इब खूंटे पै पढो :- (रमकुडी - झमकुडी) रमकुडी - यो ताऊ के हौवे सै ? झमकुडी - ऐ छोरी इब सोज्या ना ! यो ताऊ तो बालकां नै डराण के काम आवै सै ! असल मे यो किम्मै ना होता ! कोरा मन का बहम हौवे सै ! |
यमदूत ताऊ को लेकर चाँद पर पहुंचे
कैसे ताऊ से पाला पडा है ?
हे उल्लुकवाहिनी ,
यों तो हर दिन ही
आपकी कृपा की सबको जरुरत है
पर हम ब्लागरो को विशेष जरुरत है
ब्लागरी के चक्कर में
आपसे ज्यादा
माँ सरस्वती का गुणगान हो जाता है
फ़िर इसी बात पर ताई का लट्ठ चल जाता है
गूगल बाबा कुछ देते नही
आप दिखती नही
तो अब आपका ये अन्याय सहन नही होगा
सीधे से आप नही आई तो अब ये होगा
आज धन तेरस को आपका वाहन
हमारी छत की मुंडेर पर बैठा था
हम तो समझ गए थे की हमारे मोहल्ले में
आपका विचरण हो रहा है
पर ब्लॉगर समझ कर हमारे घर
आप क्यूँ आने लगी ?
आप तो पीछे की गली में
सेठ कालीजाड के घर बैठी थी
पर अबकी बार आप गच्चा खा गई
ये ब्लॉगर इतना सीधा नही
की आप इसके सारे धंधे बिगाड़ दोगी
और ये आपको चैन से रहने देगा ?
अब देखते हैं आप यहाँ से कैसे लौटती हैं ?
आपके वाहन उल्लू को ताऊ ने किडनैप कर लिया है
उसको लट्ठ मार मार कर पिंजरे में बंद कर दिया है
अब वो उड़ने में असमर्थ है
उस सेठ के यहाँ आप दो दिन से ज्यादा
नही रह पाओगी
उसके काले कारनामे देख
उल्लू के पास दौडी चली आओगी
अब भी समय है हमारे पास आजाओ
हम सीधे साधे ब्लागरिए हैं
किसी का खून नही करते
बंदूक नही, सिर्फ़ की-बोर्ड चलाते हैं
वैसे तो आप इसे नम्र निवेदन ही समझना
और नही मानना हो तो
इसे धमकी समझ लेना
बिना उल्लू कहाँ जाओगी ?
हम कोई जमाखोर सेठ नही है
जो आपको बंद करके रखे
बंद लक्ष्मी भी बीमार हो जाती है
और हम चाहते हैं आप भी स्वस्थ रहो
आप आज तक काली और बीमार लक्ष्मी हो
इसलिए आप आराम तलब हो गई हो
आप भी हमारे साथ एक ब्लॉग बनालो
स्वस्थ हो जाओगी ,और ज्यादा लोगो को खुशी दे पाओगी
ये ध्यान रखना , सबके चूल्हे पर रोज रोटी हो
नही तो ताऊ के पास लट्ठ और भैंस के अलावा अब अक्ल भी है
इसीलिए आपके वाहन को बंधक बना लिया है
अब कैसे जाओगी ? सारी उम्र ताऊ की भैंस का गोबर साफ़ करते रहना
अब भी संभल जाओ , कठिन वक्त सामने खडा है
नही तो फ़िर कहोगी
इस ब्लागरी की दुनिया के
कैसे ताऊ से पाला पडा है ?
भाईया और बहणा नै ताऊ की तरफ़ तैं दीवाली की घणी राम राम ! लक्ष्मी मैया ने ताऊ तैं करार कर लिया सै की वो आप लोगो के साथ ही रहेगी ! नु करकै थम चिंता मुक्त हो कै दीपावली पर्व खुशी २ मनाओ ! ताऊ उसने कितै भी नही जाण देगा ! थारे खातर ताऊ लट्ठ लेके रखवाली करण लाग रया सै ! तो आज धन तेरस मनाओ कल रूप चोदस यानी छोटी दीवाली नै फ़िर मिलेंगे ! इब राम राम !
