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ताऊ की शोले "पत्रिका" के ब्लाग चंक में

आज हिंदी भाषा के लोकप्रिय दैनिक अखबार "पत्रिका" के ब्लाग चंक स्तंभ मे "ताऊ की शोले" पोस्ट को स्थान मिला है.

जिसे आप नीचे पढ सकते हैं.



पूरी पोस्ट आप यहां पढ सकते हैं.

इब रामराम.

"ताऊ की शोले" की शूटिंग रुकी - गब्बर जंगल लौटा!!



ताऊ की शोले (एपिसोड - 7)
लेखक और एपिसोड निर्देशक : समीरलाल "समीर" और ताऊ रामपुरिया


गब्बर को बड़ी मुश्किल से ठाकुर घेर घार के ब्लॉगिंग में लाये थे. धीरे धीरे गब्बर का मन भी रमने लगा था ब्लॉगिंग की दुनिया मे. जंगल में छिप छिप कर अड्डा चलाते चलाते वो भी थक गया था.

कुछ समय तो बहुत मजा आया मगर जैसे ही गब्बर स्थापित होने लगा, नाम कमाने लगा, उसकी यहाँ ब्लॉगिंग मे खिलाफत होने लग गई. लोग मौज लेने के नाम पर उसे परेशान करते, जलील करते. यहाँ व्यंग्य बाणों के बेवजह तीर और स्ट्रींग ऑपरेशन की तर्ज पर खुद को और अन्यों को जलील होता देख कर गब्बर को लगा कि अगर यही सब यहाँ भी करना है तो जंगल में ही ठीक थे. यही सोच कर गब्बर वापस उदास मन से अपनी पूरी गैंग के साथ वापस जंगल जाने की तैयारी करने लगा.


ब्लॉगिंग के दौरान ही कालिया इस बात से गब्बर से नाराज रहने लगा कि गब्बर सांभा को ज्यादा चाहता है जबकि वो कालिया के बाद गैंग में आया है और सीरियस भी नहीं है. हर समय हा हा हो हो और लड़कपना करता है.

गब्बर अक्सर कालिया को समझाता है कि सांभा जैसा मौलिक और सुलझी सोच का डकैत मैने पूरे जंगल में आज तक नहीं देखा, इसलिए वो मेरा प्रिय है. जब मैं बीमार था तब भी सांभा रोज मुझे डकैती डालने की सलाह देता था. गब्बर ने अपनी बात स्पष्ट करने के लिए सांभा की शान में एक बेहतर शेर भी सुनाया जिसका लब्बोलुआब यह था कि सांभा क्यूँ उनका प्रिय है. शेर सुना कर गब्बर हो.. हो.. करके हंसने लगा मानो बहुत उँचा शेर सुनाया हो.

ठाकुर के साथ रह रह कर गब्बर को भी मौज लेने की आदत पड़ गई और इसी चुहल में उसने पुलिस वालों से भी मौज ले ली थी. अब पूरी पुलिस फोर्स भी उसके पीछे पड़ गई थी. भागते रास्ता नजर नहीं आ रहा था तो उसने सोचा कि जंगल का रास्ता लेने में उनसे भी बचाव हो जायेगा, इसलिए जंगल वापस लौट जाना 'एक पंथ दो काज' जैसी बात थी. कालिया तुरंत जंगल चलने को तैयार नहीं था क्योंकि सांभा सरदार के साथ आगे आगे चलता अतः उसने कह दिया कि आप और सांभा चलिये, हम पहुँचते हैं. अगले दिन सुबह सरदार गब्बर सिंह और सांभा जंगल की तरफ निकल पड़े.

सांभा ने भी पुलिस की मार से बचने के लिए जंगल में सेफ पहुँचने तक अपना नाम बदल कर सांभा 'सज्जन' रख लिया और गब्बर ने अपना ब्लॉग पासवर्ड से प्रोटेक्ट कर लिया. नाम बदलने के बाद भी सांभा की लड़कपने की आदत तो थी ही तो सांभा लड़कपना करते करते जंगल की तरफ चले जा रहे थे. गब्बर उसके लड़कपने पर उसे समझाने की बजाये कभी उसे और लड़कपना करने के लिए उकसाता तो कभी ताली बजा कर हौसला अफजाई करता तो कभी सिर्फ मुस्करा देता लेकिन रोकता कभी नहीं.

रास्ते में गांव पड़ा. उम्र में बड़ा दिखने पर भी सांभा को लड़कपना करता देख वह गांव के बच्चों के लिए कोतुहल का कारण बन गया. बच्चों नें मजमा लगा लिया और सांभा को घेर लिया. बच्चे उसे चिढाने लगे. ढेले और चूसे हुए आम की गुठलियों से मार मार कर हंसने लगे. तब गब्बर भागा भागा सांभा को बचाने आगे आया. बच्चे तो बच्चे होते हैं. उनके पास इतनी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव कहाँ होता है कि जान पाये कि इतने नामी गिरामी डाकू गब्बर को और उसके खास मौलिक डकैती वाले चेले सांभा को हरकतों से पहचान सकें..

बस, बच्चों ने दोनों को घेर कर बहुत परेशान किया. हे हे ही ही करके चिढ़ाया भी. गब्बर को लगा कि अब यहाँ से भाग निकलने में ही भलाई है. उसने सांभा को ईशारा किया और दोनों ने दौड़ लगा दी. तब भागते भागते गांव से दूर आकर रास्ते में दोनों एक पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे. इस बीच गब्बर ने माणिक चन्द का नया गुटके का पाऊच खाया. गब्बर का मूड ठीक करने के लिए सांभा ने जेब से अपनी एक मौलिक रचना निकाल कर गब्बर को सुनाई:

अपनों को भीड़ से बचाना भी जरुरी है

झुठ को छिपाने का बहाना भी जरुरी है,

यूँ तो इत्र का जलवा कम नहीं होता कभी

लेकिन कभी कभी, नहाना भी जरुरी है.

इस मार्मिक एवं संदेशपूर्ण कविता पर वाह वाह करते हुए गब्बर को ख्याल आया कि संदेश है कि नहाये हुए हफ्ते भर से उपर हो गया है. पास ही एक तालाब था. अतः दोनों जा कर उसमें घुस गये. अब अपने लड़कपने के अंदाज में सांभा ने एक गीत सुनाया:

सांभा को संगीत शिक्षा देते हुये उस्ताद गब्बर सिंह


'पानी में जले मेरा गोरा बदन!! पानी मेंZZZZZZzzzzzzzzzzzzz!!

गब्बर का खास चेला था तो गब्बर ने उसका मनोबल बढ़ाने के लिए वाह वाह की और इस गीत की मौलिकता एवं धुन पर सांभा को बधाई एवं शुभकामनाएँ दी.

इतने में न जाने कैसे कालिया उनको ढ़ूंढ़ता हुआ आ गया. गब्बर को वाह वाह करता देखना एवं बधाई एवं शुभकामनाएँ संदेश देता देखना उससे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने ब्रेकिंग न्यूज की तरह एक्सक्लूजिव राज खोला कि 'सरदार, ये फिल्म का गाना है. सांभा ने नहीं लिखा है, उठाया हुआ माल सुना रहा है.'

उसने अपनी बात साबित करने के लिए उसकी पिछली मौलिक रचना पर,
अपनों को भीड़ से बचाना भी जरुरी है
झुठ को छिपाने का बहाना भी जरुरी है,...... जो सांभा ने विश्राम के क्षणों मे पेड़ के नीचे सुनाई थी, पर आई ३६ में से छंटी हुई १२ टिप्पणियाँ भी दिखलाई जिससे सांभा को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहन मिल रहा था.

उसने यह भी बताया कि सांभा को रोकने वाली टिप्पणियाँ उड़ा दी जाती है अतः पानी अब सर के उपर से गुजरता कहलायेगा. लेकिन चेले के मोह में मदहोश होने के कारण गब्बर के कान में जूँ तक नहीं रेंगी और वो वाह वाह करता रहा और सांभा तर्रनुम में गाता रहा..

'पानी में जले मेरा गोरा बदन!! पानी मेंZZZZZZzzzzzzzzzzzzz!!

कालिया ने पूरी गैंग को इक्ट्ठा कर लिया कि सांभा उठाया हुआ माल सुनाता है तो भी सरदार उसे वाह वाही देता है, शाबासी देता है, बधाई एवं शुभकामनाएँ संदेश देता है और हम ओरीजनल भी सुनायें तो कहता है कि कहाँ से उड़ाया, मौलिक नहीं लगता. गोली मार दूँगा. गाली दूँगा आदि.

