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श्री काजल कुमार का साक्षात्कार : ताऊ पत्रिका

जैसा कि आपको विदित है श्री काजल कुमार ताऊ पहेली -९ के विजेता थे. हमको उनका साक्षात्कार लेना था. उनकी व्यस्त दिनचर्या के बीच हमारे कहने पर उन्होने पिछले सप्ताह शनीवार का समय हमारे लिये निकाला और हम पहूंच गये उनके दिल्ली स्थित निवास पर साक्षात्कार के लिये.

 

 

kajaljiहमारे सामने एक जिन्दादिल शख्स बैठा था. जो व्यंग और सहजता की धार को भी समझता है और उतने ही सहज और  बहुत ही सुलझे हुये विचारों के साथ  हर बात को बारीकी से महसूस भी करता है. मैं इस शख्स को ऐसा बुद्धिजीवी कहुंगा जिसका दिल और दिमाग आज भी हिमाचल प्रदेश के गांव मे धडकता है और नजर महानगरों को बहुत बारीकी से भेद कर देखती है.  तो आईये आज आपको रुबरू करवाते हैं श्री काजल कुमार से. हमने पहला ही सवाल दाग दिया इस तरह.

 

 

सवाल -- हां तो काजल जी आप अपनी शिक्षा और परिवार के बारे मे हमारे पाठकों को कुछ बताईये.

 

 

उत्तर:-  साहित्य में खुशी-खुशी  और, प्रबंधन में कैरियर की ढकोसलेबाज़ी के चलते स्नातकोत्तर शिक्षा. ये बात दीगर है कि दोनों ही विषयों में मैं कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकता......फ़िर हल्के से मुस्कराते हुये कहा...  अब तो आप समझ ही गये होंगे?

 

 

सवाल : आपके परिवार में कौन कौन हैं?

 

 

जवाब : ताऊजी, मेरे परिवार में चार मस्त लोग हैं  बेटा, बेटी, पत्नी और मैं. हालाँकि मेरे ख़ुद को मस्त कहने पर बाकी सदस्यों की सहमती संदेहास्पद है ..

 

 

सवाल : पर अभी घर मे कोई दिखाई नही दे रहा है?

 

 

उत्तर : अभी आजायेंगे तब मिलवाता हूं आपको सबसे.

 

 

सवाल : ठीक है जी, अब  ये बताईये कि कि आप कौन कौन से  शौक पालते हैं?

 

 

उत्तर:-  कार्टून, कुछ हिन्दी पत्रिकाएं, इन्टरनेट, आउटडोर खेल, लॉन्ग ड्राइव, ढेर सारा विविध संगीत, निद्रा, समाज को बदल डालने की बड़ी-बड़ी डींगें हांकना, घर पर टिके रहना, और बिटिया को दुखी करते रहना....

 

 

सवाल : वाह जी ये तो बडी लंबी चोडी फ़ेहरिस्त हो गई. पर आप बिटिया को क्यों दुखी करते हैं?

 

 

जवाब :  अच्छा लगता है, बिटिया को तंग करके बहुत अच्छा लगता है क्योंकि, एक दिन शादी के बाद जब बेटियाँ अपनी नई दुनिया बसा लेती हैं तो आप उनके सन्दर्भ में एक धीर-गंभीर पिता की भूमिका जीने लगते हैं, वे आपका ध्यान आपके बेटों से ज्यादा रखने लगती हैं .....इसलिए हम दोनों समय रहते, गंभीर होने से पहले, खूब हल्ले-गुल्ले से जी रहे हैं....वैसे कम ये भी नहीं है, मौक़ा मिलते ही धीमे से बदला भी ले लेती है....

 

 

 

सवाल - काजल जी आप हमको आपके जीवन की कोई अविस्मरणिय घटना के बारे मे बताईये.

 

 

उत्तर:-  बहुत साल पहले 'सारिका' में एक कार्टून देखा था जिसमें एक ग्रामीण, दीवार के साथ खड़ी चारपाई को देखकर सिर खुजाते हुए कह रहा था - "अरे ! मेरी खाट किसने खड़ी कर दी."?

 

 

 

इस जवाब पर हमने कहा -  जी लगता है ये ताऊ का  ही कार्टून देखा होगा आपने. क्योंकि खाट तो लोग ताऊ की ही खडी करते हैं. हमने मुस्कराते हुये कहा.

