आज कल सब जगह दास केपिटल , पूंजीवाद और मार्क्स वाद की बाते और उनको समझने की चिंताएं सब तरफ़ लगी हुई हैं ! और ताजा विषय या समस्या भी आज कल यही है ! जाहिर सी बात है की चर्चा भी इसी पर होगी ! अनवरत पर श्री द्विवेदी जी भी लगातार दास केपिटल को याद कर रहे हैं ! भाई पित्सबर्गिया ने फिरंगियों के यहाँ आए इन खतरनाक परिणामो की तरफ़ ध्यान खींचा है !
ये पोस्ट मैं ३० अक्टूबर भाई दूज को लिख रहा हूँ ! आज छुट्टी है ! दीपावली की व्यस्तता भी निपट गई है ! बिल्कुल फुर्सत है ! और आज जम कर आराम करने का दिन है ! ब्लॉग जगत में पोस्ट का अकाल पडा है ! इसी कमी को पूरा करने के लिए हम लगातार यह छठी पोस्ट आज लिख रहे हैं ! :) वैसे अनूप शुक्ल जी ने आज भी चिठ्ठा चर्चा का क्रम नही टूटने दिया ! आज चिठ्ठा चर्चा करना था हमारे गुरुदेव समीर जी को ! पर वो आज सुबह सुबह सुदर्शनाओं के पीछे निकल लिए और भूल ही गए चिठ्ठा चर्चा भी करना है ! पर ये मैं किधर निकल लिया ? अनर्थ (अर्थ) की बात करते २ कहाँ आ गया ?
आज ही कई ऐसे ब्लाग्स पर भी जाने का समय मिला जहाँ व्यस्तता की वजह से जाना नही होता ! एक ब्लॉग पर चिंता दिखाई गई है की अमेरिका की बेवकूफियों की सजा हम क्यों भुगते ? बात तो देखने में बिकुल सही लगती है ! पर मैं एक बात कहना चाहूँगा की जब दुनिया की जी. डी. पी. का २५ प्रतिशत अमेरिका से आता है तो आप अमेरिका की परेशानियों से ख़ुद को अलग कैसे कर सकते हैं ! तो आप को ये समझना चाहिए की समस्या तो पैदा हो चुकी है अब वो चाहे जिसकी भी बेवकुफ्फियाँ रही हों ! आख़िर आज हमको इस मुकाम तक या कहे इस मंजिल तक पहुंचाने में भी इन्ही बेवकूफों का हाथ है ! आप या मैं इससे इनकार नही कर सकते ! इस स्थिति को आप मा. चंद्रशेखर जी के समय गिरवी रखे गए सोने से अच्छी तरह समझ सकते हैं ! वो समय हर भारतीय के लिए बड़ा पीडा दायक था ! आप कहाँ से कहाँ आ गए हैं ! ज़रा सोचिये इन्ही बेवकूफों का डालर आप पर बरसा था ! ये अलग बात है की आई.टी. के बदले बरसा ! पर बरसाने वाले बादल तो इन बेवकूफों के ही थे !
आज कल बैंको के बारे में भी अच्छी खासी चर्चा हो रही है ! और इस बारे में श्री द्विवेदी जी की उपरोक्त पोस्ट में और टिपनीयो में भी अच्छी चर्चा है ! लाख टके का सवाळ है की हमारे बैंक वर्त्तमान परिदृश्य में कितने सुरक्षित हैं ! एक निजी बैंक की संभावित समस्याओं के बाद रिजर्व बैंक और वित्-मंत्री जी ने उनके सुरक्षित होने की बात कही ! इस बात पर कितना विश्वास करे और इस ग्लोबलाइजड दुनिया में हमारे बैंक वाकई कितने सुरक्षित हैं ? इस प्रश्न का उत्तर मुझे साफ़ तो नही ही दीख रहा है !
क्या किसी ने कल्पना की थी की अमेरिका की तेजी से बढ़ती गिरवी संपतियां एक बारूद का ढेर थी जो किसी भी वक्त फट सकती थी ! ज्यादातर आर्थिक मुसीबतों के साथ यही होता है ! तुंरत रिजर्व बैंक ने सभी बैंको से उनके लीमन से प्रभावित होने का आंकडा पूछा की वो कितने खड्डे में हैं ? लेकिन लीमन तो इस मुसीबत का एक ज़रा सा हिस्सा भर ही है !
