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ताऊ साप्ताहिक पत्रिका अंक -36

प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के 36 वें अंक मे हार्दिक स्वागत है.

पिछले सप्ताह श्री अनूप शुक्ल "फ़ुरसतिया" जी ने अपने ब्लाग लेखन के ५ साल पूरे किये. उनको ताऊ साप्ताहिक पत्रिका की तरफ़ से हार्दिक बधाईयां. सचमुच एक बहुत बडी उपलब्धि है. जिस तरह का परिपक्व लेखन वो निरंतरता पुर्वक करते है वो अपने आप मे उनकी लेखनी का मुरीद बनने पर मजबूर करता है. फ़ुरसतिया जी का ब्लाग एक मात्र ऐसा ब्लाग है जहां ताऊ फ़ुरसत मिलते ही उनकी पिछली पोस्टों को पढने मे अपना समय गुजारना पसंद करता है. बहुत कुछ सीखने को मिलता है उनसे. आप भी उनकी पिछली पोस्टों को खंगालिये. अनमोल खजाना है वहां.

ताऊ के पसंदीदा ब्लागर श्री अनूप शुक्ल "फ़ुरसतिया"

पांच साल इसलिये यहां उप्लब्धि कहलायेगी कि पांच साल यहां टिकना ही मुश्किल है. उनके साथ के कितने लोग हैं अब यहां? होने को और भी बहुत से लोग पांच साल पूरे कर रहे होंगे पर जिस तरह की निरंतरता फ़ुरसतिया जी के लेखन मे हैं, और जिस तरह का हौसला उन्होने दूसरे ब्लागर्स को दिया है, यह एक बहुत बडी बात है.

आज वो ब्लाग जगत के चमकते सितारे हैं जो अपने साथ दूसरों को भी सितारे जैसा चमकने का हौंसला देते है. ईश्वर उन्हे कामयाबी दे और वो अपनी हर मुहीम मे कामयाब हों. और हिंदी ब्लाग जगत उनके मार्गदर्शन मे फ़ले फ़ूले.
हमारे परम मित्र श्री अरविंद मिश्रा जी ने "ताऊ की शोले" को लेकर फ़िर से टंकी पर चढने उतरने की याद लोगों को दिला दी. अब ताऊ की शोले मे तो वही टंकी पर चढेगा जिसे आप लोग चाहेंगे. तो आप अपनी अमूल्य राय अवश्य बतायें कि आप किसे टंकी पर चढा हुआ देखना चाहते हैं? देखते हैं आपका अनुमान कहां तक स्क्रिप्ट से मेल खाता है?
और एक खुश खबर यह है कि "ताऊ की शोले" में संगीत निर्देशन का जिम्मा अब संभालेगे श्री दिलीप कवठेकर जी. उनके निर्देशन मे गीत रिकार्डिंग का काम शुरु हो गया है. आप सबका असीम आशिर्वाद हमको मिला है उसके लिये हम आपके आभारी हैं.

पिछले सप्ताह श्री राज भाटिया जी की तबियत थोडी खराब होगई थी. कल उनसे काफ़ी देर बात हुई, वो अब स्वस्थ हैं किसी तरह की चिंता की बात नही है. थोडी कमजोरी है जो जल्द ही दूर हो जायेगी.

उनको माताजी के जाने का थोडा सदमा सा लगा है. यह तो ऐसा सदमा है जिसका भर पाना असंभव है. पर यह दुनिया दारी के विधान हैं जो अपने हिसाब से चलते हैं. आप सबकी शुभकामनाओं के लिये उन्होने आभार व्यक्त किया है. जल्दी ही वो पुर्ववत नियमित हो जायेंगे.


आपका यह सप्ताह शुभ हो.

-ताऊ रामपुरिया

"सलाह उड़नतश्तरी की" -समीर लाल

आज बात करते हैं ईमेल के विषय में.
कृपया ईमेल को ईमेल ही रहने दें, ब्रॉडकास्टिंग का माध्यम न बनायें.

आपने पोस्ट लिखी, बहुत अच्छा किया. आप उसे पढ़वाना चाहते हैं, यह और भी अच्छी बात है किन्तु इस हेतु ईमेल का इस्तेमाल. इस कार्य हेतु एग्रीगेटरर्स हैं. ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत इस कार्य को पूर्ण सफलता से निष्पादित कर रहे हैं. फिर ईमेल किसलिये?

ईमेल निजी वार्तालाप और पत्र व्यवहार के लिए है. ईमेल पता भी निजी ही होता है और आप १०० लोगों को एक साथ ईमेल भेज कर एक तो पते की निजता को भंग कर रहे हैं, दूसरे आप पर विश्वास करके जिसने आपको अपना पता दिया, उसे सार्वजनिक कर आप उसके साथ विश्वासघात भी कर रहे हैं.

आश्चर्य तब होता है, जब सीधे मना करने का भी कोई असर नहीं होता. मानो उस ईमेल को वो इग्नोर कर अपना ईमेल ब्रॉडकास्ट पूर्ववत जारी रखते हैं.

मुझे लगता है कि जिस तरह किसी भी वस्तु के इस्तेमाल के पूर्व जैसे आप उसके संचालन बारे में सारी जानकारी एकत्रित कर जान लेते हैं वैसे ही ईमेल के सामान्य शिष्टाचार के बारे में भी आपको जानकारी एकत्रित कर उसे आत्मसात करना चाहिये.

कहीं ऐसा न हो कि आपकी हरकत से तंग आ कोई आपको ब्लॉक कर दे और फिर आप जब जरुरी कार्य हेतु निजी पत्र भी भेजना चाहें तो वो उस तक न प्राप्त हो.

तो अंत में:

हमने देखे हैं हजारों पते

ब्लॉक होते हुए...

ईमेल को ईमेल ही रहने दो,

कोई और नाम न दो..

बाकी अगले सप्ताह!!

-समीर लाल "समीर"


"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा


सिद्धिविनायक मंदिर -मुम्बई
आप सभी को गणेश चतुर्थी की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें.
'जय गणेश लम्बोदर: वक्रतुण्ड विध्नेश।
गजानन विकट महोदर, शुभकर सुमुख गणेश॥'
देवों में सर्वप्रथम पूज्य देव गणेश के विभिन्न अवतार और अनेक रूप हैं. विवरणगणेश पुराण में और विशद वर्णन मुदगल पुराण में मिलता है.

गणेश के चार अवतारों की कथा उल्लेखनीय हैं:-
१-आदिकाल में दशभुजी आदिगणेशका अवतार ब्रह्मा की सृष्टि की श्रीवृध्दि के लिए हुआ था.
२-सतयुग में मिथिला के राजा चक्रपाणि के दुरदम्य पुत्र सिन्धु के वध लिए षट्भुजी गणेश काअवतार हुआ.
३-त्रेता युग में ब्रह्मा जी की जम्हाई से उत्पन्न दैत्य सिन्दूर का वध करने के लिए शिवपुत्र चतुभुर्जी गणेश का अवतार हुआ.
४-द्वापर में कलिमल के विनाश एवं वेद प्रचार हेतु द्विभुजी गणेश का धूम्रकेतु अवतार हुआ. पाराशर मुनि की पत्नी वत्सला ने गजानन की पूजा कर गणपति को पुत्र रूप में प्राप्त किया जो धूम्रकेतु, शूपकर्ण, सुमुख आदि नामों से जाने गये.

-परशुराम द्वारा दांत तोड़ दिये जाने पर एकदन्त रूप कहलाये .
गौरी सुत गजानन के आठ रूप हैं जो विघ्न नाशक और शुभंकर हैं.
'वेद' मुनि व्यास जी ने बोले मगर लिखने वाले धूम्रकेतु गणेश जी थे.कहते हैं,यही गणेश अन्तरिक्ष युध्द के समय आकाश में धूम्र रूप में छायेंगे और कलियुग का अन्त कर सतयुग का आरंभ करेंगे.
आईये गणेश जी के इस रूप सिद्धिविनायक के बारे में जाने.यूँ तो हमने गणेश जी कि तस्वीरों में उनकी सूँड बायीं तरह मुडी देखी है.जिन मूर्तियों में सूंड दायीं तरफ मुडी हो वह सिदधि विनायक कहलाते हैं. यह रूप सर्वाधिक लोकप्रिय है.और जहाँ ये मूर्तियाँ स्थापित हैं वे मंदिर सिद्धिविनायक मंदिर कहलाये जाते हैं.ऐसी मान्यता है भगवान् शिव की तरह गणेश जी का यह रूप जितनी जल्दी भक्तों से प्रसन्न हो जाता है और मन्नतें पूरी करते हैं मगर क्रोधित भी यह उतनी ही जल्दी हो जाता है.सिद्धि विनायक की दूसरी खासियत यह है कि वह चतुर्भुजी विग्रह है.
चतुर्भुजी विग्रह क्या है--
इस में उनके ऊपरी दाएं हाथ में कमल और बाएं हाथ में अंकुश है और नीचे के दाहिने हाथ में मोतियों की माला और बाएं हाथ में मोदक (लड्डुओं) भरा कटोरा है. गणपति के दोनों ओर उनकी दोनो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि मौजूद हैं जो धन, ऐश्वर्य, सफलता और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का प्रतीक है. माथे पर अपने पिता शिव के समान एक तीसरा नेत्र और गले में एक सर्प हार के स्थान पर लिपटा है. सिद्धि विनायक का विग्रह ढाई फीट ऊंचा होता है और यह दो फीट चौड़े एक ही काले शिलाखंड से बना होता है.इनका यह रूप अनुपम है.

भारत में कई जगह सिध्दिविनायक के मंदिर हैं लेकिन जो मंदिर मुम्बई[महाराष्ट्र ]में है उसकी महिमा अपरम्पार है.ज्ञात हो कि इस मंदिर की न तो महाराष्ट्र के 'अष्टविनायकों ’ में गिनती होती है और न ही 'सिद्ध टेक ’ से इसका कोई संबंध है!जैसा कि महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के सिद्ध टेक के गणपति भी सिद्धिविनायक के नाम से जाने जाते हैं और उनकी गिनती अष्टविनायकों में की जाती है.केवल महाराष्ट्र में ही भगवान गणेश के आठ सिद्ध ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल हैं.
माना यही जाता है कि दाहिनी ओर मुड़ी गणेश प्रतिमाएं सिद्ध पीठ की होती हैं,और यहाँ [मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में] गणेश जी की जो मूर्ती है, वह दाईं ओर मुड़े सूड़ वाली है, इस तरह तो यह मंदिर भी सिद्ध पीठ है.
भले ही यह अष्ट विनायकों में शामिल नहीं है मगर इस मंदिर में होने वाली गणेश पूजा का बहुत अधिक महत्व है ! इस का अंदाजा यहाँ हर मंगलवार को आई भीड़ को देखकर लगाया जा सकता है.इसके अलावा यहाँ हर धरम के लोग पूजा अर्चना और दर्शन करने आते हैं.आये दिन यहाँ आने वाले विशेष व्यक्तियाँ [सेलेब्रिटियों]के कारण भी यह मंदिर सुर्खियों में रहता है.

