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ताऊ साप्ताहिक पत्रिका अंक २०

ताऊ साप्ताहिक पत्रिका

प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के २० वें अंक मे स्वागत है.
राऊंड दो के दसवें  अंक की पहेली का सही जवाब है सेल्युलर जेल अंडमान निकोबार. जिसके बारे मे हमेशा की तरह आज के अंक मे विशेष जानकारी दे रही हैं सुश्री अल्पना वर्मा.

 

अभी कुछ दिन पहले ही अपनी छुट्टियां वहां बिता कर आये श्री काजल कुमार जो की इस अंक के अतिथी संपादक भी हैं, ने वहां के अपने अनुभवों को हमसे साझा किया है और उनके द्वारा बनाई एक विडियो फ़िल्म भी आप इस अंक मे अतिथि संपादक की पोस्ट मे पढिये और देखिये.

 

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लविजा ने यहां मनाया अपना जन्मदिन

 

 

बीते सप्ताह ३० अप्रेल को हमारी छोटी प्रिंसेस लवि ने अपना जन्मदिन मनाया.  लवि को ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के संपादक मंडल की तरफ़ से बहुत ढेर सारी बधाईयां और प्यार.

 

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प्रिस आदि तो चाचा का विंनायक बनके मजे ले रहा है.

 

और इसी के साथ साथ २ मई को प्रिंस आदि यानि की ताऊ के दोस्त पल्टू ने भी अपना जन्मदिन मनाया. आदि को भी ताउ साप्ताहिक पत्रिका के संपादक मंडल की तरफ़ से ढेर सी बधाईयां और प्यार.

और साथ ही आदि के चाचाजी और चाची जी को शादी की बधाई और शुभकामनाएं.

 

आइये अब चलते हैं सु अल्पनाजी के “मेरा पन्ना” की और:-

 

-ताऊ रामपुरिया




"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा

अब हम पहेली राउंड २ के अंतिम पड़ाव पर आ  पहुंचे हैं और आप को लिए चलते हैं दूर...भारत के  केन्द्र शासित प्रदेश में जो लगभग छोटे बडे ५७२ द्वीपों  का एक समूह है और  उत्तर से दक्षिण की ओर विस्तार में लगभग 800 किलोमीटर की दूरी में फैला है -जी हाँ ,यह है अंडमान और निकोबार द्वीप समूह.

हिंद महासागर में स्थित इस द्वीप का नाम भगवान् हनुमान के नाम का परिवर्तित रूप है.[क्योंकि अंदमान मलय भाषा के हन्दुमान शब्द से आया माना जाता है].इस प्रदेश की राजधानी पोर्ट ब्लयेर है.इस प्रदेश के सुन्दर साफ़ समुद्री तट ,और प्राकृतिक सुन्दरता देखते ही बनती है.इस प्रदेश की अधिकारिक साईट पर इसे  धरती पर स्वर्ग कहा गया है.

 

यूँ तो अंतरजाल में इस जगह के बारे में बहुत अधिक जानकारी  है इस लिए प्रयास किया है कि संक्षेप में मगर अधिक से अधिक जानकारी दे सकूँ.२६ दिसंबर २००४ को सुनामी लहरों के कहर  का यहां सर्वाधिक असर समुद्र तल से कम ऊंचाई वाले सपाट क्षेत्र को झेलना पड़ा था, जिनमें लिटिल अंडमान का निकोबार ग्रेट निकोबार सहित कई अन्य द्वीप शामिल हैं।

 

अंडमान  कैसे पहुँचें?

 

निकटतम हवाई अड्डा --चेन्नई, कोलकाता,

जल मार्ग ‍- चेन्नई ,कोलकाता तथा विशाखा पटनम से जहाज उपलब्ध  [50-60 hrs journey]

 

अंडमान  में कहाँ ठहरें?

 

समस्त सुविधाओं से युक्‍त कमरे वाले डीलक्स पाँच सितारे होटलों से लेकर मध्यम श्रेणी वाले होटलों तथा गेस्ट हाउसों की श्रृंखला उपलब्ध है .

 

अंडमान एवं निकोबार में कब जायें?

- वर्षपर्यंत

 

यह द्वीप समूह १८ वीं शताब्दी के शुरू तक बाकी दुनिया से कटा रहा.  पहले ब्रितानी उसके बाद जापानियों ने यहाँ अपने कदम जमाने की कोशिश  की.  पुर्तगाली  भी कभी यहाँ रहे होंगे क्योंकि निकोबारियों की भाषा में पुर्तगाली भाषा के शब्द मिलते हैं.

 

पर्यटकों के लिए विशेष अधिकारिक सूचना--

 

१-विदेशियों को यहाँ घूमने और रहने के लिए इंडियन मिशन ओवरसीज़ के दफ्तर से  अनुमति लेनी होती है .

 

२-भारतियों को अंडमान घुमने के लिए अनुमति नहीं चाहिये मगर निकोबार और कुछ आदिवासी इलाकों पर घूमने  के लिए  विशेष अनुमति की आवश्यकता होगी.  अनुमति हेतु जारी निर्धारित एक आवेदन पत्र Deputy Commissioner, Andaman District, Port Blair. को दाखिल करना होता है.

3-'बैरन द्वीप 'पर किसी को भी उतरने की अनुमति नहीं है वह जहाज़  में बैठे  ही देखना होगा.

 

४-किसी भी राष्ट्रिय  पार्क में बिना अनुमति दाखिल न हों.

५-किसी भी स्थान की विडियो या फोटो लेने से पहले अगर अनुमति लेनी आवश्यक है तो जरुर लें.

 

६-संरक्षित वनों के आस पास आग न जलाएं.

७- आदिवासी इलाकों के आस पास फोटो न खींचें.

 

 

निकोबार में देखने की जगहें-

 

 

[यह जगह  विदेशियों के लिए प्रतिबंधित है मगर भारतियों को घूमने  के लिए विशेष अनुमति चाहिये.]

निकोबार २८ द्वीपों का समूह है.

