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ताऊ साप्ताहिक पत्रिका अंक -38

प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के 38 वें अंक मे हार्दिक स्वागत है.

38 वां अंक मतलब आज से 38 सप्ताह पहले हमने इस पत्रिका की शुरुआत की थी. फ़िर सुश्री अल्पना जी, सुश्री सीमाजी, श्री आशीष जी, सुश्री विनिताजी, सुश्री प्रेमलताजी और अंत मे श्री समीरलाल जी इससे जुडे. और ये कारवां बनता गया. सभी की सामूहिक लगन और मेहनत के परिणाम स्वरूप ताऊ साप्ताहिक पत्रिका नई सजधज के साथ आपके सामने हर सप्ताह पेश होती रही. आप सभी के हम हृदय से आभारी हैं.

आज इस 38 सप्ताह की पेशकश के बाद हम एक विराम दे रहे हैं इस ताऊ साप्ताहिक पत्रिका को. यकीन रखिये ये सिर्फ़ एक विराम है. ताऊ साप्ताहिक पत्रिका अपनी नई सजधज के साथ आपके सामने जल्दी ही फ़िर पेश होगी.

आप जानते हैं कि यह एक श्रम साध्य कार्य है. इसमें काफ़ी समय देना पडता है. हम अपने निजी स्वास्थ्य कारणों से फ़िलहाल पत्रिका को ज्यादा समय नही दे पारहे हैं, इस वजह से यहां एक विराम दे रहे हैं इसे.

ताऊ पहेली पुर्ववत चलती रहेगी. और उम्मीद है उसे आपका प्यार और आशीर्वाद ऐसे ही मिलता रहेगा.

आपका सप्ताह शुभ हो.

इब आज की रामराम !

-ताऊ रामपुरिया


"सलाह उड़नतश्तरी की" -समीर लाल

The first step in the acquisition of wisdom is silence, the second listening, the third memory, the fourth practice, the fifth teaching others.

-Solomon Ibn Gabriol

अर्थात

विवेकशीलता हासिल करने और ज्ञानार्जन के लिए प्रथम चरण मौन, द्वितीय श्रवण, तृतीय याददाश्त, चतुर्थ अभ्यास और पंचम चरण दूसरों को अर्जित ज्ञान बांटना है.
किन्तु आजकल जल्द से जल्द, इस दिखावे की दुनिया में, अपने आप को स्थापित करने के लिए हम इस सिद्धांत को बिल्कुल उलट कर रख दे रहे हैं. बस, नाम की चाह बच रही है, ज्ञान की नहीं..विवेक की तो बात ही मत करिये.
आज जिसे देखें, आये और बिना कुछ जाने सुने, लगे ज्ञान बांटने. विरोध हुआ तो विवाद कैसे बढ़ाना है, उसका अभ्यास पूरी तरह से कर लेंगे.

फिर याद करेंगे कि इस तरह के पूर्व विवादों में विवाद किस तरह भड़का था और उस रास्ते पर चल पड़ेंगे और फिर जब विवाद भड़क जायेगा तब सुन सुना कर मौन धर लेंगे.
विद्वान यूँ ही नहीं कह गये हैं. उनको सुनो और उनके सिद्धांतो का पालन करो. सुखी रहोगे.

The more a man knows, the more he forgives.

-Catherine the Great

अर्थात

जितना ज्ञान अर्जित करोगे, उतना क्षमाशील बनोगे.

बाकी अगली बार:


वो

आँखों से

बात करते हैं..

मुट्ठी में
इन्कलाब रखते हैं...


-समीर लाल 'समीर'


"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा


हरियाणा

हरियाणा के नाम का अर्थ है " यह परमेश्वर का निवास " से हरि ( हिंदू देवता विष्णु ) और आयन ( घर )!
हरियाणा का इतिहास वैदिक काल से आरंभ होता है. यह राज्‍य पौराणिक भरत वंश की जन्‍मभूमि माना जाता है जिसके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा. हमारे महान महाकाव्‍य महाभारत में हरियाणा की चर्चा हुई है. जैसा कि बहुत से लोग जानते हैं कि कौरवों और पांडवों की युद्धभूमि कुरूक्षेत्र हरियाणा में ही है. मुसलमानों के आगमन और दिल्‍ली के भारत की राजधानी बनने से पहले तक भारत के इतिहास में हरियाणा अग्रणी भूमिका निभाता रहा इसके बाद हरियाणा दिल्‍ली का ही एक हिस्‍सा बन गया और 1857 में स्‍वतंत्रता के प्रथम महासंग्राम से पहले तक यह गुमनाम बना रहा.

सन 1857 के विद्रोह के दमन के बाद जब ब्रिटिश प्रशासन फिर से स्‍थापित हुआ तो झज्‍झर और बहादुरगढ़ के नवाबों, बल्‍लभगढ़ के राजा त‍था रिवाड़ी के राव तुलाराम की सत्ता छीन ली गई. उनके क्षेत्र या तो ब्रिटिश क्षेत्रों में मिला लिए गए या पटियाला, नाभ और जींद के शासकों को सौंप दिए गए. इस तरह हरियाणा पंजाब प्रांत का हिस्‍सा बन गया.

यह राज्य उत्तर भारत का एक राज्य है जिसे १९६६ में पंजाब से अलग कर के बनाया गया था. पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ है जिस के बारे में हम पहले आप को विस्तार से बता चुके हैं. इस राज्य की सीमायें पंजाब ,हिमाचल प्रदेश ,उत्तर प्रदेश,और उत्तराँचल से लगी हुई हैं. सरकार कोई भी हो हरियाणा विकास के क्षेत्र में अग्रणी है. गुडगाँव यहाँ का आधुनिक और तेजी से विकसित होता हुआ शहर है.

सूचना पौद्योगिकी में जिस प्रकार कि प्रगति हरियाणा ने कि है वह सराहनीय है.कंप्‍यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत 23,000 से अधिक सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है!‘ ई-दिशा एकल सेवा केंद्र’ के नाम केंद्र’ के नाम से 1159 ग्रामीण और 104 शहरी सामान्‍य सेवा केंद्र स्‍थापित किये जा रहे हैं.
हरियाणा का औद्योगिक विकास भी किसी से छुपा नहीं है.राज्‍य में 1,343 बड़ी और मंझोली तथा 80,000 लघु अद्योग इकाइयां हैं. हरियाणा ऑटोमोबाइल , साइकिलों, रेफ्रिजरेटरों, वैज्ञानिक उपकरणो आदि का सबसे बड़ा उत्‍पादक है. हरियाणा विश्‍व बाजार में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक तो है ही पानीपत का पचरंगा अचार भी निर्यात होता है और बहुत मांग में है..यहाँ भी बहुत पसंद किया जाता है..इस के अलावा पानीपत की हथकरघे की बनी वस्‍तुएं और कालीन विश्‍व भर में प्रसिद्ध है.

यह सच में आश्चर्यजनक और ख़ुशी कि बात है राज्य हरियाणा देश का ऐसा पहला राज्‍य है जहां 1970 में ही सभी गांवों में 100 प्रतिशत बिजली पहुंचा दी गई थी! राज्य में सभी गाँव पक्की सड़कों से जुड़े हैं.यहाँ कि आर्थिक निर्भरता कृषि पर ६५ % है.
प्रति व्यक्ति औसत आय में भी इस राज्य की गणना पहले ५ राज्यों में होती है.
फरीदाबाद सब से बड़ा शहर है. पानीपत , पंचकूला और फरीदाबाद भी औद्योगिक केन्द्र हैं, पानीपत रिफाइनरी दक्षिण एशिया में दूसरी सबसे बड़ी रिफाइनरी है.
इस राज्य में कुल २१ जिले हैं.

हरियाणा जाने के लिए आप को सभी राज्यों से बस , रेल सेवा और विमान सेवा मिल जायेगी. देश की राजधानी दिल्ली निकटम होने के कारण भी हरियाणा पहुंचना बेहद सुगम है.
साल में कभी भी जाएँ.
हरियाणा पर्यटन सम्बन्धी किसी भी जानकारी के लिए आप यहाँ [मुख्य दफ्तर ] से संपर्क कर सकते हैं-
Haryana Tourism Corporation Limited
SCO 17-19, Sector 17-B, Chandigarh-160017
Tel : 0172-20702955-57, 0172-2720437.
Fax : 0172-2703185, 2702783
Email : haryanatourism@gmail.com

पर्यटन स्थल-

१-कुरुक्षेत्र में ब्रह्म सरोवर,सिटी ऑफ़ पार्क,शेख चिल्ली का मकबरा,बुद्धिस्ट मोनुमेंट ,पुरातत्व स्थल,कृष्ण म्यूज़ियम हैं.

२-थानेसर.
-कुरुक्षेत्र से एक दम साथ जुडी हुई जगह है.यहाँ स्थानेस्वर [महादेव] भगवान् का और माँ भद्र काली का मंदिर है.और एक गुरुद्वारा भी है.प्राचीन समय में यह स्थान एक प्रमुख शैक्षिक केंद्र हुआ करता था. राजा हर्ष वर्धन के राज्य में थानेसर राजधानी हुआ करती थी.

३-ज्योतिसर.-यहाँ पर एक बरगद का वृक्ष है जहाँ माना जाता है कि भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था. उन्हें पूरी गीता सुनाई थी. सम्बंधित लाइट और साउंड शो भी दिखाया जाता है.

४-पंचकुला
में देखें चंडी मंदिर और कालका देवी का मंदिर.

५-पेहोवा.

६-गोल्फ के चाहने वालों के लिए हरियाणा सरकार ' गोल्फ पर्यटन 'के तहत यहाँ के बहुत ही सुन्दर विश्वस्तरीय गोल्फ के मैदानों को प्रमोट करती है. प्रमुख अरावली गोल्फ कोर्स ,और 'करना झील' के किनारे हाईवे गोल्फ कोर्स [delhi-अम्बाला मार्ग पर] हैं.

७-इसके अलावा आप हरियाणा में ट्रेक्किंग,बोटिंग आदि भी खूब कर सकते हैं.

८-सूरजकुंड का मेला-रंग बिरंगा. आकर्षक!



