पटना यात्रा के अनुभव भाग - 2
पटना यात्रा अनुभव भाग - 1
वाराणसी यात्रा के अनुभव भाग - 6 (समापन)
वाराणसी अभ्यास शिविर भाग - 6 (समापन किश्त)
अब तक का विवरण आपने भाग -1, भाग – 2, भाग – 3, भाग - 4 एवम भाग - 5 में पढा. अब इस यात्रा के समापन भाग की तरफ़ बढते हैं.
तय कार्यक्रम अनुसार आज संकट मोचन हनुमान जी के दर्शनार्थ, सुबह सुबह तैयार होकर मधु जी की गाडी से हम, वत्स जी, मधु जी और विक्की शर्मा जी, रवाना हो गये. मंदिर के बाहर बहुत सी प्रसाद की और फ़ूलों की दुकानें थी. सबने अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार हार फ़ूल और प्रसाद लिये पर हमने कुछ नहीं लिया. प्रसाद के नाम पर पेडे और बेसन के लड्डू थे जिनको चखकर विक्की शर्मा जी बोले कि यह तो निरी शक्कर है.... सो हमारी इच्छा नहीं हुई.... पर बनारस गये हो और प्रसाद लेकर घर नहीं लौटो तो घर में फ़जीते होने का डर था. सो हमने सोचा कि बाहर कि किसी दुकान से ढंग के पेडे ले लेंगे....
यहां काल भैरव मंदिर के उलट सब काम व्यवस्थित था. लाईन लगी थी और मास्क अनिवार्य था, मोबाईल फ़ोन भी नहीं ले जाने दे रहे थे..... जिन्हें हमने ड्राईवर साहब को सौंप दिया और आनंद पूर्वक हनुमान जी के दर्शन किये बिना किसी धक्का मुक्की के बहुत सुंदर दर्शन हुये. और लौटकर होटल आ गये जहां सभी साथी नीचे ही इंतजार करते मिले. हमने फ़टाफ़ट रूम में जाकर अपना सामान पैक किया और नीचे आ गये.
जो महफ़िल 14 अगस्त से शुरू हुई थी अब उसकी समाप्ति का समय आ चुका था यानि 16 अगस्त की सुबह, जब सबको बिछुडना था. सुबह सुबह ही सब अपना सामान पैक करके नीचे हाल में ब्रेक फ़ास्ट के लिये इकठ्ठे हो ही चुके थे. शिविर में जो पाया और जो दिया, इसकी खुशी सबके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी. कहीं ना कहीं सभी को बिछुडने का गम भी था.
वाराणसी यात्रा के अनुभव भाग - 5
वाराणसी अभ्यास शिविर भाग -5
अब तक का विवरण आपने भाग -1, भाग – 2, भाग – 3 एवम भाग - 4 में पढा. अब आगे बढते हैं.
15 अगस्त को सभी तैयार होकर नीचे हाल में ब्रेकफ़ास्ट के लिये एकत्रित हुये. ब्रेकफ़ास्ट पर भी अनवरत विषय संबंधी चर्चा चलती रही. ब्रेकफ़ास्ट के बाद आईस्क्रीम का दौर चलता रहा और सभी प्रसन्नता पूर्वक चर्चा करते रहे. इसके बाद सबने अपने अपने हिसाब से काशी दर्शन का प्रोग्राम बना लिया. सब अपनी अपनी पसंद का प्रोग्राम बनाकर रवाना हो गये. हमने सभी को बता दिया था कि आज रात को डिनर के बाद सवाल पूछा जायेगा और सवाल की कुंडली ग्रूप में लगा दी कि कोई ग्रूप में जवाब नहीं देगा.
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| 14 अगस्त का ग्रूप फ़ोटो |
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| आईस्क्रीम का मजा लेते हुये |
डिनर के बाद सब हंसते मुस्कराते और परम संतुष्ट भाव से आईस्क्रीम को उदरस्थ करते रहे जब तक होटल वाले की आईस्क्रीम खत्म नही हो गई. इसके बाद तय हुआ कि ऊपर रूम में ही आज के सवाल का जवाब पूछा जायेगा. और कमरे में ही कुर्सियां लगवा दी गई. सभी वहां एकत्रित हो गये.