इस पर काजल जी ने पूछ लिया कि - ताऊ जी अगर आपसे कोई कहे की मैं तेरी खाट खडी कर दूंगा तो आप क्या जवाब देंगें?

हमने कहा - भाई हम तो यही कहेंगे कि - ताऊ की खाट तो पहले ही खडी है अब तो तुम्हारी खाट पडी है, उसको ताऊ खडी करेगा. हमने और काजल जी ने इस बात पर जोरदार ठहाका लगाया.

और फ़िर हमने कहा - काजल जी आप तो उल्टे मुझसे सवाल पूछने लग गये? भाई सवाल तो मुझे करने हैं. अब आप मुझे सवाल करने दिजिये.

 

 

जवाब : जी बिल्कुल पूछिये आप सवाल

 

 

सवाल - आप क्या काम करते हैं?

 

 

उत्तर:-  जी मैं सरकारी नौकरी में हूँ, और आजकल दिल्ली में ही हूँ.

 

 

सवाल - आप मूलत: दिल्ली के ही रहने वाले हैं? या कहीं और से हैं?

 

 

उत्तर:-  ताऊ जी, जब दिल्ली में होता हूँ तो ख़ुद को हिमाचल का बताता हूँ और जब घर जाता हूँ यानि हिमाचल जाता हूं तो दिल्लीवाला होने का ढोंग भरता हूँ.

kjl-View form my Home                                   गांव में काजल जी के घर से एक दृष्य

 

 

सवाल : आपको अपने घर की कब याद आती है?

 

 

उत्तर : सीधा और खुशगवार लगता है तो घर की याद आती है, कोहनीमार धूर्तों जैसे लगता है तो समझ जाता हूँ कि महानगर का पानी ठाठें मार रहा है. .... इस बीच, कई बार तो लगने लगता है कि अब तो मैं कहीं का भी नहीं रहा....

 

 

सवाल : जी ये बात बडी जोरदार कही आपने. अब ये बताईये कि  ब्लागिंग मे कैसे आना हुआ?

 

 

उत्तर:-  बस यूँ ही... एक दिन इन्टरनेट पर टहले हुए इधर निकल आया...कोई लम्बी-चौड़ी तक़रीर नहीं...बस शुरु हो गया.

 

 

सवाल - ताऊ कौन? इस पर क्या कहना चाहेंगे?

 

 

उत्तर:-  Tau comforts me. ताऊ का कन्धा सबके लिए हाज़िर है. ताऊ सबके भीतर बैठे बच्चे को न सोने देता है और न उदास होने देता है.

 

 

मेरा ताऊ मेरे बचपन का टॉफी वाला बाबा है... धीरे से चपत भी लगा देता है पुचकार भी लेता है. ताऊ कभी बदमाश बच्चा लगता है तो कभी देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर.

ताऊ के चाहने वाले भले ही हजारों हों पर उसे न काहू से दोस्ती है न काहू से वैर.. निश्छल, नीरव, शांत, वेगमय .....

 

 

ऐसे कितने ताऊ होते हैं जो अपना कन्धा ही हाज़िर नहीं करते, ख़ुद पर हंसने का मौक़ा देकर दूसरों को उन्हें ही भुलाने के क्षण भी देते हैं... ताऊ का ताऊ ही बने रहना एक बहुत सुखद, हवा के ठंडे झोंके सा विचार है, व्यक्ति नहीं.

 

 

सवाल - ताऊ पहेली के बारे मे आपके विचार. यानि कैसा लगता है ये सब आयोजन?

 

 

उत्तर:-  यह वो चौपाल है जिसका हुक्का गुड़गुडाने के लिए सभी कूद-फांद कर चले आते है हर हफ़्ते... फिर वहाँ एक ताऊ आता है, सब चुप हो जाते हैं, ...

ताऊ खंखारता है, और फिर फोटो बांचता है.....अच्छे बच्चे फटाफट पहेली का हल खोजने चले जाते हैं... और मेरे जैसे नालायक थोडी ही देर में सिर खुजाते हुए कहने लगते हैं...- "अरे ! मेरी खाट ताऊ ने खड़ी कर दी ?"