यह मंदिर मुम्बई के प्रभा देवी क्षेत्र में स्थित है.सरकारी दस्तावेजों के अनुसार इस मंदिर का १९ नवंबर १८०१ में पहली बार निर्माण हुआ था[लेकिन बहुत से लोग इसे संवत् १६९२ में बना मानते हैं.पुराना मंदिर ३.६० x ३.६० मीटर वर्ग के क्षेत्रफल में बना हुआ था.इसका निर्माण स्वर्गीय श्री लाक्स्मन विधु पाटिल ने करवाया जिसके लिए आर्थिक मदद स्वर्गीय श्रीमती द्विबाई पाटिल ने दी थी वे माटुंगा क्षेत्र से अगरी समाज की बहुत ही सम्पन्न महिला थीं.वह निसंतान थीं.एक दिन पूजा करते समय इस मंदिर के निर्माण का विचार उनके दिमाग में आया.
उन्होंने मन ही मन भगवान् गणपति से अनुमति मांगी.और इस तरह मंदिर का निर्माण शुरू हुआ.भगवान गणेश जी कि यह प्रतिमा एक काले पत्थर से काट कर बनवाई गयी .
१९५२ के बाद से यहाँ भक्तजनों कि संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई.१९५२ में ही सड़क कि खुदाई के समय पाई गयी हम्नुमान जी की एक मूर्ति को यहाँ लाया गाया था.जिसकी पूजा अर्चना हर शनिवार को होती है.हर मंगलवार यहाँ डेढ़ से दो लाख तक भक्तजन आते हैं[ऐसा अनुमान है]



मंदिर के ऊपर गुम्बद पर एक कलश स्थापित है.
यह मंदिर पांच मंजिलों वाला है,यहां प्रवचन ग्रह, गणेश संग्रहालय व गणेश विद्यापीठ , अस्पताल भी है.मंदिर के रसोईघर से एक लिफ्ट सीधे गर्भग्रह में आती है यहीं से पुजारी गणपति बाप्पा के लिए निर्मित प्रसाद व मोदक लाते हैं.
१९९१ में महाराष्ट्र सरकार ने इस मंदिर के भव्य निर्माण के लिए २० हजार वर्गफीट की जमीन प्रदान की थी.
इस मंदिर के पुनर्निर्माण के समय यहाँ का गर्भगृह इस प्रकार बनवाया गया कि अधिक से अधिक भक्त गणपति का सभामंडप से सीधे दर्शन कर सकें.अष्टभुजी गर्भग्रह तकरीबन १० फीट चौड़ा और १३ फीट ऊंचा है. गर्भग्रह के चबूतरे पर स्वर्ण शिखर वाला चांदी का बना सुंदर मंडप है, जिसमें श्री सिद्धि विनायक विराजते हैं. गर्भग्रह में भक्तों के जाने के लिए तीन दरवाजे हैं, जिन पर अष्टविनायक, अष्टलक्ष्मी और दशावतार की आकृतियां चित्रित हैं.इनके अलावा पहली मंजिल से भी दर्शन की सुविधा है.

हर साल गणपति पूजा महोत्सव यहां भाद्रपद की चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक विशेष समारोह किस उल्लास और आनंद पूर्वक मनाया जाता है इस से तो कोई भी अनभिज्ञ नहीं है.


“ दुनिया मेरी नजर से” -आशीष खण्डेलवाल

क्या यह सबसे लंबी ब्लॉग पोस्ट है?


कुछ हिन्दी चिट्ठों पर भ्रमण करते वक्त अक्सर लंबी-लंबी ब्लॉग पोस्ट भी मिल जाती है। ऐसे में अचरज होता है कि जब पाठकों के लिए इसे पढ़ पाना ही मुश्किल होता है तो ब्लॉग लेखक ने उस पोस्ट को लिखा कैसे होगा।

शनिवार को मेरे मन में यही जिज्ञासा जागी कि एक बहुत लंबी ब्लॉग पोस्ट को ढूंढ़ा जाए। मैंने थोड़ा सा गूगल को कष्ट दिया और पाया कि हिन्दी चिट्ठाकारी से ज्यादा लंबी प्रविष्ठियां अंग्रेजी चिट्ठों पर मौजूद है। इसी तलाश के दौरान मेरी स्क्रीन पर Living the Dream: A Coincidence Diary ब्लॉग खुला।

इस ब्लॉग की पोस्ट Part Two: The Narrative, Epilogues and Appendices पर जब मेरी नजर पड़ी तो मैं दंग रह गया। इस अकेली पोस्ट की सामग्री को जब मैंने 12 प्वाइंट साइज के साथ एमएस वर्ड पर पेस्ट किया तो इसने वहां 111 पेज बनाए और इसमें 37874 शब्दों की मौजूदगी दिखाई।

इस उपलब्धि के चलते मैं तो इसे सबसे लंबी ब्लॉग पोस्ट की उपाधि दे रहा हूं। अगर आपको इससे लंबी कोई पोस्ट दिखे तो कृपया बताइएगा। यह उपाधि उसी वक्त यहां से सरकाकर उस पोस्ट को दे दी जाएगी।

अगले हफ्ते आपसे फिर मुलाकात होगी.. तब के लिए हैपी ब्लॉगिंग.



"मेरी कलम से" -Seema Gupta


लकड़हारा

एक दिन एक लकड़हारा अपने पोते को ओक के पेड़ के चयन के अनुभव के लिए जंगल में ले गया, जो बाद में नाव बिल्डरों को बेचने के काम आयेगे.

जैसे जैसे वो साथ चलने लगे , लकड़हारा अपने पोते को समझाने लगा कि हर एक पेड़ के उद्देश्य अपनी प्राकृतिक अवस्था में निहित है: कुछ काष्ठफलक के लिए सीधे हैं, कुछ एक नाव की पसलियों के लिए उचित है, और कुछ मस्तूल के लिए लंबा है. इसलिए वो हर एक पेड़ के विवरण के लिए ध्यान दे, और इन विशेषताओं को पहचानने में अनुभव के साथ, किसी दिन वह भी जंगल के लकड़हारा बन सकता है अपने पोते कहा था. किसी दिन वह भी जंगल में लकडहारा बन सकता है अपने पोते के साथ.

तभी पोते ने एक पुराने ओक वृक्ष को देखा, जो शायद कभी भी काटा नहीं गया था, क्योंकि यह नाव बनाने के लिए बेकार था क्योंकि उसके तने छोटे और टेढे मेढे थे, पोते ने दादा से कहा हम इस ओक के वृक्ष को काट लेते हैं कम से कम ये हमारे आग जलाने के काम तो आएगा वरना तो ये बेकार ही है. दादा ने कहा अभी हमे अपना समय नाव बनाने के काम आने वाले वृक्ष को काटने में लगाना है, बाद में लोटते समय हम यहाँ दुबारा आ सकते हैं.



एक विशाल पेड़ काटने के कुछ ही घंटों के बाद, पोता थक गया और दादा से बोला क्या वो कुछ देर ठंडी छाया में आराम के लिए काम बंद कर सकता है? इस पर लकड़हारा अपने पोते को उसी पुराने ओक के वृक्ष के नीचे ले आया , जहाँ उन्होंने उस पेड़ के मुडे अंगों के नीचे ठंडी छाया में विश्राम किया.

थोड़ी देर आराम करने के बाद लकड़हारा ने अपने पोते को समझाया जंगल को और सारी दुनिया को समझने के लिए चौकस नजरो और जागरूकता की आवश्यकता है. कुछ चीजे सहज, लम्बे , सीधे पेड़ की तरह स्पष्ट हैं; अन्य चीजें कम स्पष्ट हैं, और करीब से ध्यान देने की आवश्यकता है, जैसे एक नज़र मे ये टेढे मेढे तने वाला ओक का वृक्ष पहली नज़र में बेकार लगा था मगर जब तुम काम से थक कर चूर हो गये तब इसकी घनी छाया में तुम्हे आराम और सुकून मिला.

लकड़हारे ने फिर कहा तुम्हे हर दिन सावधानी से सीखने के लिए ध्यान देने की जरूरत है की भगवान् ने हर एक चीज़ का सृजन क्यों किया है .जैसे तुमने इतनी जल्दी इस ओक के वृक्ष को बेकार समझ कर आग जलाने को काटने का निर्णय ले लिया. जबकि इसने हमे अपनी छाया तले आराम और सुख दिया.

इसलिए बेटे जो पहली बार में दिखाई देता है वो वैसा नहीं होता इसलिए धीरज रखते हए ध्यान देते हुए सही और गलत की खोज और पहचान करो.




"हमारा अनोखा भारत" -सुश्री विनीता यशश्वी


बागेश्वर

बागेश्वर कुमाऊँ का एक मुख्य पर्यटन स्थल है। यह नीलेश्वर और भीलेश्वर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच सरयू गोमती व विलुप्त सरस्वती नदी के संगम पर बसा है। पुराने समय से ही बागेश्वर को व्यापारिक मंडी के रूप में जाना जाता है। बागेश्वर में प्रतिवर्ष के बागनाथ मंदिर में ही प्रतिवर्ष विश्वप्रसिद्ध उत्तरायणी मेला भी लगता है।

प्राचीन समय में दारमा, व्यास, मुनस्यारी के निवासी भोटियों और साथ ही मैदान के व्यापारी भी इस मेले में आते थे। भेटिया जाति के लोग ऊन से बने वस्त्रों और जड़ी-बूटियों को बेचते थे और उसके बदले में अनाज व नमक इत्यादि जरूरत का सामान यहां से ले जाया करते थे। इसी कारण वर्तमान में नुमाइश मैदान कहे जाने वाले स्थान को पहले दारमा पड़ाव व स्वास्थ्य केन्द्र वाले स्थान को भोटिया पड़ाव कहा जाता था।

बागेश्वर के संगम पर हमेशा ही स्नान पर्व चलते रहता है। अयोध्या में बहने वाली सरयू और बागेश्वर की सरयू नदी एक ही मानी जाती है। सरमूल से निकलकर बागेश्वर से बहते हुए पिथौरागढ़ तक इसे सरयू उसके आगे टनकपुर तक इसे रामगंगा तथा टनकपुर से आगे इसे शारदा नाम से जाना जाता है। तथा अयोध्या में इसे पुन: सरयू नाम से पुकारा जाता है।

बागेश्वर का जिग्र स्कन्द पुराण के मानस खंड में भी किया गया है। इसके अनुसार बागेश्वर की उत्पत्ति आठवीं सदी के आस-पास की मानी जाती है। और यहां के बागनाथ मंदिर की स्थापना को तेरहवीं शताब्दी का बताया जाता है।

1955 तक बागेश्वर ग्राम सभा में आता था। 1955 में इसे टाउन ऐरिया माना गया। सन् 62 में इसे नोटिफाइड ऐरिया व 1968 में नगरपालिका के रूप में पहचान मिली। 1997 में इसे जनपद बना दिया गया।

स्वतंत्रता संग्राम में भी बागेश्वर का महत्वपूर्ण स्थान है। कुली बेगार आंदोलन की शुरुआत बागेश्वर से ही हुई थी। बागेश्वर अपने विभिन्न ग्लेशियरों के लिये भी विश्व में अलग स्थान रखता है।

इन ग्लेशियरों के नाम है-

सुंदरढु्रगा, कफनी और पिण्डारी ग्लेशियर

-विनीता


"नारीलोक" -प्रेमलता एम. सेमलानी


कुरमुरे उपमा

अब तक हमने कुछ अधिक समय लगने वाले खाना बनाने के तरीक़ो के बारे मे जाना. अल्पनाजी वर्मा के विशेष दिशा निर्देशो को पालन करते हुए, हम आज से कुछ ऐसे नाश्तों को बनाने की विधि जानेगे जो चुटकी बजाते ही गरमा गरम तैयार हो जाऍ।

यह रेसिपि भाईयो के लिए बडी ही कारगर साबित होगी. क्यो कि भाभीजी गर्मी की छूट्टियों मे पीहर चली जाऐ, तब आपको आफिस जाने मे देरी ना हो जाए इस डर की वजह से फटाफट घर से निकल पडते है, या जब तक भाभीजी मायके से लोट ना आऐ तब तक आप रोज-रोज होटल का नास्ता-खाना खाते है। जिससे पैसे के साथ-साथ स्वास्थ्य की भी हानि होती है। अत सभी भाई इस को सीख ले। मेरे पति को भी मैने यह इन्सटन्ट बनने वाले नास्ते सिखाऐ थे, उन्होने कुछ रेसिपि तो मेरे किचन के दिवार पर ही लिख दी। आप ऐसा मत करना नही तो...........?

