प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के 18 वें अंक मे स्वागत है.
राऊंड दो के आठवें अंक की पहेली का सही जवाब बडा इमामबाडा लखनऊ था. जिसके बारे मे आज के अंक मे विशेष जानकारी दे रही हैं सुश्री अल्पना वर्मा.
आजकल चुनाव का मौसम है. अधिकतर लोग चुनाव कार्य मे किसी ना किसी रुप मे व्यस्त हैं. हम भी इस लोकतंत्र के यज्ञ में अपने मताधिकार का अवश्य प्रयोग करें.
अक्सर ऐसा सोच लिया जाता है कि मेरे एक अकेले वोट से क्या होगा? तो यह मत भूलिये कि छोटी वस्तुओं का समूह भी कार्यसाधक हो सकता है जिस तरह तिनकों की बनी रस्सी से मतवाले हाथी भी बांध लिये जाते हैं.
खैर दोस्तों ..सब अपनी मर्जी के मालिक हैं पर याद रखिये कि सबको मर्जी का मालिक भी इसी लोकतंत्र ने ही बनाया है. अत: इसकी परम्पराओं और मर्यादाओं का पालन करना हमारी आजादी के लिये नितांत जरुरी है.
पानी की बडी किल्लत हो गई है. पर क्या किया जा सकता है? हमने ही जो वृक्ष काटने के गुनाह किये हैं उनका ही नतीजा है. आगे पीछे करनी का फ़ल तो भोगना ही पडता है.
नल में पानी की एक भी
बूंद नही आती थी
मजबूर प्रेमी प्रेमिका
आखिर जान से हाथ धो बैठे.
आइये अब चलते हैं सु अल्पनाजी के “मेरा पन्ना” की और:-
-ताऊ रामपुरिया
उत्तर प्रदेश भारत के उत्तर में जनसँख्या की हिसाब से सब से बड़ा प्रदेश है उत्तर प्रदेश.उत्तर प्रदेश का ज्ञात इतिहास लगभग ४००० वर्ष पुराना है,जब आर्यों ने अपना पहला कदम इस जगह पर रखा तब वेदिक सभ्यता का उत्तर प्रदेश मे जन्म हुआ.इन्ही आर्यों के नाम पर भारत देश का नाम आर्यावर्त या भारतवर्ष पड़ा था.[भरत आर्यों के एक प्रमुख राजा थे].
मथुरा शहर में जन्मे थे भगवान कृष्ण और भगवान राम" का प्राचीन राज्य कौशल इसी क्षेत्र में था.संसार के प्राचीनतम शहरों में एक माना जाने वाला वाराणसी शहर भी यहीं है.
लखनऊ उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी, लखनऊ एक आधुनिक शहर है.गंगा नदी की सहायक नदी, गोमती के किनारे बसा लखनऊ शहर अपने उद्यानों, बागीचों और अनोखी वास्तुकलात्मक इमारतों के लिए जाना जाता है.यह नवाबों के शहर के नाम से भी मशहूर है .लखनऊ शहर में सांस्कृतिक और पाक कला के विभिन्न व्यंजनों से भी जाना जाता है.
