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राजा ने दी ताऊ को बूढी भैंस

हमनै इब बाबू को बोल दिया कि देख बाबू इब
हम भी बडे हो गये हैं ! और इब हमको लठ्ठ
दिखाणा बंद करो ! ये कोई आछी बात ना सै !
जब देखो तब लठ्ठ लेके खडे हो जाते हो !
बाबू नै म्हारै रंग ढंग देख कै समझ लिया कि
आज छोरै को किसी नै हवा भर दी दिखै !
सो म्हारा बाबू भी घणा ही समझदार सै !
चुप चाप होकै प्यार तैं हमनै समझावण लाग ग्या !
और बोल्या भई तैं आराम तैं सुण ले और यो
पोस्ट लिख दे ! मैं बोल्यो - बाबू आराम तैं तो
तू चाहे जूते भी मार ले हमनै किम्मै ऐतराज ना सै !
पर सबकै सामनै तो म्हारी बे इज्जती ना करया कर !
इब बाबू नै बोलणा शुरु किया ! इब बाबू नै जो किस्सा
सुनाया उसका लुब्बे लुबाव इस तरियां था !

पुराने समय मे एक राजा था ! जो विद्वानों का बड़ा आदर
करता था ! जो भी विद्वान् उसे कुछ श्लोक या अच्छी चर्चा
करता उसे वो इनाम दिया करता था ! उस समय मे एक
नगर मे एक ताऊ भी रहता था ! वो था तो वज्र मुर्ख पर
अपने आपको कुछ ज्यादा ही विद्वान् समझा करता था !
और वो इतना दरिद्र था कि अपने बच्चों को दूध तो
क्या ठीक से खाना भी नही खिला सकता था ! एक दिन
उसकी पत्नी (ताई) ने बडे दुखी होकर कहा कि तू राजा
के दरबार मे जा और वहां राजा को कुछ कविता
या श्लोक सुना कर एक अच्छी सी गाय या भैन्स
मान्ग कर ले आना जिससे हम बच्चों को दूध
पिला सके ! राजा विद्वानों का बडा आदर करता था !
पर ये ताऊ तो बडा ही मुर्ख था ! और इसी डर से राज
दरबार मे जाना नही चाहता था ! पर ताई के लट्ठ के डर के
मारे जाने को तैयार हो गया !
और किसी तरह हिम्मत
करके राजा के दरबार मे पहुंच तो गया पर अन्दर
जाने की जुगत नही बैठी ! फ़िर किसी तरह एक दिन
अन्दर दरबार मे राजा के सामने पहुंच ही गया !

राजा ने विद्वान समझ कर ताऊ से पूछा :
कुत आगम्यते ताऊ ?
- हे ताऊ देवता ! आपका आगमन कहां से हुआ है ?
ताऊ देवता को कुछ जवाब सूझा नही
-सो बोल पडे- "कैलाशादागतोअस्म्यहम"
अर्थात मैं कैलाश से आया हूँ !
राजा भोज ने सोची कि - ये कैलाश से
जिन्दा कैसे आ गया ? पर जिस विश्वास से
ताऊ ने जवाब दिया था उससे राजा काफी
प्रभावित भी हुवा था ! सो कोतुहल वश ही
राजा ने पूछा-- और भगवान शन्कर के क्या हाल
चाल हैं ? भोलेनाथ कुशलता पूर्वक तो हैं ?


ताऊ बोला- किं प्रच्छसि शिवो मृत:
- हे राजन तुम क्या पूछते हो ?
क्या तुमको आज तक भी खबर नही है ?
कैसे शिव भक्त हो ? अरे शन्कर तो कैलाश वाशी
हो गये हैं अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं !
यह सुन कर राजा बड़े आश्चर्य मे पड गया !
और बोला- हे ताऊ श्रेष्ठ ! यह कैसे हो सकता है ?
क्योन्की जो मृत्यु की भी मृत्यु करने वाला और
काल का भी काल है ! जिसको सारा संसार अजन्मा
कहकर निरन्तर स्मरण करता है, उसकी मृत्यु भला
किस प्रकार हो सकती है ?
और उनके परिवार आदि का क्या हुआ ?

ताऊ बोला- हे पृथ्वी पति ! मुझे मालुम है कि
इस समाचार से आपको अत्यन्त दुख: हुवा है !
आप धैर्य धारण करके श्रवण करे !
मैं आपको पूरी बात का वर्णन करता हूं !--

अर्ध दावववैरिणा गिरिजया प्यर्ध हर्स्याह्र्तं
देवेत्थ भुवनत्रये स्मरहराभावे समुन्मीलति !
गंगासागरमम्बरं शशिकला शेषश्चप्रथवीतलं
सर्वघ्यत्वमधीश्वर्त्वमगमत्वांमांच भिक्षाटनम !!

