Showing posts with label क्षमा पर्व. Show all posts
Showing posts with label क्षमा पर्व. Show all posts

क्षमा याचना सहित ताऊ रामपुरिया

हमारा समाज हमेशा से ही उत्सव प्रिय रहा है ! प्राय: हर दिन ही कोई ना कोई उत्सव रहता ही है ! हर तिथि और दिन के साथ साथ कुछ ना कुछ कहानी जुडी हुई ही रहती है ! शायद इसी की देखा देखी पश्चिमी समाज ने भी आज कल हर दिन के साथ कोई ना कोई दिवस मनाने की कोशीश शुरू की हुई है ! अब ये बाजारवाद या अन्य कोई भी वाद pranam हो , हमारा मकसद उसके बारे में बहस करना नही है ! हमारे कई अति प्रिय त्योंहार हैं जिनमे होली हमारी परम्परा में साँसों की तरह घुला हुवा त्योंहार है ! पता नही हर बच्चे, बूढे और जवान को यह त्योंहार क्यों  जादू में बाँध लेता है की इसके जादू से कोई नही बच पाता ! शायद इसका कारण इस त्योंहार की मस्ती है ! इस त्योंहार का अर्थ तंत्र से ना जुडा होना ही इसकी लोकप्रियता में चार चाँद लगाता है ! आपकी जेब में दो कौडी भी ना हो तो भी इस त्योंहार की मस्ती में कोई फर्क नही पङता ! फाग गाना , नाचना, बजाना, रंग खेलना , बस सिर्फ़ अलमस्त होना !  किसी तरह की अमीरी गरीबी का लेना देना नही ! एक धनपति भी अगर रोड पर मिल जाए तो एक साधारण आदमी भी उसको रंग देगा ! और कोई फर्क नही पङता ! हालांकी आज कुछ माहौल अलग सा दिखाई देने लगा है ! फ़िर भी मैं तो  कहूंगा की होली तो होली है !

 

Swastika  इसके विपरीत दीपावली बड़ा महँगा त्योंहार है ! हर बात में खर्चा ! सामान्य स्तर वाले व्यक्तियों की तो  बात ही क्या ? अच्छे भले लोगो को बजट बनाना पड़ता है ! अबकी बार टी. वी. पर कुछ लोगो के इंटरव्यू देखे जिनमे यही सब बातें थी की कैसे दीपावली के खर्चे का संतुलन बैठाना पङता है ! उनके चहरे पर छुपी पीडा भी दीखाई दे रही थी !  जोश उल्लास तो जरुर है ! पर कहीं ना कहीं ये जोश उल्लास आदमी को बहुत महँगा पङता है ! मन मार कर मजबूरी में अपनी हैसियत से बाहर किए गए खर्चे धीरे २ एक तनाव को जन्म देते हैं और उनकी परिणिती स्वास्थय की  दृष्टी से भी ठीक नही होती ! खैर हर मौज मस्ती की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है ! हम स्वयम और बच्चे कितने रुपये के पटाके फोड़ते हैं ? क्या इसमे सिर्फ़ धन समय और पर्यावरण की बर्बादी के कुछ है ? इसमे पैसे वाले ज्यादा बर्बादी करते हैं और गरीब कम , पर मजबूरी में ! इसमे कोई उपदेश देने वाली बात नही है ! सिर्फ़ हमको आत्म-चिंतन करने वाली बात है ! बाक़ी तो अपनी अपनी डफली अपना अपना राग !

 

pranam1

मेरे बहुत से मित्र जैन हैं ! हर धर्म की कुछ अपनी अपनी खासियत और अपनी अपनी खूबियाँ होती हैं ! और गाहे बगाहे हम कुछ अच्छी बातें उनसे अपना लेते हैं ! यो तो जैन धर्म में बहुत सी अपनाने जैसी विशेषताएं हैं ! पर मैं जब इस शहर में १९७२ में कोलकाता से नया नया आया ही था तब मुझे बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ ! जैन मित्र पर्युषण पर्व के बाद क्षमा पर्व या यहाँ की भाषा में छमावणी पर्व मनाते हैं ! कुछ व्यापारी मित्रो के पोस्टकार्ड आए - की साल भर में हमने आपके प्रति जो भी ग़लत व्यवहार या अपराध किया हो उसके लिए क्षमा करे ! मैं चोंका की ये क्या चक्कर है ? फ़िर कुछ मित्र दुसरे दिन घर- आफिस पर क्षमा माँगते हुए आ पहुंचे ! हमने सोचा की ये कुछ गड़ बड़ जरूर है ! हमारी ओकात इस लायक तो नही है की इतने सारे लोग एक साथ हमसे क्षमा मांगे ! पता करने पर इसका उपरोक्त राज मालुम पडा ! बस उसी समय से हमने दीपावली पर्व को हमारी सुविधा अनुसार अपना क्षमा पर्व मान लिया ! क्योंकि दीपावली पूजन के बाद अगले दो दिन सब दोस्त और   रिश्तेदारो  के यहाँ मिलने    जाना  पड़ता  ही है सो हम तो बिल्कुल बुजुर्गो के पाँव छूते हुए साल भर की माफी  और छोटो को गले लगाते हुए साल भर की माफी मांग आते हैं !

 

आज इस दीपावली के शुभ अवसर पर आप सभी ब्लॉगर भाई बहनों से, मेरे द्वारा आपको  मन, वचन और कर्म से पहुंचाई गई ठेस के  लिए मैं आपसे हाथ जोड़कर  क्षमा प्रार्थी हूँ ! और आशा करता हूँ की सहज स्नेह आप मेरे प्रति बनाए रक्खेंगे ! यह ज्योति पर्व आपके घर परिवार और आस पड़ोस में ढेरो खुशियाँ और खुशहाली लेकर आए ! यही शुभकामना है !

 

जो  भाई बहन मुझसे बड़े हैं उनके चरण-स्पर्श करके,  सम-वयस्क हैं उनके गले मिलकर और छोटो को आशीष देकर मेरी खुशियाँ और शुभकामनाएं व्यक्त करता हूँ ! 

 

क्षमा याचना सहित ताऊ रामपुरिया