कुरमुरे उपमा Puffed Rice Upama

3 व्यक्तियो के लिये

सामग्री

कुरमूरे 350 ग्राम

लाल टमाटर 1

प्याज 1

हरी मिर्च 1

दालिया पाउडर 50 ग्राम

मुगफली के दाने थोडे से

लालमिर्च पाउडर

धनिया पत्ते

हल्दी

जीरा

नमक स्वाद अनुसार

बनाने की विधी

बर्तन मे कुरमूरे को साफ कर दस मिनट पानी मे भिगो दे। दस मिनट बाद ''कुरमूरो'' को अच्छी तरह से नितार कर इसमे थोडी सी हल्दी,

दालिया पाउडर,लालमिर्चपाउडर, और नमक डालकर, हाथ से या चम्मच से मिला कर अलग से रख दे।

अब एक कढाई ले । उसमे तेल गर्म करे। राई जीरा का छोक दे। इसमे कटे हुऍ प्याज, टमाटर और हरी मिर्च के टुकडे डाले, अब इसमे मुगफली के दाने डाले। अब मसाला मिलाकर रखे कुरमूरो को भी कढाई मे डाल दे। एक मिनट तक पकने दे। बीच-बीच मे चम्मच से हिलाए। अब तैयार गरमा-गरम ''कुरमूरे उपमा'' मे धनिया पत्ती को काट उपर से सजाए।

नोट- भाईयो! मसालो मे कुछ समान(जैसे दालिया पाउडर ) किचन मे आपको नही मिल रहे हो तो भी चिन्ता की बात नही, जो है उसी मे काम चला ले।)

जीवन-विज्ञान


आज मै कुछ अलग तरह की बात करने जा रही हू. कुछ दिन पुर्व मैने अपनी ''ज्ञान-शाला'' के विधार्थियो को ''जीवन-विज्ञान'' की सरल बाते बताई. एक ऎसे विज्ञान की जो जीवन मे मन से ''स्वस्थ'' और ''सपन्न परिवार'' की कोई कल्पना की गई है। तो इन बातो को जीवन मे अपना कर यह सपना भी साकार कर सकते है. देखे, जीवन-विज्ञान कोर्स मे कैसे ''किचन'' एवम ''खान-पान'' को मनुष्य के स्वस्थ- जीवन को अहम भागीदार बनाया है.


* खान-पान मे अनुशासन रखे.

* अपने खान-पान मे सयम रखे.

* जरुरत से ज्यादा नही खाये.

* जितनी भुख हो उतना खाए.

* अपने खाने मे सादगी और स्वच्छता बनाऎ रखे.

* तली हुई चीजो का सेवन कम करे.

* अपने खाने मे हरी सब्जियो और सलादो का प्रयोग करे.

* पेट को साफ़ रखने के लिए दही और मठ्ठे का प्रयोग करे.

* बाहर बनी चीजो से ज्यादा घर बनी चीजो का प्रयोग करे.

* ज्यादा मसाले वाले खाने से दुर रहे.

* खाना खाते समय पानी नही पिये,और खाना खाने के बाद ४५ मिनट तक पानी का सेवन नही करे.

* दोपहर का खाना खाते ही थोडी देर विश्राम ले. रात के खाने के बाद आधा-एक घन्टा टहलने जरुर निकले.

* महीने मे एक उपवास रखे तो पुरा शरीर हल्का हो जाऎगा.

* रात का खाना सुर्यास्त से पहले खाए या खाने के और सोने के बीच चार घण्टे का अन्तराल रखे.

* एक ही समय पर नियमित नास्ता एवम खाना खाए.

* खाने मे उपर से नमक ना डाले.

* निवाले को 32 बार चबा कर खाऎ.

* खाना खाते समय बोले नही. अपनी पानी का गिलास स्वय भरकर बैठे, खाना झुटा नही डाले.



चलते चलते

क्षमा सच्चे अर्थो मे


आज जैनो का पर्व ''संवत्सरी'' है। जिसे हम क्षमा दिवस-मैत्री दिवस के रुप मे मनाते है।

हाथ जोड तन मन वाणी से,

सब जीवो से क्षमा मांगती।

जाने हो चाहे अनजाने,

अपराधो की क्षमा चाहती॥

जीव मात्र के अन्तर्तल से,

फुटे क्षमा भाव का झरना।

वैर नही बस मैत्री भाव हो,

सीखे हिलमिल कर रहना॥

क्षमा वंदनीय, क्षमा जिंदगी ,

क्षमा साधना,क्षमा प्रार्थना।

ताऊ डॉट ईन के पाठको को मेरा शतश: वन्दन,

आपमे गुंजित क्षमा भावना॥

क्षमायाचना दिवस
पर आप सभी से मिच्छामी- दुक्कडम- खमत खामणा एवम भगवान श्री गणेशजी के आगमन पर हार्दीक बधाई के साथ अगले सोमवार तक मुझे आज्ञा दे ।

प्रेमलता एम सेमलानी


सहायक संपादक हीरामन मनोरंजक टिपणियां के साथ.
"मैं हूं हीरामन"

अरे हीरू पेलवान…आज इत्ती लेट क्यूं आ रिये हो पेलवान?

अरे पीरू..मैं जिस इमली के पेड की कोटर मे रहता हूं ना..आज उसमे किसी ने नकली फ़ूल लगा दिये रंग बिरंगे उस्ताद जी..गणेश उत्सव की वजह से..

तो इससे तू क्युं लेट हुआ? हिंया टिपणी छांटने मे मजगपच्ची मैं इकेला ही करे जा रिया हूं?

अरे यार पीरू भाई तम तो खामखा नाराज हो रिये हो..अरे वहां जनता ने जब इस तरह इमली के पेड पर रंगबिरंगे फ़ूल देखे तो ट्रेफ़िक जाम कर दिया.

अबे तो इसमे जाम करने की कौन सी बात आ गई?

अरे देखो खां..तुम दिमाग खराब तो मती करो हमारा..अरे जनता ने चमत्कार समझ के भीड लगा दी थी और क्या?

अच्छा अच्छा..नाराज मत हो पेलवान..माफ़ी मांग लेते हैं..चल टिपणी बता तू तो आज की …

ले पढले पेलवान खुद ही… वो कवठेकर अंकल के घर में एक शेरनी बैठी हैगी..

अरे नही यार...ला जल्दी पढने दे मुझे..

 Blogger दिलीप कवठेकर said...

शेर कहां रहता है?
लगता है, रामप्यारी मौसी को अपने भांजे शेर के बारे में कन्फ़्युज़न हो गया है.
शेर रहता है मांद में, गुफ़ा में, जंगल में , सर्कस में , गिर के अभयारण्य में , और बाकी बचे खुचे लायंस क्लब के मीटिंग में . अब और तो खबर नहीं , हां एक शेरनी मेरे घर में ज़रूर रह्ती है.

August 22, 2009 8:23 PM

  Blogger नीरज गोस्वामी said...

रामप्यारी कित्ता अजीब सवाल पूछन लाग री है तू...अरे जंगल का राजा तो जंगल में ही रवेगा...थारे मारे घर तो रैन से रया...कभी पकडा जावे तो बिचारा चिडिया घर में भी रैने को मजबूर हो जाया करता है...और हाँ जंगल में अपनी मांद में रहता है...और बोल के जवाब दूं?
नीरज

 Blogger अविनाश वाचस्पति said...

एक शेर शायरों की
गजलों में
भी रहता है
पर वो गजलों का राजा
कहाता है रामप्‍यारी
और वो जंगल का
नहीं होता राजा
पर
जंगल में मंगल
जरूर कर देता है।

 

अच्छा पेलवान चल अब गणेशजी की मुर्ति ले आते हैं..फ़िर उनकी स्थापना करते हैं…और फ़िर लड्डुओं का भोग लगाते हैं.

अरे हां  यार मैं तो लड्डुओं को भूल ही गया था..अब तो दस दिन अपनी भी मस्ती..जय गणेश देवा..

आप सबको भी गणेश चतुर्थी की घणी रामराम…गणेश जी आपके सब काम पूरे करें..सब मंगल हो…



ट्रेलर : - पढिये :श्री अविनाश वाचस्पति से ताऊ की खास बातचीत
"ट्रेलर"


"ट्रेलर"


गुरुवार शाम को ३: ३३ पर ताऊ की खास बात चीत : श्री अविनाश वाचस्पति से...पढना ना भुलियेगा.

ताऊ : अविनाश जी कुछ अपने बारे में बताईये?

अविनाश जी : ताऊजी सीधे से कहिए न कि अपना गुणगान करना है।

ताऊ : जी ठीक है..ऐसा ही समझ लीजिये.

अविनाश जी : हूं..तो... झूठा करना है या सच्‍चा करना है?

ताऊ : जैसा आप चाहें? यह आपको मौका दिया जाता है.

अविनाश जी : ..............

याद रखिये गुरुवार शाम ३ : ३३ ताऊ डाट इन पर




अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.

संपादक मंडल :-
मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया
वरिष्ठ संपादक : समीर लाल "समीर"
विशेष संपादक : अल्पना वर्मा
संपादक (तकनीकी) : आशीष खण्डेलवाल
संपादक (प्रबंधन) : Seema Gupta
संस्कृति संपादक : विनीता यशश्वी
सहायक संपादक : मिस. रामप्यारी, बीनू फ़िरंगी एवम हीरामन
स्तम्भकार :-
"नारीलोक" - प्रेमलता एम. सेमलानी

कल शाम 3:33 PM पर ताऊ की शोले! कल शाम 3:33 PM पर ताऊ की शोले! कल शाम 3:33 PM पर ताऊ की शोले!

ताऊ साप्ताहिक पत्रिका - अंक 33

प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के 33 वें अंक मे हार्दिक स्वागत है.

अक्सर किसी को अतिशयोक्तिपुर्ण बातें करने पर यह किस्सा सुनाया जाता था कि जब एक आदमी से पूछा गया कि क्या वो आधा सेर तिल खा सकता है? जवाब मे उस आदमी ने पलट कर पूछा कि तिल पौधे सहित खाने हैं या सिर्फ़ तिल खाने हैं? तो तिल खाने के लिये पूछने वाले शख्स ने उससे हाथ जोडकर कहा कि भाई यह तेरे लिये नही है.

उपरोक्त किस्सा बडे बुजुर्गों और हम उम्र दोस्त मे अनेको बार सुना गया है पर हमेशा यही लगा कि ये किस्सा वाकई अतिशयोक्ति पुर्ण ही है. गांव वालों ने फ़ुरसत के क्षणों मे इसे गढ लिया होगा. पर कल के अखबार मे एक खबर देखकर हमारा माथा घूम गया और हमको लगा कि उपरोक्त किस्सा वाकई किसी बहुत ही अनुभवी ताऊ द्वारा रचा गया होगा.

हुआ युं कि होशियारपुर मे एक बैंक के एटीएम को तोडने मे जब बदमाश असफ़ल रहे तो पूरी की पूरी एटीएम मशीन को ही ऊठा लेगये.

दूसरा किस्सा हुआ नीमच/मनासा (म.प्र.) के पास के गांव में बोहरा मस्जिद स्थित एक दरगाह से १५० साल पुरानी तिजोरी को काटकर माल ले उडे. इस तिजोरी (दानपेटी) को साल मे एक बार ही खोला जाता है और यह १३ अगस्त को खोली जानी थी. इस पेटी मे ५/७ लाख रुपया हर साल निकलता है जो मुम्बई स्थित धर्मगुरु सैयदना साहब के प्रधान कार्यालय भेजा जाता है.