अर्थात- महादेव का आधा अंग तो विष्णू
भगवान ने हर लिया , शेष बचा हुवा आधा
अंग पार्वती ने हर लिया, इस प्रकार उनके समस्त
शरीर का बंटवारा हो गया, अब उनके परिवार
की हालत बताता हूं, सुनो- उनके मस्तक पर जो
गंगा विराजमान थी वो समुद्र ने चली गई,
और शशिकला आकाश मे चन्द्रमा के साथ मिल गई,
और शेषनाग (गले मे लिपटने वाले सांप) पाताल
लोक मे चले गये, और उनमे जो सर्वज्ञता , दान देने
की क्षमता और अधिश्वरता थी वो तुझमे आ गई,
और बाकी बचा भिक्षाटन (भीख मांगने का काम ) वह
मुझमे आ गया !

इस प्रकार ताउओं के ताऊ की चतुरता और
हाजिर जवाबी से राजा भोज अत्यन्त प्रसन्न होकर
बोला- हे ताउओं में श्रेष्ठ ताऊ , मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूं ,
मान्ग लो क्या चाहिये ?
ताऊ बोला - हे राजन , मैं दरिद्रता
से दुखी हूं और मेरे कई छोटे २ बच्चे हैं !
उनको दूध भी मैं पिला नही पाता ! आपकी कृपा
से कोई अच्छी नस्ल की गाय या भैंस दुधारू मिल
जाये !
यही इच्छा है !

राजा ने तुरन्त ही मंत्री को एक उत्तम
भैंस ताऊ को मंगा कर देने का आदेश दिया !
अब बीच के अधिकारियों ने सोचा - यह ताऊ
अत्यन्त मूर्ख है !
और राजा इसकी हाजिर जवाबी
पर भैंस दे रहा है ! जबकि ये सरासर झूंठ
बोल रहा था ! अत: उन्होने एक बूढी बांझ भैंस
लाकर ताऊ को थमा दी ! पर ताऊ ये सब
भांप गया कि उसको बूढी बांझ ( बिना दुध देने वाली )
भैंस टिका दी है !

अब ताउ श्रेष्ठ , भैंस के बदन पर हाथ फ़िराता
हुवा अपना मुंह भैंस के कान पर लगा कर
कुछ बोलने का अभिनय करने लगा ! फ़िर अपना
कान भैंस के मूंह के सामने लाकर सुनने का
अभिनय करने लगा ! यह देख कर राजा
बडा चकित हो कर पूछने लगा -- हे ताउओं में श्रेष्ठ ताऊ ,
आप ये क्या कर रहे हो ?
ताऊ बोला - राजन मैने इस भैंस से पूछा कि
तेरे पाडा (नर बच्चा) है या पाडी (मादा बच्ची) है !
और तू दुध भी देती है या सिर्फ़ तेरे स्तन (थन)
ही दिखाई दे रहे हैं ! और तू गर्भवती भी है
या नही ?
तब उसने मेरे कान मे कहा -

भर्ता मे महिषासुर: कृतयुगे देव्या भवान्या
हतस्तस्मातद्दिनतो भवामिविधवा वैधव्यधर्मा ह्यहम !
दन्ता मे गलिता: कुचा विगलिता भग्नं विषाण्द्व्यं
व्रद्धायां मयि गर्भ्सम्भवविधिं प्रच्छन्न किं लज्जसे !!

अर्थात - मेरे पति महिषासुर को कृतयुग मे देवी
ने मार डाला है , उस दिन से मैं वैध्व्य भोग रही हूं ,
आज तक मैं विधवा धर्म का पालन करती आ रही हूं ,
मैने आज तक भी हर्गिज जार कर्म नही किया है !
अब मेरे दांत गिर गये हैं और स्तन शिथिल
हो गये हैं, और दोनो सींग भी टूट गये हैं ,
और मैं बूढी हो चुकी हूं, अरे दुष्ट ताऊ ऐसी
अवस्था मे भी तू मुझसे पुछता है कि मैं गर्भवती
हूं या नही ?
क्या तुझे थोडी बहुत लज्जा भी नही
आती ? और ये भी कहा की --

क्या तेरे घर मे मां बहन हैं या नही ?
हे राजन इसने इस तरह मुझे बहुत बुरा भला सुनाया !
और इस भैंस ने मुझे अनाप शनाप गालियाँ भी दी जो मैं इस
भरी राज सभा मे कह भी नही सकता ! मैंने अपने पुरे जीवन
मे इतनी गालियाँ नही खाई
जितनी गालियाँ इस पतिव्रता
भैंस ने मुझे दी हैं !

ताऊ के इस चातुर्य पर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुवा
और उसको उत्तम प्रकार की गाय , भैंसे और स्वर्ण
मुद्राएं दे कर विदा किया !

तो भाइयो इब म्हारै बाबू कुछ दिन के लिये गाम चले गये हैं !
और मैंने उनकी कही कहानी मै थोडा भोत फेर बदल कर दिया सै !
कारण की बाबू आली कहानी मै किम्मै जाति सूचक शब्द थे
उनकी जगह मैंने ताऊ शब्द इस्तेमाल कर लिया सै !
क्योंकि ताऊ इस तरियां कै झंझट तैं दूर ही रहणा चाहवै सै !
इब भाई ताऊ की राम राम ! और यो बात म्हारे बाबू नै मतना
बताइयो नही तो म्हारे हाड कुटैगा !
इब बाबू कै आणे तक तो आराम सै ! बाकी बाद मै देखेन्गे !