पढा था कि रामदयाल कुम्हार ने अपने गधे संतू को गांव के बाहर वाले सूखे  कुयें मे धक्का दे दिया था. और वहां से संतू गधे ने ताऊ को फ़ोन लगाकर सब बात बताई थी. अब आगे पढिये.

 

संतू का फ़ोन आते ही ताऊ फ़टाफ़ट अंधे कुयें की तरफ़ भागा. वहां पहले से ही भीड लगी थी. रामदयाल और उसका लडका रमलू दहाडे मार कर रो रहे थे. गांव के सब चैम्पियन अपनी २ राय दे रहे थे कि किस तरह संतू गधे को बाहर निकाला जाये.

 

रस्सी के सहारे…. कोई कुछ ..कोई कुछ.. कह रहा था पर बडा मुश्किल हो गया था. संतू का बाहर निकालना. गांव मे इतने साधन भी नही थे.

 

खैर साहब गांव के एक परम ज्ञानी ने सुझाव दिया कि संतू गधा कुयें के अंदर भूखा प्यासा मरे इससे अच्छा है कि इसे यहीं कुये मे दफ़न कर दिया जाये. जिससे इसको कम से कम तकलीफ़ होगी.

 

रामदयाल तो यही चाहता था. पर नकली  दहाड मारते  हुये बोला – अरे नही भाईयों ऐसा जुल्म मत करना. संतू तो मेरे सगे लडके रमलू से भी बढ कर प्यारा है मुझे.

 

पर मौत जिस घर मे आ जाये वहां घर वालों की बात नही सुनी जाती वहां यार लोग ही अर्थी ऊठवाने को तत्पर रहते हैं. सो यहां भी कौन सुनने वाला था? तुरंत परात फ़ावडो का इन्तजाम किया गया और तय हुआ कि उपर से परातों मे  मिट्टी भर भर के कुये मे डाल कर संतू को जिंदा दफ़न कर दिया जाये.

 

अब जैसे ही संतू गधे ने यह प्रोग्राम सुना उसकी तो हवा खिसक गई. और एक लंबी ढेंचू…ढेंचू ..की तान लगा कर चिलाया..पर उस गरीब की कौन सुनने वाला था?

 

और अब ताऊ के दिमाग ने भी तेजी से काम करना शुरु किया. और सारी बात को नाप तौल कर संतुष्ट हो गया कि अब संतू गधा पक्के से बच जायेगा.

 

अब ताऊ वहां से निकल गया और वापस काफ़ी दुर आकर संतू को फ़ोन लगाया. और दोनों मे यों बात चीत होने लगी.

 

ताऊ – हैलो कौन? कौन संतू…अरे बोलता क्यों नही..? मैं ताऊ बोल रहा हूं.

 

उधर से संतू गधे की मरी सी आवाज आई..अरे ताऊ..मैं तो बस समझो मर ही गया.

अब क्या बोलूं? यमदूत सामने ही खडे हैं.

 

ताऊ : अरे बावली बूच ..मरे तेरे दुश्मन… सुसरी के.. हिम्मत मत हार.. अरे ब्लागरों का यमदूत कुछ नही बिगाड सकते. ब्लागरों के ज्ञान चक्षू खुल जाते हैं. उनका उपयोग करते ही तेरे प्राण पक्के से बच जायेंगे. मैने तेरे जिंदा रहने का प्लान बना दिया है.

 

अब संतू को कुछ उम्मीद बंधी.. सो कुछ जी मे जी आया.

 

अब ताऊ बोला – सुन बे बावली बूच.. तू बस ध्यान से मेरी बात सुन..और जैसा मैं समझाऊं बस वैसे ही करना.. अगर हिम्मत रखी तो आज शाम को हम दोनो एक साथ ही चिकन आलाफ़ूस का डिन्नर  लेंगे. अरे चम्पा भी तेरे लिये पूछ रही थी.

 

और ताऊ ने अपना प्रोग्राम संतू गधे को समझा दिया.

 

उधर गांव वालों ने खेत मे से मिट्टी खोद खोद कर कुंये मे डालना शुरु किया और रामदयाल उपर से आंसू बहाते हुये मन ही मन राजी हो रहा था.

 

अब जैसे ही मिट्टी की पराते कुएं मे खाली होती और संतू के उपर गिरती वैसे ही संतू गधा ताऊ के बताये अनुसार मिट्टी को झटक देता. धीरे धीरे हुआ यह कि उस डाली गई मिट्टी का ढेर लगता रहा और संतू गधा उस ढेर पर चढता जाता. मिट्टी आती गई और संतू उसे पीठ पर से झटक कर उस पर चढता हुआ उपर तक आगया.

 

जब तीनेक फ़ुट गढा ही रहा तो संतू उचक कर ऊछला और सीधे खुशी से  ढेचूं.. ढेंचु…

करता हुआ बाहर निकल आया.

 

सारा मंजर ही बदल गया. कहां मौत नाच रही थी और कहां अब चिकन आलाफ़ूस का डिनर तैयार था. संतू गधा सीधे जाकर ताऊ के सामने साश्टांग होगया. और बोला – ताऊ आज आपने बचा लिया.

 

अब ताऊ बोला – देख बेटा संतू, जीवन ऐसा ही है. जब हम असफ़ल हो जाते हैं तो हमारे अपने ही हमको छोड देते हैं. और अगर हम उस संकट की घडी मे घब्रराये बिना अपना काम हिम्मत से करते रहे तो वापस उस कठीन काम मे भी सफ़ल हो सकते हैं.

 

जब भी मुसीबत आये उनको साहस और अक्ल से ठोकर मार कर उपर देखो फ़िर उन् मुसीबतों के उपर ऊठने का रास्ता भी दिखाई दे जाता है.

 

संतू गधा बोला – ताऊ आप सही कह रहे हो.  ताऊ की और संतू गधे की बातें वहीं खडी चम्पा गधेडी भी सुन रही थी. वो संतू की तरफ़ मीठी नजरों से देखती हुई डिनर का इंतजाम करने लगी.

 

ताऊ समझ गया कि अबकी बार मामला इक तरफ़ा नही है. लगता है चंपा गधेडी भी वही चाहती है जो संतू गधा चाहता है. लगता है अबकी सीजन मे इनका मुहुर्त निकलवाना ही पडेगा.

 

 

 

 



इब खूंटे पै पढो:-                          


कल “काकी की गुहार”  शीर्षक से हमने और सु.सीमा जी ने काकी द्वारा काका योगिंद्र मौदगिल जी को लिखे गये प्रेम पत्र को हम दोनों ने अपने  परम ज्ञानी चक्षुओं द्वारा पढ कर आप लोगों को सुनाया था. कल काका दिन भर कहीं इधर उधर पता नहीं कहां कहां मुंह मारते रहे?


सो कल रात  आठ बजे उनको इस प्रेम पत्र के सार्वजनिक होने की खबर लगी. तब उनकी टीपणी आई. हम तो हैरान होगये भाई ये टीपणी पढ कर.


क्योंकि काकी बता रही थी कि इनकी फ़ौज १२ की थी. और अब काका दावा कर रहे हैं कि बाकी १२ कहां छोड आई? मैं तो यानि काका तो पूरे २४ छोड गये थे.


सो भाई हमको तो कुछ समझ मे आ नही रहा है. और श्री अर्विंद मिश्रा जी भी इसका जवाब मांग रहे थे. और भी लोग जवाब के इंतजार मे थे.  


उस प्रेम पत्र का काका ने कल जो जवाब अपनी टीपणी के द्वारा दिया उसको हम यों का यों खूंटे पर बांध रहे हैं. आप स्व्यम ही उसको खूंटे से खोल लें. हम तो इन पति पत्नि के बीच मे नही पडते.

 

                          “काकी की गुहार”  के जवाब मे “काका की फ़ुहार” :-




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होली की शुरूआत में, सीधे फंदा डाल.
काकी ने मिल कर किया, ताऊ संग धमाल.
ताऊ संग धमाल, मगर ये खास नहीं है.
काकी अब भी काका पर विश्वास नहीं है.
लेकिन मैडम इसका लोजिक समझ ना पाया.
मैं चौबिस का बाप बारह का क्यूं बतलाया..?


फिर भी मैंने तो किया, ताऊ, यार यक़ीन.
भैंस के आगे मैं कभी, नहीं बजाता बीन.
नहीं बजाता बीन, बड़े-बूढ़ों का कहना.
होली पर घरवाली-साली से बच कर रहना.
क्यूकि मूरख तुझे नहीं बुद्धि आती है.
किसके कितने.. ये नारी ही तो बतलाती है.


इसमें चिंता है नहीं, भेद खुलें छब्बीस.
योगेन्द्र मौदगिल की भला, कौन करेगा रीस.
कौन करेगा रीस, कवि-सम्मेलन में जाते.
एक जूनियर का रोपण भी कर के आते.
गप्प नहीं ये ताऊ, ये तो, है होली का दौर.
सोच रहा गुडगावां जाऊं या आऊं
इंदौर.


मेरी सत्यानाशिनि, छोड़ मुझे अन्यत्र.
सीधे-सीधे भेजती, ताऊ जी को पत्र.
ताऊ जी को पत्र, मगर बे-मेल डार्लिंग.
क्योंकि हैं ताऊ के कुत्ते फेल डार्लिंग.
चरणों की दासी लिखती, री, तेरा सत्यानास.
चरण उठाने मुझको पड़ते मैं चरणों का दास.


मिश्रा जी भी जोह रहे, अब तो मेरी बाट.
सोच रहे मैं तोड़ दूं, ताऊ तेरी खाट.
ताऊ तेरी खाट, मगर ये तो है होली.
मेरे प्यारों, इसमें चलती, खूब ठिठोली.
पर भाभी ने भेद, ऒढ़ना, ढक कर खोला.
होली पर 'मुदगिल' ने तोड़ा खूब खटोला.