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एक गधे के इश्क की दास्ताँ

कहानी किस्से कहना सुनना ही लोग भूल चुके हैं तो आज आपको एक किस्सा सुना रहे हैं पर आप लोग ये मत  समझना कि मैं आपको ऐसे ही कोई ऐरी गैरी कहानी सुना रहा हूं. आप अब कोई बच्चे तो हो नही जो मैं आपको बहलाने के लिये कुछ भी कहानी किस्सा जोड जाडकर सुना दूं...ये कहानी बिल्कुल खरी सौ प्रतिशत सही है, तो सुनिये...
....... 

एक था गधा... और वो भी था एक धोबी का गधा..अब आप पूछोगे कि ताऊ ये कौनसे जमाने की बात है ? आज कल ना तो धोबी रहे और ना उनके पास गधे? अब जो धोबी थे उन्होंने लांड्रियां खोल ली और गधे की जगह स्कूटर ने  ले ली.......फ़िर ये धोबी और उसका गधा कहां से टपक गये आपकी कहानी मे?

बिल्कूल भाई... थारी बात भी कती सांची सै,  पर यार ये तो सोचो की सारे कुओं में ही भांग थोडेई पडगी सै ? अरे भाई थोडे बहुत परम्परावादी धोबी आज भी जिंदा सैं और उतने ही परम्परा वादी और वफ़ादार उनके गधे भी मौजूद सैं....भाई यकिन ना आरया हो तो आजाना ताऊ के धौरै (पास)... आपको मिलवा देंगे,  इस परंपरावादी  ज्ञानी धोबी और उसके गधे चन्दू से.

ये दोनों यानि ज्ञानी धोबी और  चंदू गधा, बडे मजे मे थे.  रोज सुबह धोबी अपने जवान गधे पर कपडे लाद के, छोरियां के कालेज कै सामने से होता हुया कपडे धोनै जलेबी घाट जाया करता और धोबी जब तक अपने कपडे धोता तब तक चन्दू गधा नदी किनारे की हरी हरी घास खाया करता.  फ़िर भी समय बचता तो ठंडी छांव मे लोट पोट हो लिया करता. चंदू इतना सुथरा और गबरू गधा था की , आप पूछो ही मत.....ये तो ज्ञानी धोबी ने इसका नाम चंदू रख दिया, इसकी जगह सलमान या शाहरूख भी रख देता तो सही होता क्योंकि इस गबरू गधे के सामने ये दोनों हीरो बिल्कुल जीरो ही लगेंगे आपको.

कभी चंदू गधे का मूड आजाया करता था तो नेकी राम की रागनी भी बडे उंचे सुर मे गा लिया करता था.... और भाई बडा सुथरा गाया करै था....राग खींचने में तो इसको महारत हासिल थी. अच्छे से अच्छा और बडे से बडा गवैया भी इसके सामने पानी भरता ही नजर आता. पर पता नही यो गधा कुण सी जात का था कि इतना सुन्दर, जवान और पक्के रागों का जानकार  होने के बाद भी इसने कभी किसी पराई गधी पर बुरी नजर नही डाली....और ना ही कभी किसी गधी पर लाइन मारने की सोची...किसी शरीफ़ प्रजाति से ताल्लूक रखने वाला रहा होगा.

वहां जलेबी घाट  पर दुसरे धोबियों और कुम्हारों की सुन्दर सुन्दर और जवान गधियां भी आया करती थी. कोई कोई कपडे और मटकों को लाद कर आती थी तो कई यों ही मटरगश्ती करने चली आती थी. कुछ दिनों से ये देखने में आ रहा था कि जलेबी घाट पर जवान और शोख गधेडियों की आवक जावक बहुत बढ गयी थी. जब इतनी सजी धजी गधेडियों की आवक बढ गई तो स्वभाविक ही था कि आवारा और मटरगश्ती वाले गधों की भी बाढ सी आगई थी वहां. हर कोई महंगे से महंगे मोबाईल हाथ में थामे...अपनी पसंद की गधेडी पर लाईन मारने की कोशीश में लगा रहता था. बस यूं समझिये कि ये धोबी घाट ना होकर कोई कोचिंग क्लास का अड्डा हो गया था जहां कई तो तफ़रीह बाजी करने के लिये ही एडमिशन ले लिया करते हैं.

पर मजाल जो कभी चन्दू गधे  ने सजी धजी गधियों की तरफ़ नजर उठा कर भी  देखा हो.  हालांकि ये और बात है कि चन्दू की हीरो टाईप बाडी और शराफ़त को देखते हुये,  उसको रिझाने के लिये काफ़ी सारी गधियों ने बहुत सारी कोशिशें की जो सब बेकार ही गई,  यहां तक कि उन पुरातन पन्थी गधियों ने भी टाइट जीन्स और लांडी कुर्ती भी पहनना शुरू कर दिया पर वो चन्दू का दिल नही जीत सकी. उनका लांडी कुर्ती और टाईट जींस पहनना भी बेकार साबित हुआ.