यहाँ -कत्चल ,कार निकोबार,ग्रेट निकोबार  द्वीप देख सकते हैं.
-ग्रेट निकोबार में मगपोदे एक दुर्लभ पक्षी देखा जा सकता है.यहाँ 'इंदिरा पॉइंट को भारत का दक्षिणी छोर माना जाता है.  [अब तक हम सब कन्याकुमारी को दक्षिणी छोर मानते आये हैं ]

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अंडमान में पोर्ट ब्लेयर और उस के आस पास की देखने लायक जगहें -

 

-महात्मा  गाँधी मैरीन  नेशनल पार्क ,-ऐतिहासिक सेल्यूलर  कारागार,-गाँधी पार्क -सिप्पिघाटी  फार्म -चिडिया  टापू  .  इन के अलावा  कोल्लिनपुर , मधुबन  ,माउंट  हर्रिएत  ,मिनी चिडियाघर ,मरीना पार्क, अंडमान वाटर स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, फिशरीज म्यूजियम, समुद्रिका म्यूजियम, एंथ्रोपोलॉजिकल म्यूजियम, फॉरेस्ट म्यूजियम आदि।

 

कार्बिन कोव्स बीच,डिगलीपुर, रॉस द्वीप,वाइपर द्वीप,सिंक व रेडस्किन द्वीप भी  देखने लायक जगहें हैं ,
बैरन द्वीप का ज्वालामुखी, भारत का एकमात्र सक्रिय है ज्वालामुखी है। -अंडमान में वॉटर स्पोर्ट्स , वॉटर स्कीइंग, सेलिंग, विंड सर्फिंग और स्नोरकेलिंग के मजे ले सकते हैं , इनके लिए पोर्ट ब्लेयर में बना अंडमान वॉटर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स सब से अच्छा है . अगर आप स्कूबा ड्राइविंग करना चाहते हैं , तो हेवलॉक में राधानगर बीच इसके लिए अच्छी जगह है.

 

पर्यटन विभाग की तरफ से साल के दिसम्बर और जनवरी के महीने में यहाँ फेस्टिवल आयोजित होते हैं. सुभाष  मेला ,विवेकानंद   मेला - ब्लाक  मेला -  भी जनवरी के महीने में आयोजित  होते हैं
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अब बात करते हैं ऐतिहासिक सेल्यूलर  कारागार की-

 

 

यह जेल अंडमान -निकोबार द्वीप की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में बनी हुई है.काला पानी के नाम से कुख्यात यह जेल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को कैद रखने के लिए अंग्रेजों ने बनाई गई थी.  इस का निर्माण कार्य १९०६ में पूरा हुआ.  सात इमारतें [जो तीन मंजिला थीं ] को मिला कर यह जेल बनी.

 

इन भवनों के केंद्र में एक टावर था.  और ६९४ कोठरियां थीं.  वर्तमान में सिर्फ तीन ही इमारतें शेष हैं.  कारागार की दीवारों पर शहीदों के नाम लिखे हैं.  यहाँ लाइट एंड साऊंड शो में यह इतिहास  चलचित्र द्वारा बताया जाता है.  शहीद  वीर सावरकर को यहाँ १९११ में लाया गया था ..वह यहाँ करीब १० साल तक रहे.  अंग्रेजों द्वारा इन कैदियों से बहुत ही बुरा वर्ताव किया जाता था.  कोडे लगाना,आम बात थी.  कोल्हू चलवाना ,  बंजर ज़मीन जोतवाना आदि कठिन कार्य करवाए जाते थे.  उनके जुल्मों की कहानी यह इमारतें अपने भीतर छुपाये हुए हैं.  दुसरे विश्व युद्ध के बाद जापानियों ने अंडमान पर कब्ज़ा किया तब ३० दिसम्बर १९४३ को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने यहाँ कैदियों से मुलाक़ात की और भारतीय झंडा फहराया.  यहीं एक संग्रहालय भी है जहाँ अंग्रेजों के शस्त्र,  सुभाष जी के दौरे की तस्वीरें आदि सुरक्षित हैं.  सुभाष जी [नेता जी]  की याद में यहाँ हर साल जनवरी में एक मेले का भी आयोजन होता है.

 

इस सेल्यूलर  कारागार की अधिकारिक साईट यहाँ है.

 

यह दूसरा राऊंड इसी के साथ समाप्त हो गया.  अब अगले भाग मे आपसे फ़िर मुलाकात होगी. तब तक के लिये अलविदा.



-विशेष संपादक : अल्पना वर्मा


“ दुनिया मेरी नजर से” -आशीष खण्डेलवाल




मालिश करने वाली कुर्सी

कभी-कभी कबाड़ से भी बड़े काम की चीज बनाई जा सकती है। चीन के इन बुजुर्ग महाशय को ही लीजिए। ये अपनी बीवी के जोड़ों में दर्द की तकलीफ से काफी दुखी थे। इन्होंने घर में रखे कबाड़े को इस तरह से उपयोग में लिया कि इससे मालिश करने वाली शानदार कुर्सी तैयार हो गई।

Would you try out this 'high-tech' massage chair being shown off by its inventor in China? /Rex



78 साल के लिन शुसेंग बीजिंग में कार रिपेयरिंग का काम करते थे और चीजों को उपयोगी तरीके से जोड़ना उन्होंने वहीं से सीखा। वे इस कुर्सी पर पिछले आठ साल से मेहनत कर रहे थे। सबसे पहले उन्होंने इसे गर्दन की मालिश करने वाली कुर्सी के रूप में तैयार किया था और अब तो इसमें इतने तामझाम जोड़ दिए हैं कि इससे पूरे शरीर की मालिश मुमकिन है। हाल ही उन्होंने कुर्सी के नीचे की ओर इलेक्ट्रिक पॉट जोड़ा है, जिससे कुर्सी थोड़ी गर्म भी हो जाती है। अब लिन के आविष्कार को देखते हुए उनके पास कुछ बड़ी कंपनियां आ रही हैं, जो इस कुर्सी के डिजाइन को पेटेंट कराना चाहती हैं।

चलते-चलते आपका ध्यान एक वीडियो की ओर दिलाना चाहूंगा, जो आजकल यूट्यूब पर धूम मचा रहा है। इसे अभी तक 23 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है। इसमें दिखाया गया है कि संगीत सिर्फ इंसानों को ही नहीं बल्कि एक तोते को भी नचा सकता है। देखिए यह वीडियो-





"मेरी कलम से" -Seema Gupta

एक बार एक आदमी  अपनी नई नई खरीदी गई कार को चमकाने में व्यस्त था, तभी उसके  चार वर्षीय बेटे ने पत्थर  उठाया और कार पर बाल सुलभ भाव से कुछ खरोंचने लगा. 

 

new-car

 

यह देखते ही उस आदमी को बडा जोर से गुसा आया.   गुस्से में वह  आदमी इतना पगला गया कि वो यह भी भूल गया कि उसके हाथ मे लोहे का रेंच है.  उसने  बच्चे के हाथ को पकडा और उसे उसी लोहे के औजार से बहुत मारा. 

 

इतनी बेदर्दी से बच्चे के हाथों पर लोहे की रेंच से की गई चोट से उसके हाथों की तीन चार उंगलियां बुरी तरह टूट चुकी थी. शायद कई तो वापस जुडने की हालत मे भी नही थी.

 

बच्चा अस्पताल मे दर्द के  मारे बुरी तरह चीख रहा था. जब बच्चे ने वहां अपने पिता को देखा तो  उसने बडी दर्दनाक आवाज मे अपने पिता से पूछा - 'पिताजी मेरी उँगलियाँ कब  वापस आएँगी ?  यह पूछते समय बच्चे की आंखों से पीडा साफ़ झलक रही थी.

 

बेटे की बात सुन कर उसको दिल पर गहरी चोट लगी और वो बदहवाश  होकर वापस आया और कार पर कई लाते मारी.

