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आई लव यू थ्री ..!

ताऊ लद्दा को भैंस चराते चराते अग्रेंजी बोलने का शौक
चढ गया । और ताऊ को ठीक से हिन्दी भी नही
बोलनी आवै थी । पर क्या हो सकता है ? ताऊ कै दिमाग
मे आ गयी, तो आ गयी । बहुत दिन तो घर पर ही
प्रेक्टिस करता रहा, पर बात बणी नही । और ताऊ नै
ये पक्का इरादा कर लिया कि अग्रेंजी बोलना सीख के रहेगा ।
ताऊ बडा उदास हो रहा था । फ़िर किसी ने उसको बताया कि
पडोस के मोहल्ले मे एक मास्टरनी जी अग्रेंजी की क्लास
लेती है और बहुत जल्दी अग्रेंजी सिखा देती है । सो मेरा मट्टा,
ताऊ तो मास्टरनी के पास पहुंच लिया । और फ़ीस भी जमा करा दी ।
दो तीन महिने मे ताऊ थोडी बहुत अन्ग्रेजी की ऐसी तैसी करने
लग गया । इब एक दिन ताउ लद्दा के घर उसकी रिश्ते की
साली आयी हुयी थी । ताऊ क्लास से शाम को घर आया, और
अपनी साली पर अग्रेंजी का रौब झाडने के लिये बोला -
आइ लव यू ...रज्जो ।
साली भी पढी लिखी थी और अपने जीजा पर जान भी
छिडकती थी, सो जवाब मे बोली - जीजा, आइ लव यू टू..!
ताऊ लद्दा भी कहां चुप रहनै वाला था ? ताऊ बोल्या --
आइ लव यू थ्री ......!

मदारी और बन्दर

बन्दर बडी अकड मे चश्मा वश्मा लगाके. और शूट वूट पहन कर,
छाता ले के बडे तैश मे मदारी के केबिन मे घुस गया ।
मदारी अपने फोन पे किसी से बतिया रहा था । इस तरह अचानक
बन्दर को घुसते हुये देखा तो बोला-
आ भई बन्दर आ ! भई घनै दिन मे दिख्या ! कहां का
सैर सपाटा कर आये ?
बन्दर -- सैर सपाटा काहे का ! खाने के ठिकाने नही,
पर तुम्हारी तो मस्ती है । बन्दर मरे या जिये ।
मदारी ने सोचा- बन्दर कुछ नाराज सा है.. चलो इसको बीडी
वीडी पिला पिलूकर चलता करते हैं !
मदारी - क्युं भई बन्दर बीडी पिवैगा ?
बन्दर - ना जी ना ? थारी बीडी थमनै मुबारक !
मदारी - के बात सै, भई बन्दर आज तो
तू बडा उखडा उखडा सा दिखै सै ?
बन्दर - थानै मालूम सै की मैं सिर्फ़ डनहिल किन्ग साईज
सिगरेट ही पीता हूं । फ़िर बीडी के लिये
पूछ्ने का मतलब ? और वो भी थारै केबिन
मै आगये तो !
मदारी ने देखा कि आज बन्दर का मूड खराब
दिख रहा है सो तुरन्त सिगरेट निकाल कर बन्दर
के सामने पेश की और पास ही एक जमुरा
बैठा था, उससे कहा... जमुरे !
जमुरा - हुक्म मेरे आका ?
मदारी - जमुरे जरा बन्दर के लिये नाश्ता तो बुलवावो !
इतने मे बन्दर बोला नही नही मुझे नही करना
तुम्हारा नाश्ता पानी । मैं तो जा रहा हूं ।
मदारी को लगा आज कुछ गड बड है । सो
बोला - अरे यार बैठो भी बन्दर साब ।
बन्दर - अच्छा तो हम साब कब से हो गये ? हम जिये
या मरे तुमको उससे क्या ? आज तक भी कभी पूछा कि
यार बन्दर भाई, तुम जिन्दा हो या मर गये ?
बन्दर जिये या मरे ! आपने कभी पूछा ? कभी नही ।
आप की बात छोड भी दूं, तब भी तुम्हारे जमुरे भी
मेरी नही सुनते । मैं दिन भर धूप में तमाशा दिखाता हूं ।
पर तुम्हारे जमुरे मेरा फोन भी नही उठाते ।
और तो और मुझको लिमिट भी नही देते ।फ़िर मैं
खेल किस तरह दिखाऊं ? जितनी लिमिट मिलती है उतने खेल
से कुछ कमाई होती नही । मतलब ये कि हमको तो पागल
समझ रखा है । तुम्हारे जमुरे चाहे जब माल काट देते हैं ।
ठीक है मैं तो जा रहा हूं ।
ये भी साली कोई तमीज हुयी ?
बन्दर पुरी तरह तैश मे आ चुका था ।
मदारी - अरे भई ! । कहां चल दिये बन्दर साब ?
बन्दर - मैं तो जा रहा हूं, नया मदारी खोजने ।
खोजने क्या , पुराने जमुरे ने ही मदारी की दूकान खोली है
मैं तो अब उसके साथ ही खेल दिखाऊंगा