चंदू था ही इतना शरीफ़ कि, जब वो लंच करता हुवा यानि घास चरता हुवा कभी कभार भूलवश  इन गधियों के झूंड के बीच पहुंच जाता तो भी उन सुन्दर और जवान गधियों के मालिकों को कभी कोई ऐतराज नही होता था, बल्कि कोई कोई तो अपनी गधी का ध्यान रखने का जिम्मा भी चन्दू गधे को दे देता कि कहीं कोई दूसरा आवारा टाईप शोहदा गधा उनकी जवान गधी को बहला फ़ुसला कर भगा ना ले जाये. तो इतना शरीफ़ और लायक था चन्दू. 

इधर कुछ दिनों से ज्ञानी धोबी ने नोटिस किया कि आजकल कालेज के सामने से निकलते हुये चंदू  थोडा धीरे  चलने लगता था और कालेज के  सामने  वाली दुकान पर आकर  तो एकदम रुक ही जाता था. अब ज्ञानी धोबी को क्या पता कि उसके शरीफ़ और नेक चंदू को असल में एक सुन्दर, जवान और चटक मटक सी कालेज की छोरी से इश्क  हो चला था...धोबी ठहरा पुराने जमाने का सो इस जवान गधे की प्रेम लीला की तरफ़ उसका ध्यान ही नही गया.

अब गधा तो गधा... सो चढ गया इस नव यौवना बला के  चाल्हे में. सो आजकल चंदू गधा बडे रोमान्टिक मूड में रहने लगा और घर से गठरी लादने के पहले शीशे के सामने खडा होकर बाल बनाता, दाढी कटिंग सब सलमान खान टाईप करके घर से निकलता था. अब धीरे धीरे इन दोनों का इश्क परवान चढने लगा. कभी छोरी इसके तरफ़ देखकर  मुसकरा देती थी, कभी बाल झटककर अपनी अदा दिखा देती और कभी मुस्करा के गर्दन को बडी अदा से घुमाकर अपने मोबाईल में खो जाती. अब उसको क्या पता कि उसकी इन अदाओं से चंदू का दिल घायल हो चुका था.

और इधर चंदू गधा भी कभी आंख का कोना दबा कर और कभी कोइ प्रेम गीत गुन गुना कर जबाव देता था. गाने में तो चंदू माहिर था ही. चंदू की जबान पर आजकल बस यही एक गाना रहने लगा....."हम तो तेरे आशिक हैं सदियों पुराने".... जब कभी वो शोख गधी इसके पास से निकलती बस चंदू के होठों से यही गीत फ़ूटता था और बाकी भी चंदू की आत्मा में यह गाना अंतर्संगीत की तरह गुंजायमान रहने लगा.

आप ये समझ लिजिये कि  अब से पहले भी इस हसींन जवान कन्या ने कई गधों को अपने इश्क के जाल मैं उलझाया था और अबके बारी आगयी इस  चिकने और कर्म जले चन्दू गधे की जो इतनी सुन्दर और सुशील गधियों को छोडकर इस सर्राटा आफ़त के लपेटे मे आगया....ईश्वर भी सीधे लोगों को ही इन चक्करों में उलझाता है वर्ना कोइ चालू गधा होता तो फ़ंसता ही नही और फ़ंस भी जाता तो ही ही ही करके बाहर भी निकल लेता.

अब धीरे धीरे बात यहां तक आ गई कि दोनों  डेटिंग भी करने लग गये.  धोबी जब तक कपडे धोता तब तक चन्दू गधा फ़ुर्र हो लेता और वो जवान छोरी भी तडी मारके कालेज से गायब और सीधे जलेबी घाट पर चंदू के साथ....दोनों कभी माल मे जाकर  सिनेमा देखते.....कभी काफ़ी शाप में गपशप....दोनों अलग होते तो अपने मोबाईल पर व्हाटस-एप्प या अन्य किसी मेसेंजर को आबाद करते....

ये समझ लिजीये  कि चन्दू तो 24 घन्टे इसी परी के ख्वाबों और ख्यालों में डूबा रहने लग गया.  उस इश्क के अन्धे को ये भी नही दिखाई दिया कि उन दोनों को खुले आम लप्पे झप्पे करते देख कर दूसरे गधे भी उस कन्या पर डोरे डालने में  लगे हुये हैं.कुछ समय बाद चन्दू को लगा की वो कन्या उससे कुछ ढंग से बात नही करती थी  और उससे कूछ उखडी उखडी सी रहने लगी थी. अब चन्दू ठहरा सीधा बांका नौजवान और उपर से गधा , सो वो क्या जाने इन अजाबों के चाल्हे....

इस सीधे सादे गधे चंदू को क्या मालूम था कि वो बला तो उसके साथ अपना टाइम पास कर रही थी,  वर्ना तो उसके सामने क्या चन्दू और क्या चन्दू की ओकात ! और अपने लिये एक मोटे से बैंक बैलेंस वाले आसामी की तलाश में थी. चंदू तो एक खिलौना था उसके लिये....
अपनी जात से बाहर जाकर प्यार करने के यही अन्जाम हुआ करते हैं गधा होकर आदमजाद से प्यार करने चला था नाशपीटा...... गधा कहीं का....... ! हमने तो यही सुना था कि गधे ही दुल्लत्ती झाडा करते हैं पर इस बला ने तो चन्दू गधे को वो दुल्लत्ती मारी कि  चन्दू ओंधे मुंह चारों खाने चित्त हो गया.