यहाँ के लोग अपनी तहजीब ,खूबसूरत उद्यानों, कविता, संगीत, के लिए भी प्रसिद्ध है.यहाँ की चिकन की कढाई वाले परिधान और चीनी - मिटटी के बर्तन तो आप सब ने सराहे ही हैं. यह बहु सांस्कृतिक शहर ऐतिहासिक रूप से 'अवध क्षेत्र 'के नाम से जाना जाता था. प्राचीन इतिहास अनुसार लखनऊ में प्राचीन कोशल राज्य का हिस्सा था. श्री राम ने अपने भाई लक्ष्मण को दे दिया इसलिए इसे लक्ष्मणपुर या लखनपुर के नाम से जाना गया,कुछ कहते हैं की इस शहर का नाम, 'लखन अहीर' जो कि 'लखन किले' के मुख्य कलाकार थे, के नाम पर रखा गया था.अंग्रेज कहते थे-Lucknow is--Luck-now- उन के लिए यह भाग्यशाली जगह रही थी. देखने के लिए जगह-: १-घंटाघर -यह भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है। २-रूमी दरवाजा नवाब आसफउद्दौला ने यह दरवाजा 1783 ई. में रूमी दरवाजे का निर्माण भी अकाल के दौरान बनवाया था ताकि लोगों को रोजगार मिल सके। ३-सआदत अली और खुर्शीद जैदी का मकबरा -अवध वास्तुकला का शानदार उदाहरण हैं. ४-रेज़ीडेंसी -लखनऊ रेजिडेन्सी सिपाही विद्रोह के समय ईस्ट इंडिया कम्पनी के एजेन्ट का भवन था. ५-जामी मस्जिद-इस मस्जिद का निर्माण मोहम्मद शाह ने शुरू किया था लेकिन 1840 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने इसे पूरा करवाया. ६-छोटा या हुसैनाबाद इमामबाड़ा-इसका निर्माण मोहम्मद अली शाह ने करवाया था. ७-बनारसी बाग--यह एक चिड़ियाघर है. ८-पिक्चर गैलरी -19वीं शताब्दी में बनी इस गैलरी में सभी नवाबों की तस्वीरें देखी जा सकती हैं.कुछ तस्वीरें ३डी हैं. ९-मोती महल -सआदत अली का बनवाई ,गोमती नदी के किनारे तीन इमारतों में मोती महल प्रमुख है. १०-शहीद स्मारक-गोमती की किनारे है. ११-निम्बू पार्क,हाथी पार्क आदि.- १२-बोटानिकल गार्डन. ,चाइना हट आदि. १३--और ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाली सब से महत्वपूर्ण जगह है--बड़ा इमामबारा. बड़ा इमामबाड़ा:_-
इस इमामबाड़े का निर्माण नवाब आसफउद्दौला ने 1784 में अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत करवाया था,यह विशाल गुम्बदनुमा हॉल 50 मीटर लंबा और 16 मीटर ऊंचा है। इसके संकल्पना कार थे किफायत - उल्ला, जो ताजमहल के वास्तुकार के संबंधी कह जाते हैं.इस संरचना में गोथिक प्रभाव के साथ राजपूत और मुगल वास्तुकलाओं का मिश्रण दिखाई देता है।
बाड़ा इमामबाड़ा एक रोचक भवन है। यह न तो मस्जिद है और न ही मकबरा, किन्तु इस विशाल भवन में कई मनोरंजक तत्व अंदर निर्मित हैं। कक्षों का निर्माण और वॉल्ट के उपयोग में सशक्त इस्लामी प्रभाव दिखाई देता है। यह हॉल लकड़ी, लोहे या पत्थर के बीम के बाहरी सहारे के बिना खड़ी विश्व की अपने आप में सबसे बड़ी रचना है।
इसकी छत को किसी बीम या गर्डर के उपयोग के बिना ईंटों को आपस में जोड़ कर खड़ा किया गया है। अत: इसे वास्तुकला की एक अद्भुत उपलब्धि के रूप में देखा जाता है। इस भवन में तीन विशाल कक्ष हैं, इसकी दीवारों के बीच छुपे हुए लम्बे गलियारे हैं, जो लगभग 20 फीट मोटी हैं। यह घनी, गहरी रचना भूलभुलैया कहलाती है, इसमें 1000 से अधिक छोटे छोटे रास्तों का जाल है जिनमें से कुछ के सिरे बंद हैं और कुछ प्रपाती बूंदों में समाप्त होते हैं, जबकि कुछ अन्य प्रवेश या बाहर निकलने के बिन्दुओं पर समाप्त होते हैं।
इस भूल भुलय्या में जाने के लिए एक अनुमोदित मार्गदर्शक की सहायता लेनी चाहिये| इस इमामबाडे में 5 मंजिला एक गहरी बावली भी है,जो गोमती नदी से जुड़ी है.इसमें पानी से ऊपर केवल दो मंजिलें हैं, शेष तल पानी के अंदर पूरे साल डूबे रहते हैं। इस इमामबाड़े में एक आसफी मस्जिद भी है.मस्जिद परिसर के आंगन में दो ऊंची मीनारें हैं. आसफी या बड़े इमामबाडे के बारे में कुछ और जानकारी श्री प्रकाश गोविन्द जी के द्वारा –: आठवीं एवं नवीं मोहर्रम को इस इमामबाडे में रोशनी की जाती है ! इमामबाडे का प्रकाश और आग का मातम देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं !
कहा जाता है कि इमामबाडे की मोटी-मोटी दीवारों और मेहराबों के पाये भी कुछ खुले हैं, इनमें भी भूलभुलैया का कुछ भाग है ! इसी प्रकार फर्श के नीचे तहखाना और टेढे-मेढ़े मार्ग हैं ! इनमें जो भी व्यक्ति गया वह वापस नहीं आया ! इसी कारण ब्रिटिश काल में इसको बंद कर दिया गया ! दुर्भाग्यवश भुलभुलय्या का नक्शा मौजूद नहीं है ! अगर नक्शा होता तो इमामबाड़े की भूल-भुलैया का रहस्य खुलता और भूमिगत सुरंगों का पता चलता ! इमामबाड़े के निर्माण कार्य पर खर्च होने वाला धन उस समय का डेढ़ करोंड रुपये आँका गया है ! कार्यरत श्रमिकों की संख्या 22000 बतायी जाती है !
कैसे जाएँ-
रेलमार्ग -लखनऊ जंक्शन भारत के प्रमुख शहरों से अनेक रेलगाड़ियों के माध्यम से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से लखनऊ मेल और शताब्दी एक्सप्रेस, मुम्बई से पुष्पक एक्सप्रेस, कोलकाता से दून और अमृतसर एक्सप्रेस के माध्यम से लखनऊ पहुंचा जा सकता है।
सड़क मार्ग -राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से दिल्ली से सीधे लखनऊ पहुंचा जा सकता है। लखनऊ का राष्ट्रीय राजमार्ग 2 दिल्ली को आगरा, इलाहाबाद, वाराणसी और कानपुर के रास्ते कोलकाता को जोडता है.
[राम आसरे के कचोडी -आलू ,बेकरी हट की पेस्ट्री मुझे अब भी याद हैं.]
अच्छा अब अगले सप्ताह फ़िर मिलते हैं, तब तक के लिये अलविदा. -अल्पना वर्मा ( विशेष संपादक ) |
क्या यह सबसे लंबा इंसान है?
इस इंसान को देखिए। इसका कद है आठ फीट और यह दुनिया का सबसे लंबा व्यक्ति बनने जा रहा है। कमाल की बात यह है कि इसे पता ही नहीं था कि यह इतना लंबा है कि इसका नाम गिनीज बुक में शुमार हो सकता है।
चीन के झाओ लियांग 27 साल के हैं। हाल ही बास्केटबॉल प्रशिक्षण के दौरान लगी चोट के बाद उन्हें अस्पताल में ऑपरेशन कराना पड़ा। उस वक्त जब अस्पताल के कर्मचारियों ने जब उनकी माप ली, तो वे ्छादंग रह गए। लियांग का कद 8.07 फीट (2.46 मीटर) है। गौरतलब है कि फिलहाल गिनीज बुक में सबसे लंबे व्यक्ति के रूप में बाओ जिशुन का नाम दर्ज है, जिनका कद केवल 7.9 फीट है।
लियांग की मां वांग केयुन का कहना है कि उसे बहुत भूख लगती है। वह एक बार में तीन आदमियों के बराबर भोजन करता है। वांग को बहू को लेकर बड़ी चिंता है, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि इतने लंबे लड़के से कौन शादी करेगा? हालांकि इतने लंबे कद की वजह से उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कोई परेशानी नहीं है। गिनीज बुक के अधिकारी अब इस दावे की पुष्टि करने की कवायद में लग गए हैं और उम्मीद है कि लियांग अब सबसे लंबे जीवित व्यक्ति के रूप में जाने जाएंगे।
अच्छा अब इजाजत दिजिये. आपका सप्ताह शुभ हो. -आशीष खण्डेलवाल ( तकनीकी संपादक ) |
एक ज्ञानी संत,अपने शिष्यों के साथ बैठे सत्संग कर रहे थे. संत ने अपने शिष्यों से पूछा :- क्या आप लोग जानते हैं कि 'हम गुस्से में इतना क्यों चिल्लाते हैं? क्यों लोग एक दूसरे पर जोर से चिल्लाते हैं?
