Showing posts with label रामायण. Show all posts
Showing posts with label रामायण. Show all posts

क्या है ताऊ का अस्तित्व और हकीकत?


श्री ज्ञानदत्त जी पांडे  जो कि ब्लागजगत के सम्माननिय और प्रथम पीढी के ब्लागरों में से एक हैं,  और जो अपनी नियमित और सारगर्भित पोस्ट्स के लिये जाने जाते हैं, ने शायद  सबसे पहले 3 dec. 2008 को  अपनी पोस्ट यह ताऊ कौन है  के द्वारा जिज्ञासा प्रकट की.



इसके पश्चात सभी ब्लागर्स में ताऊ शब्द एक पहेली बना रहा. मेरे ही शहर के सम्माननीय ब्लागर श्री दिलीप कवठेकर तो एक कदम और आगे जाते हुये हमारे शहर की उस पान की दूकान तक भी पहुंच गये जहां  "कृपया यहां ज्ञान ना बांटे, यहां सभी ज्ञानी हैं" की तख्ती लगी है. वहां पूछताछ करने पर पान वाले ने ताऊ के विषय में अनभिज्ञता ही जताई. यदि कोई ताऊ होता  तो वह बता पाता.

इस दरम्यान कुछ ब्लागर्स ने ताऊ से उसके आफ़िस/घर में मुलाकात का दावा किया पर अंतर सोहिल ने अपनी पोस्ट क्या हम असली ताऊ से मिले थे  लिख कर वापस उन दावों को शक के घेरे में ला दिया. 

ऐसा ही एक दावा डा. टी.सी. दराल ने अपनी पोस्ट    "ताऊगिरी का इस्तेमाल करते हुये तनाव हटायें"   में किया है कि वो ताऊ से एक बार मिले हैं लेकिन जिस ताऊ से मिले हैं उसकी शक्लो सूरत बिल्कुल जुदा थी. यानि बात यहां भी और उलझती नजर आ रही है.  

इसी पोस्ट पर की गई अपनी टिप्पणी में सुश्री   अल्पना वर्मा  ने निम्न टिप्पणी करते हुये मामला कुछ सुलझाने की कोशीश की है.

बहुत सही लिखा है आप ने.
यूँ तो बहुत से लोग आज तक नहीं जान पाए हैं कि आखिर ये ताऊ कौन है?
फिर भी काफी लोग अब उनकी सही पहचान जानते हैं.
शुरू में तो लोग अंदाज़ा लगाते थे कि शायद कोई महिला है ,
या कोई जाना माना ब्लोगर छद्म नाम से लिख रहा है.
लेकिन सभी के अनुमानों पर पानी फेरते हुए उन्होंने अपना एक मुकाम बना लिया है.
अब यहाँ एक सशक्त पहचान हैं.उनका साक्षात्कार का कार्यक्रम भी बहुतों से परिचय करने में सक्षम रहा.
ताऊ पहेली तो यादगार है ही !
उन्हें ढेरों शुभकामनाएँ कि ऐसे ही सब को हँसाते -गुदगुदाते रहें.

वैसे स्वयं  ताऊ ने  आज तक  किसी भी दावे का समर्थन या खंडन नही किया है.  जैसा कि सभी जानते हैं  ताऊ को फ़ेसबुक के फ़ंडों का अभी कोई विशेष ज्ञान नही है,  लेकिन आज अचानक फ़ेसबुक पर Like का चटका लगाते लगाते गलती से खुद के  मेसेज बाक्स पर तगडा चटका लग गया और निम्न मेसेज दिखा.


  • Conversation started March 27

    i have never seen such a human face

इस मेसेज को पढकर ताऊ विवश हो गया है कि भक्तों की जिज्ञासा का शमन करना अति अनिवार्य है वर्ना मुश्किलें और बढ सकती हैं.

वैसे  ताऊ का मुख व ताऊ  शब्द कौन से तत्व और कौन सी धातु से बना है? तकनीकी रूप से  यह तो शब्दों का सफ़र वाले श्री  अजित बडनेरकर ही बता सकते हैं या सिर्फ़ ताऊ ही, क्योंकि इस  शब्द की  पौराणिक कहानी कोई नही जानता. यह शब्द आज तक रहस्य ही बना हुआ है.

श्री राबिन दत्ता साहब के मेसेज द्वारा अभिव्यक्त जिज्ञासा  का जवाब  फ़ेसबुक पर देने की बजाये यहां ब्लाग पर देना उचित जान पड रहा है.   आशा है ताऊ के बारे में फ़ैली  सभी भ्रांतियां और कल्पनाएं दूर हो सकेंगी.