वाह रे चन्दू गधे की किस्मत.....तूने भी क्या कमाल दिखाया बेचारे को? असल में हुआ ये की अब उस छोरी का दिल चन्दू से ऊब गया था और वो अपनी तलाश के मुताबिक उसने एक सेठ के गधे को फ़ंसा लिया या खुद  फ़ंस गई...! ये सेठ का गधा भी क्या गधा? बल्कि गधे के नाम पर कलंक,  पर चुंकि सेठ का गधा था... तो था... आप और हम इसमे क्या कर लेंगे? इसीलिये तो कहते हैं "जिसका सेठ मेहरवान उसका गधा पहलवान" ! बिल्कुल मोटा काला भुसन्ड और दो जवान बच्चों का बाप था ये गधा....

पैसे वाले सेठ का गधा था सो  मर्सडीज कार में चलता था और उसने भी इस गधी पर बहुत दिनों से डोरे डालने शुरू कर रखे थे. अब कहां ज्ञानी धोबी का गधा चन्दू और कहां सेठ किरोडीमल का गधा? चन्दू पैदल छाप और ये मर्सडिज बेन्ज मै चलने वाला गधा... सो छोरी को तो फ़सना ही था... फ़ंस ली....हो सकता है दोनों ने एक दूसरे को फ़ंसाया हो या किसी एक ने....पर एक बात पक्की है कि छोरी का फ़ंसना और फ़ंसाना ही उसके प्रिय शगल थे, तो सेठ किरोडीमल के गधे पर ही सारा दोष भी नहीं मढ सकते. किरोडीमल सेठ के गधे ने इस गधी के नखरे उठाने मे कोई कोर कसर नहीं रखी. एपल के मोबाईल से लेकर तो एक से एक ब्रांडेड कपडे, परफ़्यूम गिफ़्ट में ऐसे देता था जैसे चार रूपये की मूंगफ़ली खा ली हो. चन्दू की तो इस सेठ के गधे के सामने ओकात ही क्या ?

अब चन्दू सडक के बीचों बीच गाता जा रहा था..." वो तेरे प्यार का गम इक बहाना था सनम".......ताऊ उधर तैं निकल रह्या था ! गधे नै यो गाना गाते हुये सुण के बोल्या - अबे सुसरी के ! बेवकूफ़ गधे के बच्चे...! इब क्युं देवदास बण रह्या सै? तेरे को पहले सोचना चाहिये था कि इन बलाओं से तेरे जैसे साधारण गधे को इश्क नही करना चाहिये.  इनसे तो कोई बडे सेठ का गधा ही इश्क कर सकै सै,  फ़िर वो भले ही दो जवान बच्चों का बाप हो या काला मोटा और उम्रदराज हो ? आखिर धन माया ही तो सब कुछ है इस जमाने में...अरे उल्लू के पठ्ठे... ये कोइ लैला मजनूं वाला जमाना नही सै.... अबे गधेराम ये इक्कसवीं सदी है,  इसमे तो धन माया के पीछे भाई भाई , बाप बेटे यहां तक की मियां बीबी भी एक दुसरे की कब्र खोद देवैं सै ! तू भले कितना ही सुथरा और शरीफ़ गधा हो, पर है तो तू आखिर ज्ञानी धोबी का ही गधा.....!

और ये सुन कर चन्दू , चुपचाप, हारे जुआरी जैसा कपडे की गठरी लादे जलेबी घाट की और बढ लिय’.



#हिन्दी_ब्लॉगिंग
(सन 2008 की हरयाणवी भाषा में लिखी पोस्ट को सरल हिंदी में प्रस्तुत किया है .)

शुभम आर्य का साक्षात्कार : ताऊ पत्रिका

जैसा कि आप जानते हैं श्री शुभम आर्य ताऊ पहेली दो और पांच के विजेता हैं. अभी तक प्रथम राऊंड  

के कुल अंकों मे से दो बार के विजेता. हमने समझा था कि कोई बहुत ही उम्रदराज शख्स होगा. हमने 

बातचीत का समय तय किया और पहुंच गये शुभम से मिलने.

 

Kashi Vishwanath

    ( काशी विश्वनाथ वाराणसी )

 

 

  

shubham हमारे सामने एक बहुत ही चंचल बालक बैठा था. जो बाबा काशी विश्वनाथ 

का परम भक्त है. उस समय तो बडा सीधा साधा लगा पर जैसे जैसे 

साक्षात्कार आगे बढा.. उसने  हमारे सवालों के जवाब बिल्कुल 

उन्मुकतता से दिये. हमारे साक्षात्कार की शुरुआत कुछ ऐसे सवाल 

जवाबों से हुई.

 

ताऊ - आपके बारे कुछ बताये, और आप कहा से हैं ?


शुभम - अब अपने बारे में तो यही कह सकता हूँ  मैं घुम्मकड़ स्वभाव का एक नटखट बच्चा हूँ , 

रोचकता और रोमांच मुझे बहुत पसंद हैं मूल रूप से मैं उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले का रहने 

वाला हूँ | भगवान शिव की प्राचीन नगरी अब इसके बारे में तो आप सभी बहुत कुछ जानते ही होंगे |


ताऊ - आप अभी क्याकर रहे है ?