चेलो ने अपने अपने हिसाब से अनेक जवाब दिये. मगर संत को संतुष्ट नहीं कर सके.
फिर संत ने दुबारा पूछा : क्या आप बता सकते हैं कि जब दो लोगों में प्यार हो जाता है ? तब वो एक दूसरे पर चिल्लाते नहीं अपितु धीरे, और कोमलता से बात करते हैं क्यों?
अब शिष्यों ने आश्चर्य से पूछा : क्यों गुरुदेव?
संत बोले - क्योंकि प्यार मे उनके दिल बहुत करीब गये हैं. उनके बीच की दूरी बहुत छोटी है ...अब उनको चिलाकर बात करने की जरुरत ही नही रह गई है.
संत बोले : इस दशा मे वे बोलते नहीं केवल बुदबुदाते है और एक दुसरे के दिल के और भी करीब होते जाते हैं. और अंत में उन्हें धीरे धीरे बोलने की भी ज़रूरत नहीं है, वे केवल एक दूसरे को देखते है और एक दुसरे की बात समझ जाते हैं .
तो प्यार मे लोग इतने करीब हो जाते हैं की बिना बोले भी सब समझ जाते हैं. यानि मौन की भाषा भी समझ आने लगती है.
जब कभी आप किसी से बहस करते है इतनी न करे की दिलो मे दुरिया बढ जाये. और ऐसे अपमान जनक शब्दों का इस्तेमाल ना करें की ये दूरियां उस हद तक पहुंच जाएँ जहाँ से वापस आने का कोई रास्ता ही न मिले.
अच्छा तो अब अगले सप्ताह फ़िर मिलते हैं, तब तक के लिये अलविदा. -Seema Gupta संपादक (प्रबंधन) |
हमारी अतिथि संपादक सुश्री विनीता यशश्वी अल्मोडा के दशहरे के बारे मे सचित्र जानकारी दे रही हैं । आईये अब उनसे जानते हैं अल्मोडा के दशहरे के बारे में. नमस्कार, आज मैं आपको अल्मोडा के दशहरे के बारे में बताती हूं.
अल्मोड़ा कुमाऊँ का ऐसा शहर है जहाँ कुमाउंनी संस्कृति का अच्छा मुजाहरा होता है। अल्मोड़ा में दशहरा मनाने का एक अलग ही अंदाज है। वहाँ दशहरा मनाने के लिये अलग -अलग मुहल्लों में रावण से संबंधित सभी राक्षसों के पुतले बनाये जाते हैं।
जिन्हें करीब एक-डेढ़ महीने पहले से बनाना शुरू कर दिया जाता है और दशमी के दिन सुबह सभी मुहल्ले वाले अपने-अपने पुतलों को अपने मुहल्ले के आगे खड़ा कर देते हैं।
दिन के समय सभी पुतलों को एक स्थान पर एकत्रित किया जाता है और शाम को सभी पुतलों की परेड अल्मोड़ा बाजार से निकाली जाती है। इस परेड में लगभग डेढ़ दर्जन पुतले शामिल होते हैं जिन्हें भव्य आयोजन के दौरान अल्मोड़ा स्टेडियम में रात के समय जलाया जाता है।
ऎसा माना जाता है कि अल्मोडा में इस मेले की शुरुआत सन १९०३ से हुई। इस आयोजन में हिन्दु-मुस्लिम सभी आपस में मिलजुल के काम करते हैं। कुछ मुहल्ले तो ऐसे भी हैं जहाँ इन कमेटियों के अध्यक्ष भी मुसलमान हैं और वो पूरे हिन्दू अनुष्ठान के तहत इस आयोजन को सफल बनाने के लिये जुटे रहते हैं।
पहले इन पुतलों की लम्बाई बहुत ही ज्यादा होती थी पर अब थोड़ी कम हो गई है। इन पुतलों में बच्चे भी अपने पुतले बनाते हैं और उन्हें परेड में शामिल करते हैं। अल्मोड़ा में इस दशहरे को देखने के लिये दूर-दूर से लोग आते हैं और अल्मोड़ा के लोगों को तो इसका इंतजार रहता ही है। देर रात तक भी सब इस परेड को देखने के लिये इंतजार करते रहते हैं।
इस दौरान मां दुर्गा की मूर्तियां भी बनाई जाती हैं। इन मूर्तियों को मुहल्लेवार ही बनाया जाता है। जो भी मुहल्ले वाले अपने मुहल्ले की दुर्गा बनाना चाहते हैं। अपने मुहल्ले में इसका आयोजन करते हैं और दशमी के दिन पूरे शहर में इन मूर्तियों को घुमा के अल्मोड़ा के निकट क्वारब में इन मूर्तियों का विसर्जन कर दिया जाता है।
अच्छा अब इजाजत दिजिये.