यदि किम्मै उंच नीच हो जाती ?
आजकल म्हारै छोटे भाई योगिन्द्र मौदगिल नै हरयानवी म्ह किस्से लिखणा शुरु कर दिया सै ! तो भाइ इब ताऊ न भी यो तय कर लिया सै कि इब ताऊ भी कविता करया करैगा ! और भाइ बात भी सही सै कि पडौस की दुकान आला दुकानदार जो माल बेचैगा वो माल तो हमको भी रखना पडैगा ! नही त म्हारी दुकान क्युं कर चालैगी ? तो इब सुनो ताऊ की ये कविता ! |
परसों रात की बात
अकस्मात
एक क्युट सी छोरी ने ताऊ को रोका
हम समझे पहचानने मे हो गया धोखा !
हम ताऊ-सुलभ लज्जा से
नजर झुकाए गुजर गये
छोरी के केश मारे गुस्से के बिखर गये
जोर जोर से चीखने चिल्लाने लगी-
गांव के जवान लोगो, आवो
इस शरीफ़जादे ताऊ से मुझको बचाओ
मैं पलको मे अवध की शाम
होठों पर बनारस की सुबह
बालों मे शबे-मालवा
और चेहरे पर बंगाल का जादू रखती हूं
फ़िर भी इस लफ़ंगे ताऊ ने मुझे नही छेडा
क्या मैं इसकी अम्मा लगती हुं ?
ताऊ बोल्यो अरे छोरी बात तो तू सांची कहवै सै
पर मन्नै या बतादे
यदि किम्मै उंच नीच हो जाती
तो ताई लठ्ठ लेकै
के थारै बाप के पास जाती ?
अच्छा भाई इब आज की राम राम !
ऊंटनी कै दूध आले ३ ही थन होवैं सैं !
हरयाणवी लोगो के जवाब में भी एक प्रश्न् छुपा होता है और यही इस भाषा की खूबसूरती है ! ताऊ आज कल भुट्टे बेच रहा है ! एक ग्राहक को बाक़ी रुपये वापस किए तो एक दस का नोट कुछ सड़ा गला था ! ग्राहक ने कहा - यह नोट बदल दे ताऊ ! अब ताऊ ने नोट बदल कर देते हुए पूछा - क्यों इस नोट की.. आँख दुखणी आ री सै के ? |
ताऊ किसी काम से शहर गया हुवा था ! वापसी मे बस मे काफ़ी भीड भाड थी !
ताऊ किसी तरह जबरदस्ती करता हुवा अपने लठ्ठ को लेके बस मे चढ तो लिया !
पर बैठण की जगह मिली कोनी ! ताऊ का माथा दिन भर की परेशानी से कुछ गर्म
तो था ही सो चुप चाप बस का डन्डा पकड कै खडा हो गया !
असल मे ताऊ शहर मे अपने लडके की स्कूल मे गया था ! क्योन्की ताऊ के छौरै नै
स्कूल म मास्टरनीजी तै किम्मै उटपटांग हरकत कर दी थी ! सो मास्टरनीजी ताऊ कै
छोरै पै किम्मै ज्यादा ही भडक ली थी और उस बालक नै स्कूल तैं निकालण की
जुगत भिडावै थी ! और इसीलिये ताऊ को स्कूल मे बुलवाया था ! इब ताऊ भी ताऊ
ही था ! वो भी जाकै मास्टरनी जी तैं भिड लिया !
मास्टरनी जी ने ताऊ को अन्ग्रेजी मे कुछ गालियां दे दी ! वो तो गनीमत की ताऊ का
अन्ग्रेजी से कुछ उधार लेना बाकी नही था सो ताऊ कुछ समझा नही ! और ताऊ को
मुर्ख समझ कै मास्टरनी जी किम्मै ज्यादा ही चटर पटर करण लाग री थी !