 

शुभम - क्या करता हूँ अब इस बारे में तो क्या बताऊँ.. करता तो बहुत कुछ हूँ उनमे से एक हैं 

आप की पहेलियों में नियमित भाग लेना, अरे-अरे इसे केवल मनोरंजन के रूप में लें | shubham's college pune


अब आते है असली प्रश्न पर अभी तो मै पुणे यूनिवर्सिटी से बी. कॉम. प्रथम वर्ष की पढ़ाई  पूरी कर रहा हूँ साथ ही साथ हिन्दी चिट्ठाकारी नामक एक बहुत बड़े परिवार से भी जुडा हुआ हूँ बस अभी तो इतना ही है आगे जहाँ जिन्दगी ले जाए .......

                                                                           

                                                                                                                      (शुभम का कालेज पुणे)



ताऊ - आप पहेली सुलझाने मे कब से रुचि रखते हैं?


शुभम् - पहेलियों के बारे में क्या बताऊ मेरी जिन्दगी ही एक पहेली है, बचपन से ही मुझे हर 

वस्तु एक पहेली जान पड़ती है वैसे ही जैसे छोटे बच्चो की हर वस्तु को जानने की इच्छा होती है 

वैसे ही बचपन से मुझमे यह इच्छा भरी हुई है, जब तक किसी भी चीज़ के बारे में पूरी जानकारी 

न ले लूँ चैन नही पड़ता है |

 

ताऊ - कुछ अपने परिवार के बारे में बतायेंगे?


शुभम् - मेरे परिवार के बारे में क्या पूछना मै तो सभी को अपने परिवार का ही हिस्सा मानते 

आया हूँ |  वैसे  हम दो भाई है एक मै और एक बड़े भाई जो अभी इस वक्त पुणे में ही है, और माँ और पापा है


ताऊ : आपको क्या क्या शौक हैं?


शुभम् - ताऊ जी,  शौक तो मेरे बहुत सारे है पर मुख्यतया भ्रमण करना, खेलना कूदना, और 

पूरी दुनिया को जानना ही मेरे शौक है और थोडी बहुत पढ़ाई भी कर लेता हूँ , आख़िर वो भी तो 

जरूरी है ना.


वैसे मुझे किताबें पढने  का शौक है.  घर पर तो सब मुझे किताबी कीडा कहते हैं, जब किसी 

किताब को हाथो में ले लूँ,  तब दुनिया से,  तब तक के लिये, कट जाता हूँ जब तक कि किताब 

ख़त्म नही हो जाती |

 

ताऊ - पत्रिका के लिये आपका कोई संदेश?

 

शुभम् - हाँ हाँ क्यों नही मेरे ख़्याल से ताऊ पहेली एक साप्ताहिक मंच बनती जा रही है जहाँ 

पर हर ब्लोगर से मिलना जुलना हो जाता है,तथा इसी बहाने भारत के प्रमुख स्थलों की सैर 

भी हो जाती है इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इसका भविष्य अत्यंत उज्जवल दिखाई पड़ता है |

 

ताऊ - आपकी नजरो में ताऊ कौन हो सकते है ? :)


शुभम् - अब ये तो बहुत ही उलझता हुआ मामला बन गया है भारत की सर्वोच्च गुप्तचर संस्था 

की नाकामी के बाद सारे देश मिल कर इस विषय पर कार्य कर रहे है, तब मैं क्यों पीछे रहूँ ?

मैंने तो इस विषय पर p.h.d. करने की ठान ली है |

 

अब हमने इतनी देर की बातचीत के बाद काफ़ी का आर्डर किया और शुभम को आगे के 

साक्षात्कार मे कुछ और रोचक सवाल पूछने का तय किया. यह तो अब तक जाहिर हो ही 

चुका था कि बालक बडा जहीन और होशियार है.


ताऊ : आप पूना होस्टल मे ही रहते हैं?

 

शुभम  - जी ताऊ जी मै इस समय पुणे के होस्टल में रह रहा हूँ

 

ताऊ : आपको खेल कौन से अच्छे लगते हैं? क्रिकेट तो खूब खेलते होगे?


शुभम -  हा हा..,   इस मामले में तो मै अपवाद साबित हो सकता हूँ |  क्योंकि जहाँ पुरे भारत 

के बच्चो को क्रिकेट से लगाव है मुझे उतनी ही कम दिलचस्पी है क्योंकि मुझे अधिकतर 

रोचकता और रोमांच वाले खेल ही पसंद हैं.


ताऊ :  अब ये क्रिकेट नही तो फ़िर क्या खेलते हो भाई?

 

शुभम - ताऊ जी मैं फ़ुटबाल, रेसिंग और शतरंज मे ज्यादा दिलचस्पी रखता हूं.

 

ताऊ - फ़िल्म देखते हो? और हां तो कौन सी अच्छी लगी?

  

शुभम :  फ़िल्म तो मै बहुत कम ही देखता हूँ फिर भी कुछ फ़िल्म है जो अच्छी लगी जैसे  

लगान, गुरु और gladiator and Jurassic park आदि.


ताऊ : पूना अच्छा लगता है या वाराणसी? 