 

अपने गुस्से के कारण  उसने बेटे का जीवन तबाह कर दिया था  ...... अफ़सोस करते हुए उसने  देखा कि गाड़ी के उपर बेटे ने पत्थर से  खरोंच कर लिखा था " I LOVE YOU DAD"

 

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रात भर वो आदमी पश्चाताप की आग में जलता रहा और अगले दिन उस आदमी ने आत्महत्या कर ली.

गुस्से और प्यार की कोई सीमा नहीं होती.  अच्छी और  प्यारी जिन्दगी के लिए दोनों का चयन सोच समझ कर करना चाहिए . वस्तुए इस्तेमाल के लिए बनाई गयी है और इंसान प्यार करने के लिए.  प्यार या गुस्से में आप खोना मतलब तबाही को दावत देना.

 

अच्छा अब अगले अंक तक के लिये अलविदा.

 

- Seema Gupta

-संपादक (प्रबंधन)



"हमारा अनोखा भारत" -सुश्री विनीता यशश्वी

अल्मोड़ा से 34 किमी. दूर स्थित जागेश्वर धाम है जो अपने मंदिरों के लिये विश्व प्रसिद्ध है। जागेश्वर में जो मंदिर हैं ये 8वीं से 12 वीं शताब्दी के बीच बने हुए हैं। जागेश्वर के मंदिर अपने वास्तुकला के लिये बेहद प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों का निर्माण चन्द और कत्यूर वंश के राजाओं के द्वारा किया गया है। जागेश्वर धाम 124 मंदिरों का समूह है जिसमें हर आकार के मंदिर हैं। कुछ बहुत बड़े तो कुछ बहुत छोटे।

 

जागेश्वर में कई देवी-देवताओं की बेहद आकर्षक मूर्तियां हैं। शिव-पार्वती और विष्णु भगवान की मूर्तियां विशेष रूप से आकर्षक हैं। महामृत्युंजय और जागेश्वर भगवान के मंदिर सबसे प्राचीन मंदिर माने जाते हैं। जागेश्वर धाम से से पहले दंडेश्वर मंदिर पड़ता है। यहां पर काफी विशाल मंदिर हैं। इन मंदिरों की उंचाई लगभग 100 फुट तक है। इन मंदिरों के उपरी भाग में छत जैसी बनी हुई हैं जिनमें कलश रखे गये हैं।

महामृत्युंजय मंदिर में धातु का तांत्रिक यंत्र भी है।

 

जागेश्वर धाम को भारत के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक माना जाता है। इन मंदिरों में पुष्टिदेवी, नवग्रह, सूर्य भगवान आदि देवी-देवताओं की मूर्तियां भी हैं। मंदिरों की बाहरी दिवारों में कुछ शिलालेख भी लिखे हैं पर इन्हें अभी तक भी पढ़ा नहीं जा सका है।

 

कहते हैं कि एक बार भगवान शिव यहां जागेश्वर आये तो यहां की रमणीयता मे खोकर समाधि में लीन हो गये. उनको खोजते खोजते मां पार्वती आई और उन्होने शिवजी को समाधि लगाये देखा तो खुद भी आंखे बंद कर समाधि मे लीन हो गई.

 

इसी प्रकार बहुत सा समय दोनों की समाधि मे बीत गया तब तैतींस करोड देवता यहां आये और उन्होने इनको जगाना चाहा.  तब भगवान शंकर और मां पार्वती यहां लिंग रुप मे प्रकट हुये.  और तभी से यह स्थान जागेश्वर के नाम से जाना जाता है और लिंग रुप मे पूजा भी होती है. 

 

 

Mukhya Mandir-jageshwar

मुख्य मंदिर

 

 

जोगेश्वर के मुख्य द्वार पर गणेश जी की पत्थर की प्रतिमा पुजित होती है .  यह मंदिर भगवान शंकर का पश्चिम मुख है.  इसमे उनका लिंग दो भागों मे बंटा है जिसमे बडा भाग शिवजी का और छोटा भाग पार्वती जी का है.  शिव-पार्वती का यह श्रद्धानारीश्वर लिंग संसार मे सबसे अनूठा लिंग है.

 

 

Shiv-jageshwar

शिवलिंग
 

 

 

जोगेश्वर को कई नामों से जाना जाता है जैसे बाल जगन्नाथ, यागेश, जागेश और यहां देवदार वृक्षों के नीचे हरे लाल पीले सांप बहुतायत मे पाये जाने के कारण इसे नागेश भी कहा जाता है.

 

सावन के माह में यहां पर शिवजी की विशेष पूजा पार्थी पूजा कराने के लिये दूर-दूर से लोग आते हैं। पूरा माह शिव की पूजा की जाती है। इस दौरान एक छोटा सा बाजार भी मंदिर के बाहर लगाया जाता है।

जागेश्वर मंदिरों से लगा हुआ एक शमशान घाट भी है। यहां के लोगों का मानना है कि इसमें दाह संस्कार करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

 

इन्हीं मंदिरों से थोड़ी दूरी पर एक पुरात्व विभाग द्वारा संग्रहालय बनाया गया है जिसमें कई प्राचीन मूर्तियों का संरक्षण किया गया है।

 

-सुश्री विनीता यशश्वी

संस्कृति संपादक



आईये आपको मिलवाते हैं हमारे सहायक संपादक हीरामन से. जो अति मनोरंजक टिपणियां छांट कर लाये हैं आपके लिये.
"मैं हूं हीरामन"

मैं हूं हीरामन


 

 

सभी भाईयों और बहनों को नमस्कार. आज के तीन विदुषक खिताब इस प्रकार हैं.

 

आज का पहला दिलचस्प टिपणी का खिताब जाता है श्री मीत को…आईये देखिये उन्होने क्या कहा?

 

 

 

Meet sketch पहले नंबर पर गले में रामप्यारी जैसा पत्ता लटकाए अगाथा संगमा..
दुसरे नंबर पे रामप्यारी से परेशां दयानिधि मारन...


तीसरे नंबर पे रामप्यारी पर गुस्सा निकलने को तैयार मिलिंद देवरा
चौथे नंबर पे रामप्यारी को समझाते हुए अम्बुमणि रामदोस
पांचवे नंबर पे जतिन प्रसाद भी समझाने को तैयार हैं...

अब कानिमौझी क्यों पीछे रहे नीचे बैठी रामप्यारी को पुचकार रहीं हैं...

वाह! रामप्यारी तुम्हारे तो मज़े हैं..
मीत

 

 

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और दूसरे नम्बर पर हैं. श्री काजलकुमार….आईये उनकी भी सुनिये….क्या फ़रमाते हैं?

 

 

 

kajalji देखो भई बेटा रामप्यारी,
बात यूं है कि,



१- सच्चाई तो ये है कि इन महिला का नाम तो मुझे पता नहीं लेकिन, फिर भी, न जाने क्यों लग रहा है कि ये किसी खेल से सम्बंधित हो सकती हैं.