गैंग ने कालिया की बात का पुरजोर समर्थन किया एवं सांभा का पुरजोर विरोध किया तो सरदार गब्बर सिंह को डर लगा कि गैंग उसके विरोध में न चली जाये. वैसे ही बिखरी हुई है. जंगल के मामले में शैशव अवस्था में है, कहीं टूट ही न जाये.
इस डर से हमेशा की तरह ऐसे मौकों पर अपनी आदतानुसार बात बिगड़ती देख सरदार 'खे खें ही हीं' करके हंसने लगा और कहने लगा कि वो तो मैं यूँ ही तुम लोंगो की मौज ले रहा था और साथ ही सांभा को प्रोत्साहन देकर उसका मनोबल बढ़ा रहा था ताकि वो ठीक से नहा ले. वरना वो तो एक डुबकी मार कर निकल जाता है. फिर दो दो महिने तालाब पर नहीं आता. तुम लोग कबसे इतने छुईमुई हो गये कि इतनी सी बात का बुरा मान गये. उसने कालिया की तरफ देख कर आँख मारी और दाँत दिखाये.

गैंग वालों को भी गब्बर की बात उचित लगी और लगा कि सांभा नहाया रहेगा तो जंगल में बदबू भी कम रहेगी.
सबको सहमत देख गब्बर भीतर ही भीतर शातिराना मुस्कराया और सांभा को धीरे से आंख भी मारी.
फिर सब शांति से जंगल की तरफ चल पड़े.

गब्बर अब अपना गैंग फिर से नये सिरे से स्थापित कर रहा है जंगल में. नये पद आवंटित किए जा रहे हैं. सबके रहने खाने की पुनः व्यवस्था की जा रही है. आसपास के गांवों के रुट मैप बन रहे हैं. नियमित जल, दारु, गुटका एवं गोश्त आपूर्ति के लिए इंतजाम किये जा रहे हैं. डांस फ्लोर (नृत्य भूमि) का कन्सट्रक्शन(निर्माण कार्य) किया जा रहा है. ठाकुर का हाथ अलग करने के लिए हाथ बांधने के लिए बल्लियाँ लगाई जा रही हैं.

अब इतने सब कामों में समय तो लगता ही है अत: शोले की शूटिंग रोकी जा रही है. आप अब इन्तजार करें शूटिंग पुनः शुरू होने का ताऊ की शोले भाग-२ के लिए.

तब तक आप सबको शोले की पूरी टीम की ओर से राम राम!!

-आगे शूटिंग कब शुरु होगी, इसी मंच से सूचित किया जायेगा. आते रहें.-
अंत में : - मैं इस बात के लिये क्षमायाचना चाहता हूं कि ताऊ की शोले में ज्यादा मदद नहीं कर पाया बस, यही एक स्क्रिप्ट लिख पाया हूँ. ताऊ की शोले- २ में मैं वादा करता हूं कि ज्यादा से ज्यादा लिखने की कोशीश करुंगा. इसमे आप लोगों द्वारा की गई गई सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका आभार व्यक्त करता हूं.
-समीरलाल "समीर"

डिस्क्लेमर :-

इस आलेख का मकसद मात्र शूटिंग के रुकने की सूचना देना और हास्य विनोद है, कृपया इसे मौज निरुपित कर विवाद पैदा करने का कष्ट न उठायें.

 

इब खूंटे पै पढो:-



सांभा : सरदार अगर वाहवाही नही दी तो..इस झील मे डुबकर प्राण दे दूंगा....!!!

गब्बर : अरे नही सांभा..तू तो मेरा प्रिय चेला है....तुझे डुबने थोडे ही दूंगा, भले मैं ही डूब जाऊं...तू चालू रह...!!! वाह..वाह...वाह..वाह..क्या खूब...सांभा...जीता रह..क्या मौलिक तान छेडी...पानी में जले..तेरा गोरा बदन..पानी में... जियो मेरे लाल…पानी मे और जलाओ…शाबास…

कालिया : सरदार...ये गलत बात है...उडाये हुये...माल पर वाह वाह...ये पक्षपात है...मैं नही रुक सकता यहां पर...सरदार सांभा का नही हमारा बदन गोरा है...सांभा तो काला कलूटा बैंगन लूटा है...अगर इसे मौलिक गाना है तो गाये...पानी में जले मेरा काला बदन..पानी में...गोरा बदन क्यों जलवा रहा है ये?

गब्बर : अरे ओ कालिया खामोश..वर्ना तेरी खुपडिया में सारी की सारी गोलियां उतार दूंगा…..खबरदार जो मेरे सांभा के लिये कुछ भी कहा तो ..अब सांभा की इच्छा गोरा बदन जलाने की है तो गोरा ही जलेगा...समझा ना? सरदार से जबान लडाने का नही...बोल दिया अपुन ने तो बोल दिया..समझा क्या?

कालिया : ठीक है सरदार..अब तुम और तुम्हारा सांभा ही गिरोह चला लेना…...हमको तो मालूम था कि ग्रहों की चाल ही कुछ टेढी मेढी हो गई है...और यों भी चारों तरफ़ हल्ला मचा है कि ब्लाग जगत आजकल ग्रहों की मार मे पडा है. शनि की वक्र दृष्टी का शिकार है और रोज एक दो पोस्ट तक इस पर लिखी जा रही हैं.

गब्बर : कालिया...ज्यादा बोलने का नईं...अपुन सब समझ गयेला है...तू होशियारी मत दिखा...तू किस के साथ मिल गयेला है? अपुन को सब मालूम है...जब दूर दूर समन्दर पार तक किसी पकड का पता नही चलता है तो लोग कहते है कि गब्बर सरदार उठा ले गया होगा......

कालिया : सरदार बात को समझा करो...और इस चेला मोह से बाहर निकल कर किसी योग्य पंडित से झाड फ़ूंक कराओ .. सरदार एक बार और सोचलो..कुछ पूजा पाठ और दान दक्षिणा के साथ मिष्ठान्न भोजन करवा दो ब्लागरों को...वर्ना ये शनि नही उतरेगा तुम्हारे सर से..और बिना शनि उतरे डकैती और पकड करना बडा मुश्किल है....और कालिया व्यंगात्मक हंसी हंसकर अपना बैग वहां से जाने के लिये कंधे पर डाल लेता है

हूं..अरे ओ सांभा.. कितने आदमी थे रे ..ऊहां?


और गब्बर अपने नथुने फ़ुलाता हुआ कुछ गंभीर मुद्रा अख्तियार कर लेता है....और अचानक पिस्तौल उठाकर पूछ बैठता है...अरे ओ सांभा..कितने आदमी थे रे.. ऊहां?

सांभा : सरदार पूरे के पूरे ... ३६.....

गब्बर : हूंSSSS....पहले ३ थे... अब ३ पर ६ आके बैठ गये...और पूरे ३६...बहुत ना इंसाफ़ी है रे कालिया... (गब्बर सरदार गुर्राकर बोला)
और कालिया की रुह कांप जाती है....गोलियों की आवाज...ठांय..ठांय..ठांय...

गोलियां किस पर चली? कालिया जिंदा बचा या गया ऊपर..? ये सब जानने के लिये इंतजार किजिये..ताऊ की शोले - भाग २ का....

फ़रार बसंती का फ़ोन आया सांभा के पास : ताऊ की शोले


ताऊ की शोले (एपिसोड - 6)
एपिसोड निर्देशक : ताऊ रामपुरिया और अनिता कुमार
सगीत निर्देशक : दिलिप कवठेकर
इस एपिसोड से बसंती का रोल कर रही हैं "अदा"

बसंती फरारी में भेष बदलकर इधर से उधर छुपती फिर रही है. उसे पुलिस शिकारी कुत्ते कि तरह ढूंढ़ रही है. बसंती को रामपुर के इलाके से निकलना बहुत ज़रूरी है. खेतों से छुपते छुपाते वो सड़क पर आ जाती है......दूर दूर तक कोई वहां नज़र नहीं आ रहा है. कड़कती दोपहरी है और सुनसान सड़क कोई गाड़ी-छटका नहीं दिख रहा है.

धन्नों भी थक गई है. बसंती ने उसे अपने कांधे पर बैठा लिया है और चली जारही है. तभी एक पेड की छांव में आड लेकर वो अपना मोबाईल निकाल कर सांभा को फ़ोन लगाकर बात करती है..

बसंती सांभा से फ़ोन पर बात करते हुये


बसंती : हां हैल्लो...हां कौन सांभा? अरे जोर से बोलो भाई...हम बसंती हैं इधर से...

उधर से सांभा की आवाज आती है....हां बसंती बहन..बोलो..बोलो..मैं सांभा ही बोल रहा हूं.

बसंती : अरे सांभा भैया...अब का बोलें? अऊर का ना बोले? तुम्हीं बताओ...इहां मारे मारे फ़िर रहे हैं और तुम लोगों को कोई हमारी फ़िक्र ही नही है?

सांभा
: अरे बसंती..ऐसे मत सोचो..हम इतना परेशान हूं...सबके लिये...अब क्या करें? तुम्ही बताओ....उधर वो कालिया अलग गिरोह बनाने की धमकी दे रहा है. इधर गिरोह के लोग इधर उधर हो रहे हैं...गोली बारुद कुछ है नही..जो कोई शिकार करें....चारों तरफ़ से पुलिस का शिकंजा अलग से...