शुभम -  सच कहूं तो दोनों ही क्योंकि जहाँ पूना अपने  साफ़ -सुथरे और पढ़ाई के माहोल के 

लिए अच्छा लगता है वहीँ पर वाराणसी अपनी धार्मिक और पुरानी संस्कृति के लिए अच्छा 

लगता है | वाराणसी सुबह के तो क्या कहने?


morning at varansi 2

       (वाराणसी के घाट पर एक सूबह)


वैसे मुझे दुनिया का हर एक शहर अच्छा लगता है क्योंकि हर जगह की अपनी एक खूबी होती है |


ताऊ : दोस्तों से क्या अपेक्षा है


शुभम - दुःख के साथ कहना पड़ता है की आजकल अच्छे दोस्त नही मिलते | वैसे मै अपने 

ऐसे दोस्त बनाना कहूंगा जिससे मै अपनी हर बात कह सकूं | ना ही कोई दिखावा हो बस 

दोस्ती यानि कि सिर्फ़ और सिर्फ़ दोस्ती.


ताऊ : हमने मुस्कराते हुये पूछा- कोई गर्ल फ़्रेण्ड बनाई क्या?


शुभम - हा हा ...अब आपसे झूठ क्यों बोलूँ, है एक दो friends परन्तु अभी मेरी पढ़ाई करने की 

उम्र है इस लिए इन सब बातो पर कम ही ध्यान जाता है |

  

ताऊ :  लडकियों से डर लगता है आपको या लडकियां आपसे डरती हैं?  


शुभम  - अरे ताऊ जी, ये कैसा प्रश्न पूछ लिया?

 

ताऊ - भाई जब सब जवाब फ़र्राटेदार दे रहे हो तो इसका भी दे ही डालो.

 

शुभम - चलिए बता ही देता हूँ मेरे ख्याल से दुनिया में ऐसा कोई मनुष्य नही होगा जो लड़कियों या 

महिलाओं से न डरता हो | उन्ही में मै भी हूँ |

 

ताऊ :  तुम वाराणसी मे ऐसी क्या खुराफ़ात करते थे कि पापा मम्मी ने तुमको पढने यहां पूना 

भेज दिया?


शुभम - पूना तो मै अपनी मर्जी से आया हूँ बड़े भाई यहाँ पहले से थे तो इस वजह से वाराणसी के 

बाद पूना ही पहली पसंद थी |


ताऊ : यानि आप यह कहना चाहते हैं कि आप बहुत शरीफ़ बच्चे हैं अपने घर के?

 

शुभम - शरीफ़ तो क्या ताऊ जी?  खुराफ़ात करने में देखा जाए तो मेरा परिवार संयुक्त होने के नाते हमारे 

परिवार में ११ खुराफ़ाती  भाई बहन थे. सभी एक से बढकर एक.


और मुझे उन सभी में सरताज का खिताब मिला हुआ था अब तक तो आप समझ ही गए होंगे की मै 

बचपन से ही शैतान रहा हूँ |

 

ताऊ : हां ये बात तो हम अब तक आसानी से समझ ही चुके हैं.  बडा भाई भी पूना मे साथ ही रह 

कर पढता है? 


शुभम  -  हाँ बड़े भाई भी पुणे में साथ ही में रहकर C.A. की पढ़ाई करने के साथ साथ एक multinational company में कार्य कर रहे है | 


ताऊ :  क्या नाम है बडे भाई का?

  

शुभम -  बड़े भाई को तो आप जानते होंगे उनका नाम वरुण जायसवाल है |

 

ताऊ : हां बिल्कुल वो भी पहेलियों को बडे शौक से हल करते हैं. अब ये बताईये कि यहां

पापा - मम्मी मे ज्यादा याद किसकी आती है? 


शुभम - सच कहूं तो दोनों की जितनी मम्मी की उतनी ही पापा की | मेरे नजरिये से दोनों समान 

है जितनी माँ महत्वपूर्ण है उतने ही पापा भी |


ताऊ :  आखिरी बार वाराणसी कब गये? 


शुभम - आखिरी बार वाराणसी दिवाली में गया था | परन्तु आने के बाद बहुत दिनों तक शायद खाना 

तथा सोना ठीक से न हो पाया था | 


ताऊ :  ब्लागींग का शौक कैसे चढा?


शुभम - ब्लोगिंग  का शौक तो ऐसे ही चढ़ गया, मुझे बहुत पहले से ही कम्पूटर में रुचि रही है , 

पूना आने के बाद ब्लॉग्गिंग को जाना | शुरू शुरू में तो बस सभी के ब्लॉग ही पड़ता था पर थोड़े 

दिनों बाद ऐसे ही अपना ब्लॉग बनाया जो थोड़ा अलग था उस समय मैंने यह नही सोचा था की 

ये इतना प्रसिद्ध हो जाएगा |  


ताऊ : अभी तक के जीवन की सबसे यादगार घटना?


शुभम -  जैसा की आप जानते है बचपन से ही खुराफ़ाती रहने के कारण मेरा जीवन ही एक यादगार 

घटना बन गया है परन्तु एक घटना मै आप सभी से बताना चाहूँगा.