अतिथि संपादक
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आईये आपको मिलवाते हैं हमारे सहायक संपादक हीरामन से. जो अति मनोरंजक टिपणियां छांट कर लाये हैं आपके लिये.
मैं हूं हीरामन
राम राम ! सभी भाईयों और बहनों को.
आज के प्रथम विदूषक का खिताब जाता है श्री नीरज गोस्वामी जी को
April 18, 2009 9:53 AM भाई ताऊ ऐ के कर दिया तमने...सुभा सुभा दिमाग में घमासान चलन लाग री है... घणी जोर की... पूछो क्यूँ...न भी पूछो तो भी बताऊंगा ही...ताऊ एक दिमाग के रया की ये डीग के महल हैं जो भरत पुर के पास है... दूसरा दिमाग इसे लखनऊ का बड़ा इमामबाडा बता रया है...के करूँ...
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द्वितिय स्थान पर हैं :
April 18, 2009 2:18 PM रामप्यारी ये तूने क्या कर दिया ?...मुझे तो दोनों में से कोई भी जवाब नहीं आता था पर ये कैसा क्लू है...तुमने तो क्लू के नाम पर एक पर्चा ही लीक कर दिया..मसीही छायावती न..न..न.. मायावती के राज में मुग़लिया वास्तुकला का ये गम जाने वाला नमूना लखनऊ के इमामबाड़े के अलावा और क्या हो सकता है..., बोनस सवाल भी लीक कर दो न, देखी जायेगी ... मेरी ओर से ढेर सारी चाकलेट (और ताऊ की ओर से डंडा..) और हाँ, एक बात और...तुमने पूछा था कि मुझे कार्टूनों के ऐसे ऐसे आइडिये कहाँ से आते हैं तो, तुम्हारी इस, केवल मेरे लिए प्रायोजित विशेष पहेली का जवाब बस इतना सा है कि मैं भी तुम्हारी ही तरह थोड़ा सा शरारती हूँ इसीलिए मुझे भी ऐसी बदमाशियां सूझती रहती हैं .-:)
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और तृतिय स्थान पर हैं:
April 18, 2009 4:49 PM ताऊ
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और आज का चौथा स्थान जाता है :
April 18, 2009 6:44 AM रामप्यारी तेरे हिंदी वाले सवाल का क्या जबाब दे ताऊ की पहेली का जबाब खोजने में इतना दिमाग खर्च हो गया कि तेरे सवाल का जबाब देने के लिए कुछ बचा ही नहीं ! |
ट्रेलर : - पढिये : गुरुवार ता : २३ अप्रेल २००९ को महाताऊ गौतम राजरिशी से अंतरंग बातचीत
अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.
संपादक मंडल :- मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया
विशेष संपादक : अल्पना वर्मा
संपादक (प्रबंधन) : Seema Gupta
संपादक (तकनीकी) : आशीष खण्डेलवाल
अतिथि संपादक : विनीता यशश्वी
सहायक संपादक : बीनू फ़िरंगी एवम मिस. रामप्यारी





