ताऊ पहेली - 40 के विजेता श्री शुभम आर्य

प्रिय भाईयो और बहणों, भतीजों और भतीजियों आप सबको घणी रामराम ! हम आपकी सेवा में हाजिर हैं ताऊ पहेली 40 का जवाब लेकर. कल की ताऊ पहेली का सही उत्तर है अमरनाथ गुफ़ा (जम्मू काश्मीर).
जय बाबा अमरनाथ



आईये अब आज के विजेताओं से आपको मिलवाते हैं.

"आज के विजेता गण" हार्दिक बधाईयां!

shubham-arya


प्रथम विजेता श्री शुभम आर्य अंक १०१

premalata-pandeyji

द्वितिय विजेता सुश्री प्रेमलता पांडे अंक १००

sushil-chhonkarji

तृतिय विजेता श्री सुशील कु. छौंक्कर अंक ९९



हमारे आज के अन्य विजेता गण इस प्रकार हैं, सभी को हार्दिक बधाई!

 

 Blogger seema gupta said... अंक ९८

 Blogger नीरज गोस्वामी अंक ९७

 Blogger मीत अंक ९६

 Blogger अन्तर सोहिल अंक ९५

 Blogger दिलीप कवठेकर  अंक ९४

  Blogger पं.डी.के.शर्मा"वत्स" अंक ९३

 Blogger jitendra अंक ९२

 Blogger Vivek Rastogi अंक ९१

 Blogger गौतम राजरिशी अंक ९०

 Blogger M.A.Sharma "सेहर" अंक ८९

 Blogger अविनाश वाचस्पति अंक ८८


योगेश समदर्शी
  अंक ८७

 Blogger HEY PRABHU YEH TERA PATH  अंक ८६


इसके अलावा निम्न महानुभावों ने भी इस पहेली अंक मे शामिल होकर हमारा उत्साह बढाया. जिसके लिये हम उनके हृदय से आभारी हैं.



डा. श्री रुपचंद्र शाश्त्री, श्री दीपक तिवारी साहब, श्री सोनु, श्री पंकज मिश्रा, श्री मकरंद, सुश्री निर्मला कपिला, श्री मुरारी पारीक, सुश्री सोनिया, श्री कमल, सुश्री बबली, श्री रतन सिंह शेखावत, श्री अनिल पूसदकर और श्री राज भाटिया...

आप सबका तहेदिल से शुक्रिया.



रामप्यारी के सवाल के विजेताओं से यहा मिलिये.

"रामप्यारी के ३० नंबर के सवाल का जवाब"


हाय…गुड मोर्निंग एवरी बडी…आई एम राम..की प्यारी… रामप्यारी.
हां तो अब जिन्होने सही जवाब दिये उन सबको दिये गये हैं ३० नम्बर…अगर भूल चूक हो तो खबर कर दिजियेगा..सही कर दिये जायेंगे.

मेरे कल के सवाल का सही जवाब है : इस किताब का नाम मदर इंडिया था जिसको अमेरिकी पत्रकार मिस कैथरीन मेयो
ने लिखा था. और इस पुस्तक के जवाब में जो किताब डा. राजेंद्र प्रसाद जी द्वारा लिखी गई थी उसका नाम एक अंकल ने "अनहैप्पी इंडिया" भी बताया गया है. पर मेरे द्वारा बहुत तलाशे जाने पर "अनहैप्पी ईंडिया" लाला लाजपत राय जी द्वारा लिखी पाई गई है. और डा. राजेंद्र प्रसाद जी द्वारा लिखी गई किताब का नाम "इंडिया डिवाइडेड" बताया गया है.

आज आपके जवाबों मे प्रश्न का पूरा उत्तर सबसे पहले दिया M. A.Sharma "सेहर" आंटी ने, फ़िर शुभम भैया ने फ़िर अपने कोटा वाले वकील साहब अंकल दिनेशराय जी ने और बाद में मीत भैया ने भी मेरा जवाब दो हिस्सों मे पूरा किया.

और मेरा ध्यान "अनहैप्पी इंडिया" पर खींचा श्री भानाराम जाट अंकल ने..उन्होने डा. राजेंद्र प्रसाद जी द्वारा लिखी गई किताब का नाम "अनहैप्पी इंडिया" बताया है. जो कि मेरे द्वारा खोज बीन किये जाने पर लाला लाजपत राय जी द्वारा लिखी मिली.

अब मेरा आप सभी सुविज्ञ पाठकों से अनुरोध है कि आप इस विषय पर पूरी जानकारी अपडेट करवाने की क्रुपा करें जिससे
नेट पर कोई गलत जानकारी ना जाये.

और भानाराम जाट अंकल आप तो बैंक मे बैठकर नोट गिन रहे होंगे या लोन बांट रहे होंगे...आपसे भी अनुरोध है कि आप यह बताये कि आपको यह सूचना कहां से मिली? मैं जानती हूं कि आप बिना किसी ठोस आधार के कोई बात नही करते...

आप सबको तीस तीस नम्बर तो मैने दे दिये हैं.

अब जिन्होने सवाल का पूरा जवाब नही दिया है, उनके रिपोर्ट कार्ड पर रिमार्क के साथ तीस तीस नम्बर दिये जारहे हैं..रिपोर्ट कार्ड पेरेंट्स से साईन करवा कर लायें और आगे के लिये ध्यान रखें.

हां तो इस केटेगरी मे रिमार्क के साथ साथ ३० नम्बर पाने मे अब्बल रही सीमा आंटी, फ़िर स्मार्ट इंडियन अंकल, फ़िर प्रेमलता पांडे आंटी और अंतर सोहिल अंकल.

इसके बाद संजय बेंगाणी अंकल, प.डी.के.शर्मा "वत्स" अंकल, इसके बाद आये अविनाश वाचस्पति अंकल, फ़िर हे प्रभु ये तेरा पथ वाले महावीर अंकल और रिजल्ट तैयार होते होते आये मोहन वशिष्ठ अंकल.


आप सबके खाते में तीस तीस नम्बर मैने जमा करवा दिये हैं.

अब रामप्यारी की तरफ़ से रामराम…अगले शनीवार फ़िर से यही मिलेंगें. वैसे आजकल शाम ६ बजे मैं ताऊजी डाट काम पर रोज ही मिल जाती हूं. ..और हां आपका आज से शुरु होने वाला सप्ताह शुभ हो.



हीरू और पीरू यानि हीरामन और पीटर की मनोरंजक टिपणियां यहां पढिये.

"आपकी सेवा में हीरू और पीरु"


अरे हीरू...कईं हुईग्यो रे पीरु भिया..
अरे म्हारे तो कईं भी ना हुयो...ऊ देख नीरज गोस्वामी अंकल को उपर से कुछ..नीचे से कुछ और…और तिरछे होने पर कुछ और ही दिखी रियो हे पेलवान..
अच्छा ला दिखा...
 Blogger नीरज गोस्वामी said... बेरा ना पाट रा भाई ताऊ ...ऊपर से देखूं तो कुछ लागन लाग रया और नीचे से देखूं तो कुछ और दीख रा, तिरछा हो के देखूं तो अजीब लाग रया.... इब के करूँ? अमरनाथ की गुफा बोल देयुं के? होगी सो देखि जायेगी...जय हो. नीरज
और ये देखो..निर्मला कपिला आंटी कंई के री हैं?
 Blogger Nirmla Kapila said... नवररात्र पर्व की शुभकामनायें यहाँ जरूर कोई देवी का स्थान है नाम बकी लोग बतायें मैं ही तो नहीं सब कुछ बताऊँगी ना
अरे हीरु देख ..देख..ये मुरारी अंकल...कंई मालवी भाषा बोली रिया के मारवाडी? ला दिखा जरा म्हारे...
 Blogger Murari Pareek said... कोन्या बेरो लाग्यो ताउजी ! पुरो नेट छान मारयो ! कठेई नै लाध्यो! बेरा कोनी ताउजी थाने यो जुगाड़ कठे स्यूं मिल ज्यावे!!
हां यार पेलवान…चल अपण तो अब माताजी का गरबा खेलणे जई रिया हां…तम चालो कांई?
चल यार भिया…हूं भी चली रियो हुं तमारे साथे….



