प्रिय भाईयो और बहणों, भतीजों और भतीजियों आप सबको घणी रामराम ! हम आपकी सेवा में हाजिर हैं साल 2011 की प्रथम और ताऊ पहेली अंक - 107 का जवाब लेकर. कल की ताऊ पहेली का सही उत्तर है श्री रंग जी मंदिर, पुष्कर, राजस्थान
अब मिस. रामप्यारी आपको आज के विजेताओं और प्रतिभागियों से मिलवा रही हैं.
हाय एवरी वन...गुड मार्निंग...मी राम की प्यारी...रामप्यारी. अब मैं पहेली के विषय में आपको क्या बताऊं? आप को अगर जानने की उत्सुकता है यो यहां चटका लगा कर स्वयं ही जान लिजिये. अब मैं सीधे आपको आज के विजेताओं से मिलवाती हुं. उसके बाद सभी प्रतिभागियों से मिलवा कर मैं अगले सप्ताह तक आपसे विदा चाहूंगी.
सभी प्रतिभागियों का बहुत आभार प्रकट करते हुये रामप्यारी अब आपसे विदा चाहेगी. अगली पहेली के जवाब की पोस्ट में मंगलवार सुबह 4:44 AM पर आपसे फ़िर मुलाकात के वादे के साथ, तब तक के लिये जयराम जी की.
ताऊ पहेली के इस अंक का आयोजन एवम संचालन ताऊ रामपुरिया और रामप्यारी ने किया. अगली पहेली मे अगले शनिवार आपसे फ़िर मिलेंगे तब तक के लिये नमस्कार.
प्रिय बहणों और भाईयो, भतीजियों और भतीजों आप सबको घणी रामराम ! हम आपकी सेवा में हाजिर हैं ताऊ पहेली 101 का जवाब लेकर. कल की ताऊ पहेली का सही उत्तर है Kiradu Temples, Barmer, Rajasthan
अब रामप्यारी किराडू देवालयों से संबंधित कुछ जानकारी आपको दे रही है.
हाय एवरी वन...गुड मार्निंग...मी राम की प्यारी...रामप्यारी.
अब सबसे पहले तो मैं पहेली के विषय में आपको दो शब्द बताऊंगी...दो से ज्यादा भी हो सकते हैं मैं गणित में जरा कमजोर हूं...गिनती आप ही लगा लिजियेगा. और उसके बाद मैं आपको विजेताओं के नाम बताऊंगी. क्योंकि आजकल हीरामन भैया भी छुट्टी पर चले गये हैं तो अब से सारी जिम्मेदारी मेरे मजबूत कंधों पर ही आ पडी है.
ताऊ पहेली 101 में हमने आपको जो चित्र दिखाया था वो किराडू मंदिर श्रंखला के पांच मंदिरों मे से ही था. किराडू को राजस्थान का खजूराहो भी कहा जाता है.
किराडू का प्राचीन नाम किरात कूप है. किरात जाति का महाभारत में भी उल्लेख है. शिव एवम पार्वती को आराध्य देव के रूप में पूजने वाली ये वनवासी जाति है. कहा जाता है कि एक बार किरातों का राजा धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन को पकड़ कर ले गया था. उस समय धर्मराज युधिष्ठर के कहने पर दुर्योधन को किरातों से भीम एवं अर्जुन ने ही छुड़वाया था. किरात कूप यानी आज के किराडू को उसी किरात जाति से संबंध की वजह से किरात कूप कहा जाने लगा.
बाड़मेर से लगभग ३५ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में हथमा गांव के पास पहाड़ी के नीचे ये किराडू के मंदिरों का समूह है. इतिहास विदों का ऐसा मानना है कि इन देवालयों को धार के परमार वंशीय मुंज के भाई के पुत्र दु:शालराज ने या उसके वंश के बाद मे आये शासकों ने ग्यारहवीं शताब्दी में बनवाया होगा.
बाडमेर का नाम आते ही बंजर भूमि, तपती रेत, रूखापन और एक अजीब सी उदासी जैसा भाव ही मन में आता है. दिन में तपती रेत और आसमान से आग उगलते सूरज के बावजूद रात को ठंडी रेत के टीलों के मध्य जब बाड़मेर के लोक संगीत की स्वर लहरियां बज उठती हैं तो सारी उदासी और सूनापन गायब हो जाता है. मौसम की विषमताओं के बावजूद यहां के लोगों में उत्सवधर्मिता गहराई से समाई हुई है.
जब भी मौका मिले, जहां भी मिले, गीत संगीत की महफ़िल अभावों का एहसास भी नही होने देती. ऊपर के विडियो में देखिये कि यहां के लोग संगीत की महफ़िलें कैसे और कहां सजाते हैं? कितना स्वर्गिक संतोष इनके चेहरों पर दिखाई देता है. एक बार इस विडियो को अवश्य देखें, सारी शिकायते भूल जायेंगे और ये जान पायेंगे कि आनंद फ़ाईव स्टार होटलों की महफ़िलों में नही बल्कि असली आनंद तो यहां के लोग लेते हैं.