उस दिन मेरी बोर्ड की परीक्षा का अन्तिम दिन था और रात में देरी से पढ़ाई करने के कारण मै बहुत ही 

देर से सोया | चूँकि घर के सभी सदस्य बाहर गए थे इस वजह से सुबह जगाने वाला भी कोई नही था। 

अलार्म भी सुबह ६ बजे का लगाया था पर घङी को भी ५ मिनट पहले ही बंद होना था यानी ५.५५ पर |


खैर मैंने वक्त देखा तो परीक्षा शुरू होने में अभी १ घंटा बाकी था. मैंने सोचा की आराम से पहुच जाऊँगा 

पर शायद किस्मत को ये भी नही मंजूर था साइकिल भी ख़राब निकली और बस भी निकल चुकी थी |


मैंने सोचा आज तो तू गया शुभम, पर उम्मीद बाकी थी. एक मोटरसाइकिल सवार ने आधे रास्ते की 

लिफ्ट दी और बाकि आधे रास्ते दौड़ता हुआ १० मिनट की देरी से पहुच गया पर इतनी देर से दौड़ते 

रहने के कारण लिखना आधे घंटे के बाद शुरू कर पाया | हैरत की बात यह थी की उसमे ही सबसे 

अच्छे नम्बर आए |

 

ताऊ : वाह भई वाह. इस परिक्षा में सबसे अच्छे नम्बर? यानि भगवान ने भी मेहनत और लगन 

का पुरुस्कार दे दिया आपको. अब ये बताईये कि अगर पिछली जिंदगी मे से एक कोई सा दिन 

वापस जीने के लिये दिया जाये तो कौन सा दिन दुबारा जीना चाहोगे?

 

शुभम -  अगर जिन्दगी ऐसा सचमुच में हो तो मै अपने बचपन के दिनों में से कोई भी दिन जी 

सकता हूँ क्योंकि आप कितने ही बड़े हो जाए बचपन के दिनों को कभी भुला नही सकते |

 
ताऊ :  स्कूल मे शिक्षक कैसे लगते थे? 


शुभम -  - इस बात में तो मै स्कूल के शिक्षकों का प्रिय था भले ही थोडी शैतानी कर लेता था परन्तु 

क्लास मोनिटर होने के नाते सभी शिक्षकों से जान पहचान थी |

स्कूल के शिक्षक मुझे सबसे अच्छे लगे क्यों की उन्होंने पढ़ाई तो करवाई ही साथ ही साथ अच्छे 

संस्कार भी दिए जो माता - पिता के बाद वो ही दे सकते थे |

 

ताऊ : अब एक अंतिम सवाल बताईये. आप पढ लिखकर जिंदगी मे आगे क्या बनना चाहते हैं?

 

शुभम - ताऊ जी, मुझे IIM से MBA करना है और मैं करके ही रहुंगा.

 

ताऊ : बहुत बधाई और शुभकामना आपको. इतना दृढ निश्चय है तो आप अवश्य अपने इरादों 

मे कामयाब होंगे.

 

शाम को हम शुभम के बडे भाई वरुण जयसवाल से भी मिले. वरुण भी निहायत ही जहीन और सुलझे 

हुये विचारों का युवक है. दोनों ही भाई बहुत सज्जन, कर्मठ और कुछ कर गुजरने वाले लगे.

 

इस उम्र के बालकों का यह जज्बा हमे तो बहुत ही प्रभावित कर गया. आपको कैसा लगा यह साक्षात्कार,  

अवश्य बताईयेगा.

ताई, छोरी और ट्रेफिक हवलदार

ताऊ का शहर के अस्पताल मे आपरेशन हुया था ! सो ताई
को शहर जाणा था ! सो ताई चढ ली शहर जाण आली बस मै !
बस मै घणी ठाडी भीड हो री थी ! बैठण की जगह कितै भी नही थी !
आगे आगे की सब सीटों पै कालेज जाण आले छोरे बैठे थे !
ताई को अनदेखी सी करके सारे छोरे सीटों पै जमे ही रहे !
कोई भी ना उठया ! ताई नै थोडी देर तो इन्तजार किया फिर
वहीं बस के बोनट पर बैठ गई !
थोडी देर बाद दो तीन कालेज जाण आली छोरियां अगले स्टाप
से बस मै चढी ! उन छोरीयां के चढते ही बैठे हुये लडकों ने
उनके लिये सीट खाली कर दी और अपनी सीटों पर उन छोरियों
को बैठा लिया और खुद खडे हो लिये ! ये देख कर ताई को
किम्मै छोह (गुस्सा) सा आगया ! ताई उन लडकों से तो किम्मै
ना बोली पर उन छोरियां तैं बोली - इतना इतराणै (गुरुर) क्युं
लाग री हो ? आज नही तै कल थमनै भी इसी बोनट पै आणा सै !