२- ये सज्जन अपने नाना की कृपा दृष्टि से केंद्र में सचार मंत्री (मलाई मंत्रालय) बने थे, नाना ने आँखें फेर लीं तो कुर्सी भी जाती रही, आजकल फिर अपने नाना की मिजाजपुर्सी में लगे हैं, और नाना भी कुछ- कुछ रेस्पोंड कर रहा है.



३-केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा के साहबजादे हैं, पिता की विरासत भोग कर बॉम्बे से संसद में जा बैठे, फिर लाइन में लगे हुए हैं.



४-पिछले पांच साल में, ये केंद्रीय स्वस्थ्य मंत्री कम और डॉक्टर-डॉक्टर ज्यादा खेले. कभी AIIMS के सिरफिरे निदेशक के साथ तो कभी बीडी-सिगरेट पीने वालों के साथ. और अब किस्मत का खेल देखिये, साउथ में बिसात बदल जाने से सत्ता में बैठे बिठाय ही, आजकल विपक्षी हो गए हैं बेचारे.



५- ये तुम्हारे ताऊ वाले हरियाणे के अतिमहत्वाकांक्षी मुंहफट कांग्रेसी नेता हैं...ये इसी ऊहापोह में जी रहे हैं कि खुद को युवा नेता कहें कि कांग्रेसी नेता...खुद को कांग्रेसी नेता कहते हैं तो लगता है कि "नहीं, अभी तो मैं जवान हूँ"... खुद को युवा नेता कहते हैं तो लगने लगता है कि ऐसे तो उन्हें कोई भी मुख्यमंत्री नहीं बनाएगा.



६-ये ऊपर वाले दो नम्बरी सज्जन के नाना की बेटी हैं, अपने पिताश्री की inaudible तमिल में कही गयी बातों को अंग्रेजी में दोहराना इनके ही जिम्मे है. हो सकता है, रामप्यारी में गलत होऊं...पक्का नहीं है..फिर भी चांस ले रहा हूँ.


और दूसरी बात यूं है बेटा रामप्यारी, तूने इन्हें पहचानने की बात कही थी, ये नहीं कहा था कि नाम भी बताओ, तो देख मैंने पहचान बता दी है...नाम नहीं बता रहा हूँ...वो इसलिए भी, कि इनके नाम इस लायक अभी हैं भी नहीं कि बताये जाएँ...दरअसल अपना नाम बनाने के लिए इन्हें अभी बहुत मेहनत कि ज़रुरत है.

 

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और तीसरे स्थान पर हैं श्री शाश्त्री …..सुनिये आपकी भी…

 

 

 

shashtriji देखने में तो एकदम अंदमान के जेल के अंदर का हिस्सा लगता है, लेकिन कालेपानी का नाम लेने वाली टिप्पणियों को आप ने छाप दिया है अत: इस चित्र में में जरूर कुछ पोल है. ढोल में पोल नहीं, जेल में पोल मालूम पडता है.

 


मुझे अब यह भी लग रहा है कि ताऊ जी शायद कम से कम कुछ सक्रित्य टिप्पणीकर्ताओं को कालापानी भेजने की तय्यारी कर रहे हैं. कोई बात नहीं, हम तय्यार हैं. कम से कम इस बहाने मुफ्त में कालेपानी को भी देख लेंगे.
सस्नेह -- शास्त्री

 

 

 

अब हीरामन को इजाजत दिजिये. अगले सप्ताह आपसे फ़िर मुलाकात होगी.  तब तक के लिये अलविदा.




"अतिथि संपादक" -श्री काजल कुमार

आम भारतीयों के बीच कालापानी के नाम से जाना जाने वाला ये भारतीय क्षेत्र, स्वतंत्रता के लिए शहीद होने वालों की कर्मभूमि रहा है. भारत की, स्वतंत्रता की लड़ाई की तीर्थस्थली 'सेल्युलर जेल' यहीं, पोर्ट-ब्लेयर में स्थित है. १८५७ की लड़ाई के बाद, अंग्रेजों ने अंडमान और निकोबार के खूबसूरत टापुओं को सज़ायफ़्ता भारतीयों के लिए जेल के रूप में बदल दिया.


अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 572 द्वीप हैं. इनमें से कई टापू निर्जन हैं . ये टापू बंगाल की खाड़ी में, उत्तर से दक्षिण की ओर एक लड़ी में, 800 किलोमीटर तक फैले हुए हैं. इनका कुल क्षेत्रफल सवा आठ हज़ार किलोमीटर है, जिसमें से एक चौथाई निकोबार का क्षेत्र है. यहाँ की कुल आबादी साढ़े तीन लाख के करीब है. यहाँ प्रायः छोटे-मोटे भूकंप आते ही रहते हैं, ये भारत का सर्वाधिक भूकंप प्रभावित क्षेत्र है.


इस क्षेत्र का सबसे पुराना उद्धहरण दूसरी शताब्दी में ग्रीक भूतत्ववेत्ता क्लौडिअस द्बारा बनाये गए नक्शों में मिलता है. 18वीं सदी तक, ब्रिटिश लोगों के आने से पहले, यह क्षेत्र बाकी दुनिया से कटा रहा. इनके बाद यहाँ कुछ समय तक जापानियों का भी वर्चस्व रहा जो द्वितीय विश्व युद्ध के साथ समाप्त हुआ.


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यह रोस टापू पर द्वितिय विश्व युद्ध के समय के जापानी बस्ती के अवशेष हैं. इनकी विशेषता ये है कि जहाँ एक ओर इन्हें पेड़-पौधों ने नष्ट कर दिया है, वहीँ दूसरी ओर उन्हीं की जड़ें और लताएं इन्हें गिरने से बचाए हुए हैं.


यह केंद्र शासित क्षेत्र है. इसे अंडमान और निकोबार नामक, दो जिलों में बांटा गया है. समुद्र के अतिरिक्त यहाँ वायुमार्ग से भी पहुंचा जा सकता है, यहाँ पोर्ट ब्लेयर में हवाई अड्डा है जहां चेन्नई और कलकत्ता से नियमित उड़ानें हैं. यहाँ हिंदी के अतिरिक्त, मुख्य रूप से तमिल, बांग्ला भाषियों की बहुलता है. यहाँ की मुख्य पैदावार नारियल और मसालों इत्यादि की है, कुछ हस्तशिल्प समुद्र उत्पाद से भी सम्बंधित हैं.

अंडमान क्षेत्र मुख्यतः पर्यटन आधारित है. यहाँ की प्रायः सभी वस्तुएं चेन्नई या कलकत्ता से मंगाई जाती हैं. निकोबार, भारतीय वायुसेना एवं नौसेना का मुख्य क्षेत्र है. वास्तव में यह क्षेत्र भारत की मुख्य भूमि की अपेक्षा बर्मा, थाईलैंड और मलेशिया के अधिक पास पड़ता है. यह क्षेत्र सुदूर-पूर्व अन्तराष्ट्रीय जलमार्ग के बहुत पास होने के कारण भारत के लिए अत्यधिक व्यापारिक और सामरिक महत्त्व का है. यह दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का प्रभाव-क्षेत्र भी निश्चित करता है.