किराडू में पत्थर पर छेनी से उत्कीर्ण कलाकृतियां उकेरी गई हैं जो सब की सब बेमिसाल हैं. मंदिरों की शायद कभी यहां पूरी श्रृंखला रही होगी परन्तु आज केवल पांच मंदिरों के भग्नावशेष ही दिखाई देते हैं. एक भगवान विष्णु का और बाकी चार भगवान शंकर के मंदिर हैं.
चहुं और खंडहरों में विलक्षण शिल्प बिखरा पडा है, बाहरी भाग अब तक भी कलाकृतियों से पुर्णतया सुसज्जित है. अगर एक पंक्ति में कहना चाहुं तो नींव के पत्थर से लेकर छत तक में कला जैसे बारीकी से उकेरी गई है.
यहां के ४४ स्तम्भ आज भी अतीत को याद करते से लगते हैं. सोमेश्वर मंदिर के पास ही एक छोटा सा शिवालय भी है. यहां पत्थरों का सौन्दर्य पग—पग पर बिखरा पड़ा है. युद्ध कौशल के दृष्य, बिगुल, तुरही, नगाड़े इत्यादि. रामायण की अनेकों दृष्यावलियां..... जैसे सोच में पड़ी बंदर सेना... और एक जगह राम की जांघ पर अचेतावस्था में लक्ष्मण जी सोए हुए हैं.... संजीवनी बूटी के लिये पवनपुत्र समूचा पर्वत ही उठा लाए हैं....समीप ही महाभारत के अनेको दृश्य भी हैं.
बाडमेर घूमने के लिये अगस्त से मार्च तक का समय उपयुक्त रहेगा. बाडमेर रेल से जोधपुर से जुडा हुआ है. नजदीकी हवाई अड्डा भी जोधपुर ही है. यहां का बस-स्टेंड रेल्वे स्टेशन के नजदीक ही है जहां से जोधपुर, बालोतरा, जालोर, जैसलमेर, अहमदाबाद, माऊंट आबू, उदयपुर सहित राजस्थान के सभी प्रमुख शहरों के लिये बसे उपलब्ध रहती हैं.
सभी प्रतिभागियों का बहुत आभार प्रकट करते हुये रामप्यारी अब आपसे विदा चाहेगी अगली पहेली के जवाब की पोस्ट में मंगलवार सुबह 4:44 AM पर आपसे फ़िर मुलाकात के वादे के साथ, तब तक के लिये जयराम जी की.
ताऊ पहेली के इस अंक का आयोजन एवम संचालन ताऊ रामपुरिया और रामप्यारी ने किया. अगली पहेली मे अगले शनिवार सुबह आठ बजे आपसे फ़िर मिलेंगे.
प्रिय भाईयो और बहणों, भतीजों और भतीजियों आप सबको घणी रामराम ! हम आपकी सेवा में हाजिर हैं ताऊ पहेली - 54 का जवाब लेकर. कल की ताऊ पहेली का सही उत्तर है कुंभलगढ फ़ोर्ट
बहनों और भाईयो नमस्कार. आईये अब आज के पहेली के स्थान के बारे में कुछ जानते हैं.
कुंम्भलगढ़ का ऐतिहासिक दुर्ग --------------------------------------
दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर संभाग में नाथद्वारा से करीब २५ मील उत्तर की ओर अरावली की एक ऊँची श्रेणी पर कुंभलगढ़ का प्रसिद्ध किला है. समुद्रतल से इसकी ऊँचाई ३५६८ फुट है. इस किले का निर्माण सन् १४५८ (विक्रम संवत् १५१५) में महाराणा कुंभा ने कराया था अतः इसे कुंभलमेर (कुभलमरु) या कुंभलगढ़ का किला कहते हैं .
कुंभलगढ़, चित्तौड़गढ़ के बाद राजस्थान का दूसरा मुख्य गढ़ है,जो अरावली पर्वत पर स्थित है.कला और स्थापत्य की दृष्टि से विश्व के किलों में कुंभलगढ़ का किला अजेय और अप्रतिम माना जाता है.सूत्रधार मंडन ने इसकी परिकल्पना की और करीब सात सौ शिल्पियों ने दिन—रात अरावली के ख्यात शिखर पर किले को आकार दिया था.
कुंम्भलगढ़ का ऐतिहासिक दुर्ग अनेक कारणों से प्रसिद्ध है.
इसी दुर्ग में ऐतिहासिक पुरूष महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था.
