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ताऊ को शेर की सीख

जैसा कि आप जानते हैं ताऊ के पास कुछ रोजगार धंधा तो था नही. उपर से लाला का और भाटिया जी का तगादा. बेचारा ताऊ घणा परेशान. बीबी बच्चे भी रोटी और कुल्फ़ी  को मोहताज. और सबसे ज्यादा परेशान रामप्यारी. क्योंकि रामप्यारी को और कुछ मिले ना मिले, पर चाकलेट तो चाहिये ही.ताऊ को किसी ने सलाह दे दी कि पास के जंगल से लकडी काट कर लाया करो और बेच कर अपनी घर गृहस्थी चलाओ. ताऊ को बात जम गई और ताऊ पहुंच गया पास के जंगल में.

 

man-with-lion वहां एक खतरनाक शेर रहता था. उसके डर से वहां कोई भी नही जाता था. जैसे ही उस शेर ने ताऊ को देखा – शेर गुर्राया और त्योरियां चढाली. और गर्ज कर पूछा – क्यों बे? तू यहां आया कैसे? तेरी हिम्मत कैसे हुई ? क्या जीने  से तेरा पेट भर गया है?

 

ताउ ने शेर की गरज भरी आवाज सुनी और उसके तो होश गुम हो गये. वो बोला – माई बाप, जान बख्शी जाये हमारी… मैं कर्जदारों से बहुत तंग हूं..भाटिया जी और गाम के सेठ ने मेरा जीना हराम कर रखा है हुजुर…उन दोनों का सताया हुआ ही आया हूं यहां  तक.

 

 

ताऊ और आगे बोला -- आपके राज मे मुझसे बहुत बेइन्साफ़ी हो रही है. मेरे छोटे २ बच्चे हैं… भूख से बिलबिलाते ..अगर आपकी आज्ञा हो तो रोज कुछ लकडियां ले जाया करूं..बच्चों का गुजर बसर हो जायेगा..आपको दुआ देंगे  हुजुर…

 

पता नही शेर पर ताऊ की बातों का क्या असर हुआ कि वो बोला – हां तो तेरा क्या नाम है? हां याद आया ताऊ…तू एक काम कर चुपचाप आकर लकडियां ले जाया कर..पर एक बात का ध्यान रखना कि सिर्फ़ सूखी लकडियां ही काटना..अगर किसी हरे पेड को हाथ भी लगा दिया तो फ़िर मुझसे बुरा कोई नही होगा. किसी और को ये बात बताना मत.

 

 

अब ताऊ रोज आता और सूखी लकडियां काट कर ले जाता. आप जानते ही हैं कि ताऊ मेहनती तो बहुत है..बस उसकी तो किस्मत ही साथ नही देती…सो मेहनत करने से उसका यह काम चल निकला.  गुजर बसर भी होने लगा और कुछ रुपये भाटियाजी को वापस भी चुकाने लग गया.

 

लोगो को जब मालूम पडा कि ताऊ शेर वाले जंगल से लकडियां काट कर लाता है तो लोग ताज्जुब करने लगे कि इतने खतरनाक शेर के जंगल से ताऊ लकडियां लाता है सो ताऊ कोई बहुत ही बहादुर आदमी होगा.

 

तऊ भी अपनी प्रसंशा सुनकर फ़ूल कर कुप्पा हो जाता था..धीरे २ ताऊ ने भी ऊंची नीची शूरमा भोपाली वाली स्टाइल मे देनी शुरु कर दी. झूंठी तारीफ़ मे यही होता है कि आदमी अपनी औकात भूल जाता है सो ताऊ भी भूल गया.

 

अब वो लोगों से कहने लगा कि अरे यार वो कोई शेर थोडे ही है..वो तो गीदड है..बस मैं जब जंगल मे जाता हूं ..तो जाते ही मेरे लिये हुक्का भर कर ला देता है और जब तक मैं हुक्का पीता हूं  डर के मारे खुद ही तब तक  लकडियां काट कर बांध देता है..

 

ताऊ की कमाई भी हो रही थी..और गाम मे रुतबा भी बिल्कुल शेरखान वाला हो रहा था. ताऊ की बहादुरी के किस्से भी दूर दूर तक पहुंचने लगे.

 

धीरे २ ये बात जंगल मे शेर तक पहुंची कि ताऊ तो तुझको गीदड बताता है. एक दिन जैसे ही ताऊ जंगल मे गया..शेर ने पकड लिया..और जोर से गुर्राया..बोला- क्यों बे,  मैं गीदड हूं? तेरी चिलम भरता हूं?

 

ताऊ समझ गया कि  कोई चुगलखोर दिलजला पहुंच गया, और आज जान गई. सो शेर के पांवों मे गिर पडा..बोला – माई बाप..गलती हो गई..एक बार और जान बख्शी जाये. आज के बाद फ़िर कभी नही होगी ऐसी गल्ती.

 

शेर दहाडते हुये बोला – खामोश ताऊ के बच्चे…ला तेरी कुल्हाडी ला ..और मेरी पीठ पर मार..ताऊ बोला – हुजुर क्या जुल्म करते हैं? मेरी क्या औकात ? जो आपकी पीठ पर कुल्हाडी मारूं. ? हुजुर गुस्सा थूक दिजिये.