यहाँ का पानी एक दम साफ़ है, इतना साफ़ कि गाढ़ा नीला होने के कारण काला दिखता है, इसीलिए इसे कालापानी का नाम भी दिया गया था. यहाँ के कई टापू, मूंगा टापू ( coral ) हैं. यहाँ से coral ले जाना एक दंडनीय अपराध है.

यहाँ हर प्रकार की पर्यटन सुविधायें उपलब्ध हैं. जिनमें, water-surfing, snorkeling, scuba diving, trekking और camping शामिल हैं. यहाँ कुछ म्यूज़ियम भी हैं, जहाँ कई जानकारियां आपको एक ही जगह मिल जाती हैं.

यहाँ आप जितने अधिक दिनों की छुटियाँ लेकर जायेंगे उतने ही और दूर के टापू देख पायेंगे. पास के टापुओं तक लाने ले जाने के लिए स्टीमर नाव प्रयोग होती हैं, जबकि दूर-पार के टापुओं की यात्रा के लिए मध्यम आकर के जलयानों और ferry का प्रयोग होता है.


यहाँ उन आने वालों को निराशा हो सकती है जिनका उद्देश्य बस कुछ न कुछ देखना ही होता है. क्योंकि अंडमान और निकोबार देखने की जगह नहीं है, यह प्रकृति के साथ आत्मसात होकर आराम से समय बिताने की जगह है. शहरों की आपा-धापा के विपरीत, यहाँ जीवन शांत वेग से बहता है. यहाँ से लौटने के बाद हर भारतीय को गर्व होता है कि भारत में ऐसा एक और स्वर्ग भी है.

एक निजी विडियो जो मैने वहां शूट किया है उसको आप यहां चटका लगाकर देख सकते हैं.

-श्री काजल कुमार

"अतिथि संपादक"





ट्रेलर : - पढिये : श्री समीरलाल "समीर" उडनतश्तरी से अंतरंग बातचीत

samirlalji   कुछ अंश उडनतश्तरी से ताऊ की अंतरंग बातचीत के…….

 

ताऊ : फ़िर क्या हुआ?

 

 

समीर जी : फ़िर वही हुआ जो नही होना चाहिये था. पीछे से आवाज   आई,  नहीं, उसका नहीं तुम्हारा बाप जलायेगा!!! एकाएक लाईट आ गई. ऊँगलियों के बीच में बिन जलाई सिगरेट लिए मैं..सामने मेरा दोस्त हाथ में माचिस लिए..और उसके पीछे सीढ़ी पर पिता जी. सोचिये, क्या हाल हुए होंगे!! बस, मैं ही जानता हूँ कि उस वक्त हमारी क्या स्थिति हुई - बताने योग्य तो कतई नहीं.

 

ताऊ : वाह ..फ़िर तो आराम से शादी हो गई होगी?

 

समीर जी : अजी आराम से कहां हुई? घर वालों का विरोध तो ऐसा कि जाने कित्ती बार हम टंकी पर चढे.. और जब कोई उतारने ही नही आया तो खुद ही उतर भी गये..

 

ताऊ : अजी समीर जी आप भाभीजी से क्युं डर रहे हैं? हम बैठे हैं ना यहां वो कुछ नही कहेंगी? आप तो बताईये बिंदास. आपके अंदाज में.

 

समीर जी : ताऊ, मैं बहुत शर्मीला हूँ.

 

 

……

और भी बहुत कुछ धमाकेदार बातें…..पहली बार..खुद ..समीर जी की जबानी…
इंतजार की घडियां खत्म…..आते गुरुवार मिलिये हमारे चहेते मेहमान श्री समीरलाल "समीर" से  से……..




अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.

संपादक मंडल :-मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया
विशेष संपादक : अल्पना वर्मा
संपादक (प्रबंधन) : Seema Gupta
संपादक (तकनीकी) : आशीष खण्डेलवाल
संस्कृति संपादक : विनीता यशश्वी
सहायक संपादक : मिस. रामप्यारी, बीनू फ़िरंगी एवम हीरामन

ताऊ साप्ताहिक पत्रिका : अंक ११

प्रिय बहणों, भाईयों, भतीजों और भतीजियों आप सबका इस अंक मे स्वागत है. दूसरे राऊंड की प्रथम पहेली का रिजल्ट कल ही घोषित कर दिया गया था.  कुछ तकनिकी कारणों के चलते ऐसा किया गया है. बाकी के सभी स्तम्भ आप यहां पढ सकते हैं. और मेरिट लिस्ट यहां ब्लाग के दाहिनी तरफ़ लगा दी गई है.

 

 

paheli-10-11 हमने आपसे जो पहेली पूछी थी उसमे जो चित्र लगा था वो मदन महल जबलपुर का था. जबलपुर मध्यप्रदेश की संस्कार धानी तो है ही साथ मे यहां पर इतने रमणीक दृष्य हैं कि आप एक बार यहां चले गये तो बार बार जाने को दिल चाहेगा. हमारा अनगिनत बार वहां जाना हुआ है. हम जब भी जाते हैं वहां पर ग्वारीघाट पर मां नर्मदा में स्नान करना नही भूलते. अगर यूं कहा जाये कि जबलपुर वासी बल्कि कहिये कि हर नर्मदा किनारे रहने वाले प्राणी का दिल “हर हर नर्मदे” बोलते हुये ही धडकता है.

 

यहां का प्रवास आपको घर वापस लौटने नही देता. यहां आसपास मे ही अमरकंटक (नर्मदा का उदगम स्थान) कान्हा किसली पंचमढी ( मध्यप्रदेश का एक मात्र हिल स्टेशन) मैहर, खजुराहो बिल्कुल आसपास ही हैं. यानि आपको इस क्षेत्र मे घूमने के लिये हमेशा समय कम पडेगा.

 

और सबसे बडी बात तो यह है कि हमारे गुरुजी श्री समीरलालजी, बवाल भाई, श्री महेंद्र मिश्राजी और श्री बिल्लोरे जी भी यहीं जबलपुर से ही हैं. और श्री समीरलाल जी का बचपन का घर तो यहां से सिर्फ़ पांच मिनट की दुरी पर ही है. और एक बात आपको बताते हैं कि ब्लागरों के  हर दिल अजीज श्री अनूप जी शुक्ल यानि फ़ुरसतिया जी भी अपने सेवाकाल में अनेकों बार  जबलपुर प्रवास पर रहे हैं. और  शायद ये जगह उनको इतनी रमणीक लगती है कि श्री समीर लाल जी के सुपुत्र की शादी मे सम्मिलित होने की यादों को एक पुरी श्रंखला के रुप मे लिपिबद्ध कर दिया है.  जिसको आप विस्तृत रुप से उनके ब्लाग पर पढने का आनन्द ले सकते हैं 

 

कहते हैं तपस्या करने के लिये नर्मदा से अनुकुल जगह कलियुग मे कहीं नही है. जो भी नर्मदा के किनारे रहता है वो स्वत: ही योगी है. अमरकंटक में तो एक से बढ कर एक महान तपस्वी आज भी रहते हैं.आपको महाभारत के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा की याद हो तो सुना है कि आज भी वो मां नर्मदा के किनारे कई लोगों द्वारा देखा गया है.