बसंती : अरे सांभा भैया..क्या कह रहे हो? ऊ कालिया का इतना हिम्म्त होगया..जो अलग गिरोह बनायेगा?

सांभा : अब का बतायें? ऊ जेलर के चक्कर मे आगया है कालिया तो..और तुम तो जानती ही हो कि गब्बर ने जेलर का पूरा हिस्सा नही दिया तब तक वो ऐसे ही गिरोह के आदमियों को भडकाता रहेगा. बडा खडूस है वो जेलर.

बसंती : तो गब्बर से कह कर उसका हिसाब किताब क्यों नाही करा देत हो?

सांभा : बसंती तुम भी समझदार होकर ऐसी बात बोल रही हो? अरे बिना रुपयों के हिसाब कहां से करवाय दें? और जेलर अपना पूरा हिस्सा लिये बिना मानने वाला नही है.

सांभा अड्डे पर बिना गोली बारुद के बैठा बसंती से बात करते हुये!


बसंती : तो गब्बर क्या कर रहे हैं आजकल..कहीं दू चार लम्बे हाथ मारकर जेलर का मूंह बंद करो और गिरोह वालों को खर्चा पानी दो..दिपावली दशहरा का त्योंहार अलग से आगया है सर पर.

सांभा : अरे बसंती...यही तो मैं समझा समझा कर हार गया पर ऊ गब्बर भाई मानें तब ना...बस ऊ ठाकुर के चक्कर मे चढ गये हैं और कहीं कुछ काम धंधा यानि डकैती वकैती डालने की योजना ही नही बनाते....बस दिन रात ऊ ठाकुर के लेपटोप मे आंखे गडाये बैठे रहत हैं..

बसंती : ई लेपटोपवा का बला है? कोनू आंख गडाने की चीज है का?

सांभा : अरे ऊ..का बताये अब....ठाकुर ने गब्बर को बिगाड के रख दिया..ऊ ससुरी बिलागिंग विलागिंग सिखा दी उसको..बस दिन रात रमे रहते हैं उसी मां...ना किसी से कछु लेना ना देना...पता नही ई ठाकुर ने कौन सा बदला निकाला है...

बसंती : का ये कोनू छूत की बीमारी है का?

सांभा : अरे उससे भी बुरी बीमारी है...सिर्फ़ मौसी ही बचा सकती है इससे...और मौसी जब भी आती है...गब्बर डर के मारे छुप जाता है..मौसी से मिलता ही नही है...

बसंती : सांभा भाई...आप चिंता मत करो...ई गब्बर का अक्ल तो हम ठिकाने लगाय देब....जरा हम मौसी तक पहुंच जाय..और फ़िर ऊ..कालिया का भी हिसाब निपटा देंगे...चिंता नही करना...इस गिरोह को टूटने नही देंगे हम...बडी मुश्किल से खून पसीना एक करके बनाया है हम लोगों ने इसको..

सांभा - हां बसंती.. ई तो तुम सही कहत हो...पर अब आगे क्या करें...ऊ गब्बर तो बिलागिंग के रोग मे जकड गया है...ठाकुर उसको बेवकूफ़ बना रहा है..ना तो हथियार दिलवा रहा है..ना छुडवा रहा है..बल्कि अफ़ीमची की तरह बिलागिंग का नशा पिलाय देत है..दिन भर गब्बर को...और बस गब्बर दिन भर गाते रहत हैं..आ..ब्लागिंग करले..आ ब्लागिंग करले...

बसंती : अऊर ऊ जय का कोनू पता चलबे किया की नाहीं..?

सांभा : अरे बसंती बहन ...लगता है ई ससुर गिरोह ही कोनू गलत मुहुर्त में बन गवा. कोई काम करना ही नही चाहता. हम अकेले ही अब कितना काम करें?

बसंती : अरे सांभा भाई... ऊ ताऊ वाली स्टाईल में पहेलियां मत बूझावो...और दन्न से बताओ कि क्या लफ़डा किये हैं जय? काहे से की ...अब धन्नों को पुलिस का गंध आने लगा है अऊर अब हम और हमारी धन्नों इहां से चम्पत होने की सोच रहे हैं..अब एरिया बदलना है.

सांभा : बसंती बहन...बात ऐसन है कि जय को तो गब्बर से भी बुरी बीमारी लग गई है.....पता नही कहां से लगी..सब काम धंधा छोड छाडकर...बस गाते फ़िरते हैं..' तुझे देख के मेरी मधुबाला, मेरा मन ये पागल झाला, तूने इक बार हंस के जो बोला.......

बसंती : अरे सांभा भाई...ई का बोल रहे हो? का जय पगलाय गये का? साफ़ साफ़ बतलाओ भाई..

सांभा : अब का बतायें बसंती बहन...सब गिरोह चौपट करवा दिया इस लडके नें...पता नही आजकल..मेरी मधुबाला...मेरी मधुबाला...गाते हुये..ऊ खपोली की पहाडियों मे घूमते रहते हैं....

बसंती : ई का कहत हो सांभा भाई? जय बचूआ तो बडे मेहनती रहे...और.....

सांभा बात काटते हुये बीच में ही बोला : और..अरे और पता नही कहां से ई शायरी का रोग ऊपर से लगवा लिये कहीं से? हम कितनी बार संदेशा भेजे कि हमको फ़ोन करो..फ़ोन करो.. पर नाही..उनको तो मधुबाला से ही फ़ुरसत नही...तो ऊ डकैती ऊकैती का कहां से सोचें? एक बार जय का शायरी का भूत उतर जाये तो ई लडका काम का है...ई हमारे गिरोह को चलाने की अक्ल रखता है. हमको इससे बहुत उम्मीदें थी..पर का करें.....

बसंती : हैल्लो..सांभा भैया...हिम्मत मत हारो..पुराने दिन फ़िर लौटेंगे...एक एक दिन मे दो दो ठो डकैतियां फ़िर से डालेंगे हम लोग...बस तुम तैयारी करो...मैं कैसे भी करके सूरमा भोपाली से मिलकर जेलर को सेट करती हूं...कि हमको कुछ वारदात उधार मे करने दे और पुलिस का फ़ंदा कम करवाये...फ़िर उसका उधार भी चुका देंगे..और सब मामला सेट कर देंगे....अब तुम मेरे फ़ोन का ईंतजार करना और ...कुछ गलत कदम मत उठाना...पुलिस पीछे लगी है..मैं सूरमा भोपाली से कहकर जरा पुलिस को हटवाती हूं... ओके...

सांभा : ओके ..बसंती..अब तो इस डूबते गिरोह को तुम्हारा ही सहारा है. (सांभा फ़ोन काट देता है. और कहीं और फ़ोन लगाने लगता है.)
इधर बसंती भरी दोपहर की गर्मी में चली जारही है.......तभी दूर से एक ठो मोटर साईकिल दिख रहा है. बसंती हाथ का अंगूठा दिखा कर रोकती है.. एक लड़का चला रहा था मोटर साईकिल... बसंती को देख कर रोक देता हैं.
लड़का : क्या बात है मैडम कोनो दिक्कत है का ?

बसंती : युंकी आप भी बहुत गजब सवाल किये हैं.....अगर दिक्कत नहीं होता तो इ ठेपो हम ऐसा ही देखाए का ..?

लड़का : हाँ कहिये का बात है ?

बसंती : युंकी ऐसा तो है नहीं कि आपसे गपियाने का वास्ते हम डहर में खड़े हैं, हम सोचे कि आप भी शहर जैबे कर रहे हैं और आपका पीछे वाला सीट भी वही जैबे कर रहा है...तो सोचे वाला बात इ है कि अगर हमहूँ आपके साथ बैठ जावें और गर्रर से आप मोटर साईकिलवा आप चलावें तो कौनो पिरोब्लेम का बात नहीं नु है ......बोलिए बोलिए. ?? माने कि आम का आम और गुठली का दाम हमहूँ चहुंप जावेंगे न सहर, सुरमा भोपाली जी का घर पर....

लड़का : हाँ हाँ मैडम काहे नहीं ...हम उधर जैबे न कर रहे हैं..आप बैठ जाइए पीछे कोई पिरोब्लेम नहीं है

बसंती मोटरसाईकिल सवार से लिफ़्ट लेकर खुद बाईक चलाते हुये


बसंती : युंकी हम जानते थे कि आप हैं तो लड़का बाकी समझदार हैं, नहीं आज का जबाना में बहुत कम हो गया है ऐसा प्राणी. अच्छा चलिए अब..... चल धन्नो तोहरी बसंती को मिल गवा सवारी .......
इतने में एक बकरी का बच्चा दौड़ता हुआ आता है और बसंती कि गोद में चढ़ जाता है ...
लड़का : अरे इ बकरी का बच्चा कौन है मैडम ? इसका का काम ?