अच्छा अब नमस्ते.सभी प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता मे हमारा उत्साह वर्धन करने के लिये हार्दिक धन्यवाद. ताऊ पहेली – ?? का आयोजन एवम संचालन ताऊ रामपुरिया और सुश्री अल्पना वर्मा ने किया. अगली पहेली मे अगले शनिवार सुबह आठ बजे आपसे फ़िर मिलेंगे तब तक के लिये नमस्कार.

ताऊ पहेली - 40

प्रिय बहणों और भाईयों, भतिजो और भतीजियों सबको शनीवार सबेरे की घणी राम राम.
ताऊ पहेली अंक 40 में मैं ताऊ रामपुरिया, सह आयोजक सु. अल्पना वर्मा के साथ आपका हार्दिक स्वागत करता हूं. क्ल्यु हमेशा की तरह रामप्यारी के ब्लाग से मिलेंगे. रामप्यारी के ब्लाग पर पहला क्ल्यु 11:30 बजे और दुसरा 2:30 बजे मिलेगा. रामप्यारी का जवाब अलग टिपणी में देवें. तो आईये अब आज की पहेली की तरफ़ चलते हैं.


यह कौन सी जगह है?

ताऊ पहेली का प्रकाशन हर शनिवार सुबह आठ बजे होगा. ताऊ पहेली के जवाब देने का समय कल रविवार दोपहर १२:०० बजे तक है. इसके बाद आने वाले सही जवाबों को अधिकतम ५० अंक ही दिये जा सकेंगे

अब रामप्यारी का विशेष बोनस सवाल : - ३० अंक के लिये.

rampyari-tdc-1_thumb[2] हाय एवरी बडी..वैरी गुड मार्निंग फ़्रोम रामप्यारी.

विनम्र निवेदन : - कृपया मेरे सवाल का जवाब अलग टीपणी मे देवें. बडी मेहरवानी होगी. एक ही टिपणी मे दोनो जवाब मे से एक सही होने पर प्रकाशित नही की जा सकती और इससे आप कन्फ़्युजिया सकते हैं कि आपकी टिपणी रुकी हुई है. तो सही होगी?

आज का सवाल :-

अ. महात्मा गांधी ने जिस पुस्तक को "ड्रेन इंसपेक्टर रिपोर्ट" कहा था, उस भारत विरोधी किताब का नाम क्या था? और उसके लेखक का नाम क्या था?

ब. उपरोक्त पुस्तक के जवाब में उस समय डा. राजेंद्र प्रसाद ने भी एक पुस्तक लिखी थी. उस पुस्तक का भी नाम बताईये?



अब आप मेरे ब्लाग पर पहली हिंट की पोस्ट पढ सकते हैं 11:30 बजे और दुसरी 2:30 बजे.

अब रामप्यारी की रामराम.


इस अंक के आयोजक हैं ताऊ रामपुरिया और सु,अल्पना वर्मा


नोट : यह पहेली प्रतियोगिता पुर्णत:मनोरंजन, शिक्षा और ज्ञानवर्धन के लिये है. इसमे किसी भी तरह के नगद या अन्य तरह के पुरुस्कार नही दिये जाते हैं. सिर्फ़ सोहाद्र और उत्साह वर्धन के लिये प्रमाणपत्र एवम उपाधियां दी जाती हैं. किसी भी तरह की विवादास्पद परिस्थितियों मे आयोजकों का फ़ैसला ही अंतिम फ़ैसला होगा. एवम इस पहेली प्रतियोगिता में आयोजकों के अलावा कोई भी भाग ले सकता है.

मग्गाबाबा का चिठ्ठाश्रम
मिस.रामप्यारी का ब्लाग

 

नोट : – ताऊजी डाट काम  पर हर शाम 6:00 बजे नई पहेली प्रकाशित होती हैं. यहा से जाये।

फ़िल्म ३६ घंटे, ३६ का आंकडा और ३६ टिपण्णियों का बवाल

एक फ़िल्म देखी थी आज से ३६ साल पहले, नाम था ३६ घंटे, यानि ३६ घंटे का तनाव, ताई के साथ देखी गई पहली ही फ़िल्म, हाय रे किस्मत. और इसके बाद तो यह ३६ का आंकडा हमारा जानी दुश्मन होगया. देखिये शादी के 36 दिन बाद ही ताई का जन्मदिन, और हमारी जेब का होगया मरण दिन. ३६ सप्ताह बाद ही कार खरीदने के लिये अनशन, क्या करें? ये बात अलग है कि माल छुपे तौर पर ससुरजी का ही था.

बाद में ३६ साल की बाली उमरिया में ही हार्ट अटेक होने का हमको परम सौभाग्य मिला. यानि ३६ का आंकडा ना हुआ हमारे लिये बवाले जान होगया.:)



ऐसा रहा हमारा हमारा ३६ के आंकडे से इश्क. अब इधर मे जीवन में ३६ कुछ बचा भी नही था सो इस इश्क का खौफ़ भी निकल गया था. पर हाय री किस्मत..हुआ वही जो नही होना था. हमको पिछले ही सप्ताह ताई ने बताया कि ..अजी सुनते हो...हमने मन ही मन कहा - सुना ही दो ..चाहे सुने या ना सुने.

अब हमारे उपर वज्रपात हुआ. ताई ने बडे गर्व से बताया कि यह हमारी शादी का ३६ वां साल चल रहा है. ३६ का नाम सुनते ही हम तो धडाम से गिरे...हे प्रभु ..रक्षा करना, और प्रभु ने कोई प्रार्थना नही सुनी. और सीधे हमको ले जा पटका इस ३६ के मनहूसी आंकडे के चक्कर में.
एक मोहतरमा के ब्लाग का स्टिंग आपरेशन हुआ और फ़ूटी किस्मत हमारी कि वहां भी ३६ टिपणियां...और अगर वहां ये ३६ का आंकडा नही होता तो हम बच जाते..क्योंकि उन ३६ टिपणीयों मे जो स्क्रूटनाईज १६ टिपणियां हुई, उनमे हम आये ही इस मनहूस ३६ के आंकडे की वजह से. वर्ना क्या जरुरी था हमारे नाम का १६ स्क्रूटनाईज टिपणियों मे ही आना? हमको पक्का विश्वास है कि अगर यह ३६ टिपणियों का आंकडा ना होता तो हमारा नाम उजागर ना होता और हम बाकी बचे २० टिप्पणिबाजों मे छुपे रहते.
अब हम तो शक्ति कपूर की तरह फ़ंस गये स्ट्रींग आपरेशन के फ़ेर में.. घर मे ताई का अलग डर कि उनको मालूम पड जाये कि ऐसे वैसे चोरी के ब्लाग पर टिपणियां करते हुये ताऊ पकडाया है तो उनके लठ्ठ खावो...और मुझे लगता है कि ये होकर ही रहेगा क्योंकि ये ३६ वां साल चल रहा है. अभी बहुत समय बाकी पडा है इस साल को खत्म होने में. अत: सेफ़्टी मेजर्स के नाते मेरे मन मे कुछ बात उठी है जिन पर विचार किया जाना जरूरी है.

यह जो स्ट्रिंग आपरेशन चलाया गया उसने बहुत कुछ सोचने को बाध्य कर दिया है. अब उस आपरेशन के बारे में हमको कुछ नही कहना क्योंकि जब सब कह रहे हैं तो वही सही होना चाहिये और गजल/शायरी के क्षेत्र से अपना सम्बम्ध सिर्फ़ वाहवाही तक ही सीमित है.

इस सारे वाकये ने किस किस की पोल खोली? कौन बेनकाब हुआ? इस पर कोई और बहस नही की जाये तो ही अच्छा होगा क्योंकि काफ़ी बहस हो चुकी है. मरी भैंस के चमडे को नहलाये जाने से उसमे चमक नही आ सकती.

अब यह मामला जो सवाल खडे करता है, उन पर ध्यान दिया जाये और सभी पंचो की राय जानी जाये, यही इस पोस्ट को लिखने का मकसद है.