 

जबलपुर मे भेडाघाट एक ऐसी जगह है जहां आप आश्चर्य चकित रह जायेंगे. मार्बल की चट्टानों के बीचो बीच बहती नर्मदा और वहां नाव मे सवार आप, और बीच धारा मे भुलभुलैया, क्या नजारा होता होगा? सोचिये. अगर नाविक नही हो तो आपको किधर जाना है ? यही नही सूझेगा.

 

इस बारे मे ताऊ पत्रिका की सलाहकार संपादक सुश्री अल्पना जी ने विस्तृत विव्रण दिया है सो आईये उनके स्तम्भ “मेरा पन्ना“ की और चलते हैं. 

 

-ताऊ रामपुरिया

 

 

 

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                             "मेरा पन्ना"



-अल्पना वर्मा


नमस्कार, आज फ़िर हम एक पहेली के बहाने मध्यप्रदेश के एक खूबसुरत शहर और
वहां की संस्कारधानी कहलाये जाने वाले शहर जबलपुर के बारे मे कुछ जानने की कोशीश करेंगे.

 

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 330 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है प्राचीन शहर जबलपुर। इस शहर को जबालिपुरम भी कहते हैं क्योंकि इसका सम्बन्ध महर्षि जाबालि से जोड़ा जाता है।रामायण एवं महाभारत की कथाएँ इस शहर से जुड़ी हुई हैं।


'बावन तालों का सुन्दर नगर 'जबलपुर , मनोहारी प्राकृतिक सुन्दरता की वजह से 12शताब्दी में गोंड राजाओं की राजधानी रहा, उसके बाद कालाचूडी राज्य के हाथ रहा और अन्तत: इसे मराठाओं ने जीत लिया और तब तक उनके पास रहा जब तक कि ब्रिटिशर्स ने 1817 में उनसे ले न लिया।

 

 

bhedaghat-marble-rock                                         भेडाघाट मे नौका विहार
        

 

भेडाघाट, जबलपुर विश्वप्रसिध्द मार्बलरॉक्स के लिए प्रसिध्द है,नर्मदा के दोनों दूर तक ओर 100-100 फीट ऊंची ये संगमरमरी चट्टानें बहुत सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करती हैं। यहां बहुत ही सुंदर जलप्रपात है जो धुंआधार के नाम से विख्यात है. फ़िल्म “जिस देश मे गंगा बहती है”  की अधिकांश शूटिंग इसी जगह भेडाघाट मे हुई थी.

 

 

और इस शहर के बारे मे जानिये – श्रीमती कृष्णा राजकपूर यहीं की हैं यहीं के सिनेमा व्यवसायी नाथ परिवार की बेटी हैं. यहां का एम्पायार थियेटर इसी परिवार की मालकियत का है. यह सिनेमा हिंदुस्थान के उस समय के सात लाजवाब सिनेमाओं की श्रंखला मे अपना स्थान रखता था. जहां आर्मी के लोग युद्धकाल के बाद मनोरंजन के लिये जाया करता थे. 

 

फ़िल्म अभिनेता प्रेमनाथ और नरेन्द्रनाथ श्रीमती कृष्णा कपूर जी के सगे भाई थे. उनके भाई  साहब प्रेमनाथ को तो आप सब अच्छी तरह जानते ही होगें. उनको भी इस शहर से इतना लगाव रहा कि  फ़िल्म  “जानी मेरा नाम“ के दिनों की चरम सफ़लता के दिनों मे वो यहा लौट आये थे और गेरुएं वस्त्र धारण कर लिये थे. और वहीं ग्वारीघाट मे आश्रम बनवाकर रहने लगे थे.

 

ओशो रजनीश और महर्षि महेश योगी इन दोनो विभुतियों को कौन नही जानता? ये दोनों भी यहीं की देन हैं. श्री हरीशंकर जी परसाई को कौन भूल सकता है? आप भी जबलपुर से ही थे. यानि इस शहर ने एक से बढ्कर एक  रत्न समाज और दुनियां को दिये हैं.   

      

एक बात इस शहर के बारे मे जानना शायद और अच्छी  लगेगी कि जबलपुर को संस्कारधानी नाम आचार्य बिनोवा भावे ने दिया था. 


जबलपुर का भौगोलिक क्षेत्र पथरीली, बंजर ज़मीन और पहाड़ों से आच्छादित है।

 

गोंडवाना क्षेत्र-

 

 

घने जंगलों का क्षेत्र, गोंडवाना अब मध्यप्रदेश का अंग है। पर एक जमाने में यह देश से अलग-थलग था और बाकी देश पर जो कुछ बीता उससे यह बहुत कुछ अछूता रहा। तथापि उत्तर के सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव से यह नहीं बच सका।

 

 

अनेक ऋषि-मुनियों ने यहाँ अपने आश्रम बनाये, क्योंकि यहाँ एकान्त भजन-पूजन के लिए बहुत उपयुक्त था। कभी यहाँ रानी दुर्गावती शासन करती थीं।

 

रानी दुर्गावती -


गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ा-मंडला सहित ५२ गढ़ों की शासक वीरांगना रानी दुर्गावती कालिंजर के चंदेल राजा कीर्तिसिंह की इकलौती संतान थी। उनका जनम 1524 A.D में हुआ था.


गोंडवाना शासक संग्राम सिंह के पुत्र दलपत शाह की सुन्दरता, वीरता और साहस की चर्चा धीरे धीरे दुर्गावती तक पहुँची परन्तु जाति भेद आड़े आ गया . फ़िर भी दुर्गावती और दलपत शाह दोनों के परस्पर आकर्षण ने अंततः उन्हें परिणय सूत्र में बाँध ही दिया.

 

 

सन् 1542 में अपने विवाह के उपरान्त  दलपतशाह को जब अपनी पैतृक राजधानी गढ़ा रुचिकर नहीं लगी तो उन्होंने सिंगौरगढ़ को राजधानी बनाया और वहाँ प्रासाद, जलाशय आदि विकसित कराये.

 

 

रानीदुर्गावती से विवाह होने के ४ वर्ष उपरांत ही दलपतशाह की मृत्यु हो गई और उनके ३ वर्षीय पुत्र वीरनारायण को उत्तराधिकारी घोषित किया गया.