चोरों ने वहां रखी तिजोरी ( दानपेटी ) का ताला तोडने मे अपने को असमर्थ पाया तो उस तिजोरी की उपर की चद्दर काट कर माल ले उडे.

उपरोक्त देनों घटनाएं आज यह साफ़ इशारा कर रही हैं कि हम किस दिशा मे जा रहे हैं. समाज मे पैदा होती जारही आर्थिक विसंगतियां शायद किसी खतरनाक भविष्य की तरफ़ इशारा कर रही हैं? क्या आपको नही लगता कि हमको इस विषय पर सोच विचार की आवश्यकता है?

-ताऊ रामपुरिया


"सलाह उड़नतश्तरी की" -समीर लाल

इधर काफी गर्म माहौल हो चला है.

पहले भी ऐसे ही विषय पर हल्ला बरपा था. विषय रहा -शील और अश्लील लेखन.

क्या शील है और क्या अश्लील-यह तो कतई भी विवाद का विषय ही नहीं है. शीलता और अश्लीलता निर्धारण में प्रमुख मान्यता लेखन के भावों की है और फिर निश्चित ही उद्देश्य आधारित शब्द चयन का महत्वपूर्ण स्थान है.

कुछ शब्द, जो सांकेतिक भाषा में इंगित कर उन पर भावों की बानगी, जिसका उद्देश्य उस शब्द का विरोध या उसके इस्तेमाल पर अपने विचार रखना-मात्र उस शब्द के आ जाने से अश्लील नहीं हो जाता.

बड़े बड़े लेखकों ने सिर्फ स्थिति का जीवंत चित्रण करने के लिए अक्सर ऐसे शाब्दों का पूरा पूरा प्रयोग भी किया है जिसका शायद अन्यथा इस्तेमाल अश्लील माना जाये किन्तु यहाँ भावों की वजह से साहित्य की श्रेणी को प्राप्त हुआ.

थोड़ा अन्तर करना तो सीखना ही होगा. एक चिकित्सा शास्त्र की पुस्तक में इस्तेमाल शब्द अपना अलग उद्देश्य रखता है और उसी का अन्यथा इस्तेमाल अलग.

फिर किसी और के द्वारा अश्लील लेखन आपके अश्लील लेखन को सिर्फ इसलिए तो शील नहीं बना देगा क्योंकि उस दूसरे ने भी ऐसा लिखा और उसका विरोध नहीं हुआ. हो सकता है, उसका उद्देश्य अन्य रहा हो. हो सकता है, उस समय किसी का ध्यान उस तरफ न गया हो या हो सकता कि कोई भी अन्य ही वजह रही हो, मगर हर हालातों में वो आपकी अश्लील लेखनी को शील नहीं ही बना सकता है.

बिन लादेन ने इतने लोगों को मार दिया. हिटलर इतने निर्दोष लोगों का कत्ल कर गया, इतना साबित कर देने से अन्य कोई कत्ल जायज नहीं हो जाता. आपका अपराध अपनी जगह अलग से दर्ज होता है.

उद्देश्य के लिहाज से देश की रक्षा हेतु वीर सैनिकों द्वारा शत्रुओं के सैनिकों को मार गिराना हत्या नहीं, वीरता और कर्तव्य कहलाता है.

गंदगी मिटाने के लिए और गंदगी का ढ़ेर लगा दिया जाये, ये बात तो किसी भी हालत में समझ नहीं आयी. आप अपना क्षेत्र साफ रखें और अन्यों को सफाई के लिए प्रोत्साहित करें, प्रेरित करें एवं एक अनुकरणीय उदाहरण बनें. फिर देखिये, सभी जब ऐसा करने लगेंगे, तो अपने आप सब तरफ सफाई ही सफाई होगी और एक सुन्दर माहौल बनेगा कम से कम आपकी अपनी दुनिया का.

आशा है मैं अपनी बात कहने में कुछ सफल हो पाया और आप मेरा उद्देश्य समझ कर इस पर अमल करने का प्रयास करेंगे.

वैसे तो सभी समझदार हैं, तो फिर आगे अगले हफ्ते.

चाँद पर देख आमद कुछ इन्सानी
चाँदनी आ मेरे अंगना टहल रही है
जबसे बदली है मैने दुनिया अपनी
देखता हूं सारी दुनिया बदल रही है.

--समीर लाल 'समीर


"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा



मणिपुर
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आईये चलें एक नए राज्य की सैर पर..यह राज्य है मणिपुर.
मणिपुर नाम से मणिपुरी नृत्य की याद आ जाती है.बनस्थली में मैंने भी यह नृत्य सीखने की कोशिश की थी. जो पूरी नहीं हुई..खैर,उन शिक्षिका के रूप में पहली बार मणिपुर की किसी महिला से मिलना हुआ. वैसे तो महानगरों में मणिपुर राज्य के लोग आप को अक्सर दिखाई दे जायेंगे.

इन बातों से हट कर ,इस राज्य के बारे में बताती हूँ..

यह राज्य भारत के पूर्वी सिरे पर स्थित है. इसके पूर्व में म्‍यांमार (बर्मा) और उत्तर में नागालैंड राज्‍य हैं , इसके पश्चिम में असम राज्‍य और दक्षिण में मिजोरम राज्‍य और म्‍यामांर हैं.कुल क्षेत्रफल 22,327 वर्ग किलो मीटर है.
इस राज्य में ९ जिले हैं. राजधानी इम्फाल है. भाषा मणिपुरी बोली जाती है.

मणिपुर में भौतिक रूप से दो भाग हैं, १-पहाडियां और २-घाटी
पहाडियों से घिरी मध्य भाग में घाटी है. पहाडियां राज्‍य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 9/10 भाग घेरती हैं! यह पर्वतीय श्रृंखला उत्तर में ऊंची है और धीरे धीरे मणिपुर के दक्षिणी हिस्‍से में पहुंचने पर इसकी ऊंचाई कम हो जाती है.
अधिकारिक site के अनुसार जनसंख्‍या 2,293,896 है.

राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था का मुख्‍य आधार कृषि और संबद्ध गतिविधियां ही हैं लेकिन बढ़ती आबादी के कारण कृषि की हालत भी कमजोर है.

राज्‍य में कृषि के बाद रोजगार की सबसे अधिक संख्‍या प्रदान करने वाला सबसे बड़ा कुटीर उद्योग हथकरघा उद्योग है.मणिपुरकी साडिया,शोलें बहुत प्रसिद्द हैं.हरथकरघा बुनाई का पारंपरिक कौशल यहां की महिलाओं के लिए न केवल आय का स्त्रोत और प्रतिष्‍ठा का प्रतीक है बल्कि यह उनके सामाजिक – आर्थिक जीवन का एक अविभाज्‍य अंग है.सीमा व्‍यापार को बढ़ावा देने के लिए सीमावर्ती शहर मोरेह में वेयरहाउस, सम्‍मेलन कक्ष और ठहरने की सुविधा के लिए एक केंद्र भी राज्य सरकार ने स्‍थापित किया गया है.

प्राकृतिक संपदा से भरपूर--

राज्य में घने और खुले वन है, जो राज्‍य के भौगोलिक क्षेत्र का 77.12 प्रतिशत है!
मणिपुर के उखरूल जिले के शिराय गांव के वनो में स्‍वर्गपुष्‍प कहे जाने वाले शिराय लिली (लिलियम मैक्‍लीनी)फूल मिलते है, जो विश्‍व में किसी भी अन्‍य स्‍थान में नहीं होते.
इसी प्रकार जूको घाटी में दुलर्भ प्रजाति‍ के जूको लिली (लिलियम चित्रांगद) पाए जाते है। ज्ञात रहे कि मणिपुर अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है. यहां कई तरह के दुर्लभ पेड़ पौधे और जीव-जंतु भी पाए जाते है. यह ‘संगाई’ हिरण (सेरवस इल्‍डी इल्‍डी) का भी निवास स्‍थान है, जो विश्‍व की दुर्लभ नस्‍लो में एक है. यह केबुल लामजाओ के प्राकृतिक अधिवास क्षेत्र में पाया जाता है.
1977 में इस अधिवास को राष्‍ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया है-- इसकी अनोखी विशेषता तैरता हुआ पार्क है जिसमें ’फुमडी’ नाम की वनस्‍पति उगती है. संगाई हिरण इसी वनस्‍पति पर निर्भर है.
इसके अलावा भांगोपोकपी लोकचाओ वन्‍यप्राणी अभयारण्‍य को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है.
और हाँ ..यहाँ के वनों में टेक्‍सस बकाटा, जिनसेंग जैसे दुर्लभ औषधीय पौधे भी पाए जाते है.

जानते हैं इस राज्य के इतिहास के बारे में--
ऐसा माना गया है कि ईसा से पूर्व भी यहाँ का इतिहास बहुत शानदार रहा है.राजवंशों का लिखित इतिहास सन् ३३ [तैतीस]से मिलता है.यह इतिहास पखंगबा के राज्‍यभिषेक के साथ शुरू होता है और उसके बाद कई राजाओं ने यहाँ राज्य किया.मणिपुर की स्‍वतंत्रता और संप्रभुता 19वीं सर्दी के शुरू तक बनी रही.मगर उस के बाद (1819 से 1825 तक) बर्मी लोगो ने यहां पर कब्‍जा करके शासन किया.ब्रिटिश शासन ने १८९१ में इस पर कब्जा किया.1947 में बाकि देश के साथ स्‍वतंत्र हुआ. 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने पर यह एक मुख्‍य आयुक्‍त के अधीन भारतीय संघ में भाग ‘सी’ के राज्‍य के रूप में शामिल हुआ था.

21 जनवरी, 1972 को मणिपुर को पूर्ण राज्‍य का दर्जा मिला और उस समय 60 निर्वाचित सदस्‍यों वाली विधानसभा गठित की गईं.

यहाँ मनाये जाने वाले त्यौहार--

कहते हैं मणिपुर में पूरे साल ही कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है..
प्रमुख त्‍योहार हैं-- लाई हारोबा, रास लीला, चिरओबा, निंगोल चाक-कुबा, रथ यात्रा, ईद-उल-फितर, इमोइनु,गान-नागी, लुई-नगाई-नी, ईद-उल-जुहा, योशांग(होली) दुर्गा पूजा, मेरा होचोंगबा, दिवाली, कुट तथा क्रिसमस आदि

मणिपुर कैसे जाएँ?--

१-सड़कें: 3 राष्‍ट्रीय राजमार्ग - i) रा. रा. - 39, ii) रा. रा - 53 और iii) रा. रा १५० हैं.
सभी पडोसी राज्यों से सड़क मार्ग से आवागमन की सुविधा है.
२-उड्डयन: इम्‍फाल हवाई अड्डा पूर्वोत्तर क्षेत्र में राज्‍य का दूसरा सबसे बड़ा हवाई अड्डा है, जो क्षेत्र के क्षेत्र को आइजोल, गुवाहाटी, कोलकाता, सिल्‍चर और नई दिल्‍ली को जोड़ता है.
३-रेलवे: मई 1990 में जिरिबाम तक रेल लाइन पहुंचाने के साथ ही यह राज्‍य भी देश के रेल-मानचित्र में शामिल हो गया है. यह इंफाल से 225 कि.मी. दूर है. इंफाल से 215 कि.मी. की दूरी पर स्थित दीमापुर निकटतम रेलवे स्‍टेशन है.

क्या देखें??-

मुख्‍य पर्यटन केंद्र हैं-—
कांगला, श्री श्री गोविंदाजी मंदिर[जिसे हमने मुख्य पहेली में पूछा था.], ख्‍वाराम्‍बंद बाजार (इमाकिथेल), युद्ध स्‍मारक, श‍हीद मीनार, नूपी लेन (स्त्रियो का युद्ध) स्‍मारक परिसर, खोगंमपट्ट उद्यान, विष्‍णु मंदिर, सेंदरा, मारह, सिरोय गांव सिरोय पहाडिया, ड्यूको घाटी, राज्‍य संग्रहालय, केनिया पर्यटक आवास, खोग्‍जोम युद्ध स्‍मारक परिसर आदि.