हर साल एक फरवरी से १५ फरवरी तक लगने वाला यह मेला पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है.
हर साल किस एक थीम पर यह मेला लगता है इस साल मध्य प्रदेश राज्य की झलकियां हस्त-शिल्प आदि यहाँ दिखाये गए थे.
-हरियाणा के लोक गीत और लोक नृत्य बहुत ही लोकप्रिय हैं.
अब कुछ जानकारी शेख चिल्ली के मकबरे के बारे में-


शेख चिल्ली का मकबरा -

शेख चिल्ली का नाम सुनते ही शेखी बघारने वाले किसी व्यक्ति का ध्यान आ जाता है.क्योंकि अक्सर किसी गप्पेबज़ ,और झूटी शेखी बघारने वाले को शेख चिल्ली कह दिया जाता है..मगर हाँ यहाँ किसी ऐसे शेख चिल्ली की बात नहीं कर रहे.
यह शेख चिल्ली तो तो एक बड़े सूफी संत थे.
यह मकबरा हरयाणा के थानेसर जिले में है और भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है.
मुख्य द्वार पर लगे सरकारी पटल के अनुसार शेख चिल्ली का नाम अब्दुर रहीम उर्फ़ अब्दुल करीम उर्फ़ अब्दुर रजाक बताया जाता है.मुग़ल राजकुमार दारा शिकोह [१६५०] द्वारा यह इमारत बनवाई गयी थी.[इस इमारत को किस ने बनवाया था इस में बहुत से इतिहासकारों में मतभेद हैं]

शेख चिल्ली उनके आध्यात्मिक गुरु थे और उन के जीते जी दारा शिकोह ने यह इमारत बनवाई जहाँ वह महीनो अपने गुरु के पास रहा कर शिक्षा लिया करते थे.शेख चिल्ली कि मृत्यु के बाद उन्हें इसी इमारत के नीचे तहखाने में दफना दिया गया था और यह इमारत शेख चिल्ली के मकबरे के नाम से मशहूर हो गयी.



मुख्य इमारत ताजमहल की तरह संगमरमर से बनी है और ऊपर एक गुम्बद भी दिखता है.बीच में बना लॉन हरा भरा और बेहद खूबसूरत है.तहखाने में ६ कब्र हैं जिन में से शेख चिल्ली कि एक है और बाकि पांच किस की हैं इस बारे में कहीं उल्लेख नहीं है.एक सूखा तलाब भी यहाँ दिखता है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कभी यहाँ पानी लेने के लिए नहर का भी इंतजाम रहा होगा.

इमारत में नौ मेहराबें हैं और बारह छतरियां हैं.इमारत पर की गयी कलाकारी पर्शियन प्रभाव की लगती है.
अपनी अनूठी और सुन्दर वास्तुकला के लिए इस इमारत को ताजमहल के बाद दूसरा स्थान दिया जाता है.मकबरे के पश्चिम में पुरातत्व विभाव को खुदाई में राजा हर्ष के टीले के अवशेष मिले हैं.

एक स्थान पर मैं ने यह भी पढ़ा है कि यह भी माना जाता है कि सूफी संत शेख चिल्ली ने ही भारत में सबसे पहले मुग़ल शासन की समाप्ति की भविष्यवाणी की थी और उन्होंने दारा शिकोह को सलाह दी थी कि जो भी काम करने हैं अपने जीवन में कर लो...और इसीलिए दारा शिकोह ने अपने उस्ताद के जीवित रहते ही उनके इस मकबरे का निर्माण करवा दिया था!

यह स्थान छात्रों में भी लोकप्रिय है क्योंकि पढने के लिए बहुत ही शांत जगह है.
इस स्थान को देखने के लिए टिकट लगता है.
सप्ताह में हर दिन सुबह ९ से शाम ५ बजे तक खुल रहता है.[कन्फर्म कर लें]
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“ दुनिया मेरी नजर से” -आशीष खण्डेलवाल



विराम के बाद फ़िर मुलाक़ात होगी.. हैपी ब्लॉगिंग.


"मेरी कलम से" -Seema Gupta

भारत के एक गरीब चिड़ियाघर में , दिन प्रति दिन एक शेर बहुत कुंठित हो रहा था क्योंकि उसे एक दिन में 1 किलो से ज्यादा मांस नहीं दिया जा रहा था .

शेर ने सोचा कि शायद उसकी प्रार्थना सुनी जायेगी, ये सोच जब एक दिन एक दुबई चिड़ियाघर प्रबंधक ने चिड़ियाघर का दौरा किया शेर ने चिड़ियाघर प्रबंधन से अनुरोध किया कि दुबई के चिड़ियाघर में स्थान्तर किया जाये . और शेर की बात मान ली गयी.

अब शेर ने वहां एक अच्छा ठंडा पर्यावरण और एक या दो बकरी प्रतिदिन की कल्पना शुरू कर दी. दुबई पहुंचने के पहले दिन शेर को एक सील बंद बेग नाश्ते के लिए दिया गया, शेर ख़ुशी ख़ुशी उस पर टूट गया और खोलते ही आवक रह गया क्योंकि उसमे सिर्फ कुछ केले थे.

इस पर शेर ने सोचा की उसे अभी अभी भारत से लाया गया है तो जगह बदली के कारण वे लोग उसके पेट के बारे मे चिंतित होंगे और उसे मॉस नहीं दिया गया होगा खाने को.

लकिन ये क्या अगली सुबह भी वही हुआ और उसके अगले दिन भी वही केले से भरा बेग उसके सामने था.
अगले दिन शेर बहुत गुस्से में था और उसने खाना वितरण करने वाले लडके को रोका और जोर से गुर्राया
'क्या तुम जानते हो कि मैं शेर ... जंगल का राजा हूँ . तुम्हारे प्रबंधन को क्या हुआ है? ये सब क्या बकवास है? मुझे खाने को केले क्यों दिये जा रहे है?.
लड़के ने विनम्रता पूर्वक कहा, 'सर, मैं जानता हूँ कि आप जंगल के राजा हैं
लेकिन .....आप. को एक बदर के वीजा पर यहां लाया गया है!! '

कहानी का नैतिक मूल्य

बेहतर है अपने ही घर में शेर बन कर रहना बजाये इसके कहीं बन्दर बन के रहना




"हमारा अनोखा भारत" -सुश्री विनीता यशश्वी



यमुनोत्तरी

जिस स्थान से यमुना नीचे आती है उस स्थान को यमुनोत्तरी कहा जाता है। यमुना का उद्गम कालिंदी पर्वत से माना जाता है। इसीलिये यमुना को कालिंदी नाम से भी जाना जाता है। केदारखंड के अनुसार माना जाता है कि - सूर्य की दो पत्नियां थी संज्ञा और छाया। संज्ञा ने गंगा को जन्म दिया तथा छाया ने यमुना व यमराज को।

कहा जाता है कि छाया ने यमराज का तिरस्कार कर दिया था जिस कारण उन्हें पृथ्वी पर आना पड़ा। परन्तु सूर्य ने यमुना को भी पृथ्वी का उद्धार करने के लिये ही धरती पर भेजा। यमुनोत्तरी के विशाखयूप पर्वत पर पांडवों ने एक वर्ष बिताया था।

यमुनोत्तरी मंदिर यमुना के बांये तट पर स्थित है। इस मंदिर के कपाट वैशाख महीने कह शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया को खुलते हैं और कार्तिक मास में आने वाली यम की द्वितीया को यह कपाट बंद हो जाता है। यमुनात्तरी के लकड़ी के मंदिर को 1885ई. में गढ़वाल के राजा सुदर्शनशाह ने बनवाया था और उसमें यमुना की मूर्ति की स्थापना करवाई।

इस समय जो मंदिर यहां पर है इसे प्रतापशाह ने बनवाया था। इस मंदिर को सन् 1999 में एक बार फिर ठीक किया गया। मंदिर के गर्भ में एक सिंहासन है जिसमें काले रंग की यमुना व सफेद गंगा व सरस्वती की मूर्तियां रखी हैं। यमुनोत्तरी में पूजा करने वाले ब्राहम्ण ग्रहस्थ हैं और इन ब्राहम्णों को पूजा करने का अवसर बारी-बारी से मिलता है। ये ब्राहम्ण पीढ़ियों से मंदिर की पूजा करते आ रहे हैं।


इस मंदिर के पास एक गरम पानी का कुंड है जिसे सूर्यकुंड कहा जाता है। केदारखंड में इसे ब्रह्मकुंड नाम से भी जाना जाता है। इस कुड के पानी का तापमान 90 डिग्री सेल्सीयस के आसपास रहता है। इस कुंड में यात्री आलू, चावल को पोटली बनाकर डाल कर पकाते हैं और उसे ही प्रसाद माना जाता है।

इस स्थान से कुछ दूरी पर एक कुंड और है जिसका नाम गौरीकुंड है। इसका पानी सूर्यकुंड से थोड़ा ठंडा है। इसमें यमुना का ठंडा पानी मिलता है जिस कारण इसके चारों ओर हर समय भाप का घेरा बना रहता है।



"नारीलोक" -प्रेमलता एम. सेमलानी



कुछ दिनो से हमारी लाडली दुलारी रामप्यारी मेरे से नाराज है. जब मैने उसे इस नाराजगी का कारण पुछा तो बडी ही चुटकीले अन्दाज मे बोली-"प्रेमा आन्टी! मै आपसे कुट्टी हू......आप हमेसा ही बडॆ लोगो के लिए खाने की चटपटी रेसिपि बताती है. हम बच्चो के लिऎ चाकलेट, आईसक्रिम की तो बात ही नही करती है.....जब देखो ताई, ताऊ के लिऎ दाल बाटी चुरमा ही बनाकर खिलाती है. जब तक आप चाकलेट आईसक्रिम बिस्किट बनाने की विधि नही बताएगी मै आपसे बात नही करुगी." तो रामप्यारी! आज तेरे लिऎ “टॉफी“‘बना रही हू. अब तो खुश हो जा.....
टमाटर की चाकलेट
सामग्री

लालटमाटर 250 ग्राम
चीनी 2 चम्मच (Table spoom)
सोडीयम बेन्जोएट(sodium benzoate) 50 मिलीग्राम
इलायची पाउडर थोडा
बनाने की विधी-:
टमाटर को काटकर उबाल ले.
अब छानकर रस निकाल ले.
चीनी, सोडीयम बेन्जोएट, इलायची पाउडर मिलाए.
थाली मे घी लगाकर मिश्रण किया हुआ रस उसमे डाल दे.
तथा परत थॊडी मोटी रखे.
धुप मे सूखाकर अब उसे मनचाहे आकार मे काट ले.
स्वादिष्ट पाचक “टमाटरटॉफी“ रामप्यारी सहीत सभी बच्चो एवम बडो को भी बहुत पसन्द आएगी.