अब आप तो जानते ही हैं कि अन्ग्रेजी बोलनै वाले को कोई गांव का ताऊ मिल जाये
तो अपनी अन्ग्रेजी का सारा ज्ञान उसी पर उंडेल देते हैं !
तब ताऊ नै भी अपणी देशी जबाण मे किम्मै उलटा सीधा बोल दिया !
तब मास्टरनी जी चिल्लाई - सिक्युरिटी..सिक्युरिटि... असल मै वो सिक्युरिटी वाले को
बुलवा कर ताऊ को बाहर निकलवाना चाहती थी ! जब वो सिक्युरिटी..सिक्युरिटि...
चिल्लावण लाग री थी तब ताऊ नु समझ्या के यो बोल री सै .. सेक रोटी.. सेक रोटी..!
इब ताऊ का तो पारा चढ लिया और ताऊ बोला - अर मास्टरनी मै क्यूं रोटी सेकूं ?
रोटी सेक तू ! हम तो मर्द आदमी सैं ! रोटी नी सेक्या करते ! और मास्टरनी जी नै
ताऊ को बाहर का रास्ता दिखा दिया ! और ताऊ किसी तरह भूखा प्यासा घर आ गया !
घर लौट कर ताऊ की इच्छा हलवा खावण की हो री थी ! और ताई किम्मै
बणा कै देण आली नही थी ! सो ताऊ नै जोगाड लगाते हुये कहा -
अर भागवान सुण .. जरा ! आज त हल्वा बणा तू !
ताई बोली - क्यूं के काम करकै आया सै ? जो तेरे लिये हलवा बणाऊं ?
ताऊ बोल्या - अर मैं रामलाल तैं शर्त जीत कै आया सूं !
ताई बोली - कुण सी शर्त जीती सै तन्नै ! जरा हमनै भी बता !
ताऊ - मैं बोल्या, ऊंटनी कै दुध आले ३ थन होवैं सै ! रामलाल बोल्या
- कि नही ४ होवैं सै !
ताई - तो तू क्यूं कर जीत गया ? सारी दुनियां जानै सै कि ऊंटनी कै ४
ही थण होवैं सै !
ताऊ बोल्या - नही ३ होवैं सै ! तू मान जा !
ताई - मैं मान ही नही सकती ! झूंठी बात किस तरियां मानी ज्यागी !
ताऊ नै पूछी - इब भी सोच ले ! मानैगी या नही ?
ताई बोली - जा जा फ़ालतू बात ना करया करै ?
इब ताऊ नै किम्मै छोह (गुस्सा) सा आग्या घणे दिनों मै ! और राज भाटियाजी
नै ताऊ को कल ही दो लठ्ठ भेजे थे जरमनी तैं ! सो ताऊ नै तो उठा कै
ताई कै मार दिये कई लठ्ठ ! और ताई तो आज ताऊ का रूप देख कै रोती रोती
एक तरफ़ मै बैठगी ! और आज ताऊ कै हाथ मे मेड इन जर्मनी लठ्ठ देखकै
बोली -- हां बिल्कुळ मानगी थारी बात ! ऊंटनी कै दूध आले ३ ही थन होवैं सैं !
ताऊ बोल्या - सही कह री सै ! रामलाल भी इसी तरह लट्ठ खाकै ही मान्या था !
आप जो बॉक्स देख रहे हैं उसकी जानकारी मुझे डा. अनुराग जी ने उपलब्ध करवाई है , भाई अभिषेक जी ओझा की मेल द्वारा ! और इस ब्लॉग का नया डिजाइन मुझे भरत मुदगल (stockmode.com/tech) ने सुझाया ! मैं, आप तीनो महानुभावों का आभारी हूँ ! |
त्राहि माम गुरुदेव समीर जी
लेण ताहीं हम रेलवे सटेशन (STATION) गये थे ! वहां
तैं बाबू नै लेकै हम घर आ गये ! नहा धौकै म्हारै बाबू
नै हम तैं पूछी के भई वो तेरी सुई तैं हवाईजहाज
आली के चीज थी ? उसकै के हालचाल सैं ?