वाराणसी यात्रा के अनुभव भाग - 4
वाराणसी अभ्यास शिविर
भाग -4
अब तक का विवरण आपने
भाग -1 भाग – 2 एवम भाग – 3 में पढा. अब आगे बढते हैं.
अब समय आ गया था सर्टीफ़िकेट
वितरण का. वत्स जी अभी भी असमंजस में थे, बोले…..
बिना परीक्षा ही आप रिजल्ट देने की बात कर रहे हैं? यदि इनमें से किसी ने सही जवाब
नहीं दिया तो? हमने कहा आप काहे चिंता करते हैं? हम हैं ना….. वो बोले इसका क्या मतलब?
यानि आप पहले से ही जवाब बता देंगे? हमने कहा…. नहीं नहीं…..हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे.
हमने तो अपनी औघड दृश्टि से सब कुछ पहले ही देख लिया है आप तो शुरू करो…. वत्स जी बोले….
शर्त लगा लो….आज आपकी सारी औघड गिरी रखी रह जायेगी…. सारे सही जवाब नहीं दे पायेंगे.
हमने कहा शर्त लगालो….वो बोले… आप कोई शरारत मत करना. हमने कहा पहली बात तो ये कि
हम कभी शरारत करते नहीं और ये अलग बात है कि हमारी शरारतें कभी पकडी नहीं जा सकती.
फ़िर भी हम कोई शरारत करें और पकडे जाये तो अगली गोवा ट्रिप का सारा खर्चा हम उठायेंगे
और यदि सबने सही जवाब दे दिया तो आप हमें सिर्फ़ इक्कीस सौ… रूपये देंगे. इस शर्त पर
वत्स जी तैयार हो गए…. पर बोले यदि मैं शर्त जीत गया तो इसी महिने गोवा चलना पडेगा. हमने
कहा इसी महिने क्यों? यही वाराणसी से सीधे चलेंगे… तब सर्टीफ़िकेट वितरण शुरू हुआ.
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नक्षत्र ज्योतिष विशारद पं. श्री बी. एन. शर्मा |
इसके बाद श्री वी.एस. पारीक जयपुर से, जिन्होंने दोनों के हाथों सम्मान ग्रहण किया. आप अपने क्षेत्र में जाना माना नाम हैं, बहुत बहुत शुभकामनाएं.
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| नक्षत्र ज्योतिष विशारद पं. वी. एस. पारीक |
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| नक्षत्र ज्योतिष विशारद पं. कु. श्वेता पांडेय |
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| नक्षत्र ज्योतिष विशारद पं. आशुतोष शर्मा |
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| नक्षत्र ज्योतिष विशारद पं. निधीष सारस्वत |
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| नक्षत्र ज्योतिष विशारद पं. सुरेश शर्मा |
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| हम, मधु जी और वत्स जी |
इसके बाद भी बहुत कुछ हुआ जिसकी रिपोर्टिंग अगले भाग में की जायेगी. पर एक बात है कि सभी परम संतोष में दिखे. यहां यह हाल था कि लेने वाले को लग रहा था कि मैंने बहुत कुछ पा लिया है पर देने वालों को लग रहा था कि हम बहुत कम दे पाये हैं. ज्ञान अथाह है जो खोजता रहता है वो पाता रहता है. संतोष की बात है कि लेने और देने वाले दोनों ही संतुष्ट थे. इसके बाद डिनर करके सब रात्रि विश्राम को चले गये. पर हमारी तो परीक्षा अभी बाकी थी कि वत्स जी से शर्त हारेंगे या जीतेंगे? यह सब अगले भाग में.
वाराणसी यात्रा के अनुभव भाग - 3
वाराणसी अभ्यास शिविर
भाग -3
भाग - 1 एवम भाग - 2 लिंक पर क्लिक करके पढें.
