जैसा कि आप जानते हैं कि ताऊ की शनीचरी पहेली - १ के प्रथम विजेता स्मार्ट इन्डियन यानि की श्री अनुराग शर्मा थे. जिन्हे हम मित्र पित्सबर्गिया के नाम से बुलाते हैं. उनका साक्षात्कार लेने हमें उनके विशेष आग्रह पर वहीं जाना पडा.
हमने उनसे निवेदन किया था कि वो फ़ोन पर ही अपना साक्षात्कार रिकार्ड करवा देवें. पर उन्होने कहा कि वैसे तो आप इधर आते नही हो सो इस बहाने आपका आना भी हो जायेगा और उन्होनें हमको टिकट और वीसा वगैरह का सब प्रबंध करके भिजवा दिया तो उनके पास हमको जाना ही पडा.
हम "पिट्सबर्ग इंटरनेशनल एअरपोर्ट." से बाहर निकले ही थे कि हमको एक आवाज सुनाई दी. ताऊ, जय राम जी की!
हमने पलट कर देखा तो ये अनुराग शर्माजी थे जो हमे लेने एयरपोर्ट आये थे. साथ मे श्रीमती शर्मा और बिटिया अपराजिता भी थी. जो की स्कूल ड्रेस मे थी. हमने भी रामराम की और फ़िर कार से उनके घर की तरफ़ रवाना हुये.
हवाई अड्डे से घर तक पहुँचने के रास्ते में एक लम्बी मगर रौशन सुरंग से गुज़रे.
जैसे ही सुरंग समाप्त हुई, मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, एक अद्वितीय नज़ारा था. (श्रीमती एवम श्री शर्मा, बेटी के साथ)
दो विशालकाय नदियों के संगम के किनारे चमकती अट्टालिकाओं से भरा हुआ एक बहुत ही सुंदर नगर हमारे स्वागत में खडा था.. हमारा तो अभी तक सुरंग मे से गुजरने का रोमांच ही नही खत्म हुआ था कि यहां सामने के नजारे को देख कर आश्चर्यचकित रह गये. रास्ते में बिटिया अपराजिता को स्कूल ड्रोप किया.
घर पहूंचकर हमने थोडा आराम किया और तैयार हो कर उनके ड्राईंगरुम में बैठ गये.
फ़िर श्रीमती शर्मा ने हमको भोजन करवाया और खुद बिटिया को लेने स्कूळ चली गई. और हम अनुरागजी का इंटर्व्यु करने बैठ गये. जहां से बाहर का शानदार नजारा दिखाई पड रहा था.
(शर्माजी के घर के पीछे का दृष्य)
हमने पहले ही सवाल को बिना किसी ओपचारिकता के उनको पूछ लिया. और उन्होने भी बिना किसी ओपचारिकता के खुले दिल से जवाब दिये.
ताऊ - : आपके जीवन की कोई अविस्मरणिय घटना हमे बताईये. हमने सुना है कि आपका जीवन बहुत ही घटना प्रधान रहा है?
अनुराग - कहावत है कि पूत के पाँव.......
ताऊ - अरे आगे भी तो कुछ है कहावत में...
अनुराग - हाँ, याद आया... पूत के पाँव, खाने के और, दिखाने के और.
ताऊ - अरे ये क्या किया ? कहावत का भी बेडा गर्क कर दिया. खैर छोडिये, कहावत से बा्द में निबटेंगे, पहले साक्षात्कार तो कर लें... पिट्सबर्ग अब आ ही गये हैं तो जरा यहां घूम फ़िर के भी जायेंगे. पर साक्षात्कार पहले पूरा कर लेते हैं.
अनुराग : जी ताऊ, आपको सब जगह घुमा फ़िराके ही भेजेंगे. अब आप यहां रोज रोज तो आने से रहे.
ताऊ : हाँ जी, इब आप बोलो
अनुराग - दो साल का था तो रामपुर में पिताजी के साथ पुस्तकालय जाता था.
पाँच का हुआ तो जम्मू में अकेला नहर में नहाने चला गया और डूब गया.
बरेली में सात साल की उम्र में मैं शनिवार की साप्ताहिक बालसभा का हीरो था.