बसंती : युंकी इ आप का बोले ? बकरी का बच्चा ? इ आपको बकरी का बच्चा दीस रहा है !! अरे इ धन्नो है धन्नो... इसको ऐसन-वैसन मत समझियेगा इ आपको केतना बार बेच कर खरीद लेगी आपको पतो नहीं चलेगा समझे.....जायेंगे तो दोनों जायेगे साथ में.. मजूर है तो बोलिए नहीं तो जय राम जी की...बसंती चली अपना घर..

लड़का : अरे मैडम कोई बात नहीं इसको भी बैठा लीजिये
बसंती धन्नो के साथ मोटर साईकिल में पीछे बैठ जाती है..रस्ते में धन्नो के कान में बसंती कुछ कहती है,,, और धन्नो लड़के का कान कुतरने लगती है.....लड़का बहुत परेशां हो जाता है.

लड़का : अरे मैडम आपकी धन्नो तो हमरे कान को चारा समझ के खाए जा रही है इसको रोकिये न

बसंती : युंकी बात इ है की हमरी धन्नो को कान खाने की आदत है...अब अगर घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा का ...इसी लिए हम अपना धन्नो को सबका कान काटने देते हैं भाई.

लड़का : अरे लेकिन हम मोटर साईकिलवा चलावेंगे कैसे ?

बसंती : युंकी आप काहे चला रहे हैं महराज.. हम कौन मर्ज का दवा हैं हजूर?

लड़का : आप मोटर साईकिल चलाती हैं ??? लडका आँख फाड़-फाड़ कर देखता है..

बसंती : लो कर लो बात ....i can drive motor cycle, i can walk motor cycle, i can talk motor cycle.. i can..अरे बसंती तुमको मोटर साइकिल में बैठा कर रामपुर का चार ठो चक्कर लगा कर तेसन्वा पर छोड़ कर आवेगी हाँ ...कह दे रहे हैं.

लड़का : अच्छा बाबा तो आप ही चलाइये हम पीछे बैठता हूँ..

बसंती : ठीक है बाकि धन्नो हमरे साथ आगे ही रहेगी भाई ...मंजूर है

लड़का : मंजूर है
बसंती और धन्नो लडके को मूर्ख बनाकर बाईक झपट ले गई!

लड़का उतरता है, बसंती मोटर साईकिल स्टार्ट करती है धन्नो को सामने 'बिठाती' है और इसके पहले की लड़का पीछे बैठे मोटर साइकिल लेकर भाग जाती है ..लड़का चिल्लाता रहता है 'अरे रोको'..अरे मेरी बाईक उडा ले गई रे....कोई तो रोको...अरे मैं लुट गया रे...

और बसंती बोलती है, चल धन्नो ....ऐ पलट सवार !!!!!'

कालिया ने की गब्बर से बगावत : ताऊ की शोले



ताऊ की शोले (एपिसोड - 5)
लेखक व निर्देशक : ताऊ रामपुरिया और अनिता कुमार,
सगीत निर्देशक : दिलिप कवठेकर

आप पहले पढ चुके हैं कि कालिया रेल्वे टेशन बसंती के साथ गया था गोला बारुद की खेप लेने..वापस लौटते मे पुलिस मुठभेड मे कालिया अरेस्ट होकर जेल पहुंच गया..तांगा और धन्नों गोला बारुद सहित जब्त होगये..बसंती किसी तरह भागने मे कामयाब होगई थी जिसका अभी तक पता नही चला. अब आगे पढिये........

अंग्रेजों के जमाने के जेलर साहब जेल मे तशरीफ़ लाते हैं. जो ब्लागिंग के भयंकर लती हैं. साथ मे चार सिपाही हैं. और उनका खासमखास जासूस हरीराम भी साथ ही है. कैदी लाईन मे खडे हैं. जेलर साहब मुआयना करते हुये कालिया के पास आकर रुकते हैं.

जेलर : हूंss..तो कालिया कितनी पोस्ट लिखी थी?

कालिया : हुजुर कहां लिखी? अबकि तो लिखने के पहले ही यहां पहुंच गया? पर मैं कुछ समझा नही?

जेलर : हाsआ...सब समझ जाओगे कालिया...हरीराम.. अरे.. ओ हरीराम...जेलर साहब ने आवाज लगाई..

हरीराम : आया हुजुर...मेरे आका..हुकुम किजिये...

जेलर ने उसको अपने पीछे आने का इशारा किया और तेजी से अपने आफ़िस की तरफ़ बढ गया.
जेलर साहब अपने आफ़िस में पांव मेज पर रख कर पीठ कुर्सी पर टिकाये बैठे हैं....डण्डा मेज पर रख दिया है..हरीराम कुर्सी के पीछे आकर उनके सर पर चंपी मालिश कर रहा है. और कालिया की तरफ़ देखकर कुटिल हंसी हंस रहा है.
जेलर - हरीराम...तुमने कालिया को मुझसे यहां आकर मिलने को कह दिया कि नही?
हरीराम : हेsहे..हुजुर..बस कालिया आता ही होगा.
इतनी देर मे कालिया अंदर प्रवेश करता है.
कालिया : नमस्ते जेलर साहब....मुझे क्युं याद फ़रमाया था हुजुर?

जेलर : हरीराम अब तुम जावो..और हरीराम बाहर चला जाता है.

अब जेलर ने कालिया की तरफ़ मुखातिब होते हुये कहा : कालिया, देखो ...हमको पहले ही मालूम था कि गब्बर तुमको यहां से छुडवायेगा नही. और हम तुमको ऐसे ही छोडेंगे नही.

कालिया - माई बाप...मुझे जाने दो..मेरे छोटे छोटे बच्चे हैं...हुजुर..वो रोते होंगे?

जेलर - चुप बे कालिया..ज्यादा नौटंकी नही..हमको क्या बडे बडे बच्चे हैं? अरे बच्चे है तो छोटे ही होंगे ना? अरे घोडा घास से यारी करेगा तो भूखा मरेगा...हम गब्बर से पूरा हिसाब किये बिना तुमको नही जाने देंगे...


कालिया : हुजुर..आप को विश्वास दिलाता हूं मुझे जाने दिजिये..मैं आपकी एक एक पाई का हिसाब गब्बर से करवा दूंगा....हुजुर..मैने सुरंग भी खोद ली है...

जेलर - तुम्हारी ये मजाल...सुरंग भी खोद ली और बिना हमको बताये ही? ये तो बहुत नाइंसाफ़ी है...नही कालिया नही...तुम बहुत बडा खतरा मोल ले चुके हो..पर तुमने सुरंग खोदी कैसे?

कालिया - हुजुर वो पिछले सप्ताह जो दो नये कैदी आये थे ना...उनके साथ गब्बर ने औजार भिजवाये थे. हुजुर...आपकी कसम..और गब्बर ने कहलवाया था कि आपका पिछला सारा हिसाब किताब चुका देगा.

जेलर - कालिया..तुम तो महा मुर्ख हो...अरे तुम्हारे अंदर अक्ल नाम की चीज नही है...बावलीबूच...समझता कोनी के? गब्बर अब तेरे को नही छुडवायेगा कालिया...

कालिया - हुजुर क्या बात होगई ऐसी..मैने कुछ गुस्ताखी कर डाली क्या?

जेलर - अरे मुर्ख...हम अंगरेजों के जमाने के जेलर हैं इसलिये सब समझते हैं...गब्बर अब तुमको रास्ते से हटाना चाहता है..अरे मुर्ख जैसे ही तू भागेगा..पुलिस तुम्हारा एनकाऊंटर कर देगी..समझा क्या?

कालिया - अरे नही हुजुर..

जेलर - नही हुजुर क्या? तेरे को मालूम नही...ठाकुर इन कामों मे माहिर है...तू तो गया काम से...तेरा एनकाऊंटर गब्बर और ठाकुर के इशारे पर ही किया जायेगा...यानि रास्ते का कांटा साफ़...

कालिया - हुजुर आपने मुझे चेता दिया..आपका यह एहसान मैं कभी नही भूलूंगा...हुजुर..इस गब्बर की तो ऐसी तैसी....हुजुर एक स्कीम आई है मेरे दिमाग में.

जेलर - बताओ कालिया..तुम्हारी फ़ूटी खोपडी मे क्या आईडीया आया है?

कालिया - हुजुर आप साथ दें तो..मैं ही एक नया गैंग बना लू हुजुर,,,कसम से ..हुजुर...आपको गब्बर इकन्नी भी पूरी नही देता इमानदारी से? जबकी बदले में आप उसका कितना खयाल रखते हैं...मैं आपको पूरे चवन्नी का हिस्सेदार बनाता हूं...हुजुर विचार कर लिजिये.....हो मंजूर तो हाथ मिलाईये हुजुर..

जेलर - कालिया..तुम्हारी खुपडिया तो तेज है..पर तुम गैंग बनाने के लिये आदमी कहां से लावोगे?