मदारी भी खेला खाया था । इसके जैसे कई बन्दर पाल के
छोड चुका था । और इससे भी बडे बन्दर तो क्या लन्गूर उसने
अब भी पाल रखे थे । सो बिल्कुल शातिर अन्दाज में बोला-
अरे यार बन्दर साब आप तो बिल्कुल ही नाराज हो गये ।
ऐसी मदारी बदलने वाली कौन सी बात हो गयी ?
बन्दर : - क्युं आपने कभी मेरे राशन पानी का इन्तजाम किया ?
कभी व्हिस्की सोढा के लिये पूछा कि इस महिने
तुमने खाया पीया या नही । दो महिने तो पिये होगये ।
तुमसे अच्छा तो पुराना मदारी ही था जो महीने के राशन पानी
और खम्बे का इन्तजाम बिना कहे ही कर देता था । अब उसकी
कीमत मालूम पड रही है । उसके यहां रहते तो मैने उसकी कद्र
कभी की नही । अब मालूम पडा है की वो ही ठीक था ।
और हमारे साथ का एक ताउ बन्दर सही ही कहता है कि
नाचै कुदै बान्दरी और खीर मदारी खाय । तो अब ऐसा नही चलेगा ।
खीर मे से एक दो कटोरी नही तो आठ दस चम्मच हमको भी
देनी चाहिये । पर तुमको तो पुरी खीर का भगोना ही पीने की
आदत पड गयी है । अपने को ये बिल्कुल ही मन्जूर नही है ।
बन्दर अब तक काफ़ी तैश मे आ चुका था ।
बीच मे मदारी ने टोका.... अरे बन्दर भाई सुनो तो ..
पर बन्दर सुनने को तैय्यार ही नही हो रहा था ।
फ़िर आगे बोल पडा.. बोल तो क्या पडा .. बस फ़ट ही पडा ।
बोला- और तुम्हारे जमुरॊं से कहो कि मेरा फोन उठाये और मेरी रस्सी
जो तुमने ५ फ़ीट की कर रखी है उसको खेल दिखाते समय कम से
कम २० फ़ीट की करवावो । और दारु पानी का इन्तजाम समय से करवावो ।
बन्दर एक सांस मे ही ये सारी बातें कह गया ।
मदारी भी घुटा हुवा था-- ठन्डे छींटे मारते हुये बोला-
अरे यार बन्दर भाई आपके लिये तो मेरी जान हाजिर है ।
जहां तक आपकी रस्सी का सवाल है तो आप खातिरी रखॊ..
कल से ही खेल दिखाते समय आपकी रस्सी मैं ही थामुंगा ।
और २० फ़ीट तो क्या आपकॊ रस्सी मे जितनी छूट (लिमिट)
चाहिये उतनी मैं दूंगा । और जहां तक दारु पानी और खर्चे
का सवाल है तो मुझे आप थोडा सा समय दो मैं ऊपर मेरे
बाजीगर (बास) से बात करके करवाने की पक्की समझो ।
आप चिन्ता मत करो । आप तो पब्लिक को बढिया खेल
दिखाते रहो । बाकी मै सम्भाल लूगा ।
बन्दर भी अब थोडा ठन्ढा पड चुका था । बन्दर ने भी सोचा चलो
घुडकी का कुछ तो असर होगा । और सोचा की ये मदारी
यों ही छोडने वाला भी नही है अगर इसने ५ फ़ीट की रस्सी
को छोडने के बजाये और घुटने के पास बांध लिया तो
और दम घुट जायेगा । सो बन्दर भी खींसे निपोरता हुवा मदारी
के केबिन से निकल लिया और मदारी ने अपने जमुरे से
विचार विमर्श शुरु कर दिया ।
पाठको आपको इसके बाद का हाल चाल भी समय समय पर
हम बताते रहेंगे ।

ताऊ लद्दा - खद्दा और हिमांशु जी


ताउ लद्दा और ताउ खद्दा दोनु भुखे प्यासे रेवाडी मे घुम रहे थे ।
उन्होने वहां से हिमान्शु जी को फोन किया की ... आपका भटिन्डा यहां
से पास है कुछ मदद करवावो । भुखे प्यासे हैं ।
हिमान्शु जी : भई मैं तो उडीसा मै हूं ।
आप लोग एक काम करो , वहां रेवाडी मे कुछ काम धन्धा शुरु कर दो ।
(हिमान्शु जी ने पीछा छुडाने को कह दिया)
इब ताउ तो ठहरे ताउ ही... होगे शुरु..
दोनु ताउ भुखे प्यासे तो थे ।
रेलवे स्टेशन के बाहर खडे हो के चिल्लाण लाग गे..
एक कि दो ...एक कि दो ...ले लो !
किस्सी नै ज्यादा ध्यान नी दिया !
ताउ चिल्लाते ही रहे .. एक की दो !
ताउ गरमी से परेशान हो लिये..
मन ही मन हिमान्शु जी को गालियां देते रहे ।
एक की दो .. एक की दो.... !
इतनै मै गुल्ला सेठ वहां आ गया..
दोनु ताउ... एक की दो ..एक की दो .. लेलो.
गुल्ला सेठ-- भई.... क्या बेच रहे हो एक की दो ?
ताउ छोह खाके बोले - ... ड. . पर दो लात ? बोल लेगा ???????