''सम्बन्लेई सेकपिल''[sambanlei ]


इम्फाल में ही तीन किलोमीटर दूर गिनिस बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज दुनिया का सब से लंबा पौधा ..Duranta repens Linn.-नीलकंठ के फूल का है.जो आम तौर पर २० फीट से ऊँचा नहीं बढ़ता.
' ''सम्बन ली सेकपिल 'नाम का यह अनोखा पौधा आसमान को जाने वाली सीढ़ी के नाम से भी मशहूर है.इस समय इस की ऊँचाई ६१ फीट है और इसमें ४४ पायदान बनायी गयी हैं.
Shri Moiranthem Okendra Kumbi ने इसे उगाया है और वही इस को इस तरह से बढा कर रहे हैं.विस्तार से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें-http://imphalwest.nic.in/sambanlei.html
पश्चिमी इम्फाल में आप गोविन्द जी का मंदिर देखने जाएँ तो इसे भी देखना न भूलें.

अब मैं आप को इम्फाल के श्री श्री गोविन्दजी के मंदिर के बारे में बताती हूँ--

यह मंदिर १८ वि शताब्दी में राज्यश्री भाग्यचन्द्र के शासन काल में बनवाया गया था. इस मंदिर का खासा ऐतिहासिक महत्व बताया जाता है. यह मणिपुर के पूर्व शासकों के महल के पास ही बनवाया गया था.

इस मंदिर के ऊपर दो खूबसूरत सुनहरे गुम्बद हैं.और बाहर लगी है एक बहुत बड़ी घंटी.मंदिर में मुख्य रूप से विष्णु जी की मूर्ति है जिस के एक तरफ राधा -गोविन्द ,बलराम ,और कृष्ण की मूर्ति हैं उनके दूसरी तरह जनन्नाथ ,बालभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ लगी हुई हैं.

त्योहारों के समय इस मंदिर की रौनक देखते ही बनती है.

होली[दोलिजात्रा ] के समय यहाँ पांच दिन ख़ास आयोजन होते हैं.वह समय यहाँ आने के लिए सर्वश्रेष्ठ है.उन दिनों सारी रात लड़के लड़कियां यहाँ का लोक नृत्य' थाबल चंग्बा 'करते हैं.

देखीये इसी अवसर के कुछ अन्य चित्र -


 

pichkari day in temple

मंदिर में पिचकारी दिवस

 

holi celeb govindjee temple manipur

गोविंद जी मंदिर मणिपुर मे होली उत्सव


इस राज्य के बाद आप को ले चलेंगे किसी ओर राज्य की सैर पर अगले हफ्ते...तब तक के लिए नमस्कार.


“ दुनिया मेरी नजर से” -आशीष खण्डेलवाल


वो याराने


कल मित्रता दिवस था। इस अवसर पर मुझे दुनिया की पौराणिक कथाओं मे वर्णित अमर मित्रताओं की एक झलक को संजोने का अवसर मिला और यह कल एक समाचार-पत्र में प्रकाशित हुई।



अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी.. तब तक के लिए हैपी ब्लॉगिंग :)


"मेरी कलम से" -Seema Gupta


दो दोस्त एक जंगल से गुजर रहे थे , उनकी यात्रा के दोरान किसी विषय पर विचार विमर्श करते करते उन दोनों में आपस में बहस हो गयी और गुस्से में आकर एक मित्र के चेहरे पर दूसरे मित्र ने थप्पड़ मार दिया.
जिसको थप्पड़ लगा उसे बहुत ही दुःख हुआ और उसने बिना कुछ भी कहे रेत पर लिखा " आज मेरे प्रिय मित्र ने मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारा. "

वे दोनों चलते रहे , जब तक उन्हें एक दरिया नहीं दिखाई दिया., दरिया दीखते ही दोनों ने नहाने पर सहमती बनाई. नहाते हुए अचानक जिसको थप्पड़ लगा था वह व्यक्ति डूबने लगा...उसे डूबता देख कर उसके मित्र ने उसकी जान बचाई और उसे दरिया से बाहर निकाल लाया. जब डूबने वाले व्यक्ति ने अपनी घबराहट और डर पर काबू पा लिया तब उसने एक पत्थर पर लिखा " आज मेरे प्रिय मित्र ने मेरी जान बचाई".


जिस मित्र ने जान बचाई और पहले थप्पड़ मारा था वह बोला " जब मैंने थप्पड़ मारा और तुम्हे दुखी किया तब तुमने रेत पर लिखा और अब जब मैंने तुम्हे डूबने से बचाया तो तुमने पत्थर पर लिखा...ऐसा क्यूँ???"

तब दूसरा मित्र मुस्कुराया और बोला , जब हमे कोई दोस्त दुखी करता है तब हमे रेत पर लिखना चाइये ताकि माफ़ी की हवाए उसे मिटाने को चलने लगे और जब कोई मित्र हमारे लिए कुछ नायाब करे या हमारी जान बचाए तब हमे दिल की स्मृति के पत्थर में जहां कोई हवा उसे ना मिटा सके वहां नक़्क़ाशी करना चाहिए ."

कहानी का नैतिक मूल्य
हमें रेत में लिखने के लिए सीखना चाहिए


"हमारा अनोखा भारत" -सुश्री विनीता यशश्वी


नैनीताल की शान माने जाने वाला रोपवे जो आज नैनीताल के पर्यटन में अपना विशेष स्थान रखता है। इसकी शुरूआत 16 मई 1985 को की गई थी। इस रोपवे का उदघाटन उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी ने किया था।

इस इस रोपवे को नैनी त्रिवेणी इलाहाबाद और वैस्ट अल्पाइन कम्पनी अस्ट्रीया के द्वारा बनवाया गया था। इसमें 800 किग्रा. का वजन एक बार में ले जाया जा सकता है। यह मल्लीताल रिक्शा स्टेंड से स्नोव्यू तक जाती है। इसकी अधिकतम गति 6 मीटर प्रति सेकेण्ड है और यह 700 मीटर की दूरी को लगभग 5 मिनट में तय कर लेती है। यह दूरी सड़क द्वारा 2.5 किलोमीटर की है।

इसे बनाने का मकसद सिर्फ पर्यटकों को एक अच्छा मनोरंजन उपलब्ध करवाना है जो यह आज भी कर रही है। इस रोपवे का वार्षिक टर्नओवर लगभग 1 करोड़ का है और यह 30 प्रतिशत मनोरंजन कर सरकार को देती है।


"नारीलोक" -प्रेमलता एम. सेमलानी


गोविन्द गट्टा

राजस्थान के स्वादिष्ट खाने मे आज हम गोविन्द गट्टा की सब्जी बनाऐगे। वैसे तो कुछ किलोमीटर के अन्तराल मे भाषा, पहनावा, रितरिवाज बदल जाते उसी तरह खाना बनाने कि विधि मे भी थोडा सा तरीका बदल जाता है। जयपुर एवम उसके आस-पास गट्टे की सब्जी मे बेसन के गोल आकार मे गट्टे ( गुलाबजामुन के आकार मे ) बनाकर ग्रेवी मे डाले जाते है। तो मारवाड (जोधपुर) मे पतले रोल बनाकर उसे छोटे-छोटे चार-पॉच टूकडे मे काटकर मिलाया जाता है। मैने विधि लिखने के पुर्व घर पर दोनो प्रकार के गट्टे बनाए है। और दोनो ही स्वादिष्ट बने।

सामग्री:-


200 gm. बेसन,
30 ml. (मिलीलीटर) तेल,
50 gm. दही,
10 gm. लहसुन (ईच्छानुसार)
5 gm. साबूत धनिया,
3 gm. जीरा,
3 gm. अजवाईन,
5 gm. हल्दी पाउडर,
5 gm. सरसो,

लालमिर्च पाउडर, नमक स्वाद अनुरुप, एवम थोडी सी कटी धनियापत्ती।

विधि:-


एक बरतन मे बेसन ले। बडा चम्मच दही, साबूत धनिया, अजवाईन,जीरा, तेल,नमक, मिलाईये। आवश्यकता अनुसार पानी डालकर कडा बेसन गून्ध ले। कुकर या पतीले मे एक से डेढ गिलास पानी ले। गून्ध हुए बेसन के गोल आकार मे गट्टे (गुलाबजामुन के आकार मे ) बनाकर कुकर या पतीले मे रख कर स्टीम करे।

ग्रेवी के लिए:-


पैन मे तेल गरम करे। जीरा,अजवाईन, व स्वादानुसार नमक डाले। थोडीलाल मिर्च पाउडर एवम बाकी दही डाले । अच्छी तरह मिलाईये।

इस ग्रेवी मे उबले हुए बेसन के गट्टे डाले। अब इसे अच्छी तरह पकाये। धनियापत्ती से सजाये। सादा रोटी, बाजरे की रोटी या बाटी के साथ सर्व करे।

नोट-: कही कही गोविन्द गट्टे के अन्दर मावा और ड्राई फ्रुट भी भ‍रे जाते है।

*****

Mr.Garlic.............



गोविन्द गट्टे बनाने थे. समान लाने सब्जी मन्डी गई थी. पीछे से कोई जोर जोर से चिल्ला रहा था,

बहिनजी....बहिनजी!

मुडकर देखा तो तो सब्जी के टोकरे से लहसुन मुझे देख मुस्करा रहा था।

"प्रेमा बहनजी! कैसे है ? मै जानता हू आप जैन है, और चातुर्मासकाल (चार महीना)मे ना आप मुझे घर लेकर जाते है और ना ही खाते है.......... पर!"
"पर... क्या ? बोल!"

सुना है आजकल आपने "ताऊ डाट ईन" पर 'भिन्डा-भिन्डी' की खुब तारीफ़ कर दी है. तब से भिन्डी अपने आपको एश्वर्या राय समझने लगी है। कभी हमारा भी 'ताऊ डाट ईन' मे फ़ोटु छपवा दो ना!".

"ठीक है ठीक है... लहसून! पर तेरे मे क्या विशेषता है जो ताऊ के पाठको को तेरे बारे मे बताऊ ? "

"प्रेमा बहीन! तो सुनो मेरी विशेषताओ से भरे गुणो को।"

* लहसून- "प्राचीन शास्त्रो के आधार पर मेरी उत्पत्ति के सन्दर्भ मे एक रोचक किदवन्ति प्रचलित है. कहा जाता है कि जब गरुड ने भगवान इन्द्र से अमृत का हरण किया इसी बीच अमृत की एक बुन्द भूमि पर गिर पडी। वह बुन्द एक पोधा को जन्म देती है. जो "रसोन" सज्ञा से प्रख्यात हुआ है।"

* हिन्दी मे 'लहसून' नाम से विश्रुत हू एवम सस्कृत मे वैदो ने मुझको ‘रसोन‘ नाम से घोषित किया है.

* मेरा आयुर्वेद ने षट रसो मे प्रतिपादन किया है।"

* मै अमृत समकक्ष हू।"

* लहसून-" मुझे एवम अमचूर दोनो को सम मात्रा मे पीसकर लगाने से बिच्छू का विष उतर जाता है।"

* लहसून-"मेरा पाक बनाकर खाने से पक्षघात की शिकायत मे लाभ होता है।"

* लहसून- "मेरा रस गर्म पानी के साथ सेवन करने से दमे कि बिमारी ठीक हो सकती है।"

* लहसून-"जो प्रतिदिन मेरी एक कली को खा ले तो उसका रक्त साफ और पतला हो जाएगा." एवम कभी बुखार नही सताऐगा।

* लहसून- "आधुनिक शोध ग्रन्थो के आधार पर रासायनिक प्रक्रियाओ द्वारा बेक्टीरिया नाशक तरल प्रदार्थ "एहत्रीसिन" एवम "जैतिकी" तत्व "एहत्रीसेन प्रथम एवम द्वितीय" मेरे मे पाऎ जाते है, ये अन्तिम दोनो ही प्रदार्थ"एन्टीबायोटिक" है.