जब बैंक सीधे कर्ज देते हैं तो उनको कर्जदार की हैसियत और जोखिम पता होती है ! लेकिन बैंक जब डेरेवेटिव में पैसा लगाता है या इनमे काम करने वाले को पैसा देता है तो वो यह अधिकार खो बैठता है ! सीधे शब्दों में उसे रिस्क की डिग्री ही पता नही चल पाती ! जयादा से ज्यादा नॉन फंड आमदनी करने के लिए अपनी बेलेंस शीट से भी ज्यादा देनदारिया खरीद लेते हैं !
और असली चिंता की बात यहीं से शुरू होती है ! इसके अलावा भी प्रतिस्पर्धा के नाम पर बैंको ने जिस तरह क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन बांटे हैं ! उनका बैंको पर क्या प्रभाव होगा ! असल में बैंक थोक कर्जे की डिमांड कम होने पर रिटेल कर्जो की तरफ़ आकर्षित हुए उसके पीछे कारण यही था की रिटेल कर्जे एक साथ नही डूब सकते ! और दुर्भाग्य से अमेरिका में हुबहू यही हुवा और वहाँ मौजूद वर्तमान सब प्राईम संकट की ये ही शुरुआत थी !
क्या भारतीय परिपेक्ष्य में क्रेडिट कार्ड का लोन कोई संकट तो नही खडा करेगा ? रिटेल लोन के चक्कर में जिस मुक्त हस्त से क्रेडिट कार्ड बांटे गए हैं , और बांटे जा रहे हैं वो अगर विस्फोटक हुए तो बड़ी मुश्किल हो सकती है ! इनकी वजह से खर्चो में बढोतरी हुई है ! कितने कार्ड्स का लोन इधर से उधर ट्रांसफर हो रहा है ! ये भी कहना मुश्किल होगा की कितना पैसा लौटेगा और कितना डूबेगा ? अगर इस में कोई तीन /चार लाख करोड़ बेलेंसशीट का बैंक डूब गया तो क्या होगा ! एक लाख तक की राशि बीमित है ! इस अनुमान से अगर ऊपर की बेलेंसशीट का बैंक राम नाम सत्य कह देता है तो क्या वो बीमा कम्पनी इतनी बड़ी राशि चुकाने की भी हैसियत रखती है ? मुझे लगता है की आगे पीछे समस्या कहीं ना कहीं से तो मुंह उठायेगी ही !
अभी कुछ समय पहले तक सरकारी बैंको में कुछ की हालत काफी ख़राब थी पर वहाँ कोई भी कभी पैसा निकालने नही पहुंचा ! आज भी सरकारी बैंको में आदमी का ज्यादा भरोसा है ! इस संकट के पैदा होने के बाद की एक रिपोर्ट के अनुसार कुछ सरकारी बैंको की फिक्सड डिपाजिट में १५ से २० % की तेज बढोतरी दर्ज की गई है ! जाहिर सी बात है यह रकम शेयर बाजार या निजी बैंको से निकल कर आ रही होगी !
परन्तु हाल के सब प्राईम घोटाले के उजागर होते ही हमारे यहाँ के एक निजी बैंक के बाहर लाइन लग गयी थी जमा रुपया वापस पाने को ! सारे एटीएम भरने से पहले खाली होने लगे थे ! जबकि वो मात्र अफवाह ही थी ! ऎसी ही अफवाहे किसी रोज बड़ी आफत भी खडी कर सकती हैं ! यहाँ एक बात यह भी सोचने लायक है की इन निजी बैंको के बोर्ड में एक प्रतिनिधी रेग्युलेटर की तरफ़ से भी नियुक्त होना चाहिए , जिससे समय रहते किसी अनहोनी का पता चल जाए ! अब ये अलग बात है की इसमे कानूनी दांव पेच हो ! अपनी आजादी पर कौन अंकुश चाहेगा !
असल में दो और दो तो चार ही होते हैं पर यहाँ वर्त्तमान खेल में दो और दो को पाँच सिद्ध करने की कवायद है ! इसीलिए इसको समझना और समझाना भी थोड़ी टेडी खीर ही है !