सवाल न. १.
क्या नये लोगों के बारे मे पूरी जानकारी किये बिना उनके चिठ्ठों पर टिपणियां नही की जाना चाहिये? जब तक की उनके बारे में पक्की खबर नही लग जाये कि यह आदमी इधर उधर का माल नही ला रहा है? अथवा उनके द्वारा सेल्फ़ डिसकलेमर पोस्ट के नीचे लगाया जाना चाहिये कि यह माल सौ प्रतिशत शुद्ध उनका ही है, यानि खांटी माल है, सिर्फ़ ऐसी ही डिसकलेमर लगी चिठ्ठा पोस्टों पर टिपियाया जाना अलाऊ होगा?

सवाल न.२
जो जिस क्षेत्र का ब्लागर है उसे उसी क्षेत्र मे टिपणी करनी चाहिये, मसलन कविता, गजल/शायरी का जानकार ही गजल/शायरी की पोस्ट पर कमेंट कर सकता है. इसी तरह गद्य के जानकार गद्य पोस्टों पर करें?

इसका फ़ायदा यह होगा कि भविष्य मे इस तरह की कवायद करने की जरुरत ही नही पडॆगी. कारण कि हर आदमी के लिये हर क्षेत्र का जानकार होना जरुरी नही है. तो फ़टे मे पांव नही घुसेडने की आदत से बचा जा सकेगा.

सवाल न. ३.
क्या आप सोचते हैं कि शादी का लिफ़ाफ़ा नही लौटाना चाहिये? अब आप कहोगे कि ऐसे लोगों को शादी का निमंत्रण ही क्यो देते हो? बात आपकी ठीक है पर यह ऐसी सरकारी शादी है कि सामने वाला बिना बताये आगे से निमंत्रण पत्र (टिपणी) डाल जाता है तो उसको क्या करें? क्या ऐसी आई हुई टिपणी को लौटा देना (डिलिट) चाहिये?

जिस तरह से यहां टिपणी करने वालों की छीछालेदर हुई है उससे तो अब कहीं टिपणी भी करने की इच्छा नही हो रही है. क्योंकि वहां टिपियाने वाले अधिकांश टिप्पणि कर्ता गजल/शायरी की विधा से वाकिफ़ भी नही थे और जो इसके जानकार भी थे तो जरुरी नही है कि वो ये जानते ही हों की यह किसकी रचना है? जिन्होने भी टिपण्णीयां की वो एक तरह से प्रोत्साहनात्मक कार्य ही था.


सवाल न. ४.
क्या आप समझते हैं कि वरिष्ठों की एक स्क्रींनिग कमेटी होनी चाहिये जिनके पास पोस्ट जमा करा दी जाये और वहां से ओके सर्टीफ़िकेट मिलने के बाद ही पोस्ट पबलिश करने की अनुमति दी जानी चाहिये?
यानि एक स्वयंभू मठाधीशों और स्ट्रिंगरों की कमेटी बना दी जाये जो यह तय करे कि यह माल मौलिक है या नही और इसके बाद ही इसको निर्बाध कमेंट करने की अनुमति दी जाये?


सवाल न. ५.
अनसेंसर्ड चिठ्ठों यानि जो आपकी स्क्रिनिंग कमेटी से होकर नही आये उन पर टिपणी करने की रोक होनी चाहिये जिससे कि ऐसे चिठ्ठों पर टिपणि करके भविष्य मे होने वाली छीछालेदर से बचा जा सके.

सवाल न. ६.
क्युंकि अब टिपणीयां सिर्फ़ स्क्रिनींग कमेटी द्वारा पारित चिठ्ठों पर ही होंगी तो इसे देखते हुये..उडनतश्तरी, सारथी और चिठ्ठाजगत को यह हिदायत दी जाये कि वो लोगों को ज्यादा से ज्यादा टिपणीयां देकर नये लोगों को उत्साह वर्धन करने की भ्रामक अपील करना बंद करें, वर्ना उन पर अनुशाशनात्मक कार्यवाही की जायेगी?

सवाल न. ७.
क्या किसी की छीछालेदर करने का अधिकार कुछ विशेष व्यक्तियों और उनके चेले चपाटों के पास सीमित कर दिया जाना चाहिये? और मौज लेने का अधिकार भी कंडिका ४ वाली कमेटी के पास सीमित कर दिया जाये? इस अधिकार के चलते कमेटी के अध्यक्ष का निर्धारण भी आसानी से हो जायेगा और सदस्य का आना भी कमेटी पर तय ही रहेगा.

सवाल न.८
. क्या इस व्यवस्था से हम मातृभाषा की ज्यादा और आसानी से सेवा कर पायेंगे?

अब अंत मे हमने एक शेर पढा था कभी, किसका है..अभी याद नही...अगर हम यह शेर छाप दें अपनी पोस्ट मे..तो आप मे से कितने लोग हैं जो इसको पहचान जायेंगे कि यह शेर ताऊ का है या आदतन चोरी डकैती का? और टिपणी मे हिदायत दे देंगे कि ताऊ फ़ांको मत....

उडान वाली उडानों पर वक्त भारी है
के अब परों की नही, हौंसलों की बारी है
दुआ करो के सलामत रहे मेरी हिम्मत
ये इक चिराग कई आंधियों पे भारी है.

अब ताऊ की रामराम...सलामत रहे तो फ़िर मिलते हैं जल्दी ही......... पर कल की पहेली मे तो निश्चित ही मिल रहे हैं.

परिचयनामा : श्री दिनेशराय द्विवेदी

श्री दिनेशराय द्विवेदी, जो किसी परिचय के मोहताज नही हैं, आप सभी उनको एक शीर्ष ब्लागर के रूप मे पहचानते हैं। जिनके ब्लाग्स अनवरत और तीसरा खंबा पर वो निरंतरता से लिखते हैं। राजस्थान के कोटा नगर के एक सफ़ल और प्रतिष्ठित वकील हैं। और समाज सेवा और दुखियों की मदद करने मे हमेशा अग्रणी रहते हैं। आप हमारे ताऊ स्टूडियो मे पधारे और हमको एक छोटी सी बातचीत का समय दिया। आपको भी उस बातचीत से रुबरू करवाते हैं। तो आईये द्विवेदी जी आपका ताऊ स्टुडियो में स्वागत है।


श्री द्विवेदी, ताऊ स्टूडियो में ताऊ के साथ बातचीत करते हुये

ताऊ : द्विवेदीजी सबसे पहले तो यह बताईये कि आप कहां के रहने वाले हैं?
दिनेश जी : राजस्थान के दक्षिण पूर्व में मध्यप्रदेश के गुना, शिवपुरी और श्योपुर जिलों तथा राजस्थान के कोटा और झालावाड़ जिलों से घिरा नगर बाराँ है, जो अब जिला मुख्यालय है वहीं मेरा जन्म हुआ।
ताऊ : यानि आपका बचपन वहीं बाराँ में ही बीता?
दिनेश जी : पिता जी अध्यापक, वैद्य और ज्योतिषी, और दादा जी ज्योतिषी, कथावाचक और नगर के एक प्रमुख मंदिर के पुजारी थे। बचपन और किशोरावस्था दादा जी के सानिध्य में मंदिर में ही बीते।

श्री दिनेशराय द्विवेदी

ताऊ : तो आप कोटा कब आये?
दिनेश जी : मैं पहले तो पत्रकार बनना चाहता था। मुंबई पहुँच गया था। लेकिन तब शादी हो चुकी थी। पत्नी को साथ रखना चाहता था। लेकिन लगा कि वहाँ उसे साथ रखने लायक घर लेने की क्षमता पैदा करने में पाँच सात बरस लग लेंगे। मैं छोड़ कर वापस आ गया। साल भर बाराँ में वकालत सीखी और फिर 1979 में कोटा चला आया। तब से यहाँ वकालत में जमा हूँ।