कालिया - हुजुर...वो अपना सांभा है ना मरदूद...बस उसको ज्यादा टीप्पणियों का लालच दूंगा... बहुत लालची है ससूरा टिप्पणीयों का.. और वो टूट कर आगया तो समझो कि गब्बर के सारे काम के आदमी तोड लायेगा हुजुर...यूं समझ लिजिये कि टिप्पणियों का इतना लालची है कि ससुरा गिन गिन कर हिसाब रखता है. और टिप्पणियों के मामले में सख्ती से थ्री किक फ़ार्मुला लागू करता है हुजुर.

जेलर आश्चर्य से - कालिया ये क्या बक बक कर रहा है? ये कोई कुश्ती का अखाडा है क्या? जो थ्री किक फ़ार्मुला लगाता है? साफ़ साफ़ बता ये थ्री किक क्या है? ताऊ की तरह पहेलिया मत बुझा.

कालिया - हुजुर..ये ससूरा कोई हरयाणवी फ़ार्मुला है..मुझे आज तक समझ नही आया..आप तो एक बार सांभा को अंदर करलो..फ़िर हुजुर उससे ही कबूलवा लिजियेगा ये फ़ार्मुला. पर हुजुर वो मेरी गैंग का क्या सोचा? हुजुर सच कहता हूं आप साथ दे दिजिये..गब्बर का तख्ता पलट कर मैं बनूंगा सरदार और आपकी तो चांदी ही चांदी होगी सरकार.

जेलर - बात तो तुम्हारी ठीक है कालिया..हमको भी अब गब्बर पर यकीन नही रहा..आजकल वो हिसाब मे इमानदारी नही रखता. तुम नई गैंग बनाने की तैयारी करो. अब तो इस गब्बर का इलाज करना ही पडेगा..बहुत तेज चलता है..सारी टिप्पणीयां अकेला ही बांट आता है..देख लूंगा गब्बर...तुझे देख लूंगा...

कालिया - हुजुर की जय हो...हुजुर के बाल बच्चे जीये...बडे होकर आपका खून पीये...

जेलर - अबे बावली बूच..क्या बकता है? हम अभी तक ब्रह्मचारी है...कालिया...

कालिया - माफ़ी हुजुर..माफ़ी..ऊ ससुरी जबान फ़िसल गई थी...तकिया कलाम मे...हुजुर की जय हो...हा..हा...अब मैं सरदार बनूंगा...

जेलर - हां जरा अपने तकिया को संभाल कर रखा करो कालिया....और आगे की तैयारी करो.

कालिया - ठीक है हुजुर..मुझे जरा सांभा से..आपके मोबाईल पर बात करवा दिजिये हुजुर..जरा बाल बच्चों का हाल पूछ लूं और..उधर का हाल चाल भी ले लूं. और सांभा का मन भी टटोल लूं जरा.
जेलर सांभा का नंबर लगाकर कालिया को देता है...उधर फ़ोन गब्बर उठाता है..पर कालिया समझ रहा है कि वो सांभा से बात कर रहा है.

कालिया.- हैल्लो..हैल्लो अरे सांभा भाई...रामराम...कैसे हो? ठीक हो? अरे सांभा भाई...सुनो...हमने जेलर से सब बात करली है...हुजुर तैयार हैं ..अरे नही भाई...जेलर साहब अपने गांव के ही हैं यार सांभा भाई.. कसम भवानी की...जेलर साहब तैयार होगये अब बस आप तैयार हो जाओ तो अलग गैंग शुरु कर देते हैं..ऐसी तैसी इस गब्बर के बच्चे की...अब और इसके जुल्म नही सहेंगे यार... यार सांभा भाई.. नई गैंग का सब काम आपको ही संभालना पडेगा...

उधर से सांभा की जगह गब्बर की आवाज आती है...हूंs तो कालिया अब नया गैंग बनायेगा? पिछले जन्म की गोलियां जो तेरी खोपडी मे उतारी थी..लगता है वो भूल गया...हूंs...अरे ओ सांभा....लगा फ़ोन जरा ऊ जेलरवा को..और करवाय दे एनकाऊंटर इस कालिया का....
कालिया को अब समझ आया कि उसने सांभा समझ कर गब्बर से बात करली और डरता हुआ अपनी बात सुधारने की गरज से बोला....
कालिया - सरदार...अरे सरदार सुनो तो..हम तो ऊ जरा जेलर को बेवकूफ़ बना रहे थे सरदार..हम आपसे कैसे गद्दारी कर सकते हैं? सरदार...हम तो आपका जन्मों से नमक खाये हैं सरदार...हमें माफ़ करो सरदार...
अपने नमक का कर्ज उतारने का एक मौका और दो सरदार...आपने पिछली बार भी धोखे से गोली मार दी थी....इस बार ऐसा मत करना सरदार...(कालिया बुरी तरह डरा हुआ है)



गब्बर की डरावनी आवाज आती है...हूंs..तूने सिप्पी साहब की शोले मे भी गोली खाई थी...लगता है भूल गया उस गोली की आवाज को? .अब ताऊ की शोले मे भी गोली खा कालिया....अरे ओ सांभा...लगा निशाना इसकी खुपडिया पर...

सांभा - जी सरदार...और सांभा के हाथ से पिस्तौल की लिबलिबी दब जाती है..और जोर की आवाज आती है...ठांय..ठांय.....

मध्यांतर........


सांभा ने मौसी के सामने गब्बर की पोल खोली : ताऊ की शोले

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ताऊ की शोले (एपिसोड - 4)
लेखक व निर्देशक : ताऊ रामपुरिया और अनिता कुमार,
सगीत निर्देशक : दिलिप कवठेकर


पिछली बार आपने पढा : कालिया और अपना माल छुडवाने के लिये गब्बर और सांभा वापस ठाकुर की हवेली में लौट आते हैं. जहां ठाकुर उनको ब्लागिंग ब्लागिंग खेलता हुआ मिलता है. गब्बर द्वारा यह कहने पर कि वो और सांभा थोडे दिन ठाकुर की हवेली पर पुलिस से छुपकर रहना चाहते हैं. ठाकुर ने सांभा को घोडे लेकर कहीं और जाने का कहा. क्युंकि पुलिस घोडे की लीद सूघ कर उनको यहां ढुंढने आ सकती थी. और सांभा वहां से अपने घोडे पर सवार होकर गांव में मौसी के घर जा पहुंचता है. मौसी ने उसको बडे प्यार से खाना खिलाया और दोनों बातें करने लगे. अब आगे पढिये...
मौसी : अरे सांभा...वो गब्बर नही आया बहुत दिनों से?

सांभा : मौसी..वो क्या है ना आजकल गब्बर भैया बहुत बिजी हो गये हैं।

मौसी : काहे, आज कल उड़नतश्तरी का धंधा जोरों पर है क्या? कि फ़िर वो मुआ ऑडिट साडिट का चक्कर है? मेरे तो समझ में नहीं आये कि जब इतना बढ़िया खानदानी धंधा चल रहा था तो ये मुए नये धंधे पकड़ने की का जरूरत। खुद तो खानदान की लुटिया डुबो रहा है, साथ में वीरु का भी सत्यानाश करे है।

सांभा : अरे मौसी ...आप तो यूं ही फ़िकर करती हो गब्बर भैया का? ऊ तो का कहवैं कि.. बहुत बडा काम करते हैं...आप चिंता मत किया करो.

मौसी : अरे, चिंता कैसे ना करुं? भाई है मेरा...मैं ही चिंता ना करुंगी तो कौन करेगा? बाप दादा का धंधा संभालता तो आज कित्ता बड़का आदमी होता, सारे मंत्री ऐसे लाइन लगाते जैसे राशन की दुकान पे चीनी की लाइन

सांभा : मौसी तू चिन्ताये मती न, गब्बर भैया तो बस बड़े आदमी बने समझो जरा बस ये लेपटॉप तो पालतू हो जाये

मौसी : का बोला…का बोला…लेपटाप, ये मुआ कोई नया जनावर है का?