 

 

पहेली ही क्यों, ताऊ का "इब खूंटे पै पढो :-"  भी उतने ही रोचक लगते हैं. और ठेठ 'भतीजे' और 'भतीजियों'  का संबोधन सबको अपनी उम्र घटाने का मौक़ा देता है.

 

 

अच्छा लगता है. सच मुझे तो बहुत अच्छा लगता है. ऐसा लगता है कि मैं मेरे घर मे आगया हूं. ताऊ के ब्लाग पर परायापन नही लगता.

 

 

सवाल. आपका ब्लॉग कार्टूनों के लिये जाना जाता है. और आप नौकरी में हैं. सवाल ये है कि आप कब से ये शौक पालते हैं?

 

 

उत्तर:   जी मैं भी कॉलेज के दिनों में बिगड़ गया और एक दिन पाया कि 'अरे मैं तो कार्टूनिस्ट हो गया !'...

 

 

एक दैनिक अख़बार के साथ कुछ समय काटा, लेकिन रेगुलर दूधिये की तरह लालाओं के हिसाब से कार्टून बनाने के बजाय सरकार की बाबूगिरी ज़्यादा ठीक लगी....

 

 

इसी बीच, मेरा ये उद्दंडी कार्टूनिस्ट आवारा हो गया और आज तक यायावरी कर रहा है, अपनी मर्ज़ी का बनाया हुआ कुछ-कुछ माल यहाँ-वहाँ  छपता भी रहता है ...

और हाँ, इस दौरान, लेखक-लेखक खेला, नाटकबाजी की, रेडियोबाज़ी भी की...कोई शौक नहीं छोड़ा.

 

 

सवाल : कुछ अपने माता जी, पिताजी के बारे मे बताईय़े.

 

 

उत्तर:   पिताजी दिल्ली से रिटायर होकर हमारे पुश्तैनी गाँव में खेती करने, एक दिन मेरी माँ के साथ लौट गए और मैं भी सपत्नीक  यही सपना पाले हुए हूँ ......

kjl-Beas River-Son, Daughter, Nephew, Wife                                गांव में व्यास नदी के किनारे परिवार के लोग

 

 

सवाल : आपको गांव मे किसी से जलन महसूस होती है?

 

 

जवाब : ( मुस्कराते हुये...) जी होती है ना. पिताजी के साथ एक कुत्ता भी रहता है, मेरी उससे कुछ ख़ास नहीं बनती क्योंकि वह मुझसे मेरी जगह छीनने की होड़ में दिखता है.

 

 

सवाल : गांव मे आपकि दिनचर्या क्या रहती है?

 

 

जवाब : ताऊ जी , गांव  जाकर घड़ी और कैलेंडर की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है...सूरज उगा तो उठ गए, सूरज छुपा तो सो गए... no noise, no tension, no heart attacks.

 

 

सवाल : आपके अन्य भाई बहिनों के बारे मे बताईये?

 

 

जवाब : जी, दो बहिनें हैं और दोनों ही विवाहित हैं. बहनें दिल्ली में ही अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं. मेरे परिवार पर जान छिड़कती हैं. मुझ पर मान करती हैं. ख़ुद को भाग्यशाली मानता हूँ.औरों की ही तरह,

 

 

सवाल : कुछ आपके भांजे भांजियों के बारे में?

 

 

जवाब : भांजे-भांजियां भी मेरी बातों को हँस कर हवा में उड़ा देते हैं, उन चारों  ने मुझे पूरा पागल घोषित कर रखा है, उनकी माँएं उन्हें डांट देती हैं.  मेरी पत्नी भी उनसे पूरी सहमत नहीं होती है...केवल आधी सहमती दिखाती है. यद्यपि ये बच्चे, मेरे उलट, अच्छे बच्चे हैं.

 

 

सवाल : हिमाचल से या आपके जीवन से  जुडी कोई रोचक घटना हो तो हमारे पाठकों को बताइये?

 

 

उत्तर:   जी ताऊ जी, एक बहुत ही रोचक क्या बल्कि अविस्मरणीय भी, और हिमाचल से जुडी हुई भी, . ऐसी ही एक घटना आपको सुनाता हूं आपको. आप भी नाच ऊठेंगे उसको सुनकर.

 

 

सवाल : जी बताईये.