ताऊ : हमने सुना है कि बचपन में सडक पर कोई लुढकता गर्म लोटा उठाकर आपने हाथ जला लिये थे?
दिनेश जी : अरे ताऊजी, वो घटना तो तब की है जब मैं सात बरस का था।
ताऊ : क्या हुआ था?
दिनेश जी : बचपन में सब ने सिखाया था कि हर किसी की मदद करनी चाहिए। वैसी ही आदत हो गई। मैं अपने निवास के पास के बाजार से निकल रहा था कि एक दुकान से एक पीतल की इमरती (लोटा) छिटक कर सड़क पर लुढ़की। मैं ने सोचा उठा कर दुकानदार को दे दूँ। जैसे ही उसे उठाना चाहा मेरी उंगलियाँ जल गईँ।
ताऊ : ये कैसे हो गया?
दिनेश जी : हुआ यह था कि ठठेरा इमरती (लोटे) को तपा रहा था और वह उस की संसी (संडसी) से छूट कर आई थी। मुझे क्या मालूम कि ये गर्म होगी?
ताऊ : फ़िर क्या हुआ?
दिनेश जी : होना क्या था? हाथों में बुरी तरह जलन होने लगी, सो घऱ आ कर छत पर रखी खारिज पानी की मटकी में जलन मिटाने को हाथ देता रहा, लेकिन दादी ने देख लिया।
ताऊ : फ़िर?
दिनेश जी : बस अपनी मूर्खता की कहानी बतानी पड़ी। तुरंत मामा वैद्य जी के यहाँ जाना पड़ा, मल्हम लाने के लिए। अभी भी वह खब्त गया नहीं है। कभी-कभी उंगलियाँ जल ही जाती हैं।
ताऊ : आपके शौक क्या हैं?
दिनेश जी : खूब पढना, अच्छा ललित, अर्धशास्त्रीय और शास्त्रीय संगीत सुनना, बढ़िया स्वादिष्ट भोजन करना और कॉफी पीना, दोस्तों के साथ मटरगश्ती, खूब बातें और बहस करना, सामाजिक मुद्दों पर समाज में सक्रिय भागीदारी निभाना, फोटोग्राफी, लेखन आदि शौक हैं। जब जिस का अवसर मिल जाता है वही कर लेता हूँ। जब से इंटरनेट मिला है, लिखने का शौक खूब पूरा हो रहा है।
ताऊ : सख्त ना पसंद क्या है?
दिनेश जी : ये आप ने खूब पूछा, अब क्या बताऊँ? आप हँसेंगे, और जग भी हँसेगा।
ताऊ : फ़िर भी बताईये तो सही?
दिनेश जी : मुझे झूठ सख्त नापसंद है। यदि वह किसी को, किसी निरीह को भारी मुसीबत से बचाने के लिए न बोला गया हो। अब आप पूछेंगे कि मैं वकालत कैसे करता हूँ? तो कह रहा हूँ कि सच बोल कर अधिक अच्छी वकालत की जा सकती है।

ताऊ : चलिये आपने स्पष्टीकरण पहले ही दे दिया, वर्ना आजकल के जमाने में इस प्रोफ़ेशन के लोगों मे ऐसे लोग कम ही दिखाई देते हैं। अब ये बताईये कि आपको पसंद क्या है?
दिनेश जी : किसी के हक की लड़ाई लड़ना बहुत पसंद है।
ताऊ : आप काफ़ी अनुभवी हैं, तो कोई ऐसी बात जो आप हमारे पाठको से कहना चाहें?
दिनेश जी : पाठकों से यही कहना चाहूँगा कि जो कुछ भी पढ़ें, उस का आनंद लें और सजग हो कर आलोचनात्मक दृष्टिकोण से पढ़ें। लेखन बहुत अच्छा लगे तो उस की तारीफ करें, लेकिन बहुत अधिक नहीं। कुछ खटके तो अवश्य लिखें और संवाद बनाए रखें, उसे तोड़ें नहीं।
ताऊ : हमने सुना है आपने विद्यार्थी जीवन मे कोई हाईड्रोजन बम का विस्फ़ोट कर दिया था?
दिनेश जी : अरे ताऊ आप भी क्यों मजे ले रहे हो? अपनी वो मूर्खता भी आपको बता ही देता हूँ।
ताऊ : जी बताईये?
दिनेश जी : ग्यारहवीं में रसायन विज्ञान की प्रायोगिक परीक्षा थी। हाईड्रोजन गैस बनाने का उपकरण तैयार कर, जस्ते और सल्फ्युरिक अम्ल के संयोग से हाइड्रोजन बना कर दिखानी थी। उपकरण सही सही तैयार किया। कीप से अम्ल भी डाला। उस ने जस्ते से क्रिया कर के गैस भी बनाई, जो बनती दिखाई भी दे रही थी। पर वह संकलक में नहीं आ रही थी।
ताऊ : अच्छा फ़िर क्या हुआ?
दिनेश जी : मुझे कुछ समझ नहीं आया। फिर जो समझ आया, वह यह था कि उस्ताद तुम बोतल के डट्टों को मोम से सील करना भूल गए।
ताऊ : फ़िर क्या किया आपने?
दिनेश जी : किया क्या? हमने झट मोमबत्ती जलाई और लगे टपकाने मोम, डट्टों के जोड़ों पर। पर वहाँ से हाइड्रोजन रिस रही थी। बस क्या था? मोमबत्ती की लौ से संपर्क में आते ही विस्फोट हो गया। धमाके के साथ डट्टा उसमें लगी शीशे की ट्यूबों समेत उड़ा और प्रयोगशाला की छत पर जा चिपका।
ताऊ : अरे रामराम..! ये तो बहुत बुरा हुआ? आगे क्या हुआ?
दिनेश जी : सैकंडों में ही दूसरा धमाका हुआ, जो मेरी खोपड़ी के भीतर हुआ था।
ताऊ : आपकी खोपडी के भीतर? भई ये क्या हमारी तरह पहेलियां बुझा रहे हैं आप? साफ़-साफ़ बताईये?
दिनेश जी : साफ़-साफ़ ही बता रहा हूं. मुझसे चार फुट दूरी पर ही रसायन विज्ञान के अध्यापक जी खड़े थे। उन्हों ने जोर से सर पर चपत लगाई। उसी चपत का धमाका था, ये दूसरा।
ताऊ : ओह.. हम तो डर ही गये थे। फ़िर क्या हुआ?
दिनेश जी : तो अध्यापक जी बोले -मुझे पता था कि ज्यादा होशियार विद्यार्थी जरूर ऐसी बेवकूफियाँ करते हैं, इसलिए पीछे ही खड़ा था। कभी ऐसी बेवकूफी, कहीं काम के दौरान मत कर देना, वर्ना बहुतों की जान ले बेठोगे। तब से किसी भी काम को करने के पहले सावधानियों पर ध्यान देना सीख गया। पर जीवन में फिर भी असावधानियाँ तो होती ही हैं।
ताऊ : आपने बताया कि आपका बचपन बाराँ मे बीता। वहां की यादों मे आपको अब क्या दिखाई देता है?
दिनेश जी : ताऊ जी ! आप तो जानते ही हैं कि बचपन की यादें अमिट होती हैं। मैं साफ़ देख पा रहा हूं कि यह बारहमासी छोटी नदी बाणगंगा के किनारे बसा एक छोटा नगर है। जो अपनी अनाज मंडी के लिए प्रसिद्ध है। इस नदी से आधा मील दूर एक और बारहमासी नदी बहती थी। मेरी स्नातक तक की पढ़ाई यहीं हुई।
ताऊ : और क्या देख पारहे है इस अतीत में?
दिनेश जी : मैं देख रहा हूं बरसात होते ही बाजारों में पानी तेज नदी की तरह बह रहा है हम बच्चे उस में कागज की नावें छोड़ रहे हैं और उन्हें धार के साथ तेजी से बहते देख खुश हो तालियाँ बजा रहे हैं। जब तक नगर के मुख्य चौराहे पर पाँच-सात फुट पानी न भर जाता, तब तक इस नगर में यह नहीं माना जाता कि इस साल बरसात हुई है।
ताऊ : अच्छा..!
दिनेश जी : हां बरसात में दोनों नदियाँ एक हो जाती थीं। जिसे देखने जाया करते थे। नगर के लोग बाढ़ पीड़ितों को सहायता पहुँचाने के लिए सरकार की तरफ न ताकते थे। जब तक पानी न उतरता, और डूब के घरों में खाना न बनता।
ताऊ : खाना न बनता? मतलब?
दिनेश जी : मतलब कि उनको खाना शहर वाले ही पहुंचाते थे.
ताऊ : वाह! ये तो बहुत गहन भाईचारे की बात हुई? बहुत अच्छा लग रहा है आपके नगर के बारे में जानकर। और बताईये वहां के बारे में।
दिनेश जी : दोनों नदियों के किनारे खूब खजूर के वृक्ष थे, जिन की खजूरें हर तोड़ गिराने वाले के लिए मुफ्त थीं। हर बच्चा स्वतः ही तैरना सीख जाता था। नगर में तीन बड़े मंदिर थे। जिन में से एक में मुझे पन्द्रह साल से अधिक रहने को मिला।