मैं बोल्यो- बाबू वा सुई तैं हवाईजहाज ना सै ! वा तो
सूई तै उडनतश्तरी सै ! बाबू बोल्यो--अर या उडनतश्तरी कित
सै आगी ? मैं बोल्यो - बाबू या तो मन्नै भी ना बेरा ! पर यो
उडन तश्तरी कितै तैं भी निकल कै घर घर जाकै प्रसाद (टिपण्णी)
बांट कै गायब ! छोटे बडे , अमीर गरीब किसी मे कोई भेद भाव नही
करै सै ! और फ़िर कोई प्रसाद लेण आला दिख्या के उसको भी प्रसाद !
किसी तैं भी भेद भाव ना करती यो उडन तश्तरी ! छोटे बडे
सबनै एक जैसा ही प्यार करै सै यो उडन तश्तरी !
और सबका उत्साह वर्धन करती है ये उड़नतश्तरी !
बाबू बोल्या-- हां भई ऐसा काम तो कोई उडन तश्तरी ही कर सकै सै !
जो दुसरे ग्रह तैं आवैं सैं ! इस ग्रह के लोग तो आपस मै
जुतम फ़जीता ही कर सकै सैं ! पर यो तो बता के उस का हुवा क्या ?
इब असल मैं बाबू पुछै था ब्लागरी का किस्सा का ! मैं बोल्या
बाबू थमनै जो पिछला किस्सा रामपुरा पन्च रतनानि का सुणाया
था वो मन्नै थारै नाम तैं ही छाप दिया था ! इब बाबू बोल्यो- अक
भई इब तू एक किस्सा और सुण और उसको भी छाप दे !
मैं समझ गया कि बाबू भी धीरे धीरे ब्लागरिया होता जावै सै !
तभी गाम तैं इतनी जल्दी इबकै आ लिया ! खैर साब इब बाबू नै
किस्सा सुणाणा शुरू किया-- और भिडते ही संस्कृत मै किम्मै मन्त्र
सा मारया ! भई म्हारै किम्मै भी समझ मैं नी आया ! और बाबू
नै मन्त्र सा मारकै पूछया - आया समझ मै ?
मैं बोल्या - बाबू इब थम के गिट्पिट गिट्पिट बोलगे ? म्हारै
किम्मै समझ मै नी आया ! इब बाबू का गुस्सा आस्मान पै चढ लिया !
बाबू लठ्ठ पै हाथ जमाता जमाता सा चिल्लाया - अर सटुपिड (STUPID)
तन्नै संस्कृत समझ मै नी आवै के ? बावली बूच कहीं का !
म्हारै बाबु नै किम्मै संस्कृत बोलण की बिमारी सै !
भई हम नै चुप रहने मे ही भलाई समझी ! अगर बाबू को ये जवाब
देते की बाबू हमको इन्ग्लिश स्कुळ मे आपने ही भेजा था ! तो म्हारै
बाबू का स्वभाव हम जाणै थे ! बाबू का लठ्ठ हाथ मै ही था ! और उधर
पास मैं ही ताई भी इन्तजार मै ही थी कि कब मौका मिलै और भाटिया जी
आल्ले मेड इन जर्मन लठ्ठ की खुजली मिटा दे ! भई ताऊ कै तो इधर कुआं
और उधर खाई !
इब बाबू नाराज होता सा बोल्या - चल ठीक सै ! ठीक सै ! उल्लू कहीं का !