सांभा : अरे नहीं मौसी..ये तो बड़के बड़के लोगां के शौक है, राजा महाराजा के…ऊ फ़िल्लम आयी थी, देखो तुमरी जवानी में संजीव कुमार वाली, शंतरज के खिलाड़ी, याद आयी, उसमें वो राजा लोग कैसा खेल खेलते थे, वैसा ही है ये लेपटॉप।

मौसी : हाय हाय तो गब्बर अब धंधा पानी छोड़ के खेल खेलत है, हे भगवान, ये छोरा तो गया हाथ से. बापूऊऊऊउ…क्या मुंह दिखाऊंगी तुम्हें।

सांभा : अरररर मौसी, पिटवाओगी गब्बर भैया से, मैने ये कब कहा कि गब्बर भैया खेलत है, अरे वो भी सुसरी पढ़ाई जैसा है, ठाकुर भैया सिखलाय रहे हैं।

मौसी : हे राम, अब इस उमर में पढ़ाई करत है, काहे, उसके बाप दादा ने कभी पढ़ाई की जो ये कर रहा है, देखत नहीं का? गांव के सब स्कूल पास लौंडे मारे मारे फ़िरत हैं दो दो चार आने की बेगार करे हैं और तू…देख कैसा मौज करे हैं और वो कालिया…। मैं पहले ही बोली थी गब्बर को, ये मरे ठाकुर की सौबत में मत पड़ , मत पड़, बर्बाद हो जायेगा, पर सुने तब न

सांभा : अरे नहीं नहीं मौसी, ठाकुर भैया तो उन्हें ब्लागिंग करना सिखाय, अब देखो, गब्बर भैया कित्ते बड़े आदमी बन गये , पहले तो सौ कोस दूर तक गब्बर भैया का नाम था अब तो दुनिया के चप्पे चप्पे में लोग उन्हें जानत हैं, प्यार करत हैं। हम तो ठाकुर भैया को बोले हमें भी तनिक सिखलाय दो इ मुई ब्लागिंग, हमें भी कोई इक बार क्यूट कह दे झूठा ही सही।

मौसी :ह्म्म, तो ये मुई बिलागिंग ने सत्यानास किया है मेरे गब्बर का, पहले वो छमिया आयी थी बर्बाद करने। कौन गांव से है ये मुई ब्लागिंग, चल अभी उसका झोंटा काट उसके हाथ न दिया तो मेरा नाम भी जगत मौसी नहीं, हां
sssss नहीं तो।

सांभा : अरे मौसी , तुम भी न , बस न आव देखती हो न ताव बस झट से डंडा निकाल लेती हो, अब बिना समझे ही चढ गई ना हुक्का पानी लेके? अरे ई ब्लागिंग कोई माहतारी नहीं ये तो एक विधा है, तुम भी सिखल्यो ना ई बिलागिंग अब छोड़ो ये आचार बनाने, ब्लागिंग सीखो ब्लागिंग, फ़िर देखो, तुम भी बड़की हो लोगी

मौसी : अरे हट परे मुए, अब क्या मेरी उमर है बड़का होने की? तेरी ये ब्लागिंग कोई दाम भी दिलाये की बस टाइम खोटी? गब्बर कुछ कमाता धमाता भी है की ना

सांभा, मौसी के सामने गब्बर की पोल खोलते हुये


सांभा : अरे मौसी..तुम भी का बात करती हो? अरे लेपटोपवा है तो ई समझ ल्यो कि पैसा ही पैसा है
मौसी आंखे बडी करके कहती है : वो कैसे ?
सांभा : अरे मौसी, अब देखो, डाका डालना हो तो पहले खबरी का खर्चा, फ़िर कम से कम दस घोड़े का खर्चा, एक एक घोड़ा, साठ सत्तर हजार का आता है, फ़िर घास भी कित्ती मंहगी हो रेली है आजकल, आदमियों का खर्चा सो अलग, और फ़िर पुलिस का खटका हुआ तो उल्टे पैर भाग लेते है, कित्ता लुकसान हो जाता है, समझ रही हैं न ?

मौसी : का मतलब है तुहार सांभा..?

सांभा : अरे मौसी..ऊ देखो ना..अब कालिया पकडे गये हैं...उसे छुड़वाने का खर्चा , भले गब्बर भैया ने ठाकुर को कह दिया,,वो छुडवा भी देंगे..पर खर्चा तो देना ही पड़े न, इसमें तो फ़ौरन काम चालू..

मौसी : सांभा..ई का ताऊ जैसन पहेलियां बुझा रहा है? कालिया..पकडा गया..ठाकुर छुडवा देगा? काम चालू..साफ़ साफ़ बता...

सांभा : अब मौसी..हम का बतायें..कि कालिया के साथ साथ ठाकुर ...गब्बर भैया का माल भी छुडवा देंगे....

मौसी : माल भी छुडवा देंगे...का कह रहे हो सांभा? कौन सा माल..

सांभा : अरे मौसी..जब गब्बर के आदमी पकडे जाते हैं तो माल भी तो साथ मे पकडा जाता है ना?
अब मौसी ने लठ्ठ हाथ मे ऊठाया और सांभा पर तानते हुये बोली - देख बचूआ..तू हमका सही सही बता वर्ना आज तेरी हड्डी पसली हम तोड ताड के रख देंगे..

सांभा : अब देखो मौसी..आप खाम्खाह मे हमारे उपर तो नाराज हो मति..हमरा आपके सिवा और हैईये कौन? और आप हमारा हड्डी पसली तोड कर भी अपना ही नुक्सान करवा लेंगी...काहे से कि हमारी दवा दारू भी आपको ही करवानी पडेगी ना बुढौती मे...

मौसी ने एक लठ्ठ दिया सांभा को घुमाकर...और बोली ---बातें बाद मे बनाना मुए..चल अब सही सही बता सब कुछ मेरे को. नही तो अब और पिटेगा.

सांभा - अरे मौसी इत्ती जोर से क्युं मारती हो? आव देखती हो ना ताव..बस जब मन हुआ घुमाय दिया लठ्ठ सांभा की खुपडिया पर...हम बताये देत हैं...ऊ का है ना कि गब्बर भैया को ठाकुर की हवेली मे जाये बिना चैन नही है और ऊंहा..ठाकुर साब उनको नशा पानी पिलवाय देत हैं...बस नशा करके ..

मौसी बीच मे ही टोक कर...तो अब क्या गब्बर नशा भी करने लगे हैं?

सांभा - अरे मौसी... ई हम कब कहत हैं? ऊ तो ई होत है कि ..नशे के बाद गब्बर बडा रोमांटिक हो जाता है और फ़िर ऊ जो कौन बंजारन है...का नाम है.. अरे मौसी ऊ ही जो सिप्पी साहब की फ़िल्लम मे बडे ठुमके लगाके नाची रही...ऊ ...हां शायद हेलनवा या ऐसन ही कोनू नाम रहा.. अबहिं नाम याद आने पर पक्का बताते हैं...बस ऊसको बुलवाकर ठुमके उमके की महफ़िल लगा लेत है...

मौसी फ़िर से बीच मे बोली ---हे राम..मेरे तकदीर फ़ूटे..इस लडके ने तो सारा कुल का नाम मिट्टी मे मिलाय दिया..अब क्या कसर रह गई? हे भगवान..यही कमी थी..अब नशा और उसके बाद नाच..गाना..छि: छि:....सांभा....

सांभा - अरे मौसी ई तो कोनू बडी बात नही है...अब का है कि इन बंजारण कि महफ़िल मे खर्चा भी बहुत बडा आता है..सब नवाबी शौक हैं..तो जब पैसा की जरुरत लग पडे तो गब्बर कहां से लाये....ई तो पूछो जरा हमसे?

मौसी बीच मे ही.. अबे मुए बतायेगा भी कहां से लाता है इतने पैसे गब्बर? या दूं घुमा के? मौसी लठ्ठ तानती हुई बोली.

सांभा खींसे निपोरते हुये बोला - अरे मौसी ...वही तो समझा रहे थे न, पैसे पाने के लिए डाके डालने पड़ते हैं, लेकिन अब तो वो सबहे काम लेपटॉप पर झूला झूलते झुलते हो जाता है, काहे गधे घोड़े की खिटपिट मोल लेनी?

मौसी: सांभा, तू पगला गया है या मुझे पगला देगा, अब क्या ये तेरे लेपटॉप से पैसा निकलता है?

सांभा: नहीं मौसी, ठाकुर ने ऐसे ऐसन गुर सिखा दिये है गब्बर भैया को कि किसी का घर में घुसने की जरूरत ही नाहीं, बस लेपटॉप खोलो, किसी के भी बैंकवा में घुसो और वारे न्यारे, क्या समझीं…॥ ही ही ही... अरे मौसी, इसी लिये तो कहूं हूं कि तू भी सीख ले ये खेल फ़िर तू भी पैसा कमाना, छोड़ ये आचार वाचार के चक्कर्। कब तक बनाती रहेगी?

मौसी: अच्छा ssssss. चल फ़िर मैं भी जरा चलूं ठाकुर के घर,
ब्लाग बिना चैन कहां रे,
ब्लाग बिना चैन कहां रे
सोना नहीं चांदी नहीं ब्लाग तो मिला
अरे ब्लागिंग कर ले


गब्बर और सांभा वापस ठाकुर की हवेली में : ताऊ की शोले

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ताऊ की शोले (एपिसोड - 3)
लेखक : ताऊ रामपुरिया और अनिता कुमार
एपिसोड निर्देशक : अनिता कुमार


गब्बर और सांभा सूरमा भोपाली से मिलने थकेले घोड़ों पर चढ़ते ही हैं कि सांभा घोड़े की लगाम खींच लेता है, गब्बर थोड़ा आगे निकल जाता है तो देखता है कि सांभा साथ साथ नहीं है, पीछे मुड़ कर देखता है तो सांभा अपने घोड़े पर बैठा दो दिन की बड़ी दाढ़ी खुजिया रहा था और घोड़ा जमुहाइयां ले रहा था, गब्बर ने आवाज लगाई

गब्बर: अरे ओ कामचोर…क्या हुआ?

