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कैसे गुजरी तमाम रात, बताऊं कैसे ?



कैसे गुजरी तमाम रात, बताऊं कैसे ?
रात भर करवटें बदलीं , सुनाऊं कैसे ?


"बेचैनी का बुरा आलम, 
दर्दे दिल तुझको, दिखाऊं कैसे ?

लग रहा भोर हो चुकी अबतो, 
रात के जख्म,  छुपाऊं कैसे ?

जीने की कोई तमन्ना ही नही,
जिंदगी का  बोझ,  उठाऊं कैसे ?

तन्हाई मुझको पुकारे यारो 
सजदे में सर अब, झुकाऊं कैसे ?



जो बिखर के चकनाचूर हुए, वो सपने हमने देखे हैं !




जो बिखर के चकनाचूर हुए, वे स्वप्न उमड़ते देखें हैं
इन नजरों ने, प्रभु के सम्मुख ,तूफ़ान उमड़ते देखे हैं.


मैं सुबह कहूं,  इसको कैसे, जलप्रलय में सूरज उगने को
जिस रात अनगिनत आफ़ताब मैंने आग उगलते देखे हैं.

ये इश्क मोहब्बत की गज़लें  दुनियां में तमाशा  करती हैं

मैंने तो यहाँ   लैलाओं  से , कई  मजनू लुटते हुये देखे हैं.

सारी रात गुजर गई यादों में,लगता है कि वे आने से रहे

पूरी रात करवटें , बदल बदल, अफ़साने  हज़ारों  देखे हैं.

लुटा यहाँ सब प्रभु के सम्मुख, बर्वादी के आँगन में     
फिर भी ताऊ ने भूखे प्यासे, काफ़िले चलते  देखे हैं. 

खुद ही उल्टा सीधा, फ़रेबगिरी का पाठ पढावै क्य़ूं सै

भाईयों, ताई के अलावा सभी भहणों, भतीजे और भतीजियों आप सबनै घणी रामराम. 

आज इस "हरियाणवी गजलकार ब्लाग मंच" पर अपनी गजल पढते हुये मन्नै घणी  खुशी होरी सै. इब मैं अपणी बिल्कुल नई नई और ताजा गजल आपको सुणा रह्या सूं.....जरा कसकै तालियां मारणा.... तालियां ना मारो तो कोई बात नही.....टमाटर भी मार सको हो....टमाटर घणे महंगे हो राखें सैं....घर ले जाऊंगा तो आज सब्जी बण ज्यागी. घणी महंगी सब्जी की वजह तैं घर म्ह सब्जी कई दिनां तैं बणी कोनी.

इब गजल का मतला अर्ज कर रह्या सूं....

खुद ही उल्टा सीधा,  फ़रेबगिरी का पाठ पढावै क्य़ूं सै
सूखी बालू पै इब यो,  चांद की तस्वीर,  बनावै क्य़ूं सै

इब आगे सुणो....

तू तो नू  कहवै थी मन्नै,  प्रीत नही सै  इब  मेरे धौरे
ऐसी तैसी करकै मेरी, कमरां म्ह फ़ूल  सजावै क्यूं सै

जिण सपना तैं नींद उड ज्यावै, ऐसे सपने देखे कौण
झूंठ  मूंठ तसल्ली पाकै, जिंदगी खराब करावै क्यूं सै

चांद निकल कर छत पै आया, घणी चांदनी बिखराता
पल दो पल की तेरी चांदनी, फ़िर घणा इतरावै क्यूं सै

इब  मकता यो रह्या....

जिन रास्तों पै तू चाल्या,  उन पर चलकर बचा है कौण
लेकिन ताऊ, आधे रस्ते तैं, इब उल्टा मुंह घुमावै क्यूं सै

आभार....रामराम.


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