इब बाबू को लठ्ठ के डर से किम्मै समझा भी ना सकै थे कि बाबू
यो सब गालियां भी थमनै ही जा री सै ! खैर साब बाबू बोल्या- हां तो
ये किस्सा राजा भोज के समय का सै ! मैं समझ गया कि आज तो बाबू
के दौ चार लठ्ठ खानै ही पडैंगे ! कारण अगर बाबू का यो किस्सा राजा
भोज के समय का है तो इस किस्से मे कालीदास जी महाराज
जरुर आयेंगे ! और जब कालीदास जी आयेंगे तो संस्कृत जरुर
बोलेंगे ! और कालीदास अगर संस्कृत बोलेंगे तो म्हारै बाबू
कै मुंह तैं ही बोलेन्गे ! ख़ुद के मुंह से तो बालने से रहे !
और हमको संस्कृत का स भी समझ आवै कोनी !
हम को याद आया कि गुरु का कहना नही मानने वाले
की हर युग मे दुर्गती होती आई है ! हमको पिछली बार भी हमारे
गुरुदेव समीर जी ने साफ़ साफ़ मुंह फ़ोड कै समझाया था कि बाबूजी
को तो बख्सो और उनको अपने खेत खलिहान सम्भालने दो !
और गांव वालो से दुआ सलाम करने दो ! पर किस्मत हमारी खराब !
जो गुरुदेव का कहना नही माना और बाबू को इस ब्लागरी के
बारे मे बढ चढ कै फ़ाकालोजी कर दी ! अब ये मुसीबत सर पर ।
इब बाबू नै जो किस्सा सुणाना शुरु किया ही था कि बाबू कै लिये रोहतक तैं
फ़ोन आ लिया ! बाबू फ़ोन सुनने के लिये ऊठ गये तो हम भी किसी तरह
नजर बचा कै वहां तैं उठ कर बाहर बढ लिये ! पर कब तक ! बाबू का किस्सा
और लठ्ठ तैं कब तक बचेंगे ? शाम तक ? चलो शाम तक तो घुमो !
आज बाबू के लठ्ठ शाम को ही खायेंगे ! इब्बी तो सनीमा देखण जायेंगे !
गुरुदेव समीर लाल जी कुछ ऊपाय बताइये ! शिष्य बहुत परेशान सै !
त्राही माम गुरुदेव समीर जी ! इबकै बचाल्यो ! थारै हाथ जौडे !
चाहे तो मेरे से ब्लागरी छोडण की कसम उठवालो ! मैं आयन्दा ब्लागरी नही करूंगा !
पर एक बार मेरे बाबू का यो ब्लागरी का चस्का छुडवाने का उपाय बतादो !
आप तो गुरुओ के भी गुरु हैं ! रक्षा करो गुरुदेव !
कित गए ताऊ ? इब तो घनी देर हो ली थाणे मैं !
ये सवाल पूछा है मित्र पित्सबर्गिया ने ! थारा घणा धन्यवाद जो ताऊ का हाल पूछा !
ताऊ की संगत मै रह कै थम भी हरयाणवी आछी लिखण लाग गे हो !
थोड़े दिन ताऊ धोरे टिक गे तो असली ताऊ हो ल्योगे ! थारा मेल आया तब
ताऊ मलहम पट्टी करवा कै खटिया में पडा था ! इब थमनै पूछ ही लिया सै
तो भई सुण ताऊ का दर्दे-दिल .........!
यो जमाना घणघोर कलजुग का आग्या दिखै सै भाई ! पहले जमाने
मै दोस्त ऐसे हुआ करे थे कि दोस्त के लिये जान भी दे दिया करते थे !
पर आज कल तो दोस्त लोग इन्तजार ही करया करैं कि कब दोस्त
चक्कर मै चढै और इसके सर मे जूत पडवाण का मौका मिलै !
दोस्त लोगो से ताऊ की दो दिन की खुशी भी बर्दाश्त ना हुई !