जहां तक ताऊ की उत्पत्ति का सवाल है यह त्रेता युग की   रामायण कालीन बात है. जब माता सीता का अपहरण दादा लंकेश्वर ने कर लिया था और उन्हें लंका की अशोक वाटिका में सख्त  पहरे में रखा गया था. पहरेदारों में अनेकों राक्षस/राक्षसनियां ऐसे भी थे जो माता सीता के प्रति सहानुभुति व स्नेह  रखते थे.  और उनका हर प्रकार से मनोबल बढाकर  ध्यान रखते थे.

सेवक/सेविकाओं द्वारा लाख यत्न किये जाने पर भी माता सीता हमेशा  उदास व गुमशुम सी प्रभु श्रीराम की याद में खोयी रहती थी. ऐसे में वहां एक काले मुंह का बंदर फ़ल फ़ूल खाने  आया करता था. वो तरह तरह की आवाजे निकालता और अजीब सी हरकते करता था. बंदर का यह नित्य का कार्य था पर एक दिन उस बंदर की कलाबाजियां देखकर माता सीता के चेहरे पर एक मुस्कान सी दौड गयी. सभी सेवक यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये.

बंदर का तो यह नित्य कर्म था, जैसे ही बंदर आता, माता सीता सब वेदनाएं भूलकर उसकी कारगुजारियां देखती रहती,  कभी मुस्करा उठती. धीरे धीरे उस बंदर से उन्हें पुत्रवत स्नेह हो गया. वह बंदर उनके आसपास ही रहता और दोनों में अक्सर बात चीत होती रहती.

जब हनुमान जी सीता माता की खोज में उस क्षेत्र में भटक रहे थे तब इसी काले मुंह के बंदर ने अपनी सांकेतिक भाषा में उन्हें माता सीता के अशोक वाटिका में होने की सूचना दी थी वर्ना इतने राक्षसों की पहरेदारी में  हनुमान जी का वहां पहुंचना असंभव ही था.

समय बीतने के साथ राम रावण युद्ध समाप्त हुआ. भगवान श्रीराम के साथ  माता सीता पुष्पक विमान पर सवार होकर अयोध्या प्रस्थान की तैयारी कर रही थी. माता सीता ने उनकी सेवा में रहे सभी सेवक सेविकाओं को उनकी इच्छा के मुताबिक वरदान दिये. लेकिन उस समय यह काले मुंह का बंदर कहीं दिखाई नही दे रहा था. माता सीता उस बंदर से मिले बिना जाना नही चाहती थी.

भगवान श्रीराम अयोध्या गमन को उतावले हो रहे थे. उन्होनें माता सीता से पूछा कि उस बंदर में ऐसा क्या है जो तुम फ़ालतू में विलंब कर रही हो? माता सीता ने बताया कि नजरबंदी की अवधि में एक वही बंदर था जो मुझे हंसाया करता था वर्ना मैं तो हंसना ही भूल चुकी थी. आप भी मिलोगे तो वो आपको भी हंसा देगा, उसकी शक्ल ही ऐसी है.

भगवान राम भी उस से मिलने को आतुर होगये.  उस बंदर की खोज करायी गई  तो मालूम हुआ कि माता सीता के अशोक वाटिका से जाने की बात पर वह उदास होकर एक कंदरा में पडा है. उसे समझा बुझाकर अशोक वाटिका में लाया गया. बंदर की बातों से भगवान श्रीराम भी चौदह वर्षों  मे जितना नही हंसे थे उससे भी ज्यादा हंसे और युद्ध की सारी थकान भूल गये. बंदर को अपने साथ ले जाने के लिये  उन्होंने विभीषण को आग्रह किया. विभिषण को भला क्या आपत्ति हो सकती थी? यह काले मुंह का बंदर भी उनके साथ पुष्पक विमान में सवार हो गया.

हवाई यात्रा के दौरान  रास्ते में वह सबका मनोरंजन करता रहा. अचानक माता सीता को ख्याल आया कि यह जंगल का जीव है और मैं इसे अपने स्वार्थ वश राजमहल ले जा रही हूं. यह इसके साथ अन्याय होगा. उन्होंने बंदर से पूछा कि क्या वो बंदर से मनुष्य बनना चाहेगा? बंदर ने चूहिया वाली कहानी सुन रखी थी सो विनम्रता पूर्वक बंदर ही बने रहने का कहा.