अब कुछ बाते टमाटर से:-
शक्ति धर, टमाटर

मानव जीवन के लिए जिन-जिन तत्वो की आवश्यकता होती है, वे प्राय: सब तत्व इसमे निहित है. लोहे की मात्रा इसमे दूध की अपेक्षा दुगुनी होती है. चूना भी इसमे प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है जो हड्डियो को मजबूत बनाता है. टमाटर मे ए-बी-सी (A, B, C ) तीनो विटामिन पाये जात है. इसमे पाए जाने वाले विटामिन्स मे यह विशेषता होती है की अन्यत्र पाए जाने वाले विटामिन्स आग लग जाने के बाद नष्ट हो जाते है. डॉक्टर क्रिनसन ने यह प्रमाणीत किया है कि जो विटामिन्स ताजे टमाटर मे वही टमाटर के अन्य प्रकारो सूखे हुऎ आचार,मुरब्बा, एवम चटनी मे पाए जाते है.इससे यह प्रमाणित होता है की टमाटर बहूत ही उपयोगी एवम लाभकारी फ़ल है.
प्रात: दो टमाटर खाकर दूध पीने से रक्त शुद्धि एवम वृद्धि होती है.
मधुमेह: डाक्टर पी.जे. केवेजने लन्दन रिपोर्ट मे लिखा है कि मधुमेह के लिए टमाटर से अधिक लाभप्रद कोई अन्य खाध पदार्थ नही है. धीरे-धीरे शक्कर की मात्रा न्यून होते होते मधुमेह स्वत समाप्त हो जाता है.
नैत्र विकृति: भी टमाटर खाने से ठीक हो जाती है.
हानि: वात-पित्त प्रधान व्यक्तियो के लिऎ टमाटर हानिप्रद है.

चलते चलते:-

जिन्दगी अजबी होती है,
कभी हार कभी जीत होती है.
तमन्ना रखो समन्दर की गहराई को छूने की,
क्यो कि किनारो पर तो जिन्दगी की शुरुआत होती है.
नमस्कार.
प्रेमलता एम. सेमलानी


सहायक संपादक हीरामन मनोरंजक टिपणियां के साथ.
"मैं हूं हीरामन"

अरे हीरू..कहां मर गिया…देख ये मुरारी अंकल को…एक ही जगह सूई अटक गई..

अबे पीरू..मैं तो शेफ़ाली दीदी की टिपप्णी पढी रिया हूं…जो आज दिमाग चलाने को मना कर रही हैं.

अरे पेलवान..देख..राठौड अंकल को नींद आने लग गई..
और शाश्त्री अंकल को तो बुखार ही चढ गिया रे!

 

 Blogger Murari Pareek said...

रामप्यारी के सवाल पर |
मेरा जवाब
मेरा जवाब
मेरा जवाब
मेरा जवाब
khi....khi..khi..khe..khe..khe..hi..hi..

September 5, 2009 8:19 AM

Blogger Shefali Pande said...

taau ,, aaj ke din to dimaag chalane ko mat kaho ..ek din rest ka

September 5, 2009 8:08 PM

 

 

 Blogger नरेश सिह राठौङ said...

मैने पूरा गूगल अर्थ छान मारा नीन्द भी आने लग गयी नही पता चला ।

September 5, 2009 8:59 PM

 

 Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

ताऊ!
मगजपच्ची करते-करते बुखार आ गया है।
शायद कल को पोस्ट भी नही लिख पाऊँगा।

September 5, 2009 8:00 PM

 

चल पीरू..जल्दी चल अब आफ़िस मे काम बहुत पडा है…

हां पेलवान..निकल ले..सीधे रस्ते से…



ट्रेलर : - पढिये : श्री विवेक रस्तोगी से ताऊ की खास बातचीत
"ट्रेलर"

गुरुवार शाम को ३: ३३ पर ताऊ की खास भेंट का ब्यौरा : श्री विवेक रस्तोगी से...पढना ना भुलियेगा.

ताऊ : ताऊ : हमने सुना है कि आप बचपन मे बहुत शरारती थे?

विवेक रस्तोगी : जी, यह सही है. शरारत का कोई मौका नही छोडा.

ताऊ : हमने सुना है कि आपने एक बार स्कूल के अपने सहपाठियों को जहरीले काजू खिलवा दिये थे?

विवेक रस्तोगी : ???????????????????

जानिये गुरुवार शाम ३ : ३३ ताऊ डाट इन पर





अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.

संपादक मंडल :-
मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया
वरिष्ठ संपादक : समीर लाल "समीर"
विशेष संपादक : अल्पना वर्मा
संपादक (तकनीकी) : आशीष खण्डेलवाल
संपादक (प्रबंधन) : Seema Gupta
संस्कृति संपादक : विनीता यशश्वी
सहायक संपादक : मिस. रामप्यारी, बीनू फ़िरंगी एवम हीरामन
स्तम्भकार :-
"नारीलोक" - प्रेमलता एम. सेमलानी

ताऊ साप्ताहिक पत्रिका अंक -37

प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के 37 वें अंक मे हार्दिक स्वागत है.

अक्सर पहेलियों को कुछ लोग बच्चों का खेल समझते हैं. और बडी धीर गंभीर मुद्रा अख्तियार किये रहते हैं. जैसे कि पहेली मे भाग लेते कोई देख लेगा तो कोई उनके बारे में गलत धारणा बना लेगा.

और कुछ लोग पहेली में भाग लेते हुये ऐसी हरकतें करते हैं जैसे कि यह उनके जीवन मरण का प्रश्न हो? हमारी समझ से दोनों ही गलत हैं. यह जो दूसरे प्रकार के लोग हैं वो भी असली मजा नही ले पाते. पहेली एक टानिक की तरह काम करती है. लेकिन उपरोक्त दोनो प्रकार के लोग असली बात से चूक जाते हैं. आप पहेली को खेल भावना से लें, दूसरों का भी उतना ही सम्मान करें जितना आप चाहते हैं.

नीचे हम विकीपिडिया से एक उद्धरण कोट कर रहे हैं, जो विकी पिडिया से लिया है और उसी का लिंक भी दे रहे हैं. हमारा निवेदन है कि आप अवश्य उसको पढे और देखे कि खेल खेल में इसका क्या प्रभाव पडता है.

पहेली व्यक्ति के चातुरता को चुनौती देने वाले सवाल होते है। जिस तरह से गणित के महत्व को नकारा नहीं जा सकता, उसी तरह से पहेलियों को भी नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता। पहेलियां आदि काल से व्यक्तित्व का हिस्सा रहीं हैं और रहेंगी। वे न केवल मनोरंजन करती हैं पर दिमाग को चुस्त एवं तरो-ताजा भी रखती हैं।

मार्टिन गार्डनर ने अपनी एक किताब की भूमिका मे पहेलियों के महत्व को इस प्रकार से समझाया है,........

तो शांति और शूकून के साथ पहेलियों में खेल भावना से भाग लेते रहें और अपने दिमाग की क्षमता को पैना करते रहे. हम जल्द ही एक विस्तृत लेख इस विषय पर लिखेंगे.

आपका यह सप्ताह शुभ हो.


-ताऊ रामपुरिया
(मुख्य संपादक)

"सलाह उड़नतश्तरी की" -समीर लाल

जिन्दगी में जब किसी मुद्दे पर अनिश्चितता के बादल घेर लें और तुम्हें समझ न आये कि दो रास्तों में से किस रास्ते का चुनाव करें तो ऐसे में एक सिक्का हवा में उछालो. वो इसलिए नहीं कि सिक्के के गिरने पर जो पहलु सामने दिखेगा , वह तुम्हारा जबाब होगा बल्कि इसलिये कि जब तक वो सिक्का हवा में रहेगा तुम जान जाओगे कि तुम्हारा दिल क्या चाहता है. बस, वही रास्ता लेना.
इस तरह का सुवचन कहीं पढ़ रहा था अंग्रेजी में.

यूँ तो दिमाग से लिए गये फैसले ही जीवन की सफलता का राज हैं किन्तु कई बार दिमाग विरोधाभासी परिस्थितियों में फंस जाता है, तब दिल की बात सुनने में कोई बुराई नहीं.

अक्सर हम लेखन में इस तरह की परिस्थितियों में आ जाते हैं कि सोचने लगते हैं, इसे लिखे या न लिखें. क्या असर होगा इसका? कोई बुरा तो नहीं मान जायेगा? किसी को चोट तो नहीं पहुँचेगी इससे? हम दुविधा में पड़े किसी भी निर्णय तक नहीं पहुँच पाते ऐसे में इस तरह का उपाय कारगर सिद्ध हो सकता है.
मुझे लगा कि यह बात आप सब से बांटना चाहिये सो कह दी.

बाकी अगले सप्ताह, तब तक:


अनजान राहें.........

राह पकड मैं चल रहा था, मंज़िल थी बस ध्यान मे

देखा तब दो राह को बनते, उस पर्ण वन उद्यान मे.

एक मैं और सीमा मेरी है, दोनो पर क्या चल पाऊँगा

उस पथ की आशा है मुझको , मंज़िल जिस पर पा जाऊँगा.

एक वो जो अल्लहड बाला सी, बना ना सकी कोई पहचान

दूजी राह कि जिस पर थे अंकित, असंख्य कदमों के निशां.

मैने चुनी वो राह जिस पर, घाँस उगी थी हरी हरी

शायद अब तक कम ही होंगे, जिसने इसकी थाह धरी.

सोचता था फ़िर कभी, यह दूसरी मै राह लूँगा

अंर्तमन मे जानता था, कहाँ कभी ये अंज़ाम दूँगा.

चल पडा बिन पद चिन्ह की, उस राह का दामन मैं थाम

शायद वो ही फ़ैसला था, जिससे पाया अभिनव मुकाम.

--The Road Not Taken-Robert Frost का हिन्दी नज़रिया एवं रुपांतरण: समीर लाल


"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा


केवल १ ,९८८ ,६३६ [२००१ की गणना के अनुसार]की जनसंख्या वाले पहाड़ी राज्य जिसकी राजधानी कोहिमा है ,आज चलते हैं उस राज्य की तरफ जिसका नाम है नागालैंड.इसे पूरब का स्विजरलैंड भी कहते हैं.

पूर्व में म्‍यांमार, उत्‍तर में अरूणाचल प्रदेश, पश्चिम में असम और दक्षिण में मणिपुर से घिरा हुआ नागालैंड 1 दिसंबर, 1963 को भारतीय संघ का 16 वां राज्‍य बना था.

इस राज्य में ११ जिले हैं.नागालैंड की प्रमुख जनजातियां है: अंगामी, आओ, चाखेसांग, चांग, खिआमनीउंगन, कुकी, कोन्‍याक, लोथा, फौम, पोचुरी, रेंग्‍मा, संगताम, सुमी, यिमसचुंगरू और ज़ेलिआंग.

'नगा 'भाषा एक जनजाति से दूसरी जनजाति और कभी-कभी तो एक गांव से दूसरे गांव में भी अलग हो जाती है इसीलिये इन्‍हें तिब्‍बत बर्मा भाषा परिवार में वर्गीकृत किया गया है. नागा लोग भारतीय-मंगोल वर्ग लोगों में से है.मुख्यत १६ जनजाति के लोग हैं .इन लोगों में संगीत का विशेष महत्व है.

बारहवीं-तेरहवीं शताब्‍दी में इन लोगों के असम के अहोम लोगों संपर्क होने से भी इन लोगों के रहन-सहन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा.

उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में अंग्रेजों के आने पर यह क्षेत्र ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आया.आजादी के बाद, 1957 में यह क्षेत्र केंद्रशासित प्रदेश बना .उस समय असम के राज्‍यपाल इसका प्रशासन देखते थे.यह नागा हिल्‍स तुएनसांग क्षेत्र कहलाया जाने लगा . लेकिन स्थानीय जनता में जब असंतोष पनपने लगा तब 1961 में इसका नाम बदलकर ‘नागालैंड ’ रखा गया और भारतीय संघ के १६ वें राज्‍य के रूप में विधिवत उद्घाटन 1 दिसंबर, 1963 को हुआ.

लगभग 70 प्रतिशत जनता कृषि पर निर्भर है.यह गौर करने लायक बात है कि १९८१ के सर्वेक्षण के अनुसार यहाँ शत प्रतिशत गावों में बिजली पहंचा दी गयी है और 900 से अधिक गांवों को सड़कों से जोड़ा गया है.

कब जाएँ? - पूरे साल आप कभी भी जाएँ. सारा साल मौसम सुहाना रहता है. दिसम्बर में एक खाब होर्निबल पर्व मनाया जाता है, जिस में राज्य कि सभी जनजातियाँ भाग लेती हैं. दूर दूर से इस उत्सव को देखने लोग यहाँ आते हैं.

कैसे जाएँ? - नागालैंड में दीमापुर एकमात्र ऐसा स्‍थान है, जहां रेल और विमान सेवाएं उपलब्‍ध हैं.

ज़रूरी सूचना - [एक बार फिर राज्य के पर्यटन विभाग से निश्चित करें]---इस राज्य में प्रवेश के लिए विदेशियों को आर ऐ पी.[प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट ] /पाप और नागरिकों को -इन्नर लाइन permit-की आवश्यकता होगी. एक छोटा सा शुल्क दे कर भारतियों को यह इन्नर लाइन परमिट कोलकाता, दीमापुर, गौहाटी और दिल्ली से मिल जाता है.

बिना परमिट के जाने पर राज्य के प्रवेश द्वार[चेक पोस्ट] पर चेकिंग के समय ही बस से उतार दिया जाता है.परमिट के अलावा अगर आप के पास कोई ख़ास पहचान पत्र है तब भी आप प्रवेश पा सकते हैं.[यात्रा प्लान करते समय नियमो की जांच अवश्य कर लें]. delhi में ऑफिस-
Deputy Resident Commissioner, Nagaland House, New Delhi
Phone No. : +91-11-23012296 / 23793673
यह भी सच है कि यहाँ की सुरक्षा स्थित की भी जाने से पहले जांच कर लेनी चाहिये क्योंकि नागालैंड में मैदानी लोग या फिर गैर नागाओं में असुरक्षा की भावना दिखती है वह उनके प्रवास तक बरकरार रहती है.इस का कारण यहाँ भूमिगत संगठनों का सरकार के समांतर सरकार चलाना है.और बेशक ,इस अलगाववादी राजनीति से नागालैंड राज्य को नुक्सान ही हुआ है. सीजफायर के बावजूद आज भी नागालैण्ड में आप को असुरक्षा महसूस हो सकती है,ऐसा वहां से आये पर्यटक कहते हैं.शाम पांच बजे तक बाज़ार बंद हो जाते हैं.

-बाज़ार की बात याद आते ही मुझे यहाँ के बाज़ारों की कुछ ख़ास बातें बताना जरुरी लग रहा है..जो मैदानी इलाकों से आये लोगों के लिए [ख़ासकर मेरे जैसे शाकाहारियों के लिए अनोखी सी लगे.कोहिमा के सब्जी बाज़ार में आप को रंग बिरंगे कीडे मकोडे ,घोंघा आदि बिकते मिल जायेंगे..और तो और पानी की थैलियों में भरे जिंदा मेंढक बिकते दिखेंगे.

कुत्ते का मांस बड़े शोक से यहाँ के लोग खाते हैं. इस के अलावा सुअर, गाय, मुर्गा, बकरा, मछली भी इन्हें बहुत प्रिय है. सब्जियों में साग, पत्ते, नागा बैगन, बीन, पत्ता गोभी आदि खाते हैं.

पेयजल की बहुत दिक्कत है.पीने का पानी सरकार देती तो है मगर फिर भी कमी ही है. यहाँ तक कि ये लोग बरसात में chhat से टपकने वाले पानी तक को एकत्र कर के रखते हैं.

पान और कच्ची सुपारी यहाँ के लोग बड़े शौक से खाते हैं वह चाहे महिला हो या पुरुष .हाँ..एक और ज़रूरी बात...नागालैंड dry area है! मतलब यहाँ मद्यपान निषेध है.

हिंदी यहाँ के लोग समझ लेते हैं..थोडी बहुत बोल भी लेते हैं इस लिए भाषा की दिक्कत नहीं आएगी.
दीमापुर, राज्य का एक मात्र शहर है जो रेल, सड़क और हवाई मार्ग से देश के अन्य क्षेत्रों से जुड़ा है, इस कारण इसे राज्य का द्वार भी कहते हैं.

देखने की जगहें-

१-दीमापुर २-किफिरे ३-कोहिमा ४-लोंग्लेंग ५-मोकोकचुंग ६-मों 7-परें ८-फेक
९-तुएंसंग १०-वोखा ११-जुन्हेबोतो

अगर नागालैंड की वास्तविक संस्कृति देखनी हो तो ''टूरिस्ट विलेज`` में zarur जाना चाहिये

'कोहिमा वार सिमेटरी'
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जो जगह पहेली में 'कोहिमा वार सिमेटरी' दिखाई गयी थी वह कोहिमा शहर में है.
कोहिमा एक बहुत ही खूबसूरत हिल स्टेशन है. यहीं सब से ऊंची गर्रिसन पहाड़ी पर द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानी सेना से युद्ध के दौरान शहीद हुए देशी और विदेशी अफसरों और जवानों की याद में कोहिमा में''वार सिमेटरी`` बना है .यह एक विश्व प्रसिद्द जगह है.

1944 में चार अप्रैल से 22 जून तक हुए युद्ध में जहां चार हजार भारतीय और ब्रिटिश सैनिक मारे गए थे, वहीं सात हजार से ज्यादा जापानियों की जानें गई थी. बाद में अर्ल माउंटबेटन ने इस युद्ध को इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध और बर्मा अभियान के लिए निर्णायक क्षण कहा था. यह युद्ध 64 दिनों तक चला था और इसमें जिला आयुक्त के बंगले के टेनिस मैदान में भी हिंसक संघर्ष हुआ था। कोहिमा का युद्ध दो चरणों में हुआ था. पहले चरण में चार अप्रैल से 16 अप्रैल तक जापान ने कोहिमा पर्वतशिखर पर कब्जा करने का प्रयास किया गया , दूसरे चरण में 18 अप्रैल से 22 जून तक ब्रिटिश और भारतीयों ने जापानियों के कब्जे को समाप्त करने के लिए जवाबी हमले किए, युद्ध 22 जून को समाप्त हुआ.



बहुत ही सुन्दर तरीके बनाया गया यह क्षेत्र और यहाँ हर कब्र पर शहीद सैनिक के बारे में जानकारी अंकित है. यहाँ प्रवेश करते ही 'दूसरे ब्रिटिश divison ' के एक अफसर की कब्र पर लिखा है :-

“ When You Go Home, Tell Them Of Us And Say,

For Their Tomorrow, We Gave Our Today ”

कुल १४२० शहीदों की कब्रें /यादगार पत्थर इस सेमेट्री में लगे हैं.९१७ हिन्दू और सिखों को उनके रीती के अनुसार डाह संस्कार करने के बाद उनकी याद में भी पत्थर लगाये हुए हैं.

सब से कम उम्र का किशोर शहीद सैनिक पंजाब का 'गुलाब' था जिसकी उम्र मरते समय मात्र १६ साल थी!
किसी ने सच कहा है..किसी भी राष्ट्र को उसके शहीदों को कभी नहीं भूलना चाहिये. उन सभी अमर जवानों को श्रद्धांजलि के साथ विदा लेती हूँ..अगली बार एक नयी जगह की जानकारी के साथ फिर मिलेंगे.


“ दुनिया मेरी नजर से” -आशीष खण्डेलवाल

आइए आपको दुनिया के सबसे बुज़ुर्ग ब्लॉगर से मिलवाएं

गूगल सर्च इंजन को कष्ट देते हुए आज यह जानने की कोशिश की गई कि दुनिया का सबसे बुज़ुर्ग ब्लॉगर कौन है। नतीजा दिलचस्प रहा और दिल को सुकून देने वाला भी। दिलचस्प इसलिए क्योंकि वरिष्ठतम चिट्ठाकार की उम्र 96 साल है और दिल को सुकून देने वाला इसलिए, क्योंकि ये महाशय भारतीय मूल के हैं। दुनिया के सबसे बुज़ुर्ग ब्लॉगर हैं, रेंडिल बूटीसिंह औऱ वे अमेरिका के फ्लोरिडा में रहते हैं।

हाल ही उनके ब्लॉग को lifebeginsat80.com वेबसाइट की ओर से ग्रेपाउ पुरस्कार के नवाज़ा गया है। ब्रिटिश गुएना में 1, दिसंबर 1912 को जन्मे बूटीसिंग काफी अर्से से ब्लॉगिंग कर रहे हैं। उनके सात बच्चे, 19 पोते-पोतियां और 18 प्रपौत्र-प्रपोत्रियां हैं। इतनी उम्र के बावजूद भी वे ब्लॉग पर पोस्ट को लिखने से लेकर पब्लिश करने का काम स्वयं ही करते हैं।

बूटीसिंह का ब्लॉग


बूटिसिंह की जानकारी यहां से ली जा सकती है और उनके ब्लॉग पर यहां से जाया जा सकता है।

क्या आप जानते हैं कि 109 और 108 साल की दो महिला चिट्ठाकारों का निधन पिछले साल ही हुआ है। इनके बारे में अधिक जानकारी फिर किसी अंक में।

अगले हफ्ते फ़िर मुलाकात होगी.. हैपी ब्लॉगिंग.


"मेरी कलम से" -Seema Gupta



एक पढ़ा-लिखा बेहद घमंडी व्यक्ति एक नाव में सवार हुआ। अपने अहंकार में चूर वह नाविक से पूछने लगा, ‘‘क्या तुमने व्याकरण पढ़ा है, नाविक?’’
नाविक बोला, ‘‘नहीं।’’
घमंडी व्यक्ति ने कहा, ‘‘अफसोस है कि तुमने अपनी आधी उम्र ऐसे हीँ बेकार गवां दी !’