अरे ताऊ नै आपका के बिगाडया था ? जो थम लोग ताई नै
राजी खुशी वापस घर छोड गे ? अर थम तैं ताऊ की दो दिन की
आजादी बर्दाश्त ना हुई ! यो तो सोच्या होता कि भई चलो ताऊ
नै पहलम दफ़ा मौका मिल्या सै ! चलो इसको भी मन की कर लेण दो !
अगर आपको ताऊ का यही हाल करना था तो भाई कुछ दिन तो
थ्यावस राखते ! पर थम तो दोस्त नही ताऊ के पिछले जन्म के
दुश्मन हो ! मन्नै बेरा है कि यो काम थमनै इस लिये ना करा कि
थमको ताई तैं कुछ प्रेम था बल्की थमको तो ताऊ तैं दुश्मनी
निकालनी थी ! इब तो पडगी थारै कालजे मैं ठन्डक ?
भई किसी भले आदमी नै कही थी कि आदमी अपने दुख मैं
दुखी नही होता पर उसतैं दुसरे का सुख नही देख्या जाता !
तो ताऊ का सुख थम लोगां तैं नही देखा गया ! और कर ली
अपने मन की ! और इस काम मैं दो तीन लोगां का हाथ सै !
और भाई हम तैं पुछो तो सबतैं ज्यादा हाथ इस काम मैं म्हारा
बडा भाई राज भाटिया जी का ही दिखै सै ! भाई ये भी म्हारी
तरिया रोह्तक के ही सैं ! इब आप ही देख ल्यो -- एक गाम
गली के हो के भी इन्होने ताऊ पै के जुल्म करे हैं ?
और इन पर सब तैं ज्यादा शक इस लिये पडरया सै कि
भाई इन्होने पहले दिन ही खुले आम धमकी दी थी !
इब थम खुद ही पढ ल्यो - ताऊ इसमै कुछ गलत बोलता होवै तो !
ताऊ मजा तो खुब आया थारी पोस्ट पढ कर लेकिन ,
पर लगे अब तुमहे मजा आये गा , यु ताई आप को
ढुढती ढुढती यहां आ गई इसे भेज रहा हु टेक्सी मे,
अब पता नही यह उसी हुलिये वाली ताई हे या दुसरी ?
जेसी भी हो समभाल लियो
और भाई उससे बढकर म्हारै तैं दुश्मनी काढण आला सै
यो दीपक थाणादार ! इसनै कहया था---
ताऊ मेरे ज्यादा मजे मत लो ! मेरा दिमाग सटक गया
तो ताई को ढुन्ढ ढान्ढ के वापस आपके घर पहुंचा दूंगा !
फ़िर रोते रहना मेरे नाम को ! :)
थाणेदार तन्नैं तो मैं मेरे गुरु डा. अमर कुमार धोरै ले जाकै
नही ठीक करवाया तो मेरा नाम भी ताऊ नही सै !
म्हारै गुरु नै तु इब्बी जाणता नही सै !
और भई भाटिया जी इब थम और हम तो एक ही जगह के
लाल सैं सो जब भी , जैसा भी मौका आयेगा , आपस मै ही
निपट सुलझ लेंगे ! दोन्य़ूं ही लालों के लाल सैं ! :) :)
इब भाई आगे यो हुआ की ताई वापस घर आ लगी !
और यार लोगां की इच्छा पूरी हो गई ! आते ही ताई
चिल्लाई -- क्युं तन्नै शरम नी आई जो तू मन्नै इक्कली
नै छोड कै भाज लिया ? आज तीन दिन हो लिये मैं मारी
मारी फ़िर रही सुं ! वो तो भला हो उस रोहतकी भाटिया का !
जो उसनै पिछाण कै मन्नै घर भेज दिया !
मेरे कुछ हो लेता तो तेरा के बिगडै था ?
ताऊ नै मन मे सोचा कि कुछ बिगडने के लिये ही तो छोड कै
आया था पर इन दोस्तां कि दोस्ती तैं तो दुश्मन आछे !