लहसून शर्माते हुए - "बहिनजी! देखो, और यह किताब पढो. विदेशो मे भी अपुन के चर्चे है." हु!"

आप भी पढे- Mr.Garlic पहुचा इग्लेण्ड!!!!

* इग्लेण्ड के प्रसिद्ध डॉ.एम डब्लू मेकडाफ़ का कथन है-"1082 क्षय रोग के शिकार व्यक्तियो के उपर विभिन्न 56 जाति के प्रयोग किये। बकायदा परिणामो का रिकार्ड रखा गया है। प्रयोग मे क्षय के कीटाणुओ और उसकी वजह से उत्पन्न विभिन्न रोगो पर विश्वनिय रुप से प्रभाव डालने वाली मात्र दो ही औषधिया प्राप्त हुई है। वनस्पति वर्ग मे लहसून और खनिज वर्ग मे पारा है।

* एक जवान पैर और पन्जे की हड्डी के क्षय रोग से आक्रान्त था। चिकित्सार्थ वह मेरे पास आया। मैने पैर कटवाने की सलाह दी। रोगी ने पैर कटवाने की बात को नही माना। वह रोगी छ: महिने बाद बिल्कुल तन्दुरस्त हालात मे मुझे मिला।

डॉ. से रहा नही गया और पुछ ही लिया-"पैर ठीक कैसे हुआ?"

डाक्टरसाहब! मैने लहसुन एवम नमक दोनो को सम मात्रा मे पानी के साथ बारीक पीस कर नियमित रुप से लेप किया. इस लेप का ही चमत्कार है आज मे अपने पैरो पर खडा हू।

* जब भी आप घुमने काश्मीर जाए, वहॉ से काश्मीरी छोटी गोल "एक कली लहसून"अवश्य साथ लाऐ। उसे छील कर नित्य भोजन के साथ खाने से हृदय रोग की सम्भावना ना के बराबर हो जाएगी।

नोट-: लहसून बहूत तीव्र जलन पैदा करने वाली एवम चर्म दाहक वस्तू है इसके लेप मे सावधानी बरते खासकर बच्चो मे।

अब मुझे आज्ञा दीजिए, अगले सप्ताह नई बात अन्य प्रदेश के खाने के साथ.नमस्कार!

( स्तोत्रः स्वास्थ-सजीवनी पुस्तक साध्वी श्री फुलकुमारीजी )

प्रेमलता एम. सेमलानी


सहायक संपादक हीरामन मनोरंजक टिपणियां के साथ.
"मैं हूं हीरामन"

अरे हीरू….बोल पीरु पेलवान..

अरे देख ..देख..वो नीरज जाट अंकल का एडमिशन नही हुआ रामप्यारी के स्कूल मे

फ़िर..अरे फ़िर क्या…जाट अंकल ने धमकी देदी है..

ला दिखा मेरे को?

ले देख ले भिया

 

   नीरज जाट जी said...

or rampyari madam ji,
aapne hamara admission to kiya nahin, ham aapke sawaalon ka jawaab abhi se hi kyon de? pahle admission, fir question.
ok?

August 1, 2009 5:56 PM

  Udan Tashtari said...

गंगा जमुना कोई टाटा बिड़ला से कम हैं क्या? जो वाहन एक ठो रखें. एक से एक वाहन होंगे, जब जिस में मर्जी हो जाये, चल दिये.

August 1, 2009 6:45 PM

 

अरे वाह…पर यार चल..अब इस बरसात के मौसम मे घूम फ़िर कर आते हैं…यहा घर बैठ कर क्या करेंगे?

 

हां हां चल..




अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.

संपादक मंडल :-
मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया
वरिष्ठ संपादक : समीर लाल "समीर"
विशेष संपादक : अल्पना वर्मा
संपादक (तकनीकी) : आशीष खण्डेलवाल
संपादक (प्रबंधन) : Seema Gupta
संस्कृति संपादक : विनीता यशश्वी
सहायक संपादक : मिस. रामप्यारी, बीनू फ़िरंगी एवम हीरामन
स्तम्भकार :-
"नारीलोक" - प्रेमलता एम. सेमलानी

ताऊ साप्ताहिक पत्रिका अंक - 30

प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के 30 वें अंक मे हार्दिक स्वागत है.
आज श्रावण मास का सोमवार है. हमारे यहां आकाश मे घटाएं छायी हैं.रिम झिम फ़ुहारें सुबह से ही मौसम को खुशनुमा बना रही हैं. और हमारी ताऊ पहेली - ३० मे भगवान आशुतोष के ज्योतिर्लिंग स्थान सोमनाथ के बारे मे ही पूछा गया था.

कल रविवार को छत्तीसगढ के राजनांदगांव के मदनवाडा पुलिस थाने पर नक्सली हमले मे संभवतया पहली बार जिले के पुलिस अधिक्षक (श्री विनोदकुमार चौबे) सहित ३१ पुलिस कर्मी शहीद होगये. इन बहादुर शहीदों को विनम्र श्रद्दांजलि. उनके शोक सतंप्त परिवार जनों को ईश्वर हिम्मत दे. नकसलाईट समस्या दिनों दिन गंभीर होती जा रही है. सरकारें अपने स्तर पर काम करती हैं. पर इस समस्या के मूल मे जो सामाजिक स्थितियां जिम्मेदार हैं उन पर गौर करना ही पडेगा. वर्ना ऐसे ही हमारे सुरक्षा बलों के जवान शहीद होते रहेंगे. और जिनके पिता, बेटे और पति इनमे शहीद होते हैं उनके जख्म ताउम्र नही भरते हैं. जो भुक्त भोगी हैं वो इस त्रासदी को आज भी भोग रहे हैं.

अंत मे भगवान भोलेनाथ से यही प्रार्थना है कि सभी को सदबुद्दि दें.

२२ जुलाई को ६५ साल के अंतराल के बाद हरियाली अमावस्या को पुर्ण सुर्य ग्रहण के समय चंद्रमा के आसपास लाल मोतियों की सुंदर माला जैसा अदभुत दृष्य दिखाई देगा. अवश्य देखें पर सावधानी पुर्वक..यानि नंगी आंखों से नही देखें.

पिछले अंक में सु. वाणी गीत ने सु. प्रेमलता जी के स्तंभ का नाम "नारीलोक" ही क्यों रखा? यह जिज्ञासा थी उनकी. उनका कहना था कि क्या नारी खाना ही बनाती रहेगी? तो जहां तक प्रेमलताजी के स्तंभ का नाम "नारीलोक" से है तो यह सिर्फ़ खाना बनाने तक ही सीमित नही है. प्रेमलताजी कई विधाओं मे दखल रखती हैं और उनका कार्य क्षेत्र बहुत विस्तृत है अत: थोडा धैर्य रखें. नारी से संबंधित विविध विषयों पर वो प्रकाश डालती रहेंगी.

आपका यह सप्ताह आनंद दायी हो और भोलेनाथ की कृपा सभी पर बनी रहे. यही प्रार्थना है. और अब ये तो कहने की कोई बात ही नही है कि अगले सप्ताह के अंक के साथ फ़िर मिलेंगे.


-ताऊ रामपुरिया


"सलाह उड़नतश्तरी की" -समीर लाल

आज चिट्ठाजगत विस्तार प्राप्त कर रहा है. हमारी सिमितता यह है कि यहाँ बाहरी पाठक कम ही आ रहे हैं. एक ब्लॉगर को दूसरा ब्लॉगर पढ़ता है और टिप्पणी करता है. धीरे धीरे वो समय आ रहा है जब वह पाठक वर्ग भी विस्तार प्राप्त करेगा जो लिखता नहीं, बस पढ़ता है. अखबारों के माध्यम से काफी बात प्रचारित हो रही है और आमजन को मालूम पड़ने लगा है कि चिट्ठाकारी क्या है और इस पर कितना कुछ लिखा जा रहा है. यह एक अत्यन्त सुखद घटना है.

अक्सर प्रश्न पूछा जाता है कि कितना लिखें? एक दिन में एक पोस्ट, या तीन दिन में एक पोस्ट या एक ही दिन में कई. इसका कोई निश्चित मानक तो अभी नहीं है किन्तु पाठकों की संख्या देखते हुए एवं यह जानते हुए कि अधिकतर पाठक स्वयं भी लिख रहे हैं, अधिकतम एक दिन में एक ही बहुत लगता है. कई लोग एक ही दिन में तीन तीन, चार चार पोस्ट लिख रहे हैं फिर उन्हीं पोस्टों का तीन तीन चार चार ब्लॉगों पर डाल रहे हैं, निश्चित ही योगदान सराहनीय है किन्तु विचारणीय भी है. क्या वजह है एक ही पोस्ट को तीन तीन चार चार जगह से प्रकाशित करने का. या यहाँ वहाँ की सामग्री उठा उठा कर दिन भर पोस्ट करते रहना बिना किसी सार्थक लेखन के. कुछ स्पष्ट नहीं होता. थोड़ा विचारें, फिर पोस्ट करें. यह स्व-विवेक की बात है, कोई बंधन नहीं. कोई नियम नहीं.

भले कम लिखो, सार्थक लिखो ताकि पाठक आकर्षित हों. कुछ संदेश पायें. कुछ मनोरंजन हो, कुछ आराम मिले. साथ ही ध्यान रहे कि शक्कर मीठी तो होती है मगर उसी शक्कर की अधिकता कड़वाहट ले आती है.
आज बस इतना ही, बाकी अगले सप्ताह:

देख दुनिया अबकी कैसी बन रही है
भाई की भाई से ही, अनबन रही है.
लिख रहे हैं क्यूँ शेर इतने सूरमा
उनकी बहरों में कहीं, अटकन रही है.

-समीर लाल 'समीर'


"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा


'गुजरात 'भारत देश के पश्चिम में एक राज्य है .इस के पडोसी राज्य हैं महाराष्ट्र ,राजस्थान,मध्य प्रदेश,दादरा एवं नगर-हवेली.इसकी उत्तरी-पश्चिमी सीमा पकिस्तान देश से लगी हुई है.इसकी पश्चिम-दक्षिणी सीमा को अरब सागर[सिन्धु सागर]छूता है.१९४७ में स्वतंत्रता के बाद बने 'बॉम्बे स्टेट' में मराठियों के प्रथक राज्य की मांग के कारण,भाषा के आधार पर ' बाम्बे स्टेट के उत्तरी भाग 'को अलग कर १ मई १९६० में 'गुजरात राज्य बनाया गया था.उस समय इस की राजधानी अहमदाबाद थी.१९७० में 'गाँधी नगर 'को इस की नयी राजधानी बनाया गया.
मार्च २००१ की गणना के अनुसार यहाँ की आबादी 5.06 करोड़ है.