थोडी देर में उसने फिर नाविक से पूछा, “तुमने इतिहास व भूगोल पढ़ा?”
नाविक ने फिर सिर हिलाते हुए ‘नहीं’ कहा।
घमंडी ने कहा, “फिर तो तुम्हारा पूरा जीवन ही बेकार गया।“
मांझी को बड़ा क्रोध आया। लेकिन उस समय वह कुछ नहीं बोला। अचानक दैवयोग से वायु के प्रचंड झोंकों ने नाव को भंवर में डाल दिया।

नाविक ने ऊंचे स्वर में उस व्यक्ति से पूछा, ‘‘महाराज, आपको तैरना भी आता है कि नहीं?’’
घमंडी ने कहा, ‘‘नहीं, मुझे तैरना नही आता।’’
“फिर तो आपको अपने इतिहास, भूगोल को सहायता के लिए बुलाना होगा वरना आपकी सारी उम्र बरबाद होने वाली है क्योंकि नाव अब भंवर में डूबने वाली है।’’ यह कहकर नाविक नदी में कूद तैरता हुआ किनारे की ओर बढ़ गया।

नैतिक मूल्य :-

मनुष्य को किसी एक विद्या या कला में दक्ष हो जाने पर गर्व नहीं करना चाहिए।


"हमारा अनोखा भारत" -सुश्री विनीता यशश्वी


रुद्रप्रयाग

रुद्रप्रयाग उत्तराखंड की बद्रीनाथ और केदारनाथ तीर्थ यात्राओं में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव है। यह समुद्र तल से 610 मी. की उंचाई पर बसा हुआ है। भगवान रुद्रनाथ का मंदिर यहीं अलकनन्दा व मंदाकिनी के संगम में स्थित है। इसके अलावा शिव और शक्ति की संगम स्थली भगवती का मंदिर भी इस स्थान पर ही है।

महाभारत में इस स्थान को रुद्रावत नाम से जाना गया है। केदारखंड में इस स्थान के बारे में लिखा गया है कि - नारदमुनि ने एक पैर में खड़े होकर यहां शिव की तपस्या की थी। उसके बाद शिव ने उन्हें अपने रौद्र रूप के दर्शन दिये थे। शेषनाग के आराध्य देव शिव के इस स्थान पर अनेकों मंदिर हैं। ऐसा माना जाता है कि नागों ने इसी स्थान पर शिव की आराधना की थी और उनसे वरदान मांगा था कि शिव उन्हें अपना आभूषण बनायें।

संगम के लिये रुद्रप्रयाग स्टेशन से कुछ दूरी पर एक पैदल मार्ग जाता है। इस संगम स्थान पर श्रृद्धालु स्थान करते हैं और भगवान रूद्र के दर्शन करते हैं तथा शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। यहां शिवलिंग के अलावा गणेश व पार्वती की मूर्तियां भी हैं।

रूद्रप्रयाग में एक संस्कृत महाविद्यालय भी है जिसे स्वामी सचिदानन्द जी ने बनवाया था। रुद्रप्रयाग के निकट ही एक स्थान है गुलाबराय। यह वह स्थान है जहां जिम कॉर्बेट ने एक खतरनाक नरभक्षी बाघ को मारा था। जिसका उस समय इस इलाके में बहुत ही आतंक था। जिम कॉर्बेट ने अपनी पुस्तक `मैन इटिंग लैपर्ड ऑफ रुद्रप्रयाग´ इसी बाघ के उपर लिखी थी।


रुद्रप्रयाग से 4 किमी. आगे कोटेश्वर महादेव का मंदिर पड़ता है। जिसके दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। यह मंदिर 20 फीट लम्बी गुफा में है जिसमें पानी प्राकृतिक रूप से टपकता रहता है। इस स्थान में सावन के प्रत्येक सोमवार और शिवरात्री के दिन मेले लगते हैं। इस स्थान से कुछ दूरी पर उमानारायण का मंदिर भी है।


"नारीलोक" -प्रेमलता एम. सेमलानी


बदाम की कतली के साथ बनाए ठण्डा पेय पाईनेपल सुप्रीम
हर दिन मसालेदार खाने से जी उकता गया होगा. आज मेरा भी मन मिठाई खाने और ठण्डा ज्युस पिने को ललचा रहा है.
आगे त्योहार भी आ रहे है. सुना है, मिठाईयो की दुकान मे मिलावटी चीजे बहुत मिलती है. मिठाईयो मे मिलाए जाने वाले "मावा" कैमिकलयुक्त अकृत्रिम रुप से तैयार कर मिठाईयो मे मिलाया जा रहा है.

इस मिलावटी मिठाईयो से हम और हमारे बच्चे घातक बिमारीयो से ग्रसित हो सकते है. कभी कभी जानलेवा भी हो सकता है. सावधान रहे! और कोशिश करे की शुद्ध स्वादिष्ट, व स्वास्थय के लिए सुरक्षित सभी तरह की मिठाईया घर पर ही बनाए. जो सस्ती के साथ-साथ सुरक्षित भी होगी. तो अब मेहमान नवाजी मे पुरे भारत भर मे मिठाई मे सबसे अधिक पसन्द की जाने वाली "बदाम की कतली" बनाएगे. और साथ मे ही "पाईनेपल सुप्रीम" ठण्डा पेय बनाकर स्वाद लेगे. तो आप सभी तैयार है.

"बदाम की कतली" के साथ बनाए ठण्डा पेय "पाईनेपल सुप्रीम"

बादाम (छिला हुआ पीसा हुआ) 1 किग्राम
चीनी .750 ग्राम
वर्क थोडा सा ( बेहतर होगा आप वर्क ना लागाऎ तो क्यो की स्वास्थ की दृष्टी हानिकारक है.)
चीनी और बदाम मिलाकर गैस पर मन्दी ऑच पर चढाए.
तब तक चलाए जब तक गोली ना बन्धे, हाथ के चिपकना नही चाहिऎ.
उतारकर कर ठण्डा होने दे. ठण्डा होने पर बडी रोटी बेलकर वर्क लगाए.
चाकू से पतग के आकार काटकर सर्व करे, या स्टोर करे.
नोट:- इसे आप लोहे की साफ़ कडाई मे बानाऎ तो ज्यादा अच्छी बनेगी
मघुमेह वालो के लिऎ बनाना हो तो चीनी की जगह suger free gold या suger free natura (कोई भी बाजार मे उपलब्ध शुगर फ़्रि) ले.
काजु कतली बनानी हो तो बदाम की जगह काजु ले.

पाईनेपल सुप्रीम
फ़्रेश या टिन सन्तरे का रस 1/2 कप
फ़्रेश या टिन अनन्नास रस 1-1/2 कप (डेढ कप)
अनन्नास एसेन्स 2 बून्द
वनीला आइसक्रिम 4 टेबल स्पून
बर्फ़ कुटी हुई थोडी सी
सभी चीजो को मिलाकर एक मिनट तक मिक्सी मे चलाए.
गिलास मे डालकर तुरन्त सर्व करे.
जरुर बताऎ की "बदाम की कतली" और "पाईनेपल सुप्रीम" आपको कैसी लगी ?
मै बादाम
बादाम के बारे मे कहा जाता है कि - "मानव की शान ऑख, पक्षी की पॉख और अमीर की नाक "बादाम" है.
प्रकृति ने बदाम को नयन की आकृति देकर इसके गोरव को अधिक ऊचा उठा दिया है. सचमुच बादाम मेवा जगत मे नेत्रोपम है. कागजी बदाम, जो हीरे के समान है. नया खुन बनाती है. मस्तिष्क को अभिनव शक्ती प्रदान करती है. हृदय को बलशाली बनाती है. बदाम को भिगोकर सुबह सुबह दुध के साथ लेने से सत्व पैदा होता है. बच्चो का मस्तिष्क तेज और मजबुत होता है. इसमे विटामीन डी प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है.
चलते चलते आपसे मन की बात

सबसे अनमोल तोहफ़ा अगर
आप किसी
को देते है, तो वह है वक्त
क्योकि आप किसी को अपना
वक्त देते है तो
आप अपनी जिन्दगी का वो पल
देते है जो लोटकर नही आता......

अब मै आपसे इजाजत चाहुगी। अगले सोमवार एक नई रेसिपी के साथ ढेर सारी बाते करने फिर आऊगी।
कहॉ.................................. ?
जी हॉ.................................!
सही फरमाया आपने...................................!
"ताऊ डॉट ईन" पर......................।
नमस्कार!
प्रेमलता एम सेमलानी


सहायक संपादक हीरामन मनोरंजक टिपणियां के साथ.
"मैं हूं हीरामन"

अरे हीरू…जल्दी देख..जल्दी.. अबे क्यूं चिल्लाये जा रिया हे?

अरे देख वो सेहर आंटी क्या के री हैं?  बोल रई हैंगी कि समीर अंकल मारेंगे?

अरे नही यार…ला जरा मुझे देखने दे…ले द्ख ले भिया….

  Blogger M.A.Sharma "सेहर" said...

क्लू देखकर तो लग रहा है की.... है तो कुमाँऊ के खेत.....अब रानीखेत भी नहीं तो .....शिमला...??
अब में रामप्यारी के दुख से दुखी हूँ न सो दीमाग उधर ज्यादा लगा है....:)
कल समीर जी मारेंगे उसे जिसने ग्लू लगाया ......:)))
सादर !!

 Blogger दीपक "तिवारी साहब" said...

अरे रामप्यारी..इतने पैसे का क्या करेगी? गरीब कर्मचारियों को उनका हक दे दिया कर. अब कैमरे के पीछे भी तू ही काम कर लेगी तो तेरी नाक पर तो पत्थर पडने ही हैं.

 Blogger ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

जगह तो नहीं मालुम पा गीत याद आ गया - हरी भरी वसुन्धरा पे नीला नीला ये गगन!

चल भिया निकल ले…अपने को नही पिटना..

हां यार..क्या पता इस रामप्यारी की नाक पर ये सिक्का कौन चिपका गया?

कहीं अपने माथे आ गई तो….चल उड जल्दी से……



ट्रेलर : - पढिये : सुश्री लवली कुमारी से ताऊ की एक सौजन्य भेंट का ब्यौरा!
"ट्रेलर"


गुरुवार शाम को ३: ३३ पर ताऊ की सौजन्य भेंट का ब्यौरा : सुश्री लवली कुमारी से...पढना ना भुलियेगा.

ताऊ : कोई ऐसी बात जो आप हमारे पाठको से कहना चाहें?

लवली जी : जरुर क्योंकि यहाँ सारे पाठक हिंदी ब्लोगर भी है मैं कहना चाहूंगी, अगर आप अपनी विचारधारा को सही समझते हैं और सामने वाले को गलत .. तब भी प्रतिद्वंदी के सामने तकपूर्ण ढंग से अपनी बात रखे, कुतर्कों और पूर्वाग्रहों से बचें.

ताऊ : अच्छा हमने सुना है कि एक बार आपने भूत बनकर किसी को बहुत बुरी तरह डरा दिया था?