पर ताऊ चुप रह गया !
ताई फ़िर चिल्लाकै पुछण लाग गी -- वो थाणेदार नै मेरा के हुलिया
लिखाया तन्नै ? नाटी .... काली कोयल... कानी... ? अरे मेरे बरगी
सुथरी लुगाई तेरे खान दान मै भी नही आई सै इब तक !
तैं के समझ के बोल्या ये सब ? इब ताऊ की तो सीट्टी पिट्टी गुम !
ताऊ के समझ मे नही आया कि यो दुश्मनी किसनै निकाली सै ?
खैर बात मे ही बात रही ! हाथा पाई तक नही पहुंची !
यहां तक तो पता नही ताऊ की किस्मत आछी थी या ताई
किम्मै थकी थकाई थी ! ताऊ का कुटाव नही हुआ था !
पर बकरे की मां कब तक खैर मना सकै सै ? भई ताऊ
को तो जुते खाने थे और यार लोगों के साथ साथ किस्मत
भी शायद ये ही चाहवै थी ! रात को सोते सोते ताऊ नींद मे
ही जोर तैं चिल्लाण लाग ग्या ! ताई नैं भी जोर तैं
चिल्ला कै पुछ्या - के होग्या ? के आग लाग री सै ?
इतनी रात गये क्युं रुक्के मारण लाग रया सै ?
ताऊ को नींद मैं कुछ सुझ तो बैठी नही ! वो तो ये ही सोचे बैठा था
की ताई तो आई गई हो राखी सै ! और ताऊ को नींद मे सपने देखने
की पुरी छुट सै ! पर इस अक्ल के आन्धे ताऊ को यो नी बेरा कि - अगर
एक बार शादी करली तो फ़िर असल मे तो क्या सपने मे भी सपने
देखने की छुट ताईयों तैं नही मिल्या करती ! खैर साब ... ताऊ नींद
मै ही बोल्या- अर म्हारा चश्मा दे जरा जल्दी से ...
ताई नै पुछ्या - क्यों ? इब रात नै सोतै समय चशमें चढाकै कुणसी
जनेत मैं जाणा सै ?
ताऊ बोल्या - पहलम बार सपने मे इतनी सुथरी सुथरी (CUTE) सी
जवान जवान छोरियां मेरे तैं प्यार करण लाग री सै और मैं बिना
चश्मे के उनको ठिक से देख नही पा रहा हूं !
जरा जल्दी तैं म्हारा चश्मा दे दे ! देर मत कर !
इब साब, ताई को कुछ तो गुस्सा था पहले का ही !
क्योंकी यार लोगों ने ताऊ से दुश्मनी निकालने के लिये ताई
के कान , नाक, आन्ख और मुंह सब कुछ ताऊ के खिलाफ़
भर राखे थे ! और इब ताऊ कि यो बात सुण कै ताई तो बिल्कुल
चण्डी का रुप धर कै उठी और वहीं पास मैं पडा लठ्ठ उठा कै जोर
तैं बोली-- ले पकड चश्मा ...और पहला लठ्ठ बजाया ताऊ कै सर पै
........ और ये ले दुसरा भी ... और ये ले....तीसरा ...और... !
और साब इब ताई नै तो बेहिसाब लठ्ठ ताऊ के उपर बजा दिये !
ताऊ किसी तरह वहां तै उठ कर भाज लिया !
और ताई लठ लिये पीछे पीछे दौडण लाग री थी !
सांची सै भई जिस आदमी के दोस्त ऐसे हों तो दुश्मनों की क्या
जरुरत है ? :) :) :)
(भई ताऊ के हाड गोडे सारे टूटे पडे सें ! यदि कभी जुड़ गए तो
अगली पोस्ट लिखेगा ! नही तो भाई इब राम राम ले ल्यो ताऊ की !)