Showing posts with label बंदरियां. Show all posts
Showing posts with label बंदरियां. Show all posts

हिन्दी दिवस पर ताऊ उवाच

हमको गर्व है अपनी मातृ भाषा पर ! हमारे देश मे दिन की शुरुआत ही भजन आरती से होती है ! हमारी सांसो मे हिन्दी महकती है ! हमारे प्राण हिन्दी मे बसते हैं ! आज चारो तरफ़ हिन्दी दिवस की बधाईयों का ढेर लगा है ! ताऊ के मन मे अचानक एक सवाल ऊठा कि आखिर हमको रोज क्यूं
ये हिन्दी पखवाडे मनाने पड रहे हैं ? आखिर हम हिन्दी को कब महसुस कर पायेंगे ? कुछ गिने चुने लोगो की सनक मे आखिर हम कब तक अपने आपको उपेक्षित महसूस करते रहेंगे ! आज इतने साल की आजादी के बाद
भी हमको हिन्दी को बढावा देने के प्रयास करना पड रहे हैं ? क्या ये हमारे लिये गौरव की बात है जब हम कहते हैं कि हिन्दी की सेवा करो ?

आज इन सब बातो की वजह से ताऊ का दिमाग बिल्कुल ही खराब था ! ताई से भी झगडा चल ही रहा था ! आज कल ब्लाग जगत मे नया फ़ैशन चल पडा है कि इसके कपडे फ़ाडो उसको पहनावो ! कोई किसी की टांग खींच रहा है ! कोई भाई तो किसी किसी की गर्दन ही खींच रहा है ! कोई किसी...खैर जब हमने अपनी बुद्धि दौडाई तो लगा कि ये तो ठीक हो रहा है !

अरे भाई जरा सोच के देखो ये सब हिन्दी की सेवा ही तो हो रही है ! आखिर कार सब एक दुसरे के कपडे हिन्दी मे ही तो फ़ाड रहे हैं ! कोई अन्ग्रेजी मे तो फ़ाड नही रहे हैं ! बहुत सकारात्मक बात है यह तो ! बिल्कुल साहब
आप तो चालू रखिये ! हिन्दी की सेवा का इससे बेहतर तरिका नही हो सकता ! क्योन्की हिन्दी पखवाडा मना कर भुला दिया जा सकता है, पर एक दुसरे के कपडे तो हम हमेशा फ़ाडते रह सकते है !

आज हमारा बन्दर कई महिनों बाद आया था ! वो तिन्छाफ़ाल के जंगलो मे किसी कालेज मे पढता है ! अब पढता है या बंदरियों के पिछे घुमता है यह तो हमकॊ नही मालुम पर आज आकर बोला - ताऊ ! आप आज हमारी कालेज
मे चलो ! मैं लेने ही आया हूं आपको ! मैने कहा - यार बंदर , मेरा तुम लोगो के बीच क्या काम ?

बंदर बोला - ताऊ बात ये है कि हमारे कालेज मे भी आज हिन्दी दिवस मनाने की सनक किसी को सुझ गई है ! और समस्या यह है कि अब हिन्दी मे भाषण देना किसी को आता नही है ! और नेता आज के लिये सारे बुक हुये पडे हैं ! तो आप ही चल कर दो शब्द हिन्दी मे बोल दो ! और आज रविवार भी है ! आपको हम वापस भी डिनर करवा कर छोड जायेन्गे ! और हुवा तो प्रिन्सिपल से कह कर एक लिफ़ाफ़े का जोगाड भी करा देंगे !

सो साहब लिफ़ाफ़े के नाम पर हम राजी हो गये ! यहां कौन ब्लागिन्ग मे, हिन्दी सेवा का पैसा मिलता है ? अगर गूगल बाबा कुछ देते भी होंगे तो वो हम तक पहुंच नही पायेगा ! अब हम बंदर के कालेज पहुंच गये !

वहां हमारा परिचय हिन्दी के मुर्धन्य विद्वान बता कर कराया गया ! जब्की हमको मुर्ख और मुर्धन्य का भी पता नही ! वहां बहुत सारे बंदर और
बंदरियां अजीब २ कपडों मे घूम रहे थे ! हमको विद्वान समझ कर ५/७ बंदर बंदरियाओ ने घेर लिया और सवाल जवाब करने लगे ! इतने मे एक बंदरियां जो हिरोइन टाइप दिख रही थी ! आकर बोली- हे ताऊ ! आई मीन
जेन्टल्मैन .. यु आर लूकिन्ग गुड.. व्हाट अ .. ड्रेसिन्ग सैन्स ...

इतने मे एक दुसरी बंदरी आई और बोली-- सर आई वांट टू आस्क अ क्वश्चन .