आपकी पहेलियों के जवाब तो अल्पना जी दे देती हैं. मेरी पहेली का जवाब वो भी
नहीं दे पाती थीं. न मानो तो पूछ लेना उनके इंटरव्यू में.
ताऊ : एक मिनट..शर्माजी..जरा एक मिनट..ये तो बडा आश्चर्य हुआ कि सु. अल्पना वर्माजी जो कि हमारी पहेलियों के जवाब देने के अलावा ताऊ साप्ताहिक पत्रिका की सलाहकार संपादक भी हैं , वो आपकी क्लास-मेट थी?
वाह भाई वाह... उन्होने तो कभी जिक्र ही नही किया?
अनुराग : असल मे ताऊ जी, बरेली में मेरे क्लास में दो अल्पना वर्मा थीं मगर यह अल्पना जी तो शायद अलग हैं.
ताऊ : अच्छा मतलब नाम की समानता है. खैर इसका मतलब ये हुआ कि आप बचपन से ही मेधावी और होनहार थे.
अनुराग : अजी अभी मेरी होनहारी के किस्से आगे भी तो सुनिये.
ताऊ : जी, सुनाईये. हम ये किस्से सुनने ही तो यहां इतनी दूर आये हैं और हमारे पाठक भी इसका आनन्द लेंगे.
अनुराग : जम्मू में जब हाईस्कूल तक के छात्रों की सम्मिलित सभा में जब कोई छात्र दशहरे और दिवाली का महत्व बताने के लिए खडा न हुआ तो मैं उठकर चला गया.और उस समय मेरी उम्र थी नौ साल.
और जो भी बोला उस पर खूब तालियाँ पिटीं और प्राचार्या ने पाँच रुपये इनाम दिए.
और ताऊ, राज़ की बात तो यह है कि - तब से आज तक कभी चुप न हुआ.
ताऊ : ये तो मुझे लगने लगा है. पर आप बताते चलिये. मुझे बडा मजा आ रहा है.
अनुराग : दस का हुआ तो सब बच्चों को धमकाने वाले एक भीमकाय बुली को डराने के लिए चक्कू लेकर स्कूल गया और वहाँ पकडा भी गया.
ताऊ : ये क्या बात हुई? भई हमको तो डर लग रहा है. कहीं वो आदत अब तक तो नही हैं? हमने मजाक करते हुये कहा.
अनुराग : नही ताऊ जी, बचपन की शरारतें बचपन के साथ ही दफ़न हो गई. आप चिंता मत किजिये. पर कोई आपको कुछ कहेगा तो फ़िर पुरानी हरकत दोहरा सकता हूं. अनुराग जी ने भी उसी मजाकिया लहजे में उत्तर दिया.
ताऊ : फ़िर आगे क्या हुआ?
अनुराग : बारह में अपने लिखे नाटक निर्देशित किए.
तेरह में कहानियाँ लिखीं.
चौदह का हुआ तो दुनिया छोड़ कर संन्यास ले लिया.
ताऊ : एक मिनट भाई एक मिनट.. ये सन्यास वाली बात कहां से सूझ गई आपको?
अनुराग : बस आ गई दिमाग मे.
ताऊ : ठीक है . अब आगे बताईये.
अनुराग : सोलह में कवितायें लिखनी शुरू कीं. सत्रह में ट्रेन से कटने से बाल-बाल बचा.
ताऊ : मतलब आपकी जिन्दगी का हर साल अविस्मरणीय रहा है?
अनुराग : जी ताऊ, फ़िर अठारह-उन्नीस साल की उम्र में बदायूं में अपने पैतृक घर में रहने का संयोग हुआ और बस उस घर में ऐसे-ऐसे चमत्कार हुए कि मेरी दुनिया ही बदल गयी.
ताऊ : कैसे बदल गई दुनियां?
अनुराग : संन्यास को अनिश्चित काल के लिए दिल के एक कोने में छिपा दिया और वापस दुनियादार बनकर पहले बरेली और फ़िर दिल्ली आ गया.
ताऊ : फ़िर क्या हुआ?