 

 

उत्तर : कई साल पहले, फरवरी महीने की स्याह बरसात और ठण्ड के दिन थे.   फुफेरे भाई की बारात जानी थी ...गाँव में उन दिनों किराए पर कार-वैन नहीं मिलती थीं और भाड़े पर बस लेना अपवाद ही था..

 

 

लिहाजा दूल्हे खासों (डोगरी में डोली का पुल्लिंग) में  जाते थे और बारातें ट्रकों में जाती थीं...इधर ट्रकवाला लेट पर लेट हुआ जा रहा था उधर रात सिर पर आने को थी...न फोन होते थे न बिजली..खैर मनाते-मनाते ट्रक आया.

 

 

हम गीले बाराती छतरियाँ खोल ट्रक में ठुस लिए (ट्रक का तिरपाल हर जगह से टपक रहा था). जब सराय पहुँच कर ट्रक से उतरे तो सभी एक दूसरे को देख कर खीं-खीं कर रहे थे क्योंकि ट्रकवाला हमसे पहले कोयला उतार कर आया था.

 

 

हम सबके मुंह-हाथ-कपड़े कालिख से पुत गए थे....ट्रक ड्राईवर घूँट लगा कर सैट था. पेट्रोमेक्स की रौशनी में लड़की वालों ने ऐसे दुरंगे बाराती पहले कभी नहीं देखे थे. खाने के समय, वहाँ की औरतों ने चटखारे ले ले कर नवीनतम, अप्रकाशित, अप्रसारित और अपुरूस्कृत गालियाँ गायीं...

 

 

उनकी रचनाओं के आगे मुझे बड़े-बड़े साहित्यकार आजतक बौने लगते हैं. मुझे भरोसा है कि सभी देसी ब्लॉगर गालियाँ गाने का मतलब बखूबी जानते हैं. और आप तो हरयाणा के हैं तो बहुत अच्छी तरह जानते होंगे ससुराल की गालियों को?

 

 

सवाल : हां काजल जी और कोई जाने या ना जाने पर हम तो जानते हैं. हम तो इस उम्र मे भी ससुराल जाते हैं तो इतनी गालियां हमें सुनाकर गाई जाती हैं कि क्या बतायें? बस युं समझ लिजिये कि अब तो बिना गालियां खाये ससुराल मे मजा ही नही आता. खैर…हमने सुना है कि आपके ससुर साहब भी शादी के पहले आपके  काफ़ी खिलाफ़ थे?

 

 

उत्तर:  ताऊ जी आपभी कहां कहां से अंदर की बात निकाल लाते हैं? पर आपने सुना बिल्कुल सही है. और युं समझ लिजिये कि यही बात अपने-आप में  एक घटना है कि अपने होने वाले तामिलियन ससुर को यह समझाने में पूरा एक साल लग गया कि ये बिन-लुंगी का, उनका होने वाला दामाद इतना भी बुरा-आदमी नहीं है... श़क्ल पर मत जाओ बाबा.

 

 

सवाल : ऐसा भी क्या हो गया था जी?

 

 

उत्तर : क्योंकि, उन्हें मेरे बारे में पक्का भरोसा था कि यह एकदम निरा लफ़ंगा लौंडा है, सरकारी नौकरी में है तो भी क्या हुआ...शादी के बाद मेरी भोली-भाली लड़की को छोड़ कर भाग खड़ा होगा, और उस पर तुर्रा ये कि कुंडली तक का तो पता नहीं....

 

 

सवाल : अरे रे..फ़िर आपकी शादी कैसे हुई? और अब ससुर साहब की राय आपके बारे मे क्या है?

 

 

उत्तर : खैर, कोर्ट-कचेहरी हो जाने के बाद, तब कहीं जाकर उन्हें अपने इस अटल विश्वास से डिगना पड़ा.

 

 

और यों भी, दूल्हेनुमा घुड़चढ़ा बबुआ सा बन, मौक़ेबाज़ टुन्न बारातियों के जुलूस की अगुवाई करते मैं ख़ुद को कभी स्वीकार कर भी नहीं पाता था....बीस साल हो गए कहीं नहीं भागा हूँ, सींग-छुपी गाय की तरह रहता हूँ.

 

 

सवाल : आप साहित्य मे रूचि रखते हैं?