शाम की मिटिंग के लिये
सब कान्फ़्रेंस हाल में जुटना शुरू हो गये थे. पर कहते हैं ना कुछ लोगों की दुआएं काम
बना देती हैं और कुछ नाशुक्रे लोगों की अंदरूनी बद-दुआएं विघ्न भी पैदा कर देती हैं.
हुआ यूं कि कान्फ़्रेंस के लिये सब कुर्सी टेबल और पोडियम लग चुके थे और बस बैनर लगना
बाकी रह गया था. होटल वाले लडके बैनर लगा रहे थे पर वो चिपक नहीं रहा था. दायें से
लगाते तो बांये से उखड जाता और बांये लगाते तो दांये से उखड जाता….. अजीब सी उलझन थी….
गुस्सा भी आ रहा था कि ये किसने गरूड पुराण बांच दिया जो जरा से काम में भी विघ्न आ
रहा था.
हम, वत्स जी, बी. एन. शर्मा जी, आशुतोश जी, पारीक जी आदि सभी बेबस से खडे देख रहे थे तभी राजेंद्र जी शर्मा की अगुआई में ग्रूप के कुछ लोगों ने कमान अपने हाथ में ले ली. युद्ध स्तर पर काम शुरू हो गया क्योंकि समय समाप्त होता जा रहा था. आखिर राजेंद्र जी के कुशल संचालन में इस बद्दुआ आफ़त पर काबू पा लिया गया.
तभी मधु जी बोली…. इसके आगे खडे होकर फ़ोटो खिंचवा कर देखते हैं तो उनकी सलाह पर हमने और वत्स जी ने मधु जी के साथ फ़ोटो खिंचावाई.
पर जैसे ही हम फ़ोटो खिंचवाकर हटे कि दूसरे भी खिचवा कर आजमा लेवें क्योंकि हमे संदेह हो चला था कि किसी दिलजले ने तगडी बद्दुआ लगाई है या कोई जादू टोना किया है…… पर ये क्या…? हम तीनों के हटते ही बैनर भाई साहब धडाम से पूरे के पूरे नीचे आ गिरे….. सबकी हंसी भी निकल गई पर हमने खिसियानी हंसी हंसते हुये कहा….. भई इस बैनर पर बहुत भारी वजनदार पंडित विराजमान है सो उनका वजन सहन नहीं कर पा रहा है…. सारे पंडित धडाम से गिर गये.
आखिर बैनर भाई साहब को किसी तरह रस्सियों के सहारे लटकाया गया. आखिर इतने धुरंधर पंडितों का वजन सेलो टेप तो सहन नहीं कर सकता था सो रस्सियों का सहारा लिया गया. तभी हमने वत्स जी को कहा कि महाराज आपके बैनर पर तो किसी ने गरूड पुराण बांच दिया है और ये यहां टिकने वाला नहीं है. वत्स जी बोले… फ़िर अब क्या करना? हमने कहा… आप एक काम करिये कि जब तक ये बैनर यहां टिका है तब तक सबको सर्टीफ़ेकेट इस बैनर को हाजिर नाजिर मानकर बांट दिजीये…… यह सुनते ही वत्स जी बोले…. ऐसे कैसे होगा? ना इन लोगों से कोई सवाल पूछा और ना ही कोई परीक्षा ली…. और आप कह रहे हैं कि सर्टीफ़िकेट बांट दिजीये… ? ये भी कोई बात हुई भला….. फ़िर दो तरह के सर्टीफ़िकेट भी तो इसी लिये लाये थे ना कि यदि सही जवाब देंगे तो “नक्षत्र ज्योतिष विशारद” का सर्टीफ़िकेट दे देंगे और सही जवाब नहीं दिया तो “ज्योतिष अभ्यास शिविर सहभागिता” में भाग लिया, वाला दे देंगे. अब बिना परीक्षा ही आप इन्हें कौन सा सर्टीफ़िकेट देंगे?
दो पांच मिनट इंतजार करके देखा कि बैनर भाईसाहब वजन सहन कर पाते हैं या नहीं? पर जब वो पांच मिनट टिक गये तो
यकिन हो गया कि अब नहीं गिरेंगे तब हम और वत्स जी भी विराजमान हो गये. बाकी सभी ने
भी अपना अपना स्थान ग्रहण कर लिया.