रानी ने  सन् 1555 से 1560 तक  मालवा के सुल्तान बाजबहादुर तथा मियाना अफगानों के आक्रमणों को विफल किया। अकबर ने उसके दरबार में गोप कवि को भेजकर, दुर्गावती के दीवान आधार सिंह कायस्थ (आधारताल का निर्माता) को अपनी और मिलाने का कूटनीतिक प्रयास किया पर उसमें असफल रहा।


अंतिम युध्द जबलपुर की मंडला की सीमा पर नर्रई नाला पर 23 जून 1564 को हुआ। नाले में बाढ़ आ जाने से रानी सुरक्षित स्थान पर नहीं जा सकी।  रात्रि में धोखे से आक्रमण कर  आसफ खां ने रानी को कपटपूर्वक पराजित किया। परन्तु वीर रानी ने अपने हाथ से ही अपना प्राणांत कर,अपने शील व स्वाभिमान की रक्षा की।

 

 

इस तरह  रानी ने साहस और पराक्रम के साथ 1546 से 1564 तक गोंडवाना साम्राज्य का कुशल संचालन किया. इन्हीं के नाम पर जबलपुर में एक विश्वविद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा गया है.


 

यह तस्वीर  इस महल के 'क्लू ' में दिखाई गयी थीं अब जानिए उस  शिला के बारे में-जो मानव अंगुली की मोटाई के  बराबर सहारे पर टिकी हुई है.

 

 

 

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                                 इसे कहते हैं-संतुलित शिला (बैलेंस रॉक )

 

प्रागैतिहासिक पृथ्वी के संरचना के समय पहाड़ों में मदन महल की पहाड़ियाँ और चट्टानें गौड़ वान ट्रैक के नाम से जानी जाती हैं पुरातत्व शास्त्रियों  के अनुसार यह  सरंचना हिमालय से भी पुरानी है।

 

संतुलित शिला का इस गौड़्वाना ट्रैक में होना खुद इस बात क प्रमाण है कि यह  क्षेत्र करोड़ों वर्ष पुराना है। दो पत्थरों के बीच लाखों वर्षों तक पानी और हवा के बहाव से पैदा हुए कटाव द्वारा संतुलित शिला का   निर्माण होता है।खास बात यहाँ की  यह शिला  भूकंप में भी नहीं हिली।

 


'लाल [समीर जी]और बवाल' ब्लॉग पर इस की तस्वीर के साथ एक बार बवाल जी ने कुछ यूँ लिखा था-


उनकी अनुमति के  बिना यहाँ दे रही हूँ-


'ज़रा सा इनकी तरफ़ तो देखो, हैं दोनों आलम सँभाल रक्खे
औ’ तुमने पहली ही फ़ुरसतों में, उबल-उबल कर बवाल रक्खे

---बवाल

मदन महल-

 

 

यह कब बना? इस के बारे में कुछ भी साफ़ साफ़ नहीं कहा जा सकता है. अधिकतर सूत्रों के अनुसार  यह किला राजा मदन शाह ने १११६ में बनवाया था.

 

 

ज़मीन से लगभग ५०० मीटर की ऊँचाई पर बने इस 'मदन महल 'की पहाड़ी 150 करोड़ वर्ष पुरानी मानी जाती है | इसी पहाड़ी पर गौंड़ राजा मदन शाह द्वारा एक चौकी बनवायी गई ।इस किले की ईमारत को सेना अवलोकन पोस्ट के रूप में भी इस्तमाल किया जाता रहा होगा.

 

 

इस इमारत की बनावट में अनेक छोटे-छोटे  कमरों को देख कर ऐसा प्रतीत  होता है कि

यहाँ रहने वाले शासक के साथ सेना भी रहती होगी. शायद   इस भवन में दो खण्ड थे। इसमें एक आंगन था और अब आंगन के केवल दो ओर कमरे बचे हैं। छत की छपाई में  सुन्दर चित्रकारी है। यह छत फलक युक्त वर्गाकार स्तम्भों पर आश्रित है। माना जाता है ,इस महल में कई गुप्त सुरंगे भी हैं जो जबलपुर के 1000 AD में बने '६४ योगिनी 'मंदिर से जोड़ती हैं.

 

 

यह दसवें गोंड राजा मदन शाह का आराम गृह भी माना जाता है. यह अत्यन्त साधारण भवन है। परन्तु उस समय इस राज्य कि वैभवता बहुत थी. खजाना मुग़ल शासकों ने लूट लिया था.

 

गढ़ा-मंडला में आज भी एक दोहा प्रचलित है -

 

मदन महल की छाँव में, दो टोंगों के बीच .

जमा गड़ी नौं लाख की, दो सोने की ईंट.

 

इस महल के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिली-जो भी मिल सकी यहाँ प्रस्तुत की गई है. घटनाओं के  काल  में भी कई स्थान पर भिन्नता देखी गयी है.यहाँ दी गयी सभी जानकारी अंतरजाल पर पहले से प्रस्तुत सामग्री के आधार पर है.यह भवन अब भारतीय   पुरातत्व संस्थान की देख रेख में है.


-- जबलपुर एयरपोर्ट मध्यप्रदेश और पडोसी राज्यों के अनेक शहरों से वायुमार्ग द्वारा जुड़ा है। यह रेलवे स्टेशन भारत के प्रमुख शहरों से रेलमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।
-राज्य परिवहन की बसें  सभी मुख्य शहरों से  जबलपुर के लिए चलती हैं। एवम ठहरने के लिये होटले सभी स्तर की उपलब्ध हैं.

-अल्पना वर्मा

( सलाहकार संपादक, पर्यटन )

 

 

अब आईये ताऊ पत्रिका के तकनिकी संपादक श्री आशीष खंडेलवाल के स्तम्भ “ दुनिया मेरी नजर से” की और चलते हैं.

 

 

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                      “ दुनिया मेरी नजर से”





-आशीष खण्डेलवाल


नमस्कार आइए आज आपको उड़नतश्तरी दिखाएं.

 

 

अब आप कहेंगे कि हिन्दी चिट्ठा संसार तो समीर लाल जी की उड़नतश्तरी को रोजाना ही देखता है। इसमें नया क्या है? तो दोस्तों इसमे  नया यह है कि आज आपको इसे सचमुच में देखने का सौभाग्य मिल रहा है। आप इस लिंक पर चटका लगाएं और देख लें। यह रोमानिया का एक बगीचा है और यहां आप खुद ही देखिए कि क्या नजर आ रहा है।

 

http://googlesightseeing.com/maps?p=1564&c=&t=k&hl=en&ll=45.70334,21.301975&z=18

 

खा गए न धोखा!  यह उड़नतश्तरी नहीं है और गूगल अर्थ पर दिख रही डिस्क जैसी इस आकृति के कारण रोमानिया प्रशासन और गूगल की नींद उड़ी है। दरअसल यह रोमानिया के टिमिसोअरा शहर में पानी सप्लाई करने वाली एक पुरानी इमारत का नजारा है। लोग इसे गूगल अर्थ पर देखकर अफवाह फैला रहे हैं कि यह कोई यूएफओ (अनआइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट) है।

 

रोमानिया का प्रशासन और गूगल दोनों ही नेटिजंस से अपील कर रहे हैं कि कृपया वे बार-बार उन्हें इस बारे में सूचना नहीं दें। अब तकनीक है तो बेजा इस्तेमाल तो होगा ही।

 

Thanks and Regards

Ashish Khandelwal


 

 

और अब आईये चलते हैं सुश्री सीमा गुप्ता के स्तम्भ “मेरी कलम से” की और.