 

 

उत्तर:   मेरे लिए, पढ़ना सबसे दूभर काम है और लिखना तो बस जी का जंजाल, मैं कार्टून बनाने के अलावा कुछ नहीं कर सकता.  छुटपन से ही लगता रहा है कि ज़बरदस्त पढ़ाई-लिखाई से दिमाग ठस हो जाता है.

 

 

मैं आज भी बस गुजारे लायक पढ़ता हूँ, लिखता तो हूँ ही नहीं... जो लिखता हूँ वो भी कोई लिखना है लल्लू... आज भी बिन रवां ही हुए चल रहा हूँ . दिमाग़ की खाली हार्ड डिस्क बहुत अच्छी लगती है इसलिए इसे हमेशा फॉर्मेट करता रहता हूँ.  अरुचिकर बातें याद रख पाना मेरे बूते की बात है ही नहीं. ...

 

 

सवाल : सुना है आप कोई पुस्तक प्रकाशन का भी इरादा रझते हैं?

 

 

जवाब : अरे! मेरा तो कोई दुश्मन भी नहीं है, फिर ये खबर किसने उडाई...? ताऊ जी सचाई तो बल्कि ये है कि मैं कई बार सोचता हूँ कि शुरू शुरू में किताब लिख कर लोगों को ज़रूर यूँ लगता होगा कि मानो उन्होंने किसी नक्षत्र को जन्म दे दिया...

 

 

फिर ये लोग कैसे प्रकाशकों के यहाँ जूतियाँ चटकाते फिरते होंगे...कैसे चिरोरियाँ करते होंगे. कैसे भारी पाँव वाली माँओं  कि तरह महीनों बैठे प्रतीक्षा करते होंगे कि प्रकाशक ने शायद उनकी पाण्डुलिपि पढ़ ली होगी, छापने का न्योता आता ही होगा, बस वो अब बहुत बड़े लेखक बनने ही वाले हैं,

 

 

छपते ही पाठक उन्हें कन्धों पर उठाने के लिए आते ही होंगे, प्रकाशक एडवांस रोयल्टी  के चेक लिए दरवाज़े पर लाइन लगाने ही वाले हैं, उनकी किताबों पर फिल्में और सीरियल बने ही समझो... ऐसे जिगरे वालों को, बक़ौल आपके,  राम राम जी. अगर आप कॉपीराइट उलंघन माफ़ कर दें तो

 

 

सवाल : साहित्य के पठन पाठन के बारे में कुछ बतायेंगे?

 

 

उत्तर:   मोटी-मोटी किताबें देखकर मेरा मुंह फटा का फटा रह जाता है.  पता नहीं इनके लेखकों और प्रकाशकों को कोई और फुर्सत क्योंकर न थी. और इन्हें पढ़ने वालों के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है, सच.

 

 

अलबत्ता इन कित्ताबों को क़रीने से संजो कर रखने वाली लाइब्रेरियाँ मुझे बहुत अच्छी लगती थीं ....कोई शोर नहीं, एकदम सन्नाटा, किसी को किसी से कुछ मतलब नहीं. मैं वहाँ छुपकर अखबारों से कुछ-कुछ उड़ाने और सोने जाया करता था...

 

 

सवाल : आप महानगरीय व्यक्तित्व और स्वयम के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

 

 

उत्तर:   महानगरीय बनावटी व्यवहार-कुशलता काटने को दौड़ती है ठीक वैसे ही जैसे खेमेबाज़ी. मेरे पैदल कार्टूनिस्ट को न तो  नेटवर्किंग और मार्केटिंग आती हैं और न ही सीखना चाहता है.

 

 

चार कारणों के चलते मैं कभी किसी से कोई बहस नहीं करता..क्योंकि मेरी बातें अंतर्विरोधी लगती हैं, मेरे फंडे शुरू से ही गोल हैं, सामने वाले को पक्का पता है कि वही सही है और, क्योंकि मुझे पता है कि मैं निश्चित हार जाउंगा.

 

 

 

Tau family2

और इस तरह साक्षात्कार पूरा करके हम वहां से विदा लेने लगे तो स्मृति स्वरुप काजल जी ने हमें यह कार्टून ताऊ परिवार का बना कर हमको भेंट किया.

 

आपको कैसा लगा यह साक्षात्कार अवश्य बताइयेगा. अगले सप्ताह आपको फ़िर हम एक और शख्शियत से रुबरू करवायेंगें. तब तक के लिये रामराम.