सांभा : ( धीरे से आगे आते हुए) सरदार मैं सोच रहा थाssssss

गब्बर: अबे जो काम तेरा नहीं वो काहे करे है। की खुजली हो रयी है जी तेरे को?

सांभा: सरदार ठाकुर साब तो हैं आप के दोस्त्…

गब्बर: हां! तो फ़िर?

सांभा: सरदार, वो भी तो इत्ते साल थाने में घंटी बजाय रहे, सूरमा भोपाली से मिलने को इत्ती दूर जाने की क्या जरुरत, ठाकुर ने बोलो घंटी खड़का दें बस्…॥

गब्बर: ( अपनी गंदी दाड़ी खुजाते हुए) बात तो तूने पते की की, सूरमा से तो मिले घणा वख्त हो गया, ठाकुर ते रोज मिले से, हां चल चल उधर ही चलते हैं..
 
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सांभा का घोडा भी सरदार के पीछे हवा की तरह उड  लिया !

gabbar-on-horse1

गब्ब्रर ने घोडे को सरपट ठाकुर की हवेली की और लपका दिया !



और दोनों ने फ़ुर्ती से अपने घोडे सरपट ठाकुर की हवेली की तरफ़ दौडा दिये ।

ब्लागिंग करता ठाकुर गब्बर-सांभा को वापस आता देख चौंक ऊठता है.

ठाकुर अपनी हवेली के बाग में झूले पे बैठा है, आखें लैपटॉप पर गड़ी, उंगलियां ऐसे चल रही है मानो लैपटॉप न हो पियानो हो, होठों पे गीत है बाप्पी दा इश्टाईल में:

ब्लॉगिंग बिना चैन कहां रेSSS
कॉमेन्टिंग बिना चैन कहां रेSSS
सोना नहीं चांदी नहीं, ब्लॉग तो मिला
अरे ब्लॉगिंग कर लेSSS
गब्बर भी घोड़े से उतर कर नाचने लगता है।

सांभा: सरदाssssर क्या कर रहे हो? भूल गये हम काहे आये?

गब्बर : ओह! हाँ , ठाकुर, क्या बात है आज तो बड़े अच्छे मूड में हो

ठाकुर: अरे ! तू फ़िर आ गया? अभी अभी तो गया था।

गब्बर: हां सरदार एक मुश्किल आन पड़ी है ।
लेकिन ठाकुर जब लैपटॉप के साथ हों ( यानी कि अपनी दूसरी रानी के साथ, ठकुराइन लैपटॉप को अपनी सौत जो कहती है) तो अपना मूड किसी को खराब करने की परमिशन नहीं दे सकते, लेकिन गब्बर दोस्त है, उसे कह भी नहीं सकते थे ‘तख्लिया’ इस लिये गीत बदल लिये..

ठाकुर झूम कर गा रहे है....

जब सर पे ख्याल मंडराएं,
और बिल्कुल रहा ना जाए।
आजा प्यारे ब्लॉग के द्वारे,
काहे घबराए? काहे घबराए?

सुन सुन सुन, अरे बाबा सुन
इस ब्लॉगिंग के बड़े बड़े गुन
हर बलॉगर बन गया है पंडित
गूगल भी थर्राए।
काहे घबराए? काहे घबराए?

गब्बर: ठाकुर क्या बके जा रहे हो, मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा.

ठाकुर: यार अब शाम के समय तू कोई प्रोब्ल्म व्रोब्लम तो सुना मति, साला माथा ठनक जाएगा, अभी अभी राधा गरमा गरम चाय की प्याली थमा कर गयी है, तू बता पियेगा तो आवाज लगाऊं

गब्बर: (रुआंसा होता हुआ बोला) नहीं ठाकुर, मैं ने तो सुना था तुम अपने वचन के बड़े पक्के हो, प्राण जाएं पर वचन न जाएं बोला था न ?

ठाकुर: ये हमने कहा था? गब्बर तेरी यादाश्त को क्या हो गया है, अबे बावली बूच.. ये तो दशरथ ने कहा था और देखा न उसका क्या हाल हुआ? मुझे क्या मूड़मतियों का सरदार समझा है?
( गब्बर चुपचाप अनमना सा बैठा रहता है, ठाकुर का मूड उखड़ रहा है, वो कहता है)

ठाकुर: अच्छा चल एक शर्त पे मैं तेरी बात सुनुंगा। अपनी बात कहने से पहले तू एक गाना गा के मेरा मूड ठीक कर।
(गब्बर गाने लगता है)

तुम तो ठहरे बलॉगवाले
साथ क्या निभाओगे।
सुबह पहले मौके पे
नेट पे बैठ जाओगे।
तुम तो ठहरे बलॉगवाले
साथ क्या निभाओगे।
ठाकुर मुस्कुराता है

ठाकुर: अच्छा बच्चू हमरी जूती हमारे ही सर, इसका मतलब तू चोरी चोरी मेरा ब्लोग पढ़ता है, मुझसे तो कहता था कि तुझे पढ़ना लिखना नहीं आता। बोल क्या चाह्ता है बच्चा।

गब्बर: खाकी वर्दी वालों ने कालिया को पकड़ लिया

ठाकुर: तो उसे उड़वा दें क्या? अबहिं उस ससुर का एनकाऊंटर करवाये देत हैं...(और मोबाईल निकालने लगता है)

गब्बर: नहीं नही ठाकुर.. उसे तो सरकारी मेहमान नवाजी के मजे लूटने दो, तुम तो मेरा माल मत्ता छुड़वा दो, और दूसरे पुलिस मुझे ढूंढ रही है, थोड़े दिन अपनी हवेली में रहने दो न, हम भी थोड़ी ब्लोगिंग सीख लेगें

ठाकुर: अरे ओ सांभाssss, तू तो घोड़े ले के वापस गांव निकल ले, ये खाकी वर्दी वाले घोड़े की लीद सूंघते चलते हैं

सांभा: जी ठाकुर साहब……

गब्बर : और सुन सांभा...कोई भी पूछे तो ये मत बताना की हम कहां हैं?

सांभा : जी सरदार...हम अब डाक्टर के यहां से दवा लेते हुये मौसी के यहां जा छुपेंगे.....पर मौसी आपके बारे मे पूछेंगी तो क्या जवाब देंगे?

गब्बर : अबे ..तू मौसी को हमारा पता मत बताना..भले तेरी इच्छा हो तो पुलिस को बता देना..पर मौसी को हरगिज नही.
सांभा ने तेजी से घोडा वापस पलटा कर दौडा दिया!


सांभा : नही सरदार..हम मौसी से झूंठ नही बोल सकते....और सांभा घोडे को ऐड लगा देता है...और फ़र्राटे से गब्बर की बात सुने बिना ही गायब हो जाता है.....

राधा और मौसी की मुलाकात : ताऊ की शोले

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ताऊ की शोले (एपिसोड - 2)
एपिसोड निर्देशक : अनिता कुमार


राधा : राम राम मौसी

मौसी : अरे राधा ! आओ आओ, कब लौटीं, रज्जो कैसी है?

राधा : अब का बताएं मौसी, रज्जो दीदी तो चिंता में डूबी आधी हो गयी है। बेटी के हाथ पांव निकल आयें तो मां की नींद तो उड़ जाती है न्।

मौसी: हांsss! सो तो है, पर्…॥

राधा : बस तभी दीदी जय भैया के लिए पूछ रही थीं, सुना है बहुत नाम दाम कमाए हैं, रोज अखबारन में उनकी फ़ोटू छपती है। कहां है आजकल दिखाई नहीं देते?

मौसी: सब राम जी की किरपा है,(मुस्कुराते हुए) राम जी ऐसा होशियार बच्चा सबको देवें। ( मौसी के जुड़े हाथ माथे तक उठ गये) सरकारी घर में मेहमान नवाजी के मजे लूट रहा है।

राधा : सरकारी घर? काहे? चोरी चकारी किए हैं क्या?

मौसी: धत्त! लोगों के घरों में चोरी चकारी करना टुच्चे लोगन का काम है, अपना जय क्या टुच्चा चोर है? अरे मंजा खिलाड़ी है,मंजा खिलाड़ी, नजरें हमेशा सैन्सेक्स पर रहती है और उंगलियाँ पब्लिक की जेब पर। मजाल है किसी को कानों कान खबर भी हो जाए। इसको कहते हैं बिजिनेस मेन… मेरे जय के आगे तो हर्षद मेहता भी पानी भरता है। उसकी शागिर्दी करने को मंत्रियों के बेटों की लाइन लगी रहती है। लोग घर आ के पैसे दे जाते हैं उसकी कंपनी में हिस्सेदारी पाने को वो काहे चोरी करे भला? फ़िर कभी ऐसे इंसल्ट की तो अच्छा न होगा, हांssss।

राधा और मौसी रिश्ते की बात करते हुये

राधा : अरे नहीं नहीं मौसी, मैं गांव की गंवारन ये शहर की बातें क्या समझूं, लड़की की सगी मौसी हूँ तो इतना तो पूछना पड़ेगा न कि सरकारी घर जाने का सौभाग्य कैसे मिल गया? वो तो बड़े भाग वालों को ही नसीब होता है। जो जाता है मिनिस्टर बन के बाहर निकलता है। अपना जय भी…?