ताऊ : जी और बताईये।
दिनेश जी : अपनी संस्कृति के प्रति नगरवासियों में बहुत अनुराग था। देवशयनी एकादशी से होने वाला यहाँ का डोल मेला खूब प्रसिद्ध है, तो यहाँ के ताजिए भी उतने ही दर्शनीय हैं। दोनों धर्मों के लोग दोनों ही आयोजनों में खूब शरीक होते हैं।
ताऊ : यानि काफ़ी सांप्रदायिक सदभाव वाला शहर है वो?
दिनेश जी : जी, बिल्कुल। कभी कोई वैमनस्यता उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है, तो उसे मुहँतोड़ जवाब भी देते हैं। एक ही स्थान पर कल्याणराय जी का मंदिर, उस की पीठ से चिपकी मस्जिद, फिर चौक और चौक के उस पार गुरुद्वारा और उत्तर में दाऊदियों की मस्जिद एक ही स्थान पर हैं। जैसे कोई तीर्थ हो।
ताऊ : वाह! यह तो बहुत अनुकरणीय है। यानि सभी एक दूसरे के धर्मों की भी कद्र करने वाले हैं?
दिनेश जी : जी बिल्कुल. मेरे घर रामायण पाठ है, तो शब्बर-मियाँ उस का न्यौता देने सब के यहाँ जा रहे हैं और सारी रात नौजवानों की मंडली के साथ रामायण पाठ में मौजूद हैं। शब्बर मियां के यहाँ कुछ है, तो मेरा भाई आयोजन की सफलता में जुटा है।

ताऊ : वाह..! कमाल के लोग हैं आपके शहर के। बिल्कुल आदर्श नागरिक?
दिनेश जी : जी, यहाँ तक कि, शब्बर मियाँ मेरे यहाँ से वाल्मिकी रामायण अपने अब्बा को पढ़ाने को ले जाते हैं, तो मुझे पढ़ने के लिए क़ुरआन का हिन्दी पाठ ला देते हैं। मुझे तो मेरे इस जन्मस्थान से बड़ा कोई तीर्थ नहीं दीखता।
ताऊ : यानि यह बडा सुखद रहा कि आपका बचपन एक बहुत ही शानदार जगह गुजरा? अब भी सब वैसा ही है? खासकर वो नदी..? खजूर के पेड..?
दिनेश जी : ताऊ इसी बात का दुःख होता है. यह सोचते हुए कि दोनों नदियाँ अब बारहमासी तो क्या? नदियाँ ही नहीं रहीं। उन्हों ने नालों की शक्ल अख्तियार कर ली है। खजूरों के वृक्ष तलाश करने पर दीख पड़ते हैं। पर खुशी इस बात की है कि अभी भी डोलयात्रा के विमान और ताजिए उसी तरह निकल रहे हैं।
ताऊ : आपका, मेरा मतलब आपके पिताजी का संयुक्त परिवार था?
दिनेश जी : आँख खुली तो संयुक्त परिवार ही देखा। दादा जी, उन के भाई, यहाँ तक की चार पीढ़ी ऊपर के रिश्ते के भाई सब एक साथ रहते।

ताऊ : अच्छा, यानि बहुत बडा परिवार है आपका?
दिनेश जी : पर अब सब नौकरियों पर जा जा कर अलग हो गए। नए जमाने ने और रोजगार ने सब को अलग कर दिया। अब संयुक्त परिवार तो सपना भर रह गया है। बच्चे ही एक-एक दो-दो हैं। संयुक्त परिवार तो हमेशा से ही अच्छा और लाभदायक है, हर संकट पूरा परिवार एक साथ रह कर झेल जाता है। लेकिन वह तभी संभव है जब, सब एक नगर या गांव में रह सकें।

ताऊ : आप ब्लागिंग का भविष्य कैसा देखते हैं?
दिनेश जी : बहुत उज्जवल है। यह एक ऐसा माध्यम विकसित हुआ है, जहाँ हर कोई अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र है। कुछ भी अभिव्यक्त कर सकता है। यहाँ अनुशासन भी आ लेगा। क्यों कि जो अभिव्यक्ति सामाजिक नहीं होगी, लोग उसे अस्वीकार कर देंगे और ऐसे लोग स्वतः ही नकार दिए जाने के कारण छंट जाएँगे। फिर भी हर तरह के नए लोग आते-जाते रहेंगे।
ताऊ : आप कब से ब्लागिंग मे हैं?
दिनेश जी : मैं अक्टूबर 2007 से ब्लागिंग में हूँ।
ताऊ : ब्लागिंग में आना कैसे हुआ?
दिनेश जी : मैं ने नेट पर साहित्य तलाशते हुए हिन्दी ब्लागिंग को देखा और टिप्पणियाँ करने लगा। बस एक दिन अनूप शुक्ला जी से कुछ पूछ बैठा था।
ताऊ : और उन्होने आपको उकसा दिया होगा?
दिनेश जी : (हंसते हुये...) ये आपने सही पकडा. उन्हों ने मुझे ब्लागिंग के लिए उकसाया, और मैं तो जैसे उकसने को तैयार ही बैठा था। मेरा लेखन वकालत के व्यवसाय की व्यस्तता ने बंद ही कर दिया था। ब्लागिंग ने ही उसे पुनर्जीवित किया है। मेरा ब्लागरी का अनुभव बहुत अच्छा रहा है।
ताऊ : आपका लेखन आप किस दिशा मे पाते हैं?
दिनेश जी : बिलकुल सही दिशा है। मनुष्य ने समाज के विकास की अनेक मंजिलें तय की हैं। वह अगली मंजिल की तलाश में है। उस के पास उस के बहुत से मानचित्र हैं, पर अभी कोई अन्तिम नहीं हो रहा है। अभी प्रयोग चल रहे हैं। जिस दिन सही मानचित्र मिल जाएगा, उसी दिन वह विकास की अगली मंजिल में प्रवेश कर जाएगा। सब सक्रिय और ईमानदार लोग उसी की तलाश में हैं। मानचित्र के लिए सब खूब लड़ते हैं, झगड़ते हैं, लेकिन मंजिल एक ही है। जब सही मानचित्र मिल लेगा, तो ये उस पर मकान बनाने के लिए एक साथ जुटे होंगे।
ताऊ : क्या राजनीति में भी आप रुचि रखते हैं?
दिनेश जी : जी हाँ, राजनीति में बहुत रुचि है। किशोरावस्था में ही खूब बहसें किया करता था। वास्तव में समाज में कोई भी बड़ा बदलाव राजनीति के बिना ला पाना संभव नहीं है। मनुष्य का कोई भी सामाजिक क्रियाकलाप राजनीति से परे नहीं होता।