 

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               "मेरी कलम से"

            

 

 

 

 

 

 

 

--seema gupta

 

नमस्कार, ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के एक और अंक में आपका स्वागत है.

 

 

जीवन में कितना ही बडा काम करना हो यानि मंजिल कितनी ही दूर और और बडी

हो उसकी तरफ़ हमेशा एक छोटा सा पहला कदम ही बढाना पडता है. इसी तरह जीवन कोई बहुत बडी खुशियों से सुखी नही होता. उसके लिये हमको हमेशा छोटी छोटी

खुशियां ही बहुत बडी खुशी देती हैं.

 

 

आजकल इतना मंदी का माहोल और से गला काट स्पर्धा. ऐसे मे हर आदमी शाम को

घर वापसी पर बिल्कुल लस्त पस्त हो चुका होता है.

 

 

fatherऐसा ही एक आदमी काम से थका मांदा चिडचिडाता हुआ शाम को घर पहुंचा और अपने पॉँच साल के बेटे को  दरवाज़े पर इंतज़ार करता हुआ पाया.

 

बेटे ने पिता को देखते ही काहा  : "पिताजी, मैं आपसे  एक सवाल पूछ सकता हूँ ?"

 

पिताजी: "हाँ यकीनन , क्या पूछना है ?" पूछो  उस आदमी ने कहा.

बेटे: "पिताजी, आप  एक घंटे में कितना पैसा कमा लेते हैं?"

 

 

पिताजी: "ये जानना तुम्हारा  काम नहीं है. तुम क्यों इस तरह की  बात पूछ रहे हो ?" उस आदमी ने थोडा  गुस्से से कहा.

 

बेटा: "मैं सिर्फ जानना चाहता हूँ कि  आप  एक घंटे में कितना कमाते हैं? कृपया   मुझे बताईये?"

 

पिताजी: ", अगर तुम्हे जानना जरूरी है तो मैं एक घंटे में 100 रुपये कमाता हूँ.."

ओह," छोटे लड़के ने सर झुकाते हुए  उत्तर दिया,  और जमीन की तरफ देखते हुए पूछा क्या मै आपसे ५० रूपये उधार ले सकता हूँ?

 

 

पिता, क्रोधित था , अपने बेटे से बोला अगर तुम सोचते हो की इन पैसो से तुम कोई खिलौना या कुछ अन्य बकवास खरीदोगे तो भूल जाओ और अपने कमरे में जाकर सो जाओ.

 

 

कितने स्वार्थी हो तुम क्या मै हर रोज इतनी कड़ी मेहनत तुम्हारी इन बचकानी हरकतों को पूरा करने के लिए करता हूँ?

 

 

छोटा लड़का चुपचाप अपने कमरे में गया  और दरवाजा बंद कर लिया . वह आदमी अपने बेटे को कोसने लगा की उसकी हिम्मत कैसे हुई  कुछ पैसे  के लिए इस तरह के सवाल पूछने की ?

 

 

 

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एक घंटे के बाद वो व्यक्ति कुछ शांत हुआ और सोचने लगा की हो सकता है बच्चे  ने  कुछ काम के लिए ही पैसे मांगे हों क्योंकि वो अक्सर इस तरह तो कभी पैसे मांगता नही था.." यही सोच कर वो व्यक्ति अपने बेटे के कमरे की तरफ गया और धीरे से दरवाजा खोला..

 

बेटा क्या तुम सो रहे हो?" उसने पूछा.

 

नहीं पिताजी, मैं जाग रहा  हूँ, "उस लड़के ने उत्तर  दिया.

उस आदमी ने कहा : "मैं, शायद  तुम पर ज्यादा ही नाराज हो गया था. आज का दिन कुछ ज्यादा ही खराब  था  जो मैंने सारा गुस्सा तुम पर उतार दिया. ये लो ५० रूपये जो तुमने मांगे थे ."

 

अब बेटा खुशी से चिल्लाते हुये बोला : "ओह, पिताजी धन्यवाद!"

 

फ़िर उस बच्चे ने अपने तकिये के नीचे से कुछ मुडे तुडे रूपये निकाले, उस व्यक्ति ने देखा की इसके पास तो पहले से ही पैसे हैं तो उसे गुस्सा आने लगा.

 

उस बच्चे ने धीरे धीरे अपने सारे  पैसे गिने और अपने पिता की तरफ देखा.

 

अगर तुम्हारे पास पहले  से ही रुपये   थे तो और क्यों मांगे? "पिता गुर्र्राया .

 

अब बेटा बोला - "क्योंकि ये पैसे  पर्याप्त नही थे मगर अब पूरे हैं." पिताजी कल आप एक घंटे घर जल्दी आना , अब मेरे पास १०० रुपये हैं और मै आपका एक घंटा खरीद सकता हूँ. उम्मीद है आप मेरे साथ रात का  भोजन करना पसंद करेंगे.

 

अब उस आदमी की शक्ल देखने लायक थी.

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" हम जिनके साथ रहते हैं या जिन्हें प्यार करते हैं उन्हें अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ  पल अवश्य देने चाहिए . ये एक छोटा सा reminder है सबके लिए जो अपने व्यवसाय की वजह बहुत व्यस्त जीवन गुजारते हैं...ऐसा न हो की जो हमारे दिल के बहुत करीब हैं, जिनकी हम चिंता करते हैं, उनके साथ समय बिताये बिना ही समय हमारे हाथो से फिसलता चला जाए....यही प्रबन्धन है..."

 

 

अगले सप्ताह फ़िर मिलते हैं तब तक के लिये अलविदा.

 

 

--सीमा गुप्ता

 

विशेष संपादक (प्रबंधन)

 

हमारे पहेली अंक - 9 के विजेता श्री काजल कुमार जी का साक्षात्कार आपसे करवायेंगे ५ मार्च 

गुरुवार को. अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी.

 

 

संपादक मंडल :-

 

मुख्य संपादक – ताऊ रामपुरिया

सलाहकार संपादक (पर्यटन) – सुश्री अल्पना वर्मा

विशेष संपादक (प्रबंधन) – सुश्री सीमा गुप्ता

तकनिकी संपादक –  श्री आशीष खंडेलवाल

 

सहायक गण :-

 

सहायक ( पहेली) – श्री बीनू फ़िरंगी

सहायक ( बोनस पहेली) – मिस. रामप्यारी