मौसी: अरे राधा, बिजिनेस मैन को बहुत दूर की सोचनी पड़ती है, अब देखो, आज कल मंहगाई कित्ती बढ़ गयी है, फ़िर तू तो जानती है जय और वीरू के आपसी भाईचारे के चर्चे आम हैं। जय ने सोचा, वीरु तो आये दिन सरकारी मेहमान बना ही रहता है, काहे न अपना दफ़तर सरकारी घर में ही खोल लें, न रोटी की चिंता तो न सिक्युरटी की, न मुलाजिमों को पगार देने की चिंता( सरकार देती है न पगार उन्हें), न लेनदारों से बचने का झंझट्। है न बड़िया तरकीब्।

राधा :
हांssss! सो तो है। मौसी, जय कब तक लौटेगा (छूटेगा) ?

मौसी: अरे लौटने का क्या है? वहां कौनहू परेशानी है का? जैसे ही रेड अलर्ट का कारड गोरी पुलिस वापस ले लेगी जय और वीरू लौट आयेगें, अभी तो लापता की लिस्ट में नाम डलवाए दिए हैं।

राधा : जय हो मौसी, तुम्हारा भी जवाब नहीं। और सुनाओ, वीरू के क्या हाल हैं, वो क्या करता है, वो भी कुछ कमाता वमाता है कि सब जय भैया पर छोड़ दिये हैं।

मौसी: अरे कमाता क्युं नहीं, वीरू के तो मजे ही मजे हैं। गुरुदेव की बात सुनो तो नैया पार हो जाती है। उसके मास्साब बोले कि अगर काम में भी उतना ही आनंद आने लगे जैसे खेल में तो जिन्दगी भर काम नहीं करना पड़ता, खेल का खेल और कमाई की कमाई। अपने सचिन तेंदुलकर को ही देख लो।

राधा : ( आखें बड़ी करते हुए ) हैं? तो मौसी अपना वीरु क्या क्रिकेट स्टार बन गया?

मौसी: नहीं मैं ने ये कब कहा? क्रिकेट तो वो तब खेलता है जब टी वी पर मैच देख रहा होता है। उसे सब पता होता है कि कौन कितने चौके लगायेगा और कौन सी पारी जीतेगी।

राधा : अच्छाsssssss। वो कैसे?

मौसी: अरे ये सब अंदर की बातें हैं। ऊ सारे क्रिकेटिया उस से पूछ कर ही तो खेलते हैं। जियो और जीने दो।

राधा : तो मौसी जब क्रिकेट मैच न हो तब क्या करते हैं वीरु

मौसी: अरे तुम क्या उसे आलतू फ़ालतू समझी हो? बहुत बिजी है अपना वीरू, जूँ निकालने की भी फ़ुरसत न है उसे, बाप का नाम रौशन करना है।

राधा : (चौंक कर) बाप का नाम रौशन करना है? मतलब आप के भाई? क्या करते हैं आप के भाई?

मौसी: ( गर्वित हो कर) समाज सुधारक हैं और क्या, पुलिस को चुस्त रखते हैं।

राधा : आप के भाई पुलिस के कप्तान है क्या?

मौसी: ( गुस्सा होते हुए) तुम मेरे भाई को भी नहीं जानती और रिश्ता मांगने आई हो?

राधा : हमका माफ़ी दैइ दो मौसी जी कभी देखे नहीं न हम, का नाम है आप के भाई का?

मौसी : गब्बर! यहां से सौ सौ कोस जब कोई बच्चा रोता है तो मां कहती है 'सो जा बेटा, नहीं तो गब्बर आ जायेगा'।

(राधा घबरा कर माथे का पसीना पौंछती है और सोचती है कि ऐसे घर में अपनी भांजी का रिश्ता देना ठीक न होगा, प्रत्यक्ष रूप से कहती है)

राधा : बड़े हीरे भतीजे हैं आप के मौसी मानना पड़ेगा।

मौसी: हांss! वही तो हम कह रहे हैं, रज्जो को ऐसे दामाद टॉर्च ले के ढूंढने से भी न मिलेगें, लेकिन मैं एक बात पहले ही बता दूँ ।

राधा : अब भी कुछ बताना बाकी है मौसी?

मौसी: अरे असली बात तो अब करेगें…रज्जो से कह देना इतने होनहार दामाद कोई पके आम नहीं कि तुमने नजर उठाई और टपक गये। एक चार कमरे का बड़ा अच्छा सा मकान देखा है मैं ने, अब भई सरकारी खातिरदारी की आदत पड़ गयी, ये बड़े बड़े कमरे, तो छोटे घर में तो पांव भी न समायेगें न्। पास ही में होन्डा सिटी की भी ये बड़ी सी दुकान है, आजकल डिस्काउंट भी चल रहा है। तुम तो बस बाजू वाले मॉल में चली जाना, आजकल फ़्रिज, होम थिएटर, ए सी, सब एक ही छत के नीचे मिल जाता है, राम भला करे इस सरकार का, कित्ता ख्याल रखती है अपनी पब्लिक का, ठंडे ठंडे में आओ और सारी ख्ररीददारी एक ही छत के नीचे। और हां, दो तीन नौकरानियों का इंतजाम करना तो भूलना मती, क्या है न, जय और वीरू को अब मालिश कराने की आदत पड़ गयी है न, संजीव तिवारी के मेहमान बन लिए थे छ: महीने, बस तब से ऐसी नेक आदत का आरंभ हो गया। बकिया फ़िर कल बता दूंगी।

लो चाय भी आ गयी। अब देखो तुम रिश्ता ले कर आयी हो तो ज्यादा पूछने की कोई बात है नहीं फ़िर भी शादी ब्याह का मामला, आजकल के जमाने में तो पता नहीं लड़कों को क्या हो गया है, लड़की को घुमाये बिना शादी करने को राजी ही नहीं होते। खैर ज्यादा पूछने की तो मेरी आदत नहीं ये रज्जो कि बिटिया के बारे में भी तो कुछ बताओ।

राधा : अब मौसी, अपने मुंह अपनी भतीजी की तारीफ़ करते तो अच्छा नहीं लगता न, पर सुन्दर ऐसी कि उस पर नजर नहीं ठहरे ( फ़िसल कर पास खड़ी लड़की पर ठहरे), शर्मीली इतनी कि आप सारा दिन उनके घर पर रह लिजीए आप को उसकी शक्ल तक न दिखाई देगी।

मौसी: हाय! हाय! तो क्या सारा दिन कमरे में बैठी रहती है?

राधा : अरे नहीं मौसी, घर के बाहर रहती है, और फ़ुर्तीली इतनी कि धन्नो से भी ज्यादा तेज अपनी स्कूटी चलाती है। वो देखो ..वो भागी जारही है सामने से ही..देख लो आप भी.....

राधा की भतिजी मटर गश्ती करते हुये


मौसी: वो सब तो ठीक। घर का कामकाज भी कुछ जाने की नहीं?

राधा :
हां मौसी करती क्युं नहीं, करती है न्। नहाना धोना, बनना संवरना, ये सब घर पर ही तो होता है कोई पब्लिक शौचालय में थोड़े ही।

मौसी: कुछ पढ़ी लिखी भी है कि नहीं?

राधा : पढ़ी लिखी है न, बहुत पढ़ी लिखी है, सलीमा हॉल में लगे पोस्टर यूँ फ़रार्टे से पढ़ती है और मौसी जब मोबाइल पे एस एम एस करती है न तो ऐसे लगता है मानो उंगलियां थिरक रही हों।

मौसी: अब तू तो जाने है बसंती आज कल के लड़कों को तो कमाऊ बीबी चाहिए, तो ये कुछ कमाती भी है कि नहीं?

राधा : हां हां मौसी, कमाती क्युं नहीं, खूब नाम कमाया है उसने, गली के एक एक लड़के के मोबाइल में उसका नंबर दर्ज है, इतनी पॉप्युलर है हमारी बिटिया।

मौसी: अरेएएए! मेरा मतलब है कि कुछ पैसा कमाती है कि नहीं?

राधा : अब मौसी सब को मोबाइल नंबर दिया है तो कमाई भी हो ही जायेगी।

मौसी: ह्म्म! वैसे नाम क्या है रज्जो की बेटी का

राधा : ( कुछ शरमाते हुए, कुछ मुस्कुराते हुए) 'लाजो'