इस में २६ जिले हैं-अहमदाबाद , अमरेली , आनंद , बनासकांठा , भरूच , भावनगर , दाहोद , दंग , गांधीनगर , जामनगर , जूनागढ़ , Kutch , खेडा , महेसाणा , नर्मदा , नवसारी , पंचमहल , पतन , पोरबंदर , राजकोट , साबरकांठा , सूरत , सुरेंद्रनगर , तापी , वडोदरा , वलसाड .
सभी मुख्य राज्यों से वायु ,सड़क तथा रेल मार्गों द्वारा जुडा हुआ है.
समुद्री तट- मांडवी -कच्छ , द्वारका , चोरवाड , गोपनाथ , तिथल , पोरबंदर , Dandi , नारगोल , सोमनाथ , अहमदपुर मांडवी , डुमास
प्रसिद्द पहाड़ी क्षेत्र -Saputara , पावागढ़ , गिरनार , तरंगा , शत्रुंजय

गुजरात सरकार की अधिकारिक पर्यटन साईट के अनुसार 'जूनागढ़ पर्यटन क्षेत्र 'में आने वाले स्थान हैं-
१-जूनागढ़
२-पोरबंदर
३-गिर राष्ट्रिय उद्यान
४-सोमनाथ
सोमनाथ

यहाँ के मुख्य दर्शनीय स्थलों में है--महादेव का विश्व प्रसिद्द मंदिर-'सोमनाथ मंदिर'
1-सोमनाथ महादेव मंदिर -
भारत के पश्चिम में सौराष्ट्र (गुजरात) के अरब सागर के तट पर ऐतिहासिक "प्रभास तीर्थ "स्थित है.यहीं विश्व प्रसिद्ध और दर्शनीय सोमनाथ मंदिर है.
यह तीर्थस्थान देश के प्राचीनतम तीर्थस्थानों में से एक है एवं इसका उल्लेख स्कंदपुराणम, श्रीमद्‍भागवत गीता, शिवपुराणम आदि प्राचीन ग्रंथों में भी है. ऋग्वेद में भी सोमेश्वर महादेव की महिमा का उल्लेख है.

सोमनाथ मन्दिर का आदिशिवलिंग शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है.इस मन्दिर की मन मोहक छटा देखते ही बनती है.सुबह और संध्या के समय मन्दिर के अलग रुप देखने को मिलते हैं.

मन्दिर के निर्माण की कहानी-:

१-पौराणिक कथा के अनुसार

- इसका निर्माण स्वयं चंद्रदेव सोमराज ने किया था.[ इसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है].भगवान ब्रह्मा के पुत्र "दक्ष" थे ,
और दक्ष की २७ पुत्रियां थीं[जिन्हें २७ नकश्त्र भी कहा जाता है.]उनका विवाह सोमराज के साथ हुआ था.महाराजा दक्ष की पुत्रिओं ने उनसे शिकायत की कि चन्द्र्देव[सोमराज] सिर्फ़ रोहिनि को ही स्नेह देते हैं और बाकि किसी पर भी ध्यान नहीं देते.

इस पर क्रोधित हो कर राजा दक्ष के चन्द्र देव को श्राप दे दिया कि वह कान्तिहीन हो जाये!
जब सच में चन्द्र्देव का भास धूमिल होने लगा तब उनकी पुत्रियों ने उनका श्राप वापस लेने की अपने पिता से प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि सरस्वती के मुहाने पर समुद्र में स्नान करने से श्राप के प्रकोप को रोका जा सकता है,
तब सोमराज ने सरस्वती के मुहाने पर स्थित सिन्धु[अब अरब ]सागर में स्नान करके भगवान शिव की आराधना की जिस से प्रभु शिव यहाँ पर अवतरित हुए और उनका उद्धार किया .

शिवभक्त चन्द्र देव ने यहां शिव जी का "स्वर्ण- मन्दिर ’बनवाया.यहां जो ज्योतिरलिन्ग स्थापित हुआ उस का नाम सोमनाथ [जिसका अर्थ है--चन्द्र के स्वामी] पड़ गया.चून्कि चन्द्र्मा ने यहाँ अपनी कान्ति वापस पायी थी तो इस क्षेत्र को "प्रभास पाटन "कहा जाने लगा.
महाशिव भक्त रावण ने इस मन्दिर को चांदी का बनवाया,और उस के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका पर अपने शासन के समय इसे चन्दन का बनवाया.

इतिहास के पन्नों से-:


१-1948 में प्रभासतीर्थ प्रभास पाटन’ के नाम से जाना जाता था. इसी नाम से इसकी तहसील और नगर पालिका थी.तब यह जूनागढ रियासत का मुख्य नगर था. लेकिन 1948 के बाद इसकी तहसील, नगर पालिका और तहसील कचहरी का वेरावल में विलय हो गया.

२-इस मन्दिर का इतिहास बताता है कि इस का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा,सिर्फ़ १०२६ तक!
गुजरात के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी. अरब यात्री अल बरूनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका जो भव्य विवरण लिखा उससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन 102६ में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और जिस शिवलिंग को खंडित किया, वह आदि शिवलिंग था.
.इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका शिला में पुनर्निर्माण कराया.
जिसकी तस्वीर हमने पहेली के आखिर क्लू में दी थी.
जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो दोबारा प्रतिष्ठित किए गए शिवलिंग को 1300 में अलाउद्दीन की सेना ने खंडित किया.
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और विनाश का सिलसिला यूं ही जारी रहा.

-एक नज़र में देखें तो--:


सर्वप्रथम मंगोल सरदार मौहम्मद गजनवी ने इ.स. 1026 में और अल्लाउद्दीन खिलजी के सरदार अफजलखां ने बारी बारी 1374, 1390 में 1491, 1590, 1520 में अन्यों द्वारा लूट का कहर चलाया गया आखिर में औरंगजेब ने भी उसमें लूट की थी। कुल मिलाकर 17 बार[?] इस मंदिर को तोड़ा या लूटा गया.
बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं. महमूद गजनी सन 1026 में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था.
राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अंतिम मंदिर बनवाया गया था.
तत्कालीन सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री उच्छंगराय नवल शंकर ढेबर ने जाब यहां उत्खनन कराया था,तो उत्खनन करते समय करीब 13 फुट की खुदाई में नीचे की नींव से कुछ शिल्प अवशेष पाए गए,जिनमें’ मैत्री काल से लेकर सोलंकी युग तक के शिल्प स्थापत्य के उत्कृष्ट अवशेष शामिल है.
सोमनाथ मंदिर निर्माण में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल का बडा योगदान रहा.नये मन्दिर में भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है.
सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1950 को मंदिर की आधार शिला रखी तथा 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया.प्रभा शंकर सोमपुरा ने इस नये मन्दिर का डिजाईन बनाया था.
नवीन सोमनाथ मंदिर 1962 में पूर्ण निर्मित हो गया था.
1970 में जामनगर की राजमाता ने अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में उनके नाम से दिग्विजय द्वार बनवाया. इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है.
सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित यह नवीन मंदिर स्थापित है-यह ट्रस्ट ही मंदिर सम्बंधित हर बात की देख रेख करता है.

मन्दिर सम्बंधित जानकारियां-:


**मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है. उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है.यह हमारे प्राचीन ज्ञान व सूझबूझ का अद्‍भुत साक्ष्य माना जाता है.
**प्रभास पाटन में त्रिवेणी है..जहां सरस्वती,ह्रिन्या,कपीला नदियां एक साथ सिन्धु[अरब] सागर में मिलती हैं.इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।
**यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मो के लिए भी प्रसिद्ध है. चैत्र, भाद्र, कार्तिक माह में यहां श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है। इन तीन महीनों में यहां श्रद्धालुओं की बडी भीड लगती है।
**सागर किनारे पानी में कई शिवलिन्ग भी दिखायी दे जायेंगे.[क्लू की पहली तस्वीर.]
***मन्दिर के प्रांगण में रात साढे सात से साढे आठ बजे तक एक घंटे का साउंड एंड लाइट शो चलता है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के पूरे इतिहास का बडा ही सुंदर सचित्र वर्णन किया जाता है.
**मंदिर के पिछले भाग में स्थित प्राचीन मंदिर के विषय में मान्यता है कि यह पार्वती जी का मंदिर है.
**तीर्थ स्थान और मंदिर मंदिर नं.1 के प्रांगण में हनुमानजी का मंदिर, पर्दी विनायक, नवदुर्गा खोडीयार, महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा स्थापित सोमनाथ ज्योतिर्लिग, अहिल्येश्वर, अन्नपूर्णा, गणपति और काशी विश्वनाथ के मंदिर हैं.
**अघोरेश्वर मंदिर नं. 6 के समीप भैरवेश्वर मंदिर, महाकाली मंदिर, दुखहरण जी की जल समाधि स्थित है.
**मंदिर नं. 12 के नजदीक विलेश्वर मंदिर है,कुमार वाडा में पंचमुखी महादेव मंदिर और नं. 15 के पास राममंदिर स्थित है.
** नागरों के इष्टदेव हाटकेश्वर मंदिर, देवी हिंगलाज का मंदिर, कालिका मंदिर, बालाजी मंदिर, नरसिंह मंदिर, नागनाथ मंदिर समेत कुल 42 मंदिर नगर के लगभग दस किलो मीटर क्षेत्र में स्थापित हैं!
**भालकेश्वर, प्रागटेश्वर, पद्म कुंड, पांडव कूप, द्वारिकानाथ मंदिर, बालाजी मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, रूदे्रश्वर मंदिर, सूर्य मंदिर, हिंगलाज गुफा, गीता मंदिर, बल्लभाचार्य महाप्रभु की 65वीं बैठक के अलावा कई अन्य प्रमुख मंदिर हैं.
**बाहरी क्षेत्र के प्रमुख मंदिर वेरावल प्रभास क्षेत्र के मध्य में समुद्र के किनारे शशिभूषण मंदिर, भीडभंजन गणपति, बाणेश्वर, चंद्रेश्वर-रत्नेश्वर, कपिलेश्वर, रोटलेश्वर, भालुका तीर्थ हैं.

भालुका तीर्थ
-ऐसी मान्यता है कि जब एक बार श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे, तब ही शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पद्मचिन्ह को हिरण की आंख जानकर धोखे में तीर मारा था, तब ही कृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुंठ गमन किया इस लिये इस स्थान पर भव्य दर्शनीय कृष्ण मंदिर बना हुआ है. इस कारण भी इस क्षेत्र का महत्व और भी अधिक हो जाता है.
***प्रभास खंड में विवरण है कि सोमनाथ मंदिर के समयकाल में अन्य देव मंदिर भी थे. इनमें शिवजी के 135, विष्णु भगवान के 5, देवी के 25, सूर्यदेव के 16, गणेशजी के 5, नाग मंदिर 1, क्षेत्रपाल मंदिर 1, कुंड 19 और नदियां 9 बताई जाती हैं[?] एक शिलालेख में तो यह भी विवरण है कि महमूद गजनी के हमले के बाद इक्कीस मंदिरों का निर्माण किया गया. हो सकता है, इसके पश्चात भी अनेक मंदिर बने होंगे??
-**सोमनाथ से करीब दो सौ किलोमीटर दूरी पर प्रमुख तीर्थ श्रीकृष्ण की द्वारिका है,जहां प्रतिदिन द्वारिकाधीश के दर्शन के लिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं!
यहां गोमती नदी का जल सूर्योदय पर बढता जाता है और सूर्यास्त पर घटता जाता है, जो सुबह सूरज निकलने से पहले मात्र एक डेढ फीट ही रह जाता है!!!!!!!!!!!!

सोमनाथ कैसे जायें??--
वायु मार्ग- सोमनाथ से 55 किलोमीटर स्थित केशोड नामक स्थान से सीधे मुंबई के लिए वायुसेवा है।

रेल मार्ग-सबसे समीप मात्र सात किलोमीटर दूरी पर स्थित वेरावल रेलवे स्टेशन है .
सड़क मार्ग- सोमनाथ वेरावल से 7 किलोमीटर, अहमदाबाद 400 किलोमीटर, और जूनागढ़ से 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं. पूरे राज्य में इस स्थान के लिए बस सेवा उपलब्ध है.

इस के साथ ही ,मिलते हैं अगले अंक में ,तब तक के लिए नमस्कार.