ताऊ : आप इसमें कैसे सहयोग करते हैं?
दिनेश जी : मुझे लोगों को संगठित करना और उन के हकों की लड़ाई लड़ाना अच्छा लगता है। वर्तमान की सारी दलदगत राजनीति मौजूदा सत्ता की राजनीति है।
ताऊ : इसमे जनता का क्या रोल है?
दिनेश जी : बहुत ज्यादा, बल्कि कहना चाहिये कि मुख्य रोल ही जनता का है। जनता खुद अपने संगठनों में संगठित नहीं है। जब वह अपने संगठनों में संगठित हो लेगी, और अपने निर्णय अपने सामूहिक हितों को देख कर लेने लगेगी, तो नई और सही राजनीति विकसित होगी। आज ही मुझे एक मेल मिला है जिस में दिल्ली में किसी एक वार्ड को अनेक भागों में बाँट कर वहाँ के मतदाताओं को संगठित करने के प्रयास का उल्लेख है। यह सही राजनीति है। ऐसा ही करने को मैं भी अपने मित्रों के साथ प्रयत्नशील रहा हूँ और अनेक संगठन बनाए हैं। लेकिन मूलतः प्रवृत्ति सांस्कृतिक होने से सांस्कृतिक संगठनों में सक्रिय रह पाता हूँ।

ताऊ : कुछ अपने स्वभाव के बारे मे बताईये?
दिनेश जी : सामान्यतः शांत और सहयोगी हूँ और कुछ मजाहिया भी, पर सब की मजाक करने के पहले खुद की मजाक बनानी पड़ती है। लोग कहते हैं, मुझे कभी कभी जोर गुस्सा का आता है, लेकिन केवल मिनटों के लिए। मेरे एक दिवंगत बुजुर्ग वकील साथी शरीफ मोहम्मद जी तो अक्सर कहते थे -आप को गुस्से में देखे बहुत दिन हो गए। और मैं कहता क्या मुझे गुस्सा भी आता है? वे कहते -देखने लायक होता है।
श्रीमती और श्री दिनेश राय द्विवेदी, पुत्र और पुत्री के साथ

ताऊ : आपकी धर्मपत्नी के बारे मे कुछ बताईये?
दिनेश जी : मेरी पत्नी 'शोभा', बहुत अच्छी गृहणी हैं। जिन्हों ने हर कष्ट और खुशी में मेरा साथ दिया है। हमारे घर, परिवार को संवारा है। मुझे एक पुत्री और पुत्र का पिता बनने का सौभाग्य दिया है। दोनों बच्चों को भले संस्कार दिए हैं,उन्हें योग्यतम बनाने और अपने पैरों पर खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हर किसी की, हर संभव मदद करने को तैयार रहती हैं।

ताऊ : ब्लागर्स से मेरा मतलब हिंदी ब्लागर्स से आप कुछ कहना चाहेंगे?
दिनेश जी : मैं तो यही कहना चाहता हूँ कि यदि आप बेईमान हैं और किसी खास इरादे से ब्लागरी में ब्लागर या पाठक के रूप में मौजूद हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना है। लेकिन यदि मानव समाज को बेहतर मंजिल में ले जाना हमारा ईमानदार उद्देश्य है, तो उस के लिए ईमानदारी से कृतियों का सृजन करें। सब को मित्र समझें। वाद-विवाद अवश्य करें लेकिन आपस में वैमनस्य न बढ़ाएँ। भाषा को ऐसा बनाए रखें कि उस के कारण कोई अपमानित न हो, न महसूस करे।
ताऊ : ताऊ पहेली के बारे मे आप क्या कहना चाहेंगे?
दिनेश जी : अरे! बहुत मजेदार है, और लोगों का ज्ञान बढ़ा रही है। बस इस में ये टाइम वाला लोचा है। हम अक्सर उसी में पिछड़ जाते हैं। पर लोचा ठीक है किसी तरह तो प्रथम का चुनाव करना पड़ेगा। हमें रामप्यारी की पहेलियाँ भी खूब पसंद हैं। गणित के सवाल करने में तो बहुत मजा आता है।
ताऊ : अक्सर पूछा जाता है कि ताऊ कौन? आप क्या कहना चाहेंगे?
दिनेश जी : वो तो हम जानते हैं, लेकिन बताएँगे नहीं। वरना सारा मजा चला जाएगा। वैसे ताऊ वो, जो बिना बात भी मजमा लगा ले!

ताऊ : ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के बारे में आप क्या सोचते हैं?
दिनेश जी : बहुत सुंदर पत्रिका है। पढ़ने को समय चाहती है। ब्लाग पाठक अधिक देर रुकता नहीं है। मैं तो फुरसत में पढ़ता हूँ उसे।
ताऊ : अगर आपको भारत का कानून मंत्री बना दिया जाये तो आप क्या करना चाहेंगे?
दिनेश जी : बहुत मजाहिया सवाल है। आप वो पूछ रहे हैं जो हो नहीं सकता। फिर भी ऐसा हो जाए तो सब से पहले प्रधानमंत्री को कहूँगा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की संख्या दुगनी करने के लिए पंचवर्षीय योजना बनाइए। योजना बन जाने पर उसे तत्परता से लागू करने का प्रयत्न करूंगा। राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बुला कर कहूँगा कि वे भी पाँच सालों में अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या कम से कम चार गुना करने की पंचवर्षीय योजना बनाएँ और उसे हर हालत में लागू करें। ऐसी हालत हो कि कोई भी मुकदमा दो वर्ष से अधिक किसी अदालत में लम्बित नहीं रहे। मुकदमों के निपटारे में देरी से देश में अराजकता फैल रही है और राज्य और उस के न्याय पर से विश्वास उठ जाने के कारण आतंकवाद, नक्सलवाद और विभाजनवाद को पनपने का अवसर प्राप्त होता है। साथ ही देश में अपराध तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इन सब को रोकने में इस से मदद मिलेगी।
अंत मे " एक सवाल ताऊ से"....

सवाल दिनेश जी का : मुझे तो एक बात बता दीजिए कि आप पैदायशी ताऊ हैं या ताऊपने की किसी से दीक्षा ली है? दीक्षा ली तो वो गुरू कौन है?

जवाब ताऊ का :आपके सवाल के उत्तर में पहले एक सवाल मैं पूछना चाहूंगा कि क्या आप गधे को घोडा बना सकते हैं? आप कहेंगे नही. क्योकि घोडे के लिये उसका पैदायशी घोडा होना जरुरी है फ़िर आप उसको ट्रेनिंग देकर संवार सकते हैं. ठीक इसी तरह ताऊ होने के लिये कुछ पैदायशी ताऊपने के गुण होने चाहिये.

अब आपके सवाल का दूसरा हिस्सा - जहां तक दीक्षा की बात है तो जीवन मे एक से बढकर एक ताऊ मिले हैं और हर ताऊ कुछ ना कुछ सिखा गया. जैसा कि आप भी जानते ही हैं कि यहां ब्लागजगत मे भी मेरे दो गुरु हैं, और ब्लागिंग मे मुझे हर प्रकार की दीक्षा इन दोनों से मिली है. पहले ब्लागिंग कि दीक्षा मिली माननिय गुरुदेव समीरलालजी से और दूसरी दीक्षा मिली आदरणीय गुरुदेव डा. अमरकुमार जी से. इन दोनों का मैं हृदय से आभारी हूं.

तो ये थे हमारे आज के मेहमान दिनेशराय जी द्विवेदी . आपको इनसे मिलकर कैसा लगा? अवश्य बताईयेगा।

फ़रार बसंती का फ़ोन आया सांभा के पास : ताऊ की शोले


ताऊ की शोले (एपिसोड - 6)
एपिसोड निर्देशक : ताऊ रामपुरिया और अनिता कुमार
सगीत निर्देशक : दिलिप कवठेकर
इस एपिसोड से बसंती का रोल कर रही हैं "अदा"

बसंती फरारी में भेष बदलकर इधर से उधर छुपती फिर रही है. उसे पुलिस शिकारी कुत्ते कि तरह ढूंढ़ रही है. बसंती को रामपुर के इलाके से निकलना बहुत ज़रूरी है. खेतों से छुपते छुपाते वो सड़क पर आ जाती है......दूर दूर तक कोई वहां नज़र नहीं आ रहा है. कड़कती दोपहरी है और सुनसान सड़क कोई गाड़ी-छटका नहीं दिख रहा है.

धन्नों भी थक गई है. बसंती ने उसे अपने कांधे पर बैठा लिया है और चली जारही है. तभी एक पेड की छांव में आड लेकर वो अपना मोबाईल निकाल कर सांभा को फ़ोन लगाकर बात करती है..