शायद आप नहीं जानते
पर वत्स जी जानते हैं कि यदि माईक दिख जाये तो फ़िर हमारा स्थान कुर्सी पर नहीं बल्कि
माईक के पीछे होता है सो हम पोडियम के पीछे खडे हो गये पर ये क्या? वहां माईक वाईक
तो कुछ था नहीं सो जोर से बोलना ही पडेगा. तब हमने वत्स जी को कहा कि इस तरह बिना माईक
तो इतना सारा बोलने में हमारे गले की बारह तो क्या तेरह बज जायेगी…. अभी आप ही बोल
लीजिये हम कल बोल लेंगे….. वत्स जी बोले…. आप शुरू किजीये, बीच बीच में आपके गले को
रेस्ट दिलवा देंगे…. कुछ सवालों के जवाब हम दे देंगे तब तक आप गले को आराम करवा लिजीयेगा.
तब हमने अपने गले को विश्वास दिलाया कि चल शुरू हो जा… भगवान सब भली करेंगे.
हमने काशी के कोतवाल
भरव जी और गुरूओं के गुरू भोलेनाथ विश्वनाथ जी का स्मरण वंदन करते हुये बोलना शुरू
किया. सभी विद्वान इतनी तन्मयता से सुन रहे थे कि बस दो मिनट में ही लय बंध गई. हमने
बडे बडे विद्वानों और बडी भीड में भी बोला है पर इतनी तन्मयता और जिज्ञासु भाव से सुनने
वाले श्रोता नहीं मिले.
अब जिज्ञासुओं के सवालों का निराकरण वत्स जी ने करना शुरू किया तब तक हमने गले को विश्राम दिया. एक बात साफ़ नजर आई कि इतने गंभीर किस्म के जिज्ञासु पहली बार मिले थे. बहुत ही तन्मयता से सुन भी रहे थे और जिज्ञासा भी प्रकट कर रहे थे. ऐसे ही जिज्ञासुओं को कुछ बताने में भी आनंद आता है.
इसके बाद हमने फ़िर मोर्चा संभाल लिया और सभी लोग गंभीरता पूर्वक सुनते रहे. जो कुछ बोला गया उसे यहां दोहराने की आवश्यकता नहीं है.
वाराणसी यात्रा के अनुभव भाग - 2
वाराणसी अभ्यास शिविर भाग - 2
अगले दिन यानि 14 अगस्त को सुबह सुबह उठकर बनारस के घाटों को
निहारने की ख्वाहिश थी सो उठकर हाथ मुंह धोये और प्लान यह बना कि वहीं घाट पर गंगा
स्नान भी कर लेंगे और अपने परम प्रिय अस्सी घाट पर नाश्ता पानी करते हुये बनारसी
भौकाल का आनंद उठायेंगे. बाहर निकल कर पता चला कि सारे घाट डूबे हुये हैं और पानी
सडक तक आ चुका है. तो यह प्रोग्राम कैन्सिल कर दिया. हम और वत्स जी सीधे पहुंच गये
पहलवान लस्सी वाले के यहा. ईमानदारी से कहूँ तो वहां बनारसी कचोरी में वो मजा नहीं
आया, जितनी कि तारीफ सुनी थी। इससे ज्यादा मजेदार और स्वादिष्ट तो मथुरा की बेड़मी
पूरी और झोल वाली आलू की सब्जी थी.