लवली जी :???????????????

याद रखिये गुरुवार शाम ३ : ३३ ताऊ डाट इन पर




अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.

संपादक मंडल :-
मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया
वरिष्ठ संपादक : समीर लाल "समीर"
विशेष संपादक : अल्पना वर्मा
संपादक (तकनीकी) : आशीष खण्डेलवाल
संपादक (प्रबंधन) : Seema Gupta
संस्कृति संपादक : विनीता यशश्वी
सहायक संपादक : मिस. रामप्यारी, बीनू फ़िरंगी एवम हीरामन
स्तम्भकार :-
"नारीलोक" - प्रेमलता एम. सेमलानी

ताऊ साप्ताहिक पत्रिका - 35

प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के 35 वें अंक मे हार्दिक स्वागत है.
अभी पिछले दिनों एक मित्र ने पूछा कि ताऊ ये क्या लफ़्फ़ाजी करते रहते हो? अरे करना है तो कुछ रचनात्मक करो. अब हमको तो इन दोनों के बीच का संबंध भी नही पता? तो हम क्या करते? रह गये अपना सा मुंह लेके चुपचाप.

हमको चुपचाप देखकर वो मित्र पुरानी कहावत अनुसार सीधे चौके मे ही चले आये. तब हमने पूछा कि आपको समस्या क्या है?
हमने पूछ लिया तो वो अंग्रेजी मे आगये. इन बुद्धिजीवी लोगों मे एक ही समस्या ज्यादा बडी होती है कि इनकी बाते सुनो तो ठीक वर्ना ये सीधे अंग्रेजी बोलने पर उतर आते हैं. हिंदुस्थान में किसी को हिंदी भले ही नही आती हो पर अंग्रेजी जरुर आती है. वो कहने लगे -- ताऊ यू आर जस्ट किलिंग द टाईम...हमने बीच मे ही कह दिया - साहब हमको इस बात पर शख्त से भी शख्त ऐतराज है.

वो बोले - क्यों?
हमने कहा - मेरे आका....समय को आज तक समय ही नही मार पाया तो आपकी हमारी क्या औकात? बस साहब को लाल मिर्ची मुंह मे लग गई. शक्कर फ़ांको भाई...महंगी हुई तो क्या हुआ?

हमारा मेगा प्रोजेक्ट ताऊ की शोले का काम बहुत तेजी से चालू होगया है...इसे भी वो साहब लफ़्फ़ाजी ही कहेंगे... तो हमको इस लफ़्फ़ाजी मे रोल निभाने वाले चंद छोटे बडे किरदारों के लिये कलाकारॊ की आवश्यकता है. कुछ नये किरदार भी रचे गये हैं. इच्छुक सज्जन..जिन्हे तथाकथित लफ़्फ़ाजी मे आनंद आता हो वो आडीशन के लिये संपर्क कर सकते हैं.


ताऊ की शोले का प्रकाशन समय अब से मंगलवार शाम ३:३३ बजे का रहेगा.

महंगाई, स्वाईन फ़्ल्यु और जीवन की तमाम विसंगतियों के बीच अगर हमारी लफ़्फ़ाजी किसी के चेहरे पर एक सैकिंड के लिये भी मुस्कान लाती है तो हम ये लफ़्फ़ाजी सारी उम्र करेंगे. बुद्धिजीवियों को उनकी बुद्धिजिवीता मुबारक.

कबीर साहब कह गये हैं कि
कबीरा खडा बाजार मे,
लिये मुराडा हाथ,
जो घर फ़ूंके आपना,
चले हमारे साथ.

उन्होने यह दोहा ईश्वर भक्ति के संदर्भ मे कहा बताते हैं पर हम तो इसे हमारी लफ़्फ़ाजी के लिये ही आदर्श वाक्य मानते हैं.

आपका आने वाला सप्ताह शुभ हो. लफ़्फ़ाजी करते रहें....मुस्कराते रहे.


-ताऊ रामपुरिया


"सलाह उड़नतश्तरी की" -समीर लाल

कभी सोचता हूँ कि हम में कितने लोग स्व-आंकलन के लिए समय निकालते हैं.

हमारा सारा समय इस बात में बीता जाता है कि फलाना ऐसा, फलाना वैसा. उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया.
मगर हम खुद कैसे हैं और हमने क्या किया, इस बात से हम बिल्कुल निष्फिकर रहते हैं.

कितना अच्छा हो अगर हम दिन के २४ घंटो में से अपने खुद के आंकलन में १५ मिनट का समय बितायें. अपने चेहरे से नकाब हटायें और अपना असली चेहरा, कम से कम, खुद के सामने तो लायें. खुद सेशरमाना कैसा और खुद से छिपाना कैसा.

पिछले २४ घंटों की अपनी गतिविधियों के बारे में मनन करें. मैने क्या किया, मैने क्या लिखा. मैने क्या भला किया. मैने क्या बुरा किया. जो मैने किया यदि कोई दूसरा मेरे साथ करता तो मुझे कैसा लगता.क्या जो मैने किया, उससे बेहतर कुछ कर सकता था आदि आदि.

क्या मैं अपने कृत्यों से समाज में, परिवार में, देश में, विश्व में कुछ बेहतर जोड़ रहा हूँ. क्या मेरा कदम सही दिशा में है.

इस आंकलन में खुद के प्रति तो कम से कम एकदम ईमानदार रहें.

आंकलन के दौरान ही तय करें कि अब मुझे अगले २४ घंटो में क्या करना है जो मुझे आज से बेहतर लगे और मैं जब फिर खुद से मिलूँ तो खुद को आज से बेहतर पाऊँ.

आप स्वतः में आये बदलाव को शीघ्र ही अनुभव करेंगे और जल्द ही अपने आपको एक परिवर्तित इंसान पायेंगे, एक बेहतर इंसान. जिसकी सबको जरुरत है, जो सबका चहेता है. जो खुद अपना आपकोचाहेगा.

सभी इस तरह से अगर स्व-आंकलन कर बेहतरी की ओर कदम बढ़ायें तो कल का संसार कितना सुन्दर होगा, जरा सोचिये तो!!

बाकी अगले सप्ताह:

जिन्दगी

किस किस राह से

बहती है

किसने जाना!!

वो

नकाब में

रहती है

किसने जाना!!


-समीर लाल 'समीर'


"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा


दिल्ली का लाल किला -


दिल्ली शहर का सर्वाधिक प्रख्यात पर्यटन स्थल.

भारत की यह ऐतिहासिक इमारत या कहिये धरोहर पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है.और यह युनेस्को विश्व विरासत स्थल में भी चयनित है.लाल पत्थरों से बने होने के कारण इसे लाल किला कहते हैं और यह दुनिया के सर्वाधिक प्रभावशाली भव्‍य महलों में से एक माना जाता है.

भारत का इतिहास भी इस किले के साथ काफी करीब से जुड़ा है, यहीं से ब्रिटिश व्‍यापारियों ने अंतिम मुगल शासक, बहादुर शाह जफर को पद से हटाया था और तीन शताब्दियों से चले आ रहे मुगल शासन का अंत हुआ था. यहीं से भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने घोषणा की थी कि अब भारत उपनिवेशी राज से स्‍वतंत्र है.यही कारण है कि हर साल 'स्वतंत्रता दिवस १५ अगस्त के दिन इसी की प्राचीर से तिरंगा लहराया जाता है.

इस किले के बारे में कौन भारतीय नहीं जानता होगा.थोड़ा सा विस्तार में आज मैं आप को बताती हूँ.
जानते हैं इस के इतिहास के बारे में-

यमुना नदी के किनारे बना लाल किला बादशाह शाहजहाँ की नई राजधानी, शाहजहाँनाबाद का महल था.यह दिल्ली शहर की सातवीं मुस्लिम नगरी थी।

मुगल शासक शाहजहां ने 11 वर्ष तक आगरा से शासन करने के बाद जब तय किया कि राजधानी को दिल्‍ली लाया जाए और तब यहां 16th April 1639 में लाल किले की नींव रखी गई.इसे बनाने में ९ साल क समय और उस समय के एक करोर रुप्ये खर्च हुए बताते हैं.16th April 1648 में इसके उद्घाटन के बाद महल के मुख्‍य कक्ष भारी पर्दों से सजाए गए और चीन से रेशम और टर्की से मखमल ला कर इसकी सजावट की गई थी. लगभग डेढ़ मील के दायरे में यह किला अनियमित अष्‍टभुजाकार आकार में बना है. इसके दो प्रवेश द्वार हैं, लाहौर और दिल्‍ली गेट.

यमुना नदी के कि्नारे स्थित इस किले के निर्माण के बारे में कुछ मतों के अनुसार इसे लालकोट का एक पुरातन किला एवं नगरी बताते हैं, जिसे शाहजहाँ ने कब्जा़ करके यह किला बनवाया था. लालकोट हिन्दु राजा पृथ्वीराज चौहान की बारहवीं सदी के अन्तिम दौर में राजधानी थी.

एक अन्य मत के अनुसार यह किला ’सलीमगढ के किले [ जिसे इस्लाम शाह सूरी ने 1546 में बनवाया था ] का ही विस्तार है.शाह्जहान ने उसी पुराने किले को बस नया रुप दिया.11 मार्च 1783 को, सिखों ने लालकिले में प्रवेश कर दीवान-ए-आम पर कब्जा़ कर लिया.नगर को मुगल वजी़रों ने अपने सिख साथियों को समर्पण कर दिया था. यह कार्य सरदार बघेल सिंह धालीवाल के कमान में हुआ.

कह्ते हैं इस किले के परिसर में ३००० लोग रहा करते थे.1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद, किले को ब्रिटिश सेना के मुख्यालय के रूप में प्रयोग किया जाने लगा . इस सेना ने इसके करीब अस्सी प्रतिशत म्ण्डपों तथा उद्यानों को नष्ट कर दिया और इस परिसर के रिहायशी भाग भी ! इन नष्ट हुए बागों एवं बचे भागों को पुनर्स्थापित करने की योजना सन 1903 में उमैद दानिश द्वारा चलाई गई थी.1947 में स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना ने इस किले का नियंत्रण ले लिया . दिसम्बर 2003 में, भारतीय सेना ने इसे भारतीय पर्यटन प्राधिकारियों को सौंप दिया था.

---और यह बात तो सभी जानते हैं कि इस किले पर दिसम्बर 2000 में लश्कर-ए-तोएबा के आतंकवादियों द्वारा हमला भी हुआ था.

जानते हैं इस किले के बारे में कुछ और--:

यह भी सुनते हैं कि इस किले का परिरूप कुरान में वर्णित स्वर्ग या जन्नत के अनुसार बना है. यहाँ लिखी एक आयत कहती है,’यदि पृथ्वी पर कहीं जन्नत है, तो वो यहीं है, यहीं है, यहीं है’.