मैने उसकी बात काटते हुये कहा - पूछो पर हिन्दी मे ..

इतने मे एक बंदर बोल पडा - हे टाऊ .. एक्चुली वी डोन्ट वान्ट टू लर्न हिन्डी ..
य़ू नो ? गिव यौर लेक्चर... एंड डोन्ट डिस्टर्ब अस ! और वहां से दो तीन बंदरीयो के साथ कैन्टीन की तरफ़ चला गया !

आज हिन्दी इन नौनिहालो के लिये सिर्फ़ हिन्दी दिवस होकर रह गई है ! आखिर कब हम समझेंगे अपनी भाषा का दर्द ? कोई विदेश से आता है उसको हम सर आंखों पर बिठाते हैं ! अपनो को गरियाते हैं ! हम मे आत्म सम्मान का होना जरुरी है और वो तभी होगा जब हम अपनी भाषा को सम्मान देना सीख जायेंगे !

गंभीरतम बात हो, मजाक हो अथवा गाली देना हो ! आप सोच कर देखिये क्या आप हिन्दी के अलावा किसी अन्य भाषा मे उस शिद्दत से अपने आपको व्यक्त कर सकते हैं ! यहां मैं चिठ्ठा चर्चा का जिक्र करना चाहुंगा ! क्या शुक्ल जी, तरुन जी, कुश जी , अथवा समीर जी चिठ्ठा चर्चा मे जो चुटकियां लेते हैं वो अन्गरेजी मे सम्भव है ? अगर चिठ्ठा चर्चा
अन्ग्रेजी मे की जाये तो क्या ऐसे २ टाइटल फ़ुर्सतिया जी आप दे पाओगे ?

शायद नही ! तो हम क्यूं अपनी भाषा से दूर भाग रहे हैं ? और दिवस मना रहे हैं ! हम रोज रोटी खाते हैं उसी तरह रोज हिन्दी का उपयोग करे तो इन दिवस पखवाडो की जरुरत ही नही पडेगी ! नीचे बाक्स में खूंटे पै एक पुरानी याद जेहन मे हिन्दी के नाम पर आगई ! वो लिख रहा हुं !

मर्यादा वादी कृपया सकारात्मक रुप मे ग्रहण करें !



इब खूंटे पै पढो:-

मरहूम अमजद खान साहब (शोले वाले गब्बर सिन्ह ) का जिक्र करना चाहुंगा !

एक दिन किसी पिक्चर की शूटिन्ग मे फ़ुर्सत के क्षणो मे हमको पकड लिया ! हम उनकी उस पिक्चर के डिस्ट्रिब्युटर थे ! और कहने लगे, यार रामपुरिया ...तेरे मजे हैं ! तू भी जिन्दगी के असली आनन्द लेता है !

मैने कहा -- सर जी क्या हो गया ? आज कोई मिला नही क्या ?

वो बोले - नही यार मुझे तो तेरी भाषा सुन के मजा आजाता है ! पता नही तू जब गालियां देता है तो मुझे हंसी आती है !

( उन दिनो मैं किसी भी बात पर मेरे मुंह से गालियां फ़टाफ़ट निकल जाया करती थी ! और मैं इस वजह से बदनाम भी था इस मामले मे ! और हमारे अन्चल मे तो आज भी आदमी दस बीस गाली, दिन भर मे खुद को और
३०/४० सामने वाले को नही दे ले ! तब तक खाया पीया हजम ही नही होता ! वैसे आप चिंता नही करें अब मैं सुधर गया हूं.:)..)

एक हमको देखो ! साला अन्ग्रेजी मे गाली देता है .. ईडियट, ब्लडी..बास्टर्ड.. ! कुछ मजा ही नही आता ! और एक तुमको देखो ! गाली भी देते हो तो लगता है कि हां चलो २० / २५ किलो की कोई चीज दी है ! अन्ग्रेजी की गालियां दस बीस ग्राम की ! वो कहने लगे यार, गालियां देने का मजा तो हिन्दी मे ही है !


मेरी समझ से अपने आपको अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम तो हिन्दी ही है ! पर अन्ग्रेजी के शौकीन इसको सबके सामने कबूल नही करते ! आप एक प्रयोग कर के देंखे - किन्ही अन्ग्रेजी वाले साहब को दो चार जबलपुरी या इन्दोरी गालियां बक दे ! फ़िर देखें वो आपको अन्ग्रेजी मे जवाब देते हैं या हिन्दी मे !

( आप अपनी जिम्मेवारी पर ही ये प्रयोग करें ! किसी भी अनहोनी के लिये हम जिम्मेवार नही होंगे ! :) )