अनुराग : उसके बाद में स्टेज पर एक बड़ा नाटक किया. भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में बहुत से इनाम जीते. बड़ी पत्र-पत्रिकाओं, और स्थानीय अखबारों में नाम छपा.
ताऊ : मतलब आपका जीवन अभी तक तो पुर्णत: घटना प्रधान रहा. फ़िर आपने काम धंधा कब शुरु किया?
अनुराग : उसके बाद तीन साल तक टिककर एक नौकरी भी की जिसमें पहली बार घर-परिवार से बाहर की दुनिया को देखा. फ़िर एक-एक करके छः फरिश्तों से मिला, सारा हिन्दुस्तान घूमा, इंग्लॅण्ड देखा और अमेरिका में बस गया.
ताऊ : पर आप यहां वर्तमान मे क्या कर रहे हैं?
अनुराग : आजकल मैं यूपीएमसी में ऍप्लिकेशन आर्किटेक्ट हूँ. कंप्यूटरों से खेलता हूँ. पर एक मजे की बात बताऊं कि टेक्नोलॉजी क्षेत्र में हूँ मगर हर नए सेलफोन का प्रयोग आज भी मेरी बेटी ही सिखाती है.
ताऊ : वाह साहब वाह, यानि बिटिया भी बाप की तरह बहुत तेज दिमाग वाली है. आखिर बेटी भी तो आपकी ही है ना. हां तो और क्या क्या करते हैं आप?
अनुराग : खाली समय में अजीबो-गरीब काम करता रहता हूँ. बच्चों के साथ छोटे-मोटे नाटक आदि कर लेता हूँ, बीच में एक ऑनलाइन रेडियो स्टेशन "पिटरेडियो" शुरू किया था. दो साल तक चलाया फ़िर समय की कमी के चलते बंद कर दिया.
कुछ स्थानीय सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए वेब-साईट भी बनाई थीं - एक अभी भी है. आजकल आवाज़ (हिंद-युग्म) पर साप्ताहिक "सुनो कहानी" का संचालन और मासिक कवि सम्मलेन की तकनीकी सहायता कर रहा हूँ.
अपने मित्र भीष्म देसाई की प्रेरणा से विनोबा जी के गीता प्रवचन को भी स्वर दिया है
ताऊ : अरे वाह. हम तो समझे थे कि आम भारतीय की तरह आप भी पढ लिख कर सीधे यहां आगये होंगे? पर आप तो बहुत ज्यादा घुम्मकड निकले ? यानि सारी दुनियां ही नाप डाली? और यहां आकर भी आप चैन से नही बैठे?
अनुराग : चैन से नहीं बैठे से आपका क्या मतलब? आप क्या कहना चाहते हैं?
ताऊ : भई आप तो उल्टे हमारा इंटर्व्यु लेने लग गये? हमारे कहने का मतलब कि आप अभी तक भी आपकी बचपन वाली ऊठापटक से बाज नही आये?
अच्छा तो अब आपकी ये अविस्मरणिय़ घटनाए हमें और हमारे पाठकों को और बताईये. हमे इसमें बडा मजा आरहा है.
अनुराग : जी ताऊ. सच कहूं तो मेरे जीवन में जीवन कम है अविस्मरणीय घटनाओं का पुलिंदा ज़्यादा है. मगर आज मैं ऐसी एक भी घटना नहीं बताऊंगा. पूछो क्यों?
ताऊ: क्यों? अभी तक तो बता रहे थे. अब क्या नाराजी हो गई?
अनुराग : क्योंकि अगर मैंने बता दिया तो
इन घटनाओं पर लिखे मेरे अविस्मरणीय
उपन्यासों "एन एलियन अमंग फ्लेश ईटर्स" और "बांधों को तोड़ दो" और मेरी जीवनी को कौन पढेगा?
ताऊ : अच्छा तो ये बात है? चलिये साहब हम इन घटनाओं को आपकी लिखी किताबों से जान लेंगे.
पर आप ये बताईये कि आपकी कविताओ मे दर्द और लेखों मे साहित्यक विचार झलकने के पीछे कोई विशेष कारण? कोई खास वजह?