बेशक महल की योजना मूलरूप से इस्लामी रूप में है, परंतु प्रत्येक मण्डप अपने वास्तु घटकों में हिन्दू वास्तुकला को प्रकट करता है,वहीं लालकिले का प्रासाद, शाहजहानी शैली का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करता है.

लाल किले में उच्चस्तर की कला एवं विभूषक कार्य दृश्य है, यहाँ की कलाकृतियाँ फारसी, यूरोपीय एवं भारतीय कला संश्लेषण हैं.लाल बलुआ पत्थर की प्राचीर एवं दीवार इसकी चारदीवारी बनाती है जो कि 1.5 मील (2.5 किमी) लम्बी है, और ऊँचाई 60 फीट (16मी) नदी किनारे की ओर से, लेकर 110 फीट (33 मी) ऊँची शहर की ओर , तक है! कह्ते हैं इसके मास्टर प्लान को बनाने वाले अहमद और हमीद ने इसकी योजना एक 82 मी की वर्गाकार ग्रिड (चौखाने) का प्रयोग कर बनाई गई होगी.

जैसा कि पहले मैं लिख चुकी हूं कि इस किले के मुख्य दो द्वार हैं-लाहौर और दिल्‍ली गेट.

1-लाहौर गेट से दर्शक छत्ता चौक में पहुंचते हैं, जो एक समय शाही बाजार हुआ करता था .इसमें दरबारी जौहरी, लघु चित्र बनाने वाले चित्रकार, कालिनों के निर्माता, इनेमल के कामगार, रेशम के बुनकर और विशेष प्रकार के दस्‍तकारों के परिवार रहा करते थे. शाही बाजार से एक सड़क नवाबखाने को जाती है, जहां दिन में पांच बार शाही बैंड बजाया जाता था. यह बैंड मुख्‍य महल में शाही परिवार के प्रवेश का संकेत भी देता था और शाही परिवार के अलावा अन्य सभी अतिथियों को यहां झुक कर जाना होता है.

२-किले का दीवाने खास -

यह निजी मेहमानों के लिए था.शाहजहां के सभी भवनों में सबसे अधिक सजावट वाला 90 X 67 फीट का दीवाने खास सफेद संगमरमर का बना हुआ मंडप है जिसके चारों ओर बारीक तराशे गए खम्‍भे हैं.बेहद खूबसूरत!इनमें सुवर्ण पर्त भी मढी है, तथा बहुमूल्य रत्न जडे़ हैं.इसकी मूल छत को रोगन की गई काष्ठ निर्मित छत से बदल दिया गया है!

कार्नेलियन तथा अन्‍य पत्‍थरों के पच्‍चीकारी मोज़ेक कार्य के फूलों से सजा दीवाने खास एक समय प्रसिद्ध मयूर सिहांसन के लिए भी जाना जाता था, जिसकी कीमत 6 मिलियन स्‍टर्लिंग थी!

लाल किले पर 1739 में फारस के बादशाह नादिर शाह ने हमला किया था और वह अपने साथ यहां से स्वर्ण मयूर सिंहासन ले गया था, जो बाद में ईरानी शहंशाहों का प्रतीक बना [आज भी इरान में है].

३-नक्कारखाना-

लाहौर गेट से छ्त्ता चौक तक आने वाली सड़क से लगे खुले मैदान के पूर्वी ओर नक्कारखाना बना है. यह संगीतज्ञों हेतु बने महल का मुख्य द्वा्र है.

४- दीवान-ए-आम-

इस गेट के पार एक और खुला मैदान है, जो कि दीवाने-ए-आम का आन्गन हुआ करता था। यह जनसाधारण हेतु बना वृहत प्रांगण था, एक अलंकृत सिंहासन का छज्जा दीवान की पूर्वी दीवार के बीचों बीच बना था जो कि बादशाह के लिये बना था.

५- ज़नाना महल-

महल के दो दक्षिणवर्ती प्रासाद महिलाओं हेतु बने हैं, जिन्हें जनाना कहते हैं: मुमताज महल, जो अब संग्रहालय बना हुआ है, एवं रंग महल, जिसमें सुवर्ण मण्डित नक्काशीकृत छतें एवं संगमर्मर के फ़र्श वाले हमाम बने हैं, जिसमें नहर-ए-बहिश्त से जल आता है.

६-शाही हमाम, -जो कि राजसी स्नानागार था, यह तुर्की शैली में बना है. इसमें संगमरमर में मुगल अलंकरण एवं रंगीन पाषाण हैं जो किसी कालीन के होने का आभास देते हैं.

७-मोती मस्जिद

हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद है,यह सन् 1659 में , बनाई गई थी, यह औरंगजे़ब की निजी मस्जिद थी. यह एक छोटी तीन गुम्बद वाली, तराशे हुए सफ़ेद संगमर्मर से बनी है, इसका मुख्य फलक तीन मेहराबों से युक्त है, एवं आंगन में उतरता है.

८-हयात बख़्श बाग-

किले के उत्तर में एक बहुत बडा उद्यान है जिसे ’हयात बख्श बाग" कहते हैं, इसका अर्थ है जीवन दायी उद्यान! यह द्विभाजित है। एक मण्डप उत्तर दक्षिण कुल्या के दोनों छोरों पर स्थित हैंएवं एक तीसरा बाद में अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा 1842 बनवाया गया था. यह दोनों कुल्याओं के मिलन स्थल के केन्द्र में बना है.

९-नहर-ए-बहिश्त-

राजगद्दी के पीछे की ओर शाही निजी कक्ष स्थापित हैं, इस क्षेत्र में, पूर्वी छोर पर ऊँचे चबूतरों पर बने गुम्बददार इमारतों की कतार है, जिनसे यमुना नदी दिखायी देती है. ये मण्डप एक छोटी नहर से जुडे़ हैं, जिसे नहर-ए-बहिश्त कहते हैं, जो सभी कक्षों के मध्य से जाती है, किले के पूर्वोत्तर छोर पर बने शाह बुर्ज पर यमुना से पानी चढा़या जाता है, जहाँ से इस नहर को जल आपूर्ति होती है.

सच में , अपने वैभव काल में यह स्थान कितना मनोरम होता होगा.

आजकल यह किला पर्यट्कों के लिये खुला है या नहीं--मुझे इसकी जानकारी नहीं है.पहले यहां होने वाले रंगारंग कार्यक्रमों की बहुत धूम हुआ करती थी.हर शाम Light and Sound show भी दिखाया जाता था.

इसके साथ यह सफ़र यहीं समाप्त करती हूं.

आप सभी को स्वन्त्रता दिवस की बहुत सारी शुभकामनायें.



“ दुनिया मेरी नजर से” -आशीष खण्डेलवाल




इस मंदिर की और जानकारी इस वेबसाइट से ली जा सकती है।

अगले हफ्ते आपसे फ़िर मिलेंगे.. तब तक के लिए हैपी ब्लॉगिंग.


"मेरी कलम से" -Seema Gupta


लकडी का कटोरा

एक कमजोर बूढ़ा आदमी अपने बेटे, बहु, और एक चार वर्षीय पोते के साथ रहता था. बुढे आदमी के हाथ पैर कांपते थे और दृष्टि भी कमजोर हो चली थी. रात के भोजन के लिए सब लोग टेबल पर एकत्रित हुए. कमजोर दृष्टि और कांपते हाथों ने उस बुढे व्यक्ति के लिए खाना मुश्किल बना दिया. उसकी चम्मच से मटर जमीन पर लुढक गये.

जब उसने दूध का ग्लास उठाया तो वह मेज़पोश पर गिर गया. बेटे और बहू इस गंदगी से नाराज हो गए. "हमे दादा के बारे में कुछ करना चाहिए," बेटे ने कहा.

तो दोनों पति और पत्नी ने कोने में एक छोटी सी मेज निर्धारित की अपने पिता के लिए जबकि परिवार के बाकी लोगो ने खाने की मेज पर रात के भोजन का आनंद लिया वहाँ, दादा ने अकेले खाया.


अपने बुढापे की वजह से उस बुढे व्यक्ति ने कांच के एक दो कटोरी और प्लेट तोड़ दिए थे तो अब उसे खाना लकडी की कटोरी में दिया जाने लगा. कभी कभी जब परिवार दादा की तरफ देखता था, तो अकेले खाना खाते हुए उसकी आँखों में आँसू होते थे . फिर भी, बहु और बेटे के पास उसे चेतावनी देने के सिवा कुछ नही होता था. जब भी वह एक कांटा या खाना गिरा देता था . चार साल का पोता ये सब कुछ चुप्पी में देखा करता था.

एक शाम पिता ने अपने बेटे को लकड़ी के कुछ टुकडों के साथ खेलते देखा , पिता ने प्यार से पूछा - बेटे तुम क्या कर रहे हो ???

बेटे ने प्रतिक्रिया व्यक्त की, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा ना उस वक़्त के लिए खाना खाने के लिए आपके और माँ के लिए एक छोटी कटोरी बना रहा हूँ, बेटा मुस्कुराया और वापस काम पर चला गया.
बेटे के इन शब्दों ने माँ बाप दोनों को अवाक कर डाला और उनकी आँखों से आंसू बहने लगे हालाँकि कोई कुछ नहीं बोला मगर दोनों जानते थे की अब क्या करना है. उसी शाम पिता ने दादा का हाथ पकडा और परिवार के साथ खाने की टेबल पर ले गया. उसके बाद जब तक वह बुढा व्यक्ति जिया उसने अपने परिवार के साथ ही मिल कर खाना खाया और आश्चर्य जनक रूप से दूध गिरने पर खाना बिखरने पर या बर्तन टूटने पर भी बेटे या बहु ने उन्हें कुछ नहीं कहा.

बच्चे उल्लेखनीय रूप से सब कुछ महसूस करते हैं, उनके कान सब कुछ सुनते हैं और आँखे जो देखती हैं वही संदेश उनके दिमाग तक पहुंच कर अपनी प्रकिया देता है. अगर वो घर के बडो को धैर्य पूर्वक खुशनुमा माहोल परिवार के लिये बनाते देखते हैं तो , उनका भी रवैया जीवन के प्रति वैसा ही हो जाता है.

कहानी का नैतिक मूल्य "

बुद्धिमान अभिभावक ही यह एहसास कर पाते है की उनके द्वारा ही हर दिन बच्चे के भविष्य के लिए नीव रखी जा रही है.