अब लस्सी की बारी थी। मिट्टी के कुल्हड़ में लस्सी और ऊपर से मलाई
और रबडी की टापिंग देखकर मन ललचा गया, उम्मीदे जवान हो गई. कुल्हड़ को मुंह के पास
लाये तो सौंधी मिट्टी की खुशबू से दिल दिमाग ताजा हो गया. हालांकि रबड़ी और मलाई के
स्वाद तक सब ठीक था पर दही में हल्की खटास ने वत्स जी का मूड खराब कर दिया, बोले
यार पंजाब जैसी नहीं है. ज्यादा अच्छी तो हमें भी नहीं लगी सो हमने कहा ये पंजाब नहीं
है यू पी है, हो सकता है यहां ऐसा ही चलता होगा सो दोनों ने लस्सी को उदरस्थ कर
लिया. फिर मुंह का जायका ठीक करने के लिए वहीं पास में मिट्टी के कुल्हड़ में चाय
सुड़की तब जाकर चैन आया. फिर वापस होटल पहुंचकर नहा धोकर तैयार हो गये. तब तक
विद्वान साथियों का आना शुरू हो चुका था.
जैसा कि पहले भाग में बताया था श्रीमती मधु झा जी तो 13 अगस्त को
ही पधार चुकी थी. श्री बी. एन. शर्मा जी, श्री व श्रीमती वी. एस. पारीक जी, आशुतोष
शर्मा जी, श्री सुरेश शर्मा जी, श्री राकेश शर्मा जी, श्रीमती संगीता राय जी और
कु. श्वेता पांडेय जी भी आ चुके थे. श्री निधीष सारस्वत जी जिनके आने की कन्फ़रमेशन
नहीं थी, वो भी पधार गये तो आनंद दूना हो गया, बस मलाल रहा तो श्री सोहन वेदपाठी
जी के नहीं आने का. सबने उनको बहुत ही मिस किया.
सबसे मिलकर बहुत ही सुखद लगा, सभी लोग पूर्व परिचित ही लगे. सभी के
विनयी स्वभाव और विद्वता ने मन मोह लिया. सब लोग तैयार होकर दोपहर बाद हाल
में इकठ्ठा हुये.
क्रमश:
वाराणसी यात्रा के अनुभव भाग - 1
वाराणसी अभ्यास शिविर [यात्रा भाग -1]
कहते हैं जिस इंसान
को भटकने की आदत लग जाये वो एक जगह टिक कर नहीं रह सकता. जबसे कोरोना महामारी शुरू
हुई है तबसे तो ताऊ जैसों की लगी पडी है. घर में तो जैसे पांव जलते हैं और यही हाल
“वत्स” जी का है. अभी चार पांच महिनें पहले ही दोनों गोवा जाकर आये थे उसके बाद राजस्थान
की ट्रिप हो गई थी. फ़िर लोक डाऊन टू शुरू हो गया….तबसे घर में कैद होकर रह गये.
लोक डाऊन टू का असर
कुछ कम होने लगा तो वत्स जी बोले, ताऊ चल, गोवा निकलते हैं….मैंने कहा अभी कोरोना चल
रहा है कहीं उसने पकड लिया तो क्या होगा? वो बोले…ताऊ कोरोना तेरा क्या कर लेगा? वो
तो खुद तुमसे दूर भागता है और सोचता है….कि कहीं ताऊ ने मुझे पकड लिया तो क्या होगा?
हमने कहा…. बात तो
आपकी सही है पर ताई जाने नहीं देगी…. बिना बात लठ्ठ खाने पड जायेंगे… अभी कुछ दिन रूकिये.
पर वत्स जी नहीं माने और बोले… ताऊ मुझे नहीं पता… तुम लठ्ठ खावो या कुछ और… मैं टिकट
करवा रहा हूं अब घर में दम घुट गया है. अब हम क्या कहते… हमें तो लठ्ठ खाने की आदत
हो चली है सो तैयार हो गये.
फ़िर अचानक कुछ भक्तगणों
की सहमति पर वत्स जी ने गोवा की जगह वाराणसी का प्रोग्राम बना लिया और बोले श्रावण
का महीना है, ताई मना नहीं कर पायेगी भोलेनाथ के दर्शन के नाम पर… और मुझे भी बापू
की गालियों से प्रोटेक्ट शील्ड मिल जायेगी. इस तरह 14 अगस्त से 16 अगस्त का प्रोग्राम
बन गया.
