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"दुल्हे मियां"


dulhe-miya1

दुल्हे मियां
सामने भविश्य तेरा
मुंह बाये खडा है
और तू घोडी पे
चड़ने को बेताब बडा है
आज हो रहा तू राजी
कल बाप ही कहेगा पाजी

अरे पागल सोच
ये प्रणय वेदी नही

तेरी बलि वेदी है
मंडप मे हवन नही
छुपा हुआ बडावानल है
मंत्रोच्चार नही
बोलता सिंहनाद है
पंडित नही मदारी हैdulhe-miya2
अरे अक्ल के अंधे
ये भांवर नही

गहरा एक भंवर है
अर्धांगिनी नही
ये नागफनी है
गठबंधन नही

यम का फ़ंदा है
अरे बावले

चंद्रग्रहण और सुर्य ग्रहण खराब
वैसे ही पाणिग्रहण करेगा बर्बाद

समय पर जरा जाग
धागे कच्चे हैं तोड डाल
पक गये धागे तो सारी उम्र
रस्साकशीं मे रहेगा बेहाल....
 
(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)