"हमारा अनोखा भारत" -सुश्री विनीता यशश्वी


नैनीताल का वर्णन स्कंद पुराण के महेश्वर खंड में त्रिऋषि यानी तीन ऋषि - अत्रि, पुलस्त्य और पुलह के सरोवर के रूप में आता है। कथा है कि ये संत यात्रा करते-करते जब गागर पहाड़ी श्रृंखला की उस चोटी पर पहुंचे जिसे अब चाइना पीक के नाम से जाना जाता है, तो उन्हें प्यास लग गयी। उस स्थान में पानी नहीं था और तीनों ऋषि प्यास से बेहाल थे। तब उन्होंने मानसरोवर का ध्यान किया और जमीन में बड़ा से छेद कर दिया। वह छेद मानस जल से भर गया। इस प्रकार उनके द्वारा सृजित इस झील का नाम त्रिऋषि सरोवर पड़ा।

यह भी मान्यता है कि इस सरोवर में स्नान करने से वही फल प्राप्त होता है जो मानसरोवर में स्नान करने से मिलता है। बाद में इस झील का नाम नैनी झील उस देवी के नाम में पड़ा जिसका मंदिर इस झील के किनारे स्थित है। 1880 के भूस्खलन में यह मंदिर नष्ट हो गया। जिसे फिर दोबारा उस स्थान पर बनाया गया जहां यह इस समय स्थित है।

इस झील के बारे में सर्वप्रथम 1841 के अंत में कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले अखबार

`इंग्लिशमैन´ में छपा था। जिसमें यह लिखा गया था कि - `अल्मोड़ा क्षेत्र में झील की खोज´ इसके बाद बैरन ने`पिलिग्रम´ नाम से `आगरा अखबार´ में इस झील का विवरण दिया गया था। बैरन ने आगे लिखा था कि - वह नैनीताल जाते समय खैरना से होकर गया और लौटा रामनगर के रास्ते से। उसने यह भी लिखा था कि - पहले स्थानीय लोग उसे झील दिखाने से लगातार इंकार करते रहे क्योंकि इस झील का उनके लिये बेहद धार्मिक महत्व था और उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि यहां कोई झील नहीं है। पर बाद में बड़ी मुश्किल से स्थानीय लोग मान गये।
वर्ष 1842 में बैरन फिर यहां वापस आया। इस समय तक करीब आधा दर्जन अर्जियां भवन निर्माण के लिये अधिकारी के पास पहुंची और उस समय के कमिश्नर लुशिंग्टन ने एक छोटा सा भवन बनाने की शुरूआत की। 1842 से पहले इस स्थान में एक झोपड़ी भी नहीं थी। नैनी देवी की पूजा के लिये वर्ष में एक बार आस-पास गांव के लोग यहां इकट्ठा होते थे और एक छोटे से मेले का आयोजन भी होता था। जिसे आज भी नंदादेवी मेला के रूप में मनाया जाता है।

मिस्टर लुशिंग्टन ने ही यहां बाजार, सार्वजनिक भवन और एक सेंट जोन्स गिरजाघर का निर्माण करवाया। मिस्टर बैरन ने इस झील में पहली बार नौका को डाला और झील में नौकायान की शुरूआत की।



"नारीलोक" -प्रेमलता एम. सेमलानी


कारकोलम्ब karakolumbu
हम साउथ इण्डिया के बडे ही लजिज स्वादिष्ट,पोष्टिकता भरे खाने को हमेशा ही पसन्द करते है. जैसा की आप जानते है साउथ इण्डियन फ़ूड मे चावल की उपस्थित्ता अधिक मात्रा मे पाई जाती है.

अमुमन देश के कोने-कोने मे साउथ डीसेज का बोलबाला है- इटली-वडा, डोसा, उत्थपम्म, तो हम खाते ही रहते है. यहा का फ़ेमस सापाड sapad (खाना) खाना हो तो जब भी चन्नैई जाऎ तब नेशनल होटल साहूकार पेठ, एवम माऊन्टरोड,
कोईम्बटूर
मे अन्न्पुरणा होटल मे जरुर तमिल सापाड मगाकर खाऎ. तमिल सापाड मे रोटी नही होती है चावल होते है व अनेक तरह कि सब्जिया होती है.उसमे चावल मिलाकर खाऎ जाते है. जैसे हमारॆ यहा एक चपाती व अनेक सब्जिया होती है.
तो आज हम तमिल सपाड (खाना) मे से एक सब्जी "कार+कोलम"(karakolumbu) कार का अर्थ है मसालेदार, चटपटी, और "कोलम" का अर्थ है सब्जी, तो आज हम बनाकर देखते है.

कारकोलम्ब karakolumbu

सामग्री
आलू 2
प्याज 3
टमाटर 4
सीग (drumstick) 5 piece
लालमिर्च पाऊडर 2 tsp
धनीया पाऊडार 2 tsp
हलदी 1/2 tsp
ईमली 75 ग्राम
कच्चा नारीयल थोडा सा (कदकस किया हूआ)
लहसुन 4 कली
अदरक 1/2 इन्च का टुकडा
नमक स्वादअनुसार.

कारकोलम्ब karakolumbu बनाने की विधी


अब कढाई मे तेल गर्म करे.जीरा- हीन्ग डाले.
अब प्याज के छोटे piece करके तेल मे भूने.
आलू के छोटे piece और सीग के (drumstick) medium piece डालकर भूने.
इन्हे थॊडा पकने दे.
फ़िर टमाटर-लहसुन-अदरक का पेस्ट बनाकर इसमे मिला दे.
अब इसमे ईमली का पानी डाल दे, और पकने दे.
अब सुखा मसाला जो हम बनाकर रखे थे वो डाले, चम्मच से हिलाऎ। अन्त मे पिसा हुआ नारीयल डाले। अब दस-पन्द्रह मिनट तक पकने दे.
अब तैयार है हमारा मसालेदार कारकोलम्ब. गरम गरम चावल के साथ मिलाकर खाऎ या चपाती के साथ, सम्भलकर कही कारकोलम्ब के साथ ऊगली ना चबाले आप!


सुखा मसाला बनाने की विधि


साबूत धनिया 4 tsp,
साबूत लालमिर्च 4-5,
मेथी दाना 15-20 piece,
चना दाल 2 tsp
जीरा 1 tsp
इन सभी सामग्रीयो को बिना तेल के सूखी कढाई मे भुने. बाद मे मिक्सी मे डालकर बरबरा पीस ले.

नोट-: ईमली एवम मिर्च स्वादनुसार ज्यादा या कम कर सकते है


आज हम अपने बालो कि समस्याओ को घरेलू इलाज से निपटेगे।



बालो का समय से पहले सफेद होना

एक चम्मच ऑवला चूर्ण दो घूट पानी के योग से सोते समय अन्तिम वस्तु के रुप मे ले। असमय बाल सफेद होने और चेहरे की कान्ति नष्ट होने पर जादू का सा असर करता है। ( साथ ही आपके स्वर को मधुर और शुद्ध बनता है)
सुखे ऑवला के चूर्ण को पानी के साथ लेई बनाकर इसका सिर पर लेप करने तथा पॉच से दस मिनट बाद केशो को जल से धो लेने से बाल सफेद होने और गिरने बन्द हो जाते है। सप्ताह मे दो बार तीन मास तक यह प्रयोग करके देखे।

बालो का गिरना

केशो के झडने या टुटने पर सिर मे निम्बू के रस मे दो गुना नारियल तेल मिलाकर उगलियो की अग्रिम पोरो से आहिस्ता-आहिस्ता केशो की जडो मे मालिश करने से आपके केश झडने बन्द हो जाऍगे, इससे बालो से सम्बन्धित सभी रोग भी दूर हो जाएगे।

सिर मे रुसी

नारीयल तेल 100 ग्राम, कपुर 4 ग्राम, दोनो मिलाकर शीशी मे रख ले। दिन मे दो बार स्नान के बाद केश सूख जाने पर और रात मे सोने से पहले सिर पर खूब मालिश करे। दूसरे ही दिन से रुसी(सफेद पतली भूसी की तरह) मे लाभ प्रतित होगा।

जाते जाते...................

गीत तो थे हम स्वर नही दे पाये,
प्रशन तो थे,हम उत्तर नही दे पाये।
परिन्दो के विचारो का क्या दोष ?
हम ही उन्हे उडने का अवसर नही दे पाये॥

अब मुझे आज्ञा दीजिए अगले सप्ताह अल्पनाजी के सुझाव पर कम समय मे बनने बाले नास्ते की रेसिपि के साथ मिलेगे तब तक नमस्कार!

प्रेमलता एम सेमलानी


सहायक संपादक हीरामन मनोरंजक टिपणियां के साथ.
"मैं हूं हीरामन"

 

अरे हीरू..क्या कर रिया हे यार?

अबे क्या तेरे को बुखार चढ गिया? जो चिल्लाये जा रिया हे पेलवान?

अरे भिया नाराज क्युं हो रिये हो? ये देखो अपने वकील साहब की नजरें आजकल उल्टी सीधी जगह जाकर टिक रही हैं.

ला दिखा पेलवान मुझको जरा जल्दी से……ले देख ले.

 

 Blogger दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सलींम चिश्ती की दरगाह से चले निजामुद्दीन औलिया के दरबार में पहुँचे। अमीर खुसरो से मिले। आगे फिर लाल किला आ पहुँचे। वहाँ बहुत सी इमारतें देखीं। शीशमहल देखा तब जा कर रंगमहल पर निगाहें टिकीं।

August 15, 2009 6:05 PM

Anonymous रंजन said...

ताऊ आज लेट हो गये.. वरना हमने तो कल ही सोच रखा था की आज की पहेली क्या होने वाली ऐ और सही जबाब क्या होगा..:)
राम राम

August 15, 2009 2:39 PM

 Blogger दीपक "तिवारी साहब" said...

रामप्यारी जी आपको क्या सुरैया से गाना गवाना है ताऊ की शोले मे..जो पहेली मे उनको याद कर रही हो?

August 15, 2009 9:28 AM



ट्रेलर : - इस सप्ताह ताऊ के साथ तीन पांच कर रहे हैं श्री संजय बैंगाणी
"ट्रेलर"


गुरुवार शाम को ३: ३३ पर ताऊ के साथ तीन पांच करेंगे श्री संजय बैंगाणी....पढना ना भुलियेगा.

ताऊ : कल रात को आपने कौन सी सब्जी खायी थी?

संजय बैंगाणी : आज सुबह की सब्जी भी याद नहीं.

ताऊ : धर्मपत्नि से आखिरी बार डांट कब खायी थी?

संजय बैंगाणी : रोज रोज होने वाली बाते कौन याद रखे?

याद रखिये गुरुवार शाम ३ : ३३ ताऊ डाट इन पर






अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.

संपादक मंडल :-
मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया
वरिष्ठ संपादक : समीर लाल "समीर"
विशेष संपादक : अल्पना वर्मा
संपादक (तकनीकी) : आशीष खण्डेलवाल
संपादक (प्रबंधन) : Seema Gupta
संस्कृति संपादक : विनीता यशश्वी
सहायक संपादक : मिस. रामप्यारी, बीनू फ़िरंगी एवम हीरामन
स्तम्भकार :-
"नारीलोक" - प्रेमलता एम. सेमलानी