ताऊ और पहलवान

एक था पहलवान । जिम जाने का शौकीन था। एक बार गाम से उसका ताऊ भी उसके पास शहर आया हुया था।
वो सुबह उठके जिम जाने लाग्या तौ ताऊ ने बूझ्या :- कित जा रया से ।
पहलवान :- जिम जा रया सूं।
ताऊ :-भाई यो जिम के हो सै

पहलवान :- ताऊ यो अंगरेजी अखाडा हो सै...वरजिश करण का ।
ताऊ :- अरै, वर्जिश करण की बी कोए जगहां हो सै ? आपणे बगड़ मैं-ऐं क्यूं ना कर लेता ?
पहलवान -ताऊ, जिम में बड्डी-बड्डी मशीन लाग रही सैं वर्जिश करण की ।
ताऊ - अरै पहलवान, कसरत तन्नैं करणी सै अक उन मशीनां नैं ?

ताई धाफली और कालेज का छोरा

एक बार ताई धाफली घन्ना सारा सामान लेकर बस मे चढ़ गयी । और गोदी मे छोटा सा बालक भी ठा राख्या था। बस मे भीड़ बहुत ज्यादा हो रही थी। और ताई धाफली ने सीट मीली कोनी। एक सीधा सा कॉलेज का छोरा भी खड़ा था , ताई के पास ही। ताई उस तैं बोली बेटा मेरा यो झोला पकड़ ले जरा, छोरे ने पकड़ लिया । थोड़ी देर बाद दूसरा फ़िर तीसरा , इस तरियों ताई ने उस बिचारे छोरे को पुरा लाद दिया। और गोदी का बालक भी उसी को पकड़ा दिया । इब ताई को सीट मिल गयी। इब ताई उस छोरे तैं बोली ...बेटा तू तो भोत सुथरा बालक से तेरा नाम के से ? छोरा बोल्या - मेरा नाम से खूंटी, और कुछ टांगना सै तो टांग ले ।

पाँच छुट्टी इक्कठी

हम जिस गाम के स्कूल मै पढ्या करते थे, वो स्कूल
बिल्कूल ही शमशान घाट के पास था । सो जब भी कोई
गाम का बुढा ठेरा मर जाया करता तो मास्टर जी
म्हारी छूट्टी कर दिया करते और भई म्हारी हो लेती मौज !

एक दिन इसी तरियों एक बुढा मर लिया और म्हारी हो ली छूट्टी !
हम सारे बालक वापस घर जा रहे थे । रास्ते मे एक चबुतरे
पर ५ कती फ़ूस बुढ्ढे बैठे थे । उनको देख कै म्हारा साथी
रामजीलाल लंगडा बोल्या - भाइ ५ छूट्टी तो यो इकट्ठी
इत ही बैठी सैं .......!

Exams:-

Exams are like GIRL FRIENDS।
Too Many Questions।
Difficult to Understand।
More Explanation is Needed।
Result is always FAIL!!!

भरतू नाई और सरदार जी

एक बै एक खुले बाला आला सरदार ट्रेन मे बैठया जा रह्या था....... . ट्रेन हरियाने से होकर जान लाग री थी........ और भरतू नाई भी उसके पास ही बैठया था........ थोडी देर मे सरदारजी को नींद आन लागगी ....... उसने भरतू नाई को बीस रुपिये दीये और बोल्या ... ओये मेरा टेसन करनाल आये तो उठा देना.......... भर्तू बोल्या जी सरदार जी थमने म ठा दूँगा ... चिंता मतने करो ... सरदार जी सो ग्ये. थोड़ी देर बाद भरतू नाई के नाई आली आन लाग गी ,..... उसने सोच्या इस सरदार जी ने मुझको 20 रुपिये सिर्फ उठाने के लिये हि थोड़ी दिये होंगे. सरदार जी की थोड़ी सेवा भी कर देनी चहिये . ............. भरतू ने अपने झोल्ले मे ते उस्तरा निकाल्या और सरदार जी के खोपड़ी के खुल्ले बाल कती सफाचट कर दिये ........... और उसके बाद सरदारजी की दाडी मूंछ भी कती साफ कर दिये .......... इब सरदार अंडा की जात लागन लागरया.............. करनाल आते ही नाई ने उसको ठा दीया .............. घर पहुंच के सरदार जी ने ख़ुद को शीशे (आईने) मे देख्या तो गाली दे के बोल्या ...... उस ससुरे नाई की ....साले ने रुपीये तो मेरे से ले लिये और उठा कीसी और को दिया.

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