“ दुनिया मेरी नजर से” -आशीष खण्डेलवाल

खिड़की पर लटककर शादी


चीन में खिड़कियों पर लटकर शीशे साफ करने वाले दो कर्मचारियों ने शादी के लिए भी अपने ऑफिस को ही बेहतर समझा। जियांग डेझांग (27) और टाई गुआंगजु (26) ने हाल ही ऊंची इमारत की खिड़कियों पर लटकते लकड़ी के बक्सों पर बैठकर एक-दूसरे को अंगूठी पहनाई। साथ ही शादी की गवाही के लिए दूल्हे का दोस्त और दुल्हन की सहेली भी उसी तरह लटके। ये दोनों भी उन्हीं के पेशे के थे। और बाराती.. जी नहीं, वे लटके नहीं, वे नीचे सड़क पर जमा थे।

आपका सप्ताह शुभ हो.. नमस्कार


"मेरी कलम से" -Seema Gupta


ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है

एक किसान था जो आधा किलो मक्खन एक बेकरी वाले को बेचा करता था. एक बार बेकर ने ये सोच कर की उसको मक्खन पूरा आधा किलो मिल रहा है या नहीं? मक्खन वज़न करने का निर्णय लिया. तोल में मक्खन कुछ कम निकला और बेकर नाराज होकर किसान को अदालत में ले गया.

जज ने किसान से पुछा की क्या वो किसी भी माप का उपयोग कर रहा था?
किसान ने कहा - जज साहब मै एक गरीब अनपढ़ मनुष्य हूँ, मेरे पास कोई वजन करने का उचित उपाय नहीं है, लेकिन फिर भी एक तरीका है जिस से मै रोज मक्खन वजन कर के बेकर को देता हूँ.
जज ने जानना चाहा की कौन से तरीके से किसान वजन किया करता है?
किसान ने कहा - " जज साहब, लंबे समय से बेकर मुझसे मक्खन खरीद रहा है और उसके बदले मे मुझे उतने ही वजन की ब्रेड (रोटी) देता है. हर दिन जब बेकर रोटी लाता है , मैं तराजू के एक तरफ उसकी दी हुई रोटी रखता हूँ और दूसरी तरफ मक्खन रख कर बराबर वजन कर बेकर को मक्खन दे देता हूँ.

अब ऐसे में अगर कोई दोषी है तो वो तो यह बेकर ही है.

कहानी का संदेश

जो हम बोते हैं वही काटना पड़ता है. जिनका व्यवहार बेईमानी और झूठ से भरा हो जाता है क्या वो जानते हैं की वो किसको धोखा दे रहे हैं....सिर्फ अपने आप को ही तो.


"हमारा अनोखा भारत" -सुश्री विनीता यशश्वी

कुमाऊँ के त्यौहारों में एक प्रमुख त्यौहार फुलदेई भी है। इस त्यौहार को वसंत के आगमन की खुशी में मनाया जाता है। इस त्यौहार को कहीं 7 दिन, कहीं 15 दिन, कहीं महीने में और कहीं वर्ष में एक बार मेष संक्रान्ति अर्थात चैत्र मास के प्रथम दिन मनाया जाता है। कई जगह इसे फूल संक्रान्ति भी कहा जाता है।

इस त्यौहार के दिन किशोरियां बुरांश और प्यूली के फूल अपने और अपनी पास-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों की देहरी में डालती हैं और देहली का पूजन करती हैं। पूजन करते हुए वह इन लाइनों का उच्चारण करती हैं - `फूल देई, छमा देई, दैनी द्वार भरी भखार। यह गीत समस्त पर्वतीय अंचल में गाया जाता है। देहली पूजन के बाद घर के स्वामी इन कन्याओं को चावल, तिल, गुड़ और पैसे उपहार स्वरूप देते हैं।

इस त्यौहार में बुरांश और प्यूली के फूलों का विशेष महत्व है क्योंकि यह वसंत ऋतु के आगमन पर ही खिलने लगते हैं।

फूलदेई के अवसर पर गाये जाने वाला एक प्रचलित गीत यह भी है -

फूलदेई फूलदेई फूल संगराद
सुफल करो नौउ तुमकू भगवान
रंगीला चंगीला फूल एंग्या
डाला बोटला धरयां ह्वैग्या
पोन पंछी ऐन, फूल हंसी रैन

आयो तेरी नौउ बरस
आज फूलों संगरांद
तुमारा भकार भर्यान
अन्न धन्न फूल्यान
औनि रया रितु मास
फूलदा रया फूल
बच्या रौला हम तुम
फेर आली फूल संगराद


भावार्थ
-

फूलदेई-फूलदेई फूल संक्रान्ति आई है
भगवान तुम्हारे लिये
नया वर्ष सफल करे
रंग बिरंगे फूल खिले
नयी हवा, नये पंछी आये
फूल हंसने लगे

नयी आशा से नया वर्ष
आज फूल संक्रांति लेकर आया है
तुम्हारे अन्न के भंडार भरें
अन्न धन फूले-फले
ऋतु मास आते रहें
फूल खिलते रहे
हम-तुम जीवित रहें
फूल संक्रांति फिर आयेगी


"नारीलोक" -प्रेमलता एम. सेमलानी



"रसोईया-ईलाज"

खाना बनाना एवम उसमे रोज नई नई डिश बनाना तो सभी भली भॉति जानते है। आज हम इसी से सम्बन्धित पर स्वस्थ परिवार के निर्माण मे हमारे भोजन सामग्री के बारे मे बात करेगे।

जीवन मै तीन बाते अनिवार्य है। तन, मन और धन। इन तीनो मे स्वास्थय का प्रथम स्थान है।

कहावत भी है- "पहला सुख निरोगी काया।"

जीवन का सार है - अच्छा स्वास्थ्य। सचमुच मे ससार मे सबसे धनवान वह है जो स्वस्थय तन स्वस्थय मन का धनी है।

वर्तमान युग की सबसे बडी समस्या है अस्वास्थ्य। पुरी दुनिया हैरान परेशान है। अस्वास्थ्य का मुल कारण है खान-पान और रहन-सहन मे जागरुकता का अभाव। सवाल यह उठता है जागरुकता कहा से पैदा होती है ? मेरा ऐसा मानना है जागरुकता रसोई घर से शुरु होनी चाहिए। अगर एक मॉ एक बहन एक पत्नि थोडी सतर्क रहकर रसोई घर से बनेने वाले भोजन से पुरे परिवार को स्वस्थता का अहम भाग निर्माण कर सकती है। लोगो को पता होना चाहिए स्वास्थता के साथ बिमारीयो के निवारण मे रसोईघर एवम उसमे लगने वाली वस्तुओ कि अहमियता को जानना जरुरी है। हमे पता हो की कैसे एवम कोनसी बिमारी मे "रसोईया-ईलाज" कितना कारगर होगा हमारे परिवार पर।

डाईबीटीज का इलाज भिन्डी के द्वारा


तरीका

* रात मे सोते समय दो भिन्डी ले।

* उसे चाकु से सीधा काटे (दोनो भाग अलग नही हो इसका ध्यान रखे) vertical

* कॉच की गिलास को आधा पानी से भरे ।

* अब कटी हूई दोनो भिन्डी आधा भरा गिलास मे रख दे।

* सुबह उठकर दोनो भिन्डी को उसी पानी मे हाथ से मचल दे ।

* अब जुर से या कपडे से छानकर उसे पी ले।

सावधानिया-

(1) भिन्डी का पानी पिने से पहले एवम बाद के आधा घन्टा कुछ ना खाऐ।

(2) पन्द्रह दिनो बाद आप अपना सुगर लेवल चेक करावे।

(3) अगर आप डाईबीटीज की कोई दवाई ले रहे है तो अपनी रिपोर्ट डाक्टर के पास ले जाऐ और बताए कि आपका शुगर लेवल कम/ज्यादा हुआ है अब दवाई की मात्रा कैसे लेनी है ?

(4) बिना डाक्टर कि सलाह कोई दवाई कम ज्यादा ना करे।

(5) ऐसा क्रम आप दो तीन महिने तक करके देखे। आपको इस घरेलु इलाज से डाईबिटस जैसे घातक बिमारी से राहत मिल सकती है।

नोट-: बिना डाक्टर कि सलाह कोई दवाई कम ज्यादा ना करे।

* पेचिश मे भी भिन्डी की सब्जी खाना लाभदायक है, इससे ऑतो की खुराश दुर होती है।

ऐसे छोटे छोटे घरेलु नुस्खे हमारे परिवार के स्वास्थ्य के लिए हमे ज्ञात हो तो बिमारी आप लोगो से डरने लगेगी

अगले सप्ताह एक और नई बात लेकर आऊगी। तब तक नमस्कार।

प्रेमलता एम सेमलानी



सहायक संपादक हीरामन मनोरंजक टिपणियां के साथ.
"मैं हूं हीरामन"

अरे हीरू…देख देख ..दीपक तिवारी अंकल..रामप्यारी के हाथ जोड रहे हैं.

अरे नही यार पीरू..

अबे नही क्या ? ले खुद ही पढ ले.


  दीपक "तिवारी साहब" said...

रामप्यारी तेरे हाथ जोडूं..इतने बडे बडे परमाणू फ़ार्मुले वाले सवाल मत पूछा कर..वर्ना किसी दिन मेरा दिमाग फ़ेल हो जायेगा. करोड तक की गिनती कर चुका अब और मेरे को नही आती..जरा भाटिया अंकल से पूछ ले..या समीर अंकल से ही पूछ लेना..हमारा दिमाग क्यों खर्च करवाती है?

July 11, 2009 11:07 AM

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हां यार हीरू…देख देख..ये प. वत्स जी क्या कह रहे है?

क्या कह रहे हैं? 

अरे कह रहे हैं “ बेरा कोनी”  ले पूरी बात खुद ही पढ ले.

 


  Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

रामप्यारी सुबह जल्दबाजी में तेरे सवाल का जवाब देना याद ही नहीं रहा.अब ध्यान आया तो सोचा चलो जवाब दे ही देते हैं. तो नोट कर ले, तेरे सवाल का जवाब है---बेरा कोनी.

July 11, 2009 7:41 PM

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अरे ये देखो..जरा जल्दी देखो..संजय बैंगाणी अंकल क्या पूछ रहे है?

क्या?

ले खुद ही पढ ले.

 

  संजय बेंगाणी said...

राम प्यारी, इतनी टिप्पणी करने जित्ते चिट्ठे हैं क्या? :)

July 11, 2009 10:25 AM

 

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चल यार हीरु..जरा बरसात मे भीग कर आते हैं…मजा आयेगा..

चल यार..



ट्रेलर : - पढिये : श्री रविकांत पांडे से ताऊ की अंतरंग बातचीत
"ट्रेलर"

ताऊ की खास बातचीत श्री रविकांत पांडे से

ताऊ : आप कहां के रहने वाले हैं.

रविकांत : हूं आप पूछते हैं मैं कहां से हूं ? तो सुनिये किसी शायर ने लिखा है-
जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा
किसी चराग का अपना मकां नहीं होता



ताऊ : जी, और आप करते क्या हैं?

रविकांत : हूं., मैं करता क्या हूं ? देखिये कृष्ण ने कहा है गीता में-
अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते
सिर्फ़ मूढ़ ही करने की भाषा में सोचते हैं। मैं कुछ नहीं करता जो करता है वही करता है।

ताऊ : हमने सुना है कि आपको एक बार रास्ते मे भूत मिल गया था? क्या ये बात सही है?

रविकांत :??????

और भी बहुत कुछ अंतरंग बातें…..पहली बार..खुद श्री रविकांत पांडे की जबानी…इंतजार की घडियां खत्म….16 जुलाई ... गुरुवार शाम 3:33 PM पर मिलिये हमारे चहेते मेहमान से.




अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.

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"नारीलोक" - प्रेमलता एम. सेमलानी