अब तक विमान अयोध्या के पहले आज के शेखावाटी व  हरियाणा क्षेत्र के ऊपर से गुजर रहा था. अचानक माता सीता के आदेश पर विमान को वहां जंगल में उतार दिया गया. विमान के उतरते समय उस बंदर ने कुछ अजीब सी हरकत और आवाजें की जिससे माता सीता खुलकर हंस पडी, हंसते हंसते उनके पेट में बल पडने लगे, किसी तरह अपनी हंसी काबू में करते हुये वो बंदर से कहना चाह रही थी कि हे तात....और हंसी आने के कारण उनके मुंह से निकला हे ता..ऊऊऊ.... बंदर ने जब अपना ताऊ नाम सुना तो अति प्रसन्न हो गया और माता के चरण स्पर्श करते हुये बोला - माता आपने आज मेरा सही नामकरण कर दिया.

माता सीता ने उसको आशीर्वाद देते हुये कहा - हे ताऊ, तुमने मेरे दुखों के दिनों में हंसा हंसाकर मुझे जीवन दान दिया है. मैं तुम्हारी आभारी हूं और बदले में तुम्हें ऐसा कुछ देना चाहती हूं जिससे  युगों तक तुमको दुनियां याद रखेगी. बंदर बोला - माते,  जो आपकी इच्छा हो मेरे लिये वही आज्ञा है.

माता सीता ने कहा - हे वानर, अब से तुम  ताऊ नाम से पुकारे जावोगे, आज से   इस सुरम्य शेखावाटी व  हरियाणा प्रदेश का समस्त क्षेत्र मैं  तुम्हारे लिये आरक्षित करवा रही हूं, अब से इस प्रदेश पर तुम्हारा यानि ताऊओं का ही राज रहेगा.  अब से इस प्रदेश में घर घर में ताऊ पैदा होंगे जो दुखी इंसानों के चेहरे पर खुशियां बिखरने का काम करेंगे. घर में छोटे बडे सभी उनको तात की जगह ताऊ से संबोधित करते हुये  आदर और सम्मान देंगे. तुम्हें और तुम्हारी ताऊ प्रजाति को कभी  भी दुख नही व्याप्त होगा, तुम अनंतकाल तक  इस धरा पर सुखपूर्वक आनंद लेते रहोगे.

यह कहते हुये माता सीता ने बंदर ताऊ के सर पर स्नेह वश हाथ फ़िराया, हाथ फ़िराते ही बंदर का शरीर तो मनुष्य का हो गया और मुंह उस काले बंदर जैसा ही रहा क्योंकि बंदर पूर्ण रूप से मनुष्य नही बनना चाहता था.

प्रभु श्रीराम ने बंदर ताऊ पर सीता जी का इतना स्नेह देखा तो उन्होनें कृपा पूर्वक बंदर ताऊ को सम्मान स्वरूप एक पगडी (साफ़ा) अपने हाथों से  पहनायी साथ ही एक  लठ्ठ भी भेंट में देते हुये कहा -   जब तक यह संसार रहेगा ताऊ,  तब तक तेरा नाम रहेगा. इस लठ्ठ से अपनी व दीन दुखियों की रक्षा करना. कलियुग में घोर गमों का दौर आयेगा जब इंसान हंसना ही भूल जायेगा. तब  भी तुम  सारे जगत को हंसाते रहना, इससे बडा पुण्य नही है. तुमने देवी सीता को इतने गहरे गम में भी हंसाया है तो बाकी लोग तो तुम्हारे नाम और शक्ल देखकर ही खुशी पूर्वक प्रसन्न होंगे. तुम्हारे नाम और दर्शन से,  कलियुग के प्रभाव से संतप्त और दुखी मनुष्य,  हर्ष का अनुभव करेंगें. यह मेरा वरदान है जो मिथ्या नही हो सकता.

इतना सब होने के बाद हनुमान जी क्यों पीछे रहते सो उन्होंने  ताऊ को गले लगाते हुये कहा - हे भाई, तुमने   तात से ताऊ बनकर हमारी जाति का गौरव बढाया है. मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि जो भी दुखी सुखी तुम्हारी शरण में आयेगा मैं उसके सारे कष्ट दूर करूंगा. और कलियुग मे जब ब्लागिंग शुरू होगी तब तुम्हारे ब्लाग पर जो भक्त आकर श्रर्द्धा पूर्वक तुम्हें टिप्पणी रूपी फ़ल फ़ूल अर्पण करेगा उसके समस्त कष्ट विकार मेरे द्वारा दूर किये जायेंगे.

इसके बाद पुष्पक विमान उड चला और तभी से ताऊ ताऊत्व  के प्रचार प्रसार  में लगा हुआ है.

(आगे पढिये)