इस अजेय दुर्ग की दीवारें इतनी चौडी है कि इस पर कई घोड़े एक साथ दौड़ सकते है. चीन की दीवार (ग्रेट वॉल ऑफ चाईना) के बाद संभवत: यह दुनियाँ में दूसरी सबसे चौड़ी दीवार वाला दुर्ग है. भारत में सब से लंबी दीवार इसी दुर्ग की है.
इस दुर्ग की खासियत यह है कि यह दूर से नज़र आता है मगर नजदीक पहुंचने पर भी इसे देखना आसान नही हैं. इसी खूबी के कारण एक बार छोड़ इस दुर्ग पर कभी कोई विजय हासिल नहीं कर पाया.
सामरिक रणनीति के तहत राजस्थान के मेवाड़ एवं मारवाड़ क्षेत्र की सीमाओं पर निॢमत ११०० मीटर की ऊंचाई और १३ अन्य पहाडि़यों की चोटी से घिरा यह अनूठा दुर्ग हैं.मेवाड़ की सीमाओं की दुश्मनों से रक्षा करने के लिए मेवाड़ अंचल से बनाये गये ८४ छोटे-बड़े दुर्ग में से ३२ का निर्माण एवं डिजाईन महाराणा कुम्भा द्वारा करवाई गई थी.यह 12 किलोमीटर तक फैला हुआ है और कई मंदिर, महल व बाग इसमें स्थित है.
बादल महल से आस-पास के देहातों का दृश्य दिखाई देता है. गढ़ में केवल सात द्वारों केलवाड़ा से ही पहुंचा जा सकता है.विजय पोल के पास की समतल भूमि पर हिन्दुओं तथा जैनों के कई मंदिर बने हैं.यहाँ पर नीलकंठ महादेव का बना मंदिर अपने ऊँचे-ऊँचे सुन्दर स्तम्भों वाले बरामदा के लिए जाना जाता है. इस तरह के बरामदे वाले मंदिर प्रायः नहीं मिलते. कर्नल टॉड जैसे इतिहासकार मंदिर की इस शली को ग्रीक (यूनानी) शैली बतलाते हैं. लेकिन अधिकांशतः विद्वान इससे सहमत नहीं हैं. यहाँ का दूसरा उल्लेखनीय स्थान वेदी है, जो शिल्पशास्र के ज्ञाता महाराणा कुंभा ने यज्ञादि के उद्देश्य से शास्रोक्त रीति से बनवाया था. राजपूताने में प्राचीन काल के यज्ञ-स्थानों का यही एक स्मारक शेष रह गया है. किले के सर्वोच्च भाग पर भव्य महल बने हुए हैं.
इस सुन्दर दुर्ग के स्मरणार्थ महाराणा कुंभा ने सिक्के भी जारी किये थे जिसपर इसका नाम अंकित हुआ करता था.
महाराणा कुंभा एक कला प्रेमी शासक थे.कला के प्रति उनके इस अनुराग को अविस्मरणीय बनाने के लिए राजस्थान पर्यटन विभाग ने वर्ष २००६ से 'कुंभलगढ़ शास्त्रीय नृत्य महोत्सव 'की शुरूआत की है.
कुंभलगढ़ में इस वर्ष यह महोत्सव २१ से २३ दिसम्बर तक चला.महोत्सव के दौरान दिन और रात में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हुआ.इसमें तीनों दिन प्रात: ११ से अपरान्ह ३ बजे तक तीरंदाजी, पगड़ी बांधना, रस्साकस्सी, रंगोली और मांडणा बनाने की प्रतियोगिताओं के साथ ही राजस्थान के लोक कलाकारों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ हुईं.
अच्छा अब नमस्ते.सभी प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता मे हमारा उत्साह वर्धन करने के लिये हार्दिक धन्यवाद. ताऊ पहेली – 54 का आयोजन एवम संचालन ताऊ रामपुरिया और सुश्री अल्पना वर्मा ने किया. अगली पहेली मे अगले शनिवार सुबह आठ बजे आपसे फ़िर मिलेंगे तब तक के लिये नमस्कार.
महत्वपुर्ण सूचना
इस पोस्ट को तैयार करने मे हमसे भूल हो गई है. श्री संजय बेंगानी जी का जवाब ६ ठे नंबर आया था. जो त्रुटीवश शामिल नही किया जा सका. आज उनके द्वारा ध्यान दिलाये जाने पर इस पोस्ट मे यह सुधार आज दिन में ११:३० AM पर किया गया है.
उन्हे ६ ठे रैंक के हिसाब से ९६ नंबर दिये गये हैं और जो भी अन्य सम्माननिय विजेता इससे प्रभावित हुये हैं उनके अकाऊंट मे अपेक्षित सुधार किया गया है.
संजय बेंगाणी said... मन्ने तो कुम्भलगढ़ लाग रियो है.