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"अहंकार"

 
युगों पुराना मेरा अहंकाahankar
जरासी चोट लगते ही

क्यों गुंजायमान हो गया 
जब जब विराट हुआ
मेरी  विजय का मान होता रहा  

दो कौडी का ये अहंकार
छोटों को लताडने और
बडॊं को दिखाने के काम आता रहा
ना अस्त्र ना शस्त्र से टूटा
टूट तो एक भावुक से क्षण मे
अहम को छोड़  अंतरात्मा मे
झांका तो इस एहसास का भान हुआ
अहंकार कोरा अहंकार ही है

और टूटना इसकी नियति है.
 
(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)