अनुराग : ताऊ, लोग उसी चीज़ के पीछे भागते हैं जो उनके पास नहीं होती है. अपन ठहरे मस्तराम बदायूँनी, दिल के साफ़ और दिमाग से साफ़. दर्द क्या होता है, कभी जाना ही नहीं.
ताऊ : फ़िर ये दर्द कहां से आगया आपके लेखन मे?
अनुराग : बस एक दिन जगजीत सिंह को गाते सुना, "जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे, औरों को समझाया है" - उसी दिन तय कर लिया की अपनी कविता में वही भाव समझायेंगे जो ख़ुद कभी नहीं समझा.
किस्मत अच्छी थी कि पाठक आप जैसे समझदार और दरियादिल निकले और उन्होंने उस दर्द को भी प्रोत्साहित ही किया. ज़िक्र आया है तो बताता चलूँ कि आप लोगों के
प्यार के लिए बहुत आभारी हूँ
और मेरा सपना है कि मैं भी अपने पाठकों, जिसमें आप भी शामिल हैं, जैसा ही उदारमना बन सकूं. बात आयी है तो यह भी बता दूँ कि अभी हाल ही में मेरा काव्य संकलन आया है,
"पतझड़ सावन वसंत बहार."
कृपया ज़रूर पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएँ.
यदि आपकी नज़दीकी दूकान पर न मिले तो मुझे ज़रूर बताएं.
लेखों में साहित्यिक विचार के बारे में तो मुझे ज़्यादा पता नहीं है मगर इतना ज़रूर है कि जो भी देखता हूँ उसको गहराई से महसूस करने की कोशिश करता हूँ और लिखते समय पाठकों की संवेदनाओं का और "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" का सूत्र याद रखता हूँ.
ताऊ : कोई ऐसा संदेश जो आप ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के पाठकों कहना चाहे?
अनुराग - मैं अपनी ज़िंदगी के हर दशक में कम से कम एक बार मौत को बिल्कुल
छूकर गुजरा हूँ. मैं जानता हूँ कि ज़िंदगी बहुत छोटी है. इसे छोटी-मोटी शिकायतों या बेवजह के स्वार्थों में बरबाद करने के बजाय थोड़ी सी मेहनत करके अपने आस-पास फैले उन बदनसीब भाई-बहनों के काम में लाने की कोशिश करें जो न जाने कितनी पीढियों से बहुत बेसब्री से हम जैसे भले लोगों का इंतज़ार कर रहे हैं.
अच्छाई के बारे में बड़ी-बड़ी बातें लिखें या न लिखें, कोई फर्क नहीं पड़ता है. अपनी सीमाओं में रहकर जितनी अच्छाई कर
सकते हैं, ज़रूर करें. साथ ही क्षमाशील बनने की कोशिश करें.
ताऊ : हर सफलता के पीछे एक प्रेरणा होती है? आप इसके पीछे किसे मानते हैं?
(शर्मा परिवार "फालिंग वाटर्स" में)
अनुराग : - जी, सफलता तो अभी तक नहीं मिली हाँ प्रेरणा ज़रूर है. मेरे लेखन के
पीछे मेरी पत्नी का बहुत बड़ा हाथ है. वे मेरी सह्कर्मिणी थीं. हमने अपनी जाति-भाषा-क्षेत्र से बाहर जाकर विवाह किया.
ताऊ : जी बहुत अच्छा लगा आपके विचार और आपकी अर्धांगनी के बारे में जानकर. आपकी बेटी भी हैं एक? उनके बारे मे बताईये.
अनुराग : जी मेरी बेटी अपराजिता है जो बाप की तरह कहानियां तो लिखती ही है, साथ में माँ की तरह चित्रकार भी है.
उसके बनाए एक चित्र को ओमनी होटल समूह ने अपने क्रिसमस+नववर्ष कार्ड पर प्रयुक्त किया था.
(अपराजिता द्वारा बनाई पेंटिंग)
यहां से हम अनुराग जी के घर के पीछे का दृष्य देख पारहे थे. सभी पेडो पर बर्फ़ जमी हुई थी. अब आप तो जानते ही हैं कि
हिंदुस्तान मे तो हमको यह मालूम पड जाये कि कश्मीर मे बर्फ़ पडी है तो हमे घर बैठे २ ठंड लगने लग जाती है.