बसंती सांभा से फ़ोन पर बात करते हुये


बसंती : हां हैल्लो...हां कौन सांभा? अरे जोर से बोलो भाई...हम बसंती हैं इधर से...

उधर से सांभा की आवाज आती है....हां बसंती बहन..बोलो..बोलो..मैं सांभा ही बोल रहा हूं.

बसंती : अरे सांभा भैया...अब का बोलें? अऊर का ना बोले? तुम्हीं बताओ...इहां मारे मारे फ़िर रहे हैं और तुम लोगों को कोई हमारी फ़िक्र ही नही है?

सांभा
: अरे बसंती..ऐसे मत सोचो..हम इतना परेशान हूं...सबके लिये...अब क्या करें? तुम्ही बताओ....उधर वो कालिया अलग गिरोह बनाने की धमकी दे रहा है. इधर गिरोह के लोग इधर उधर हो रहे हैं...गोली बारुद कुछ है नही..जो कोई शिकार करें....चारों तरफ़ से पुलिस का शिकंजा अलग से...

बसंती : अरे सांभा भैया..क्या कह रहे हो? ऊ कालिया का इतना हिम्म्त होगया..जो अलग गिरोह बनायेगा?

सांभा : अब का बतायें? ऊ जेलर के चक्कर मे आगया है कालिया तो..और तुम तो जानती ही हो कि गब्बर ने जेलर का पूरा हिस्सा नही दिया तब तक वो ऐसे ही गिरोह के आदमियों को भडकाता रहेगा. बडा खडूस है वो जेलर.

बसंती : तो गब्बर से कह कर उसका हिसाब किताब क्यों नाही करा देत हो?

सांभा : बसंती तुम भी समझदार होकर ऐसी बात बोल रही हो? अरे बिना रुपयों के हिसाब कहां से करवाय दें? और जेलर अपना पूरा हिस्सा लिये बिना मानने वाला नही है.

सांभा अड्डे पर बिना गोली बारुद के बैठा बसंती से बात करते हुये!


बसंती : तो गब्बर क्या कर रहे हैं आजकल..कहीं दू चार लम्बे हाथ मारकर जेलर का मूंह बंद करो और गिरोह वालों को खर्चा पानी दो..दिपावली दशहरा का त्योंहार अलग से आगया है सर पर.

सांभा : अरे बसंती...यही तो मैं समझा समझा कर हार गया पर ऊ गब्बर भाई मानें तब ना...बस ऊ ठाकुर के चक्कर मे चढ गये हैं और कहीं कुछ काम धंधा यानि डकैती वकैती डालने की योजना ही नही बनाते....बस दिन रात ऊ ठाकुर के लेपटोप मे आंखे गडाये बैठे रहत हैं..

बसंती : ई लेपटोपवा का बला है? कोनू आंख गडाने की चीज है का?

सांभा : अरे ऊ..का बताये अब....ठाकुर ने गब्बर को बिगाड के रख दिया..ऊ ससुरी बिलागिंग विलागिंग सिखा दी उसको..बस दिन रात रमे रहते हैं उसी मां...ना किसी से कछु लेना ना देना...पता नही ई ठाकुर ने कौन सा बदला निकाला है...

बसंती : का ये कोनू छूत की बीमारी है का?

सांभा : अरे उससे भी बुरी बीमारी है...सिर्फ़ मौसी ही बचा सकती है इससे...और मौसी जब भी आती है...गब्बर डर के मारे छुप जाता है..मौसी से मिलता ही नही है...

बसंती : सांभा भाई...आप चिंता मत करो...ई गब्बर का अक्ल तो हम ठिकाने लगाय देब....जरा हम मौसी तक पहुंच जाय..और फ़िर ऊ..कालिया का भी हिसाब निपटा देंगे...चिंता नही करना...इस गिरोह को टूटने नही देंगे हम...बडी मुश्किल से खून पसीना एक करके बनाया है हम लोगों ने इसको..

सांभा - हां बसंती.. ई तो तुम सही कहत हो...पर अब आगे क्या करें...ऊ गब्बर तो बिलागिंग के रोग मे जकड गया है...ठाकुर उसको बेवकूफ़ बना रहा है..ना तो हथियार दिलवा रहा है..ना छुडवा रहा है..बल्कि अफ़ीमची की तरह बिलागिंग का नशा पिलाय देत है..दिन भर गब्बर को...और बस गब्बर दिन भर गाते रहत हैं..आ..ब्लागिंग करले..आ ब्लागिंग करले...

बसंती : अऊर ऊ जय का कोनू पता चलबे किया की नाहीं..?

सांभा : अरे बसंती बहन ...लगता है ई ससुर गिरोह ही कोनू गलत मुहुर्त में बन गवा. कोई काम करना ही नही चाहता. हम अकेले ही अब कितना काम करें?

बसंती : अरे सांभा भाई... ऊ ताऊ वाली स्टाईल में पहेलियां मत बूझावो...और दन्न से बताओ कि क्या लफ़डा किये हैं जय? काहे से की ...अब धन्नों को पुलिस का गंध आने लगा है अऊर अब हम और हमारी धन्नों इहां से चम्पत होने की सोच रहे हैं..अब एरिया बदलना है.

सांभा : बसंती बहन...बात ऐसन है कि जय को तो गब्बर से भी बुरी बीमारी लग गई है.....पता नही कहां से लगी..सब काम धंधा छोड छाडकर...बस गाते फ़िरते हैं..' तुझे देख के मेरी मधुबाला, मेरा मन ये पागल झाला, तूने इक बार हंस के जो बोला.......

बसंती : अरे सांभा भाई...ई का बोल रहे हो? का जय पगलाय गये का? साफ़ साफ़ बतलाओ भाई..

सांभा : अब का बतायें बसंती बहन...सब गिरोह चौपट करवा दिया इस लडके नें...पता नही आजकल..मेरी मधुबाला...मेरी मधुबाला...गाते हुये..ऊ खपोली की पहाडियों मे घूमते रहते हैं....

बसंती : ई का कहत हो सांभा भाई? जय बचूआ तो बडे मेहनती रहे...और.....

सांभा बात काटते हुये बीच में ही बोला : और..अरे और पता नही कहां से ई शायरी का रोग ऊपर से लगवा लिये कहीं से? हम कितनी बार संदेशा भेजे कि हमको फ़ोन करो..फ़ोन करो.. पर नाही..उनको तो मधुबाला से ही फ़ुरसत नही...तो ऊ डकैती ऊकैती का कहां से सोचें? एक बार जय का शायरी का भूत उतर जाये तो ई लडका काम का है...ई हमारे गिरोह को चलाने की अक्ल रखता है. हमको इससे बहुत उम्मीदें थी..पर का करें.....

बसंती : हैल्लो..सांभा भैया...हिम्मत मत हारो..पुराने दिन फ़िर लौटेंगे...एक एक दिन मे दो दो ठो डकैतियां फ़िर से डालेंगे हम लोग...बस तुम तैयारी करो...मैं कैसे भी करके सूरमा भोपाली से मिलकर जेलर को सेट करती हूं...कि हमको कुछ वारदात उधार मे करने दे और पुलिस का फ़ंदा कम करवाये...फ़िर उसका उधार भी चुका देंगे..और सब मामला सेट कर देंगे....अब तुम मेरे फ़ोन का ईंतजार करना और ...कुछ गलत कदम मत उठाना...पुलिस पीछे लगी है..मैं सूरमा भोपाली से कहकर जरा पुलिस को हटवाती हूं... ओके...

सांभा : ओके ..बसंती..अब तो इस डूबते गिरोह को तुम्हारा ही सहारा है. (सांभा फ़ोन काट देता है. और कहीं और फ़ोन लगाने लगता है.)
इधर बसंती भरी दोपहर की गर्मी में चली जारही है.......तभी दूर से एक ठो मोटर साईकिल दिख रहा है. बसंती हाथ का अंगूठा दिखा कर रोकती है.. एक लड़का चला रहा था मोटर साईकिल... बसंती को देख कर रोक देता हैं.
लड़का : क्या बात है मैडम कोनो दिक्कत है का ?