ताई को पहले से बताने
का मतलब की जाने के दिन तक रोज लठ्ठ खावो सो बताने का तो कोई सवाल ही नहीं था….ताऊ
भले ही कहीं मंदिर दर्शन के लिये भी शहर से बाहर जाये पर ताई को लगता है कि गोवा गया,
और यही हाल वत्स जी का है….वत्स जी के शहर से बाहर निकलते ही बापू को पक्का शक हो जाता
है कि गोवा गया….फ़िर जो पंजाबी शब्दों में आशीर्वाद की बौछार होती है वो कल्पनातीत
है.
पर ना तो वत्स जी को
इस पंजाबी आशीर्वाद से फ़र्क पडता है और ना ही ताऊ को. ताऊ को तो आप सब जानते ही हैं
कि जब तक रोजाना दो चार लठ्ठ नहीं पडें तब तक रोटी हज्म नहीं होती.
आखिर वाराणसी जाने
का दिन आ ही गया और ताऊ ने बताया…. सुनते ही ताई का दिमाग सातवें आसमान पर…. पास पडा
लठ्ठ उठाया और फ़टकारते हुये बोली… तुमको शरम भी आती है या नहीं? लोग कोरोना के मारे
घर से नहीं निकलते और तुम चले गोवा….. बीच में ही ताऊ बोला… गोवा कहां जा रहा हूं…
मैं तो भोलेनाथ के दर्शन करने वाराणसी जा रहा
हूं…… बस यह सुनते ही ताई ने दो चार लठ्ठ और मारे फ़िर बोली….. अब झूंठ भी बोलने लगे?
वाराणसी का बहाना बना रहे हो और जाना तुमको गोवा है. खैर जाने के दो चार घंटे पहले
ही बताया था सो किसी तरह यह भूकंपमयी समय भी निकल गया और हम अपना बैग उठाकर सीधे एयरपोर्ट
पहुंच गये.
दोपहर करीब 3 बजे के
आसपास वाराणसी के एयरपोर्ट पर थे. वहां से सरवेश्वरी होटल, लंका जाने का साधन तलाशा
तो प्रीपेड टेक्सी वालों ने 800 रुपये मांगे. हमने कुछ मोल भाव करना चाहा तो ठेठ बनारसी
अंदाज का जवाब मिला…. सुनिये…. जाना है तो आठ सौ रूपये दीजिये, हम रसीद बना देते हैं
वर्ना कोई और साधन खोज लीजिये. हमने पूछा और कौनसा साधन है… तो मुंह में दबाये पान
की पीक गटक कर वो बोला….. ऊ सब हमें नाहीं मालूम…. बाहर जाकर खोज ना लिजीये…. बनारसी
भौकाल से यह पहला सामना था.
हम अपना सा मुंह लिये
विचार करने लगे तभी बेटे का फ़ोन आ गया कि पहुंच गये या नहीं. बेटे ने कहा मैं ऊबर टेक्सी
बुक करवा देता हूं… हम सोच ही रहे थे कि ये चेन्नई में बैठ कर बनारस में कैसे टेक्सी
बुक करवायेगा? इतनी देर में वो बोला टेक्सी बुक कर दी है…. ये टेक्सी नम्बर है, अभी
फ़ोन आता होगा और पेमेंट कर दिया है 592 रूपये…. आप कहीं डबल मत कर देना. हमारा तो दिमाग
ही चक्कर खाने लगा कि टेक्सी भी बुक हो गई, पेमेंट भी हो गया…. कहीं बेटा मजाक तो नहीं
कर रहा? इतनी देर में टेक्सी वाले का फ़ोन आ गया….. कि सर मैं अराईवल गेट के सामने ही
खडा हूं… आप आ जाईये.
हम बाहर निकले कि उसने
हमारा बैग लिया और गाडी में रख कर हमें बैठा कर रवाना हो गया. करीब 30 किलोमीटर की
दूरी थी सो करीब 1 घंटा लग गया. टेक्सी वाला भला बंदा था हमें शहर के बारे में बताते
हुये आया. बोला सर, ये सब फ़्लाई ओवर मोदी जी की मेहरवानी से बने हैं…. और ये वाला वही
फ़लाई ओवर है जो निर्माण के दौरान गिर गया था…. यह BHU परिसर है….. ये इधर संकट मोचक
हनुमान जी का मंदिर पडेगा… आपके होटल के पास ही पहलवान लस्सी वाला है… वहां कचोरी और
लस्सी जरूर पीना…..इत्यादि इत्यादि….