और यहां तो हम चारों तरफ़ बर्फ़ देख कर ही ठंड मे सिकुड रहे थे.
(शर्माजी के घर से दिखाई देता एक दृष्य)
इतनी देर मे श्रीमती शर्मा अपराजिता बिटिया को स्कूल से लेकर आगई. और उन्होने थोडी देर मे हमारे सामने गर्मा गर्म चाय और नाश्ता रख दिया. अब हमारी सर्दी थोडी दूर भागी और हमने ईंटर्व्यु का सिलसिला आगे बढाया.
ताऊ : तो अनुराग जी अब आप हमारे पाठकों को आपके कैरियर के शुरुआत और वर्तमान तक के बारे मे कुछ बतायें.
अनुराग : जब मैं संन्यास से उबरकर बाहर आया तो पढाई पूरी की. पहली नौकरी नोएडा
में की. तीन साल पूरे होने से पहले ही केनरा बैंक में प्रोबशनरी अधिकारी बन गया.
जब तक बैंकिंग के विभिन्न पक्ष सीखे, बैंक कम्प्यूटरीकरण शुरू हो गया. योग्य अधिकारियों को चुनकर सॉफ्टवेयर विकास के लिए लगाया गया तो अपना भी रास्ता बदल गया. एक दशक दिल्ली में नौकरी की और अब एक दशक से पिट्सबर्ग में हूँ.
ताऊ : अनुराग जी अगर मैं आपसे आपकी पसंद पूछूं तो क्या जवाब देंगे?
अनुराग : पसंद..सही मे मुझे ...लोग - सरल, स्पष्टवादी, बुद्धिमान, उदार और निर्भीक सबसे ज्यादा पसंद हैं.
ताऊ : और आप पिछले दस साल से USA मे हैं तो खाने मे आपको क्या पसंद है?
अनुराग : खाने मे... - शाकाहारी और चरपरा..यानि तीखा..
ताऊ : किस तरह के स्थान अच्छे लगते हैं?
अनुराग : मुझे ऐसे स्थल हैं जैसे कि नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर.
ताऊ : किताबे कैसी पसंद करते हैं आप?
अनुराग : किताबें - शिक्षाप्रद ज्यादा पसंद हैं.
ताऊ : आपको नापसंद क्या है?
अनुराग : भ्रष्टाचार, स्वार्थ, मौकापरस्ती, संकीर्णता ये सब सख्त नापसंद हैं.
ताऊ : और संगीत के बारे मे? यानि किसका संगीत पसंद है?
अनुराग : संगीत - अपने अलावा किसी भी आवाज़ में
ताऊ - पर आपकी आवाज तो काफ़ी खूबसूरत है. और हमारे पाठक आपकी आवाज मे कई कहानियां भी पाडकास्ट पर सुन चुके हैं. चलिये ..हमारे पाठकों के लिये अपनी आवाज मे कोई कविता ही सुना दिजिये.
अनुराग : लीजिये साहब ये कविता सुनिये.
आलू भरी वो, कचौडी बनाएं
ख़ुद भी खाएं, हमें भी खिलाएं
आलू भरी वो...
भरवां करेले नहीं माँगता हूँ
पूरी औ' छोले नहीं माँगता हूँ
पत्तों की चटनी बनाकर वो लायें
ख़ुद भी चाटें, हमें भी चटायें
आलू भरी वो...
कैसे बताऊँ मैं भूखा नहीं
खा लूंगा मैं रूखा सूखा सही
मुझको न थाली सुनहरी दिखाएँ
ख़ुद भी खाएं, हमें भी खिलाएं
आलू भरी वो...
ताऊ : वाह साहब बडा मजा आया आपकी इस कविता में तो. अब आप मुझे ये बताईये कि आप ब्लागिंग मे कब से हैं? और हिंदी ब्लागिंग मे कब से आये?
अनुराग : मैंने २००५ में "बरेली ब्लॉग" http://bareilly.spaces.live.com/blog/) के नाम से अंग्रेजी में ब्लोगिंग शुरू की थी.