बसंती : युंकी आप भी बहुत गजब सवाल किये हैं.....अगर दिक्कत नहीं होता तो इ ठेपो हम ऐसा ही देखाए का ..?

लड़का : हाँ कहिये का बात है ?

बसंती : युंकी ऐसा तो है नहीं कि आपसे गपियाने का वास्ते हम डहर में खड़े हैं, हम सोचे कि आप भी शहर जैबे कर रहे हैं और आपका पीछे वाला सीट भी वही जैबे कर रहा है...तो सोचे वाला बात इ है कि अगर हमहूँ आपके साथ बैठ जावें और गर्रर से आप मोटर साईकिलवा आप चलावें तो कौनो पिरोब्लेम का बात नहीं नु है ......बोलिए बोलिए. ?? माने कि आम का आम और गुठली का दाम हमहूँ चहुंप जावेंगे न सहर, सुरमा भोपाली जी का घर पर....

लड़का : हाँ हाँ मैडम काहे नहीं ...हम उधर जैबे न कर रहे हैं..आप बैठ जाइए पीछे कोई पिरोब्लेम नहीं है

बसंती मोटरसाईकिल सवार से लिफ़्ट लेकर खुद बाईक चलाते हुये


बसंती : युंकी हम जानते थे कि आप हैं तो लड़का बाकी समझदार हैं, नहीं आज का जबाना में बहुत कम हो गया है ऐसा प्राणी. अच्छा चलिए अब..... चल धन्नो तोहरी बसंती को मिल गवा सवारी .......
इतने में एक बकरी का बच्चा दौड़ता हुआ आता है और बसंती कि गोद में चढ़ जाता है ...
लड़का : अरे इ बकरी का बच्चा कौन है मैडम ? इसका का काम ?

बसंती : युंकी इ आप का बोले ? बकरी का बच्चा ? इ आपको बकरी का बच्चा दीस रहा है !! अरे इ धन्नो है धन्नो... इसको ऐसन-वैसन मत समझियेगा इ आपको केतना बार बेच कर खरीद लेगी आपको पतो नहीं चलेगा समझे.....जायेंगे तो दोनों जायेगे साथ में.. मजूर है तो बोलिए नहीं तो जय राम जी की...बसंती चली अपना घर..

लड़का : अरे मैडम कोई बात नहीं इसको भी बैठा लीजिये
बसंती धन्नो के साथ मोटर साईकिल में पीछे बैठ जाती है..रस्ते में धन्नो के कान में बसंती कुछ कहती है,,, और धन्नो लड़के का कान कुतरने लगती है.....लड़का बहुत परेशां हो जाता है.

लड़का : अरे मैडम आपकी धन्नो तो हमरे कान को चारा समझ के खाए जा रही है इसको रोकिये न

बसंती : युंकी बात इ है की हमरी धन्नो को कान खाने की आदत है...अब अगर घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा का ...इसी लिए हम अपना धन्नो को सबका कान काटने देते हैं भाई.

लड़का : अरे लेकिन हम मोटर साईकिलवा चलावेंगे कैसे ?

बसंती : युंकी आप काहे चला रहे हैं महराज.. हम कौन मर्ज का दवा हैं हजूर?

लड़का : आप मोटर साईकिल चलाती हैं ??? लडका आँख फाड़-फाड़ कर देखता है..

बसंती : लो कर लो बात ....i can drive motor cycle, i can walk motor cycle, i can talk motor cycle.. i can..अरे बसंती तुमको मोटर साइकिल में बैठा कर रामपुर का चार ठो चक्कर लगा कर तेसन्वा पर छोड़ कर आवेगी हाँ ...कह दे रहे हैं.

लड़का : अच्छा बाबा तो आप ही चलाइये हम पीछे बैठता हूँ..

बसंती : ठीक है बाकि धन्नो हमरे साथ आगे ही रहेगी भाई ...मंजूर है

लड़का : मंजूर है
बसंती और धन्नो लडके को मूर्ख बनाकर बाईक झपट ले गई!

लड़का उतरता है, बसंती मोटर साईकिल स्टार्ट करती है धन्नो को सामने 'बिठाती' है और इसके पहले की लड़का पीछे बैठे मोटर साइकिल लेकर भाग जाती है ..लड़का चिल्लाता रहता है 'अरे रोको'..अरे मेरी बाईक उडा ले गई रे....कोई तो रोको...अरे मैं लुट गया रे...

और बसंती बोलती है, चल धन्नो ....ऐ पलट सवार !!!!!'

ताऊ पहेली -39 की विजेता सुश्री पारुल

प्रिय भाईयो और बहणों, भतीजों और भतीजियों आप सबको घणी रामराम !

कल की ताऊ पहेली - 39 का सही उत्तर है बाबा हरभजन सिंह टेंपल, सिक्किम. जैसा की आप जानते हैं आज से ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन कुछ समय के लिये स्थगित किया गया है इस वजह से इस विषय पर आप सुश्री अल्पना वर्मा का आलेख नही पढ पायेंगे. उन्होने इसे देखते हुये कुछ चित्र और विडियो उपलब्ध करवाया है जो हम नीचे दे रहे हैं.

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 बाबा हर भजन सिंह जी

baba harbhajan singh mandir board

 बाबा हरभजन सिंह मंदिर बोर्ड

BabaHarbhajanSinghJi2
  1.  
    बाबा हरभजन सिंह मंदिर

 

और नीचे के विडियो में आप और विस्तृत जानकारी पा सकते हैं.





आईये अब आज के हमारे क्रमश: प्रथम आये तीन विजेताओं से मिलते हैं.

प्रथम विजेता    सुश्री पारुल

Blogger     पूरे १०१ अंक बधाई

Bloggerद्वितिय विजेता श्री Murari Pareek

अंक १०० बधाई

Blogger तृतिय विजेता श्री Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" अंक ९९


आईये अब क्रमश: आज के अन्य माननिय विजेताओं से आपको मिलवाते हैं.

 

 

 

Blogger

seema gupta 

अंक ९८

Blogger मीत

अंक ९७

Blogger jitendra


अंक ९६

Blogger शुभम आर्य

अंक ९५

Blogger संजय तिवारी ’संजू’

अंक ९४

 

 

premlatapandey

अंक ९३

Blogger Smart Indian - स्मार्ट इंडियन अंक ९२

Blogger Udan Tashtari 

अंक ९१

Blogger अभिषेक ओझा

अंक ९०

 

छपते छपते :


Bloggerश्री HEY PRABHU YEH TERA PAT का भी सही जवाब आया है. आपको दिये जाते हैं पूरे ५० नम्बर. बधाई.

 

श्री  अविनाश वाचस्पति भी आये सही जवाब के साथ आपको भी दिये जाते हैं पूरे ४९ अंक…बधाई. 

 


इसके अलावा निम्न महानुभावों ने भी इस पहेली अंक मे शामिल होकर हमारा उत्साह बढाया. जिसके लिये हम उनके हृदय से आभारी हैं.



श्री अविनाश वाचस्पति,  श्री गौतम राजरिशी,  श्री अनिल पूसदकर, श्री विवेक रस्तोगी,  श्री सोनू,    श्री राज भाटिया,  श्री सोनु, श्री भैरव, श्री दीपक तिवारी साहब,  श्री सही,



श्री भानाराम जाट,  श्री दिगंबर नासवा,  श्री हरी,  श्री नीरज जाटजी,  श्री सुशीलकुमार छोंक्कर, श्री आशीष खंडेलवाल,  श्री पंकज मिश्रा,  डा. श्री रुपचंद्र शाष्त्री  और  सु. वाणीगीत

 

आप सभी का हार्दिक आभार.



"रामप्यारी के ३० नंबर के सवाल का जवाब"


हाय…गुड मोर्निंग एवरी बडी…आई एम राम..की प्यारी… रामप्यारी.
हां तो अब जिन्होने सही जवाब दिये उन सबको दिये गये हैं ३० नम्बर…अगर भूल चूक हो तो खबर कर दिजियेगा..सही कर दिये जायेंगे.

जैसा कि आप लोगों ने बