
ताऊ - प्रेमलताजी, ताऊ डाट इन के परिचयनामा में आपका स्वागत है. सबसे पहले तो आप ये बताईये कि आप कहां से है और क्या करती हैं?
प्रेमलता जी - मैं पिछले छ्ब्बीस सालों से दिल्ली में हूं और एक सरकारी उच्च माध्यमिक स्कूल मे अध्यापन कार्य करती हूं.
ताऊ - अब आप ये बताईये कि आपके शौक क्या हैं?
प्रेमलता जी - विशेष शौक में मुझे पढ़ना-लिखना बहुत पसंद है और तीर्थाटन मे भी उतनी ही रुचि है.ताऊ - आपको सख्त ना पसंद क्या है?
प्रेमलता जी - बनावटीपन और फ़रेब।ताऊ - आपकी विशेष पसंद क्या है?
प्रेमलता जी - यों तो पसंद का कोई पैमाना नही होता पर आप अगर विशेष पसंद ही पूछ रहे हैं तो "सादगी और सच्चाई" मेरी विशेष पसंद हैं.
ताऊ - आप हमारे पाठको से क्या कहना चाहेंगी?
प्रेमलता जी - मेरा मानना है कि आज का पाठक बहुत सुधी है फिर उनसे क्या कहूं?ताऊ - हमने सुना है कि आपने एक बार स्कूल की छुट्टी वाली घंटी बजाकर स्कूल की छुट्टी करवा दी थी? क्या यह सच है?
प्रेमलता जी - हां जब आपको पता चल ही चुका है तो ना कैसे करूं? घटना तो सही है.ताऊ - पूरी बात बताईये कि हुआ क्या था?
प्रेमलता जी - यह घटना है जब हम ११वीं कक्षा में पढ़ते समय राजनीति-विज्ञान से पहला सामना हुआ था, बड़ा जोशथा। तभी हमारे शहर में डॉ० फ़खरुद्दीन-अहमद आये थे जो उस समय कृषि-मंत्री थे।
ताऊ - जी, आगे बताईये.
प्रेमलता जी - विद्यालय के ज्यादातर अध्यापक उनकी मिटिंग सुनने चले गए। हमताऊ : फ़िर प्रिंसिपल महोदया ने अगले दिन तो खूब पूजा पाठ की होगी?
बच्चे यूँ ही घूम रहे थे तभी सबने मिलकर योजना बनायी कि हम भी उन्हें सुनने चलते हैं। बस आव देखा न ताव घंटी बजा दी स्कूल की। छुट्टी करके सब भाग गए सभा में।
प्रेमलता जी - हां, अगले दिन प्रिंसिपल महोदया ने अपने कमरे में बुलाया और पूछी असलियत।ताऊ - आप मूलत कहां से हैं?
माता-पिता की सच बोलने की सीख काम आयी। सब सच बता दिया। प्रिंसीपल ने डांटा नहीं बस इतना कहा- इतन मन था तो किसी टीचर से क्यों नहीं कहा? बहुत अच्छी बात है किसी के विचार जानना। पर इस तरह नहीं जाना चाहिए था। हम सभी बच्चों ने माफ़ी मांगी और वो मुस्करा गयीं। महान थीं डॉ० पुष्पा शर्मा- हमारी प्रिंसीपल।
प्रेमलता जी - जन्म तो दिल्ली में हुआ लेकिन बचपन पैतृक-स्थान अनूपशहर में बीता। अनूपशहर क़स्बा गंगाजी के किनारे बसा जि० बुलंदशहर उ०प्र० में है।ताऊ - संयुक्त परिवार के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?
प्रेमलता जी - देखिये परिवार शब्द ही संयुक्तता का परिचायक है। पर सामंज्स्य न हो तो फिरताऊ - आप ब्लागिंग का भविष्य कैसा देखते हैं?
संयुक्त का दिखावा न हो। अलग रहकर भी संयुक्त्ता बनायी रखी जा सकती है। परिवार प्रेम और त्याग का धाम है स्वार्थ का नहीं एक छत हो या न हो।
प्रेमलता जी - मुझे यह स्वर्णिम और लाभप्रद दिखाई दे रहा है !ताऊ - आप कब से ब्लागिंग मे हैं?
प्रेमलता जी - अप्रैल २००६ से ।ताऊ - आपका ब्लागिंग मे आना कैसे हुआ? और कैसा रहा ये अनुभव?
प्रेमलता जी - अन्तर्जाल पर हिंदी खोजते-खोजते हिंदी रचनाएँ पढना शुरु किया। फिर ’काव्यालय’ पत्रिका में अपनी कविताएँ भेजी जहाँ कविताएँ प्रकाशित तो नहीं हुयीं पर वहाँ से ’अनुभूति’ अन्तर्जाल-पत्रिका का पता चला जिसमें तीन संक्षेपक प्रकाशित हुए।ताऊ - जी, आगे क्या हुआ?
प्रेमलता जी - फिर रवि भाई/ श्री रविंद्र श्रीवास्तव जी के ’रचनाकार’में ’परिवर्तन’ शीर्षक से मेरी एक कविता छपी और रविभाई से ब्लॉग लिखने की प्रेरणा मिली। तकनीकी ज्ञान बहुत कम होने के कारण श्री जितेंद्र चौधरीताऊ - आपके लेखन की दिशा किस और हैं?
जी की सहायता से ब्लॉग ’मन की बात’ बनाया और लेखन किया। बाद में वर्डप्रैस पर ’पसंद’ बना लिया । अब इसपर ज़्यादा सक्रियता रहती है।
प्रेमलता जी - जो अनुभव करती हूँ वही लिख देती हूँ। मातृ-भाषा से गहरा लगाव है।ताऊ - आपकी राजनैतिक रुचि और विचार बतायें?
प्रेमलता जी - सरकारी कर्मचारी रिटायरर्मेंट के बाद रुचि बनाता है। (हंसते हुये...) जिसकी सरकार उसी के मुलाजिम। अपना वोट भी कभी डाल पाते हैं और कभी नहीं भी क्योंकि हमेशा एलेक्शन-ड्यूटी पर होते हैं।ताऊ - कुछ अपने स्वभाव के बारे मे बताईये.
प्रेमलता जी - सादा। झूठ और बेईमानी सहन नहीं।( अध्यापिका-स्वभाव)ताऊ - कैसा जीवन पसंद है?
प्रेमलता जी - सरल जीवन पसंद है।ताऊ - कौन सी पुस्तक आपको विशेष पसंद है?
प्रेमलता जी - श्रीमदभागवत-गीता को जीवन की कला सिखाने वाला सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मानती हूँ, मात्र धार्मिक पुस्तक नहीं।ताऊ - जीवन का कोई मूलमंत्र आपके हिसाब से?
प्रेमलता जी - सेवा को पूजा मानती हूँ और बच्चों, माता-पिता या वृद्धजन को भगवान। दंभ,झूठ और ग़लत बात घर, बाहर और नौकरी कहीं पर भी पसंद नहीं करती। कई बार परेशानी होतीताऊ - ताऊ पहेली के बारे क्या कहना चाहेंगी?
है पर अन्त में सब सही को ही सही कहते हैं। चाहे मन में कहें। (एक सौम्य हंसी के साथ...)
प्रेमलता जी - शिक्षिका की भाषा में- ’चहुँमुखी ज्ञान के विकास की नींव’( इमारत बननी बाकी है) ।ताऊ - ताऊ कौन? क्या कहेंगी?
प्रेमलता जी - आदरणीय, विद्वान और मातृ-भाषा-प्रेमी।ताऊ - अगर आपको शिक्षा मंत्री बना दिया जाये तो आप क्या करना चाहेंगी?
प्रेमलता जी - सभी के लिए समान शिक्षा-व्यवस्था। सरकारी और प्रायवेट सब एक और शिक्षा का उद्देश्य सनद नहीं बल्कि मानवीयता की जड़े मजबूत करना।ताऊ - आप शिक्षण से ताल्लुक रखती हैं...आप आज के समय में विशेषकर पालकों से क्या कहना चाहेंगी.
प्रेमलता जी - पालकों! बच्चों को अपना खिलौना न समझें वे भी जानदार और दिमागदार है।
बालकों! - माता-पिता और बड़ों का आदर और सेवा करें यही आराधन है और पूजा है। अनुभव से सीखा ज्ञान शुद्ध होता है।
तो ये थी हमारी आज की मेहमान सुश्री प्रेमलता जी पांडे. आपको इनसे मिलकर कैसा लगा? अवश्य बताईयेगा.