२००८ के उत्तरार्ध में हिन्दी ब्लोगिंग की दुनिया में आया. आप तब से तो मुझे भली प्रकार पहचानते ही हैं.
(इस्कोन मंदिर का भीतरी दृश्य)
और इसके बाद अनुराग जी ने हमको पिट्सबर्ग घुमाने का कार्यक्रम बनाया. माउंट वाशिंगटन से नगर (डाउनटाऊन) का दृश्य बड़ा मोहक लगा. हम तो मंत्र-मुग्ध हो गये देख कर.
फ़िर हम मनरोविल में श्री वेंकटेश्वर मन्दिर और हिन्दू जैन मन्दिर गए. ऊड्ड्पी रेस्तराओं में शुद्ध शाकाहारी दक्षिण भारतीय खाना खाकर तो हम और भी आनन्द मग्न हो गये, ऐसा दक्षिण भारतीय भोजन तो यहां भारत में भी नही मिलता.
रास्ते में हमने नगर (डाउनटाऊन) में अनुराग जी के दफ्तर की इमारत यानि "स्टील टॉवर" को देखा. शहर से लगभग ८०-१०० मील की दूरी पर इस्कोन का न्यू वृन्दावन
मन्दिर और स्वर्ण महल जाकर दर्शन का लाभ लिया.
हमने कुछ तस्वीरें हमारे कैमरे से खींची थी. नीचे हम आपको वही तस्वीरे दिखा कर उन मंदिरों के बारे में थोडा बहुत बताते हैं.
(इस्कान मंदिर में मुर्तियां)
सबसे पहले इस्कोन मन्दिर व वहाँ के स्वर्ण महल (पैलेस ऑफ़ गोल्ड - जहाँ प्रभुपाद आकर रुकते थे) गये . बहुत ही सुंदर जगह है.
(इस्कान मंदिर पिटस्बर्ग)
यह मन्दिर और महल इस्कोन के स्वर्णिम दिनों की याद है और इसे इस्कोन के गौर कृष्णभक्तों भक्तों ने ख़ुद अपने हाथों से बनाया था.
(श्री वेंकटेश्वर मंदिर पिटस्बर्ग)
अगले दिन हमने आराम किया. और फ़िर शाम को मार्केट और पिटस्बर्ग की अन्य जगह घूमते हुये हम वहां के श्रीवेंकटेश्वर मंदिर गये. यह मंदिर ईस्टर्न सब अर्ब में पेन हिल्स पर स्थित है.
यह मंदिर अमेरिका मे बने शुरुआती मंदिरों मे से है जो कि यहां बसने वाले भारतीय समुदाय की आस्था का केंद्र है. और सारे अमेरिका और कनाडा तक से लोग यहां दर्शन करने आते हैं.
(हिंदू जैन मंदिर पिटस्बर्ग)
और जब शर्माजी ने हमको वहां हिंदू जैन टेम्पल होने की बात कही तो हमे विश्वास ही नही हुआ कि इतना सुंदर हिंदू जैन मंदिर वहां हो सकता है. यह मंदिर परमार्थ निकेतन के स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के निर्देशन में बनवाया गया था.
यहां गणेश जी, लक्ष्मीनारायण, राधाकृष्ण, राम , सीता, लक्ष्मण, हनुमान और भगवान महावीर के दर्शन करके मन प्रफ़ुल्लित हो गया.
अगले दिन शर्माजी सपरिवार हमको एयरपोर्ट छोडने आये. और इस तरह हमने अपनी पिटस्बर्ग यात्रा पुर्ण की.
एक निहायत ही जिन्दा दिल, जोश से भरे और साहित्य प्रेमी शख्स और उनकी धर्मपत्नि एवम बिटिया से मुलाकत करके हमको तो बहुत ही शानदार अनुभव हुआ.
आज के जमाने मे ऐसे आदर्श वादी पुरुष से मिलकर एक सुखद आश्चर्य हुआ. हमने शर्माजी द्वारा भेंट की गई उनकी किताबों मे से "पतझड़ सावन वसंत बहार." को फ़्लाईट मे पढने के लिये बाहर ही रख लिया.
श्री अनुराग शर्मा से मिलना आपको कैसा लगा? अवश्य बताईयेगा.