शहर पहुंच कै ताई बस तै उतर ली और अस्पताल की तरफ़ चाल
पडी ! रास्ते मै चोराहा पार करणा था सो ताई नै लाल पीली
लाइट का किम्मै बेरा था नही सो वो तो चाल पडी मूंह ठा के !
लाल लाइट मै चोराहा पार करते देख कै, ट्रेफ़िक होलदार सीटी
मारण लाग ग्या ! पर ताई तो सीधी ही चाली जावै थी ! फ़िर
दोड कै होलदार साब नै ताई को रोका !
और बोला- क्युं ताई मरण का सोच कै आई सै के ?
ताई- अरे बेटा मैं क्युं मरण लागी ! तैं ढंग सै नही बोल सकदा के ?
या तनै बात करण की तमीज नही सिखाई तेरे घर आला नै ?
होलदार-- ताई मैं इतनी देर तैं सीटी मारण लाग रया सूं अर तैं तो
रुकदी ही नही ?
ताई बोली-- अरे तेरी के अक्ल खराब हो राखी सै ?
इब मेरी या उम्र के तन्नै सीटी पर रुकण की दिखै सै ?
अपनै जमानै मै तो मै एक सीटी पर ही रुक जाया करै थी !
और छोह मै आके ताई नै होलदार के दो कान तले बजा दिये !

एक गधे की दुःख भरी दास्ताँ



आप लोग न्युं मत समझना कि मैं आपको ऐसे ही कोइ कहानी सुना रह्या सूं ! भाई थम इब कोई बालक थोडे ही हो ! या कहानी सै बिल्कूल सांचीं, तो भाइ सुनो !


एक था गधा ! और भाइ वो था एक धोबी का गधा ! इब आप पूछोगे कि भाइ यो कुणसे जमाने की बात सै ? आज कल ना तो धोबी रहे और ना उनके पास गधे ! इब जो धोबी थे उन्होने लान्ड्री खोल ली और गधे की जगह स्कूटर ले लिये !

बिल्कूल भाई थारी बात भी कती सांची सै ! पर यार ये तो सोचो की सारे कूओं में ही भांग थोडे पडगी सै ? अरे भाई थोडे बहुत परम्परावादी धोबी भी सैं और उतने ही परम्परा वादी उनके गधे भी सैं ! और भाइ यकिन ना हो तो आजाना ताउ के धौरै (पास) ! आपको मिलवा देंगे , इस ज्ञानी धोबी और उसके गधे चन्दू से !

यो दोन्युं बडे मजे मे थे ! रोज सुबह धोबी अपने गधे पर कपडे लाद के और छोरियां के कालेज कै सामने से होता हुया कपडे धोनै जलेबी घाट जाया करता और वो जब तक अपने कपडे धोता तब तक चन्दू गधा नदी किनारे की हरी हरी घास खाया करता ! और फ़िर समय बचता तो ठन्ढी छांव मे लोट पोट हो लिया करता ! इतना सुथरा और गबरू गधा था की , आप पूछो ही मत !

कभी इसका मूड आजाया करता था तो नेकी राम की रागनी भी बडे उंचे सुर मे गा लिया करै था ! और भाइ बडा सुथरा गाया करै था !पर भाइ पता नही यो गधा कुण सी जात का था कि इतना सुन्दर और जवान होने के बावजूद भी इसने कभी किसी पराई गधी पर बुरी नजर नही डाली ! और ना ही कभी किसी गधी पर लाइन मारनै की सोची !

वहां पर दुसरे धोबियों और कुम्हारों की सुन्दर सुन्दर और जवान गधियां भी आया करै थी पर चन्दू ने कभी उनकी तरफ़ नजर उठा कर भी नही देखा ! हालांकि ये और बात है कि चन्दू को रिझाने के लिये उन गधियों ने बहुत सारी कोशिशें की जो सब बेकार गई ! यहां तक कि उन पुरातन पन्थी गधियों ने टाइट जीन्स और लांडी कुर्ती भी पहनना शुरू कर दिया
पर वो चन्दू का दिल नही जीत सकी !

और साहब आप ये समझ ल्यो कि चन्दू गधा लन्च करता हुवा यानि घास चरता हुवा इन गधियों के बीच मे चला जाता तो भी उन सुन्दर और जवान गधियों के मालिकों को कोई ऐतराज नही होता , बल्कि कोइ कोइ तो अपनी गधी का जिम्मा भी चन्दू गधे को दे देता कि कहीं कोइ दुसरा गधा उनकी जवान गधी को बहला फ़ुसला कर भगा ना ले जावै !
इतना शरीफ़ और लायक था चन्दू !

इधर कुछ दिनों तैं ग्यानी धोबी नै देख्या कि आज कल कालेज कै पास आकै गधा थोडा धीरे हो जाता था ! और कालेज कै सामनै आली दुकान पै आके तो एकदम रुक ही जाया करै था ! असल मै चंदू गधे को एक सुन्दर, जवान और चटक मटक सी कालेज की छोरी धोरै प्यार हो गया था !

इब गधा तो था ही सो चढ गया इस नव योवना कै चालै ! और आज कल बडा रोमान्टिक मूड मै रह्या करता और घर से गठरी लादनै के पहले बाल बनाके, दाढी कटिंग सब तरिके से करकै निकल्या करै था ! इब धीरे धीरे इन दोनुआं का इश्क परवान चढनै लग गया ! कभी छोरी इसके तरफ़ देखकै मुसकरा देवे, कभी बाल झटक कै अपनी अदा दिखावै
और कभी मुस्करा के गर्दन को बडी अदा से घुमा ले !

