आखिर सन्नाटे को तोडते हुये ताऊ महाराज धॄतराष्ट्र बोले - पितामह आप ही बताईये कि आखिर ये सब हमारी ही किस्मत में क्यों लिखा है? द्वापर से अभी ब्लागयुग तक हम कभी चैन से नही जी पाये, अभी हम मुश्किल से तोतलों के आंदोलन से उबरे थे, उसमे भी हमारी किरकिरी हुई थी और अब ये आपने नया सर दर्द खडा कर दिया... ...आखिर पितामह आप समझते क्यूं नही कि अब द्वापर नही है जहां आप जगत पितामह बने हुये थे, अब ये ब्लागयुग है...इसमे सब अपने अपने पितामह है..कोई आपको पितामह मानने को तैयार नही होगा.
पितामह बोले - पर वत्स धृतराष्ट्र, जब तुम द्वापर से लेकर आज तक महाराज बने हुये हो तो मेरे को पितामह मानने में क्या दिक्कत है? अरे इस ब्लाग युग का सुत्रपात तक हमने किया है तो हम ब्लाग पितामह हुये कि नही? वत्स, तुम ये मान लो कि हमें पितामह कहाये बिना नींद नही आती. अब हम क्या करें? हमको हर किसी के फ़टे में टांग फ़ंसाने की द्वापर से ही आदत पडी हुई है...अब हमारी द्वापर वाली शान तो नही रही पर तुम्हारे इन ब्लाग पुत्र पुत्रियों को समझावो कि हमें वही पितामह वाला सम्मान दिया करें और हमारी टिप्पणियों को महत्व दें....
पितामह की बात काटते हुये मिस समीरा टेढी बोली - पर पितामह आप भी ना .....अब क्या कहूं? आप अपने आप को समझते तो ब्लाग पितामह हैं पर बाते बिल्कुल बचकानी चिरकुटई टाईप करते हैं तो आपको कौन ब्लाग पितामह मानेगा? आखिर आपका आचरण भी तो वैसा ही होना चाहिये ना?
इतनी देर से खामोश बैठे गुरू द्रोणाचार्य ने उचकते हुये मिस समीरा टेढी का समर्थन करते हुये बोलना शुरू किया - पितामह आप ये क्यूं नही समझते कि अब ब्लागयुग में राजशाही नही लोक शाही चलती है. और आप अपने आपको अब भी ब्लागयुग का पुरोधा समझते हैं...ये भूल मत किजिये पितामह वर्ना आप पितामह तो दूर बल्कि पुत्रमह भी नही रहेंगे. इस ब्लागयुग में सब एक से बढकर एक हैं...जरा युग की नजाकत समझिये और ये रोना धोना बंद करके खुद कुछ ढंग की ब्लागिंग किजिये...फ़ोकट खेमेबाजी करके कब तक आप पितामह बने रहेंगे?
ताऊ महाराज धृतराष्ट्र ने गुरू द्रोणाचार्य की बातों से प्रसन्नता प्रकट करते हुये कहा - पितामह मुझे तो गुरू द्रोण की बाते बडी प्रीतिकर लगी. आप इनका कहा मानिये और फ़ालतू की टिप्पणियां करके अपने को पितामह कहलवाने के बजाये स्वयं कुछ स्वस्थ लेखन किजिये जिससे आपको लोग सच में पितामह समझ सकें.....और...
महाराज ताऊ धृतराष्ट्र कुछ और बोल पाते कि इतने में ही युवराज दुर्योधन अपने परम मित्र कर्ण के साथ राज दरबार में प्रवेश करते हुये चिल्लाये...ये क्या हो रहा है तातश्री? आखिर ये ब्लाग भारत कब तक चलेगी तातश्री? द्वापर में हम भले ही हार गये होंगे पर अब ये ब्लाग युग है इसमे हमको कौन हरायेगा? अब मेरे हाथ में गदा नही बल्कि की-बोर्ड और हाईस्पीड नेट कनेक्शन है और प्राक्सी सर्वर भी.......
(क्रमश:)