आखिर हम होटल पहुंच
गये और हमने उससे कहा कि भाई तुम भले आदमी लगते हो… हमको 16 तारीख को यहीं से उठाकर
एयरपोर्ट पर पटक देना…. वो बोला सर आ जाऊंगा….. आपकी टिकट मुझे व्हाटसएप्प पर भेज दिजीये…
मैं सही टाईम पर आ जाऊंगा…. आप बेफ़िक्र रहिये…. और वो चला गया.
होटल बाहर से देखने
में बढिया लग रहा था, करीब सात आठ मंजिल ऊंचा, हम दाखिल हुये तो रिसेप्शन काऊंटर पर
एक आदमी पान या खै्नी मुंह में दबाये बैठा था. हमने कहा कि हमारी बुकिंग है और हमें
कमरा दे दीजिये. वो पान दबाये हुये ही क्या गें..गें..बोल रहा था वो समझ नहीं आया और
गर्मी के मारे बुरा हाल था. उस भले आदमी ने एक वाल फ़ैन सिर्फ़ अपनी तरफ़ लगा रखा था बाकी
पूरे हाल में आषाढ की दुपहरिया जैसा हाल था. गर्मी के मारे प्राण निकलने को थे. शायद
पांच सात मिनट हमारे पेशेंस का इम्तहान लेने के बाद उस भले आदमी को तरस आया होगा सो
वो जाकर पान थूक कर आया और बोला…. देखिये जी, मैनेजर साहब अभी अभी खाना खाने गये हैं,
उनके आने के बाद ही कुछ होगा…. अरे आप खडे क्यों हैं? उंहां सोफ़ा पर बैठिये ना…. हम
बोले भाई बहुत गर्मी है…. कोई पंखा वंखा ही चला दो….. वो बोला इंहा तो ये एक ही फ़ैनवा
है…. हम उसका मंतव्य समझ गये और काऊंटर पर कुछ ऐसी पोजीशन बनाकर खडे हो गये कि उसके
ना चाहते हुये भी उसके फ़ैनवा की थोडी सी हवा झटक सकें.
करीब आधा घंटे तक काऊंटर
पर खडे खडे सोना बाथ लेने के बाद हमें मैनेजर साहब के दर्शन नसीब हुये. मैनेजर साहब
ने आते ही हमारी बुकिंग रसीदें देखी और उनका बनारसी भौकाल शुरू हो गया. बोले आप लोग
ये आन लाईन बुकिंग काहे करवाते हैं? इतना कम दाम पर तो हम सब ये फ़ेसेलिटी पिरोवाईड
नहीं ना कर पायेंगे…. काहे से कि हमको नुक्सान ना हो जाता है.
हम बोले… मैनेजर साहब
आप फ़िलहाल तो हमको एक ठो एसी रूमवा दे दिजिये…. काहे से कि हमारा मगजवा भी बहुते गर्म
हो गया है. रही आपकी फ़ेसेलिटी की बात तो बुकिंग करवाने वाले वत्स जी भी आ ही रहे हैं….
वो सब बाते आप उनसे कर लिजीयेगा. इतनी ही देर में राजेंद्र शर्मा जी पहुंच गये… उनकी
कोई एडवांस बुकिंग थी नहीं, सो काफ़ी झकझक के बाद उनकी व्यवस्था हुई. फ़िर वत्स जी और
विक्की शर्मा जी भी पधार गये. उसके बाद सब व्यवस्थाएं उस रोज के लिये सेट की गई. और
अंत में मधु जी भी पधारी. फ़िर सब अपने अपने रूम में सेट हो गये. इस तरह 13 अगस्त मनाया
गया.
क्रमश:








