और चंदू गधा भी कभी आंख का कोना दबा कर और कभी कोइ प्रेमगीत गुन गुना कर जबाव देता था ! और साहब "हम तो तेरे आशिक हैं सदियों पुराने" इसी गाने को चन्दू गधा गुन गुनाया करै था !

आप न्युं समझ ल्यो की इब से पहले भी इस हसींन जवान कन्या ने कई गधों को अपने इश्क के जाल मैं उलझाया था और इबकै बारी आगी सै इस चिकनै और कर्म जले चन्दू गधे की जो इतनी सुन्दर और सुशील गधियों को छोडकर इस सर्राटा आफ़त के लपेटे मे आ लिया !

इब धीरे धीरे बात यहां तक आ गई कि दोन्युं डेटिंग भी करनै लग गये ! धोबी जब तक कपडे धोता तब तक चन्दू गधा फ़ुर्र हो लेता और वो जवान छोरी भी तडी मारके कालेज से गायब ! कभी माल मै जाकै सिनेमा तो कभी काफ़ी शाप
पर ! और साहब ये समझ लो कि चन्दू तो २४ घन्टे इसी परी के ख्वाबों और ख्यालों में डूबा रहने लग गया ! उस इश्क के अन्धे को ये भी नही दिखाई दिया कि उन दोनु को खुले आम लप्पे झप्पे करते देख कै दुसरे गधे भी उस कन्या पर डोरे डालनै लग गये हैं !

कुछ समय बाद चन्दू को लगा की वो कन्या उससे कुछ ढंग से बात नही करती थी ! और उससे कूछ उखडी उखडी सी
रहण लाग री थी ! इब चन्दू ठहरा सीधा बांका नौजवान और उपर से गधा , सो वो क्या जाने इन अजाबों के चाल्हे !
और इस सीधे सादे गधे को क्या मालूम था कि वो बला तो अपना टाइम पास कर रही थी ! वर्ना तो उसके सामने क्या चन्दू और क्या चन्दू की ओकात ! अपनी जात से बाहर जाकै प्यार करने के यो ही अन्जाम हुया करै सैं ! गधा होकै आदम जाद तैं प्यार करनै चला था !...... गधा कहीं का....... ! हमनै तो सुण राख्या था कि गधे ही
दुल्लत्ती मारया करै सैं पर भाई इस बला नै तो चन्दू गधे को वो दुल्लत्ती मारी कि यो चन्दू ओंधे मूंह कुलांट खा गया !

वाह रे चन्दू गधे की किस्मत ! असल में हुया यो की इब उस छोरी का दिल चन्दू से ऊब गया था और वो एक सेठ के गधे से फ़ंस गई थी ! ये सेठ का गधा भी क्या गधा ? बल्कि गधे के नाम पर कलंक ! पर चुंकि सेठ का गधा था तो था ! आप और हम इसमे क्या कर लेंगे ? इसिलिये तो कहते हैं "जिसका सेठ मेहरवान उसका गधा पहलवान" ! बिल्कुळ मोटा काला भुसन्ड और दो जवान बच्चों का बाप !
पर आया जाया करै था मर्सडीज कार मे और घने दिनों तैं डोरे फ़ेंक राखे थे इस छोरी पै ! इब कहां ज्ञानी धोबी का गधा चन्दू और कहां सेठ किरोडीमल का गधा ? चन्दू पैदल छाप और ये मर्सडिज बेन्ज मै चलने वाला गधा ! सो छोरी को तो फ़सना ही था ! फ़ंस ली !

क्यों की फ़ंसना और फ़साना ही तो उसके प्रिय शगल थे ! और इसकै नखरै उठानै मैं इस मोटे गधे ने कोइ कमी भी नही
छोड राखी थी ! चन्दू की तो इस सेठ के गधे के सामने ओकात हि क्या ?

इब चन्दु सडक के बीचों बीच गाता जावै था
" वो तेरे प्यार का गम इक बहाना था सनम"
ताऊ उधर तैं निकल रह्या था ! गधे नै यो गाना गाते सुन के बोल्या --
अबे सुसरी के ! बेवकूफ़ गधे के बच्चे ! इब क्युं देवदास बण रह्या सै ? तेरे को पहले सोचना चाहिये था कि इन बलाओं से तेरे जैसे साधारण गधे को इश्क नही करना चाहिये ! इनसे तो कोई बडे सेठ का गधा ही इश्क कर सकै सै ! फ़िर वो भले ही दो जवान बच्चों का बाप हो ! या काला मोटा और उम्रदराज हो ? आखिर धन माया ही तो सब कुछ है इस जमाने में ! अरे उल्लू के पठ्ठे... ये कोइ लैला मजनूं वाला जमाना नही सै ! अबे गधेराम ये इक्कसवीं सदी है ! इसमे तो धन माया के पीछे भाइ भाइ , बाप बेटे यहां तक की मियां बीबी भी एक दुसरे की कब्र खोद देवैं सै ! तु भले कितना ही सुथरा और शरीफ़ गधा हो ! है तो तू आखिर धोबी का ही गधा !

और ये सुन कर चन्दू , चुपचाप, हारे जुआरी जैसा कपडे की गठरी लादे जलेबी घाट की और बढ लिया !