 

शेर बोला – ताऊ तू मेरी पीठ मे कुल्हाडी मार ..वर्ना मैं तुझे अभी चीरफ़ाड के रख देता हूं..डर के मारे कांपते हाथों से ताऊ ने एक हल्का सा वार कुल्हाडी का शेर की पीठ पर किया.

 

शेर की पीठ से खून बहने लगा..अब शेर बोला – ठीक है..अब सात दिन बाद मिलेंगे. इसके बाद ताऊ से उस शेर की मुलाकात सात दिन बाद हुई.

 

मिलते ही शेर ने ताऊ को अपनी पीठ दिखाई और बोला – ताऊ देखो जरा मेरी पीठ का घाव कैसा है? ताऊ ने पीठ देखी और बोला – हुजूर..घाव तो एक दम भर चुका है. कहीं निशान भी नही दिख रहा है.

 

शेर बोला – देखा ताऊ, तुम्हारी कुल्हाडी का घाव सात दिन मे ही भर गया. पर तुम्हारी बोली का घाव अभी तक भी हरा है.कडवी जबान के घाव कभी नही भरते, हथियारों के भर जाते हैं. मैने तुम्हे क्षमा कर दिया है, पर भविष्य मे इस बात को ध्यान रखना.

 

बोली मे ही सब कुछ है. बोली मे ही अमृत और बोली मे ही जहर है. मीठा बोलो.और आराम से अपना गुजर बसर करो. और यह कर शेर जंगल के अंदर चला गया.

 

 

ऐ बुद्धिवालों तुम रहो  अपनी   बुद्धि से त्रस्त

ताऊ तो रहता है अपनी ताऊगिरि में मस्त.

 

 

अभी पिछले सप्ताह हमारे यहां एक मुशायरा हुआ. एक नामी शायर हैं, नाम अभी भूल गया हूं क्योंकि ताऊ हूं. इसलिये भूलुंगा ही. भूलना ताऊ होने के लिये एक शर्त है. उन्होने एक शेर पढा..

 

तुझे करीना   नही मिल   सकती ऐ दोस्त

क्युंकि   तू   जयसुर्या है    सैफ़ खान   नही.

 

 

हमने इसे यूं कहा :-

 

तुझे जन्नत नही मिलेगी ऐ ताऊ

क्योंकि तू मसखरा है, बुद्धिजीवी नही.

 

बुद्धि वालों को उनकी जन्नत मुबारक और हमे अपने भतिजे भतिजियों के साथ मसखरा होना मुबारक.

 

इब रामराम भाई.

 

 

 


इब खूंटे पै पढो :-

ताऊ ने शेर के डर के मारे जंगल जाना छोड दिया. अब एक नया धंधा पकड लिया.
अब ताऊ को किसी ने बताया कि ताऊ कुल्फ़ी बेचने का काम करले. बहुत मुनाफ़े का    
काम है. ताऊ को बात जंच गई.

पर ताऊ सीधे से कोई काम करना जानता ही नही है. उसे तो हर काम अपने तरीके से करने मे ही मजा आता है. सो घर का बढिया भैंस वाला दूध लेकर और उसकी कुल्फ़ी
बनवा कर अपने ठेले पर रखी और रामप्यारी को हाथ मे घंटी (बजाने वाली) पकडा
कर ठेले पर कुल्फ़ी की मटकी के बराबर बैठा दिया.

अब ताऊ गलियों मे ठेला धका रहा था. और रामप्यारी जोर जोर से घंटी बजा रही थी.
और ताऊ आवाज लगा रहा था….ले लो..कुल्फ़ी..ये ताजी और गर्मा गर्म  कुल्फ़ी..

चले आवो..गरमा गरम कुल्फ़ी .
.और रामप्यारी बिल्कुल ताल मे घंटी बजा रही थी.


लोग चौंके पर ताऊ के कौन मुंह लगे?  थोडी देर बाद भाटिया जी आये और ताऊ को
रोक कर पूछा – अरे बावली बूच ताऊ..तेरी कुल्फ़ी कौन खरीदेगा ? बेवकूफ़ कहीं के..
कुल्फ़ी भी कहीं गर्म होती है क्या ?

ताऊ बोला – अरे भाटिया साहब..मेरे को एक बात बताओगे ?

भाटिया जी : भई ताऊ बात तो तू एक छोडकै दस बूझ ले..बस पिस्से उधार मत मांग.

ताऊ बोला – मुझे ये बताओ जब बिना मास्टरों के स्कूळ चल सकते  है?..जब डाक्टर
अपने औजार मरीज के पेट मे भूल सकते  हैं?..सडक, बांध और पुल कागजों पर बन सकते हैं?…अंगुठा छाप नेता बन सकते हैं?… कुछ लोग बुद्धिजिवी होने का ढोंग रच
सकते हैं? ..तो मेरी कुल्फ़ी गर्मागरम क्यों नही हो सकती ?


चल बेटा रामप्यारी…घंटी बजा..कुल्फ़ी..गरमा गरम कुल्फ़ी…लेलो जी ..

और ताऊ ने अपना ठेला आगे बढा लिया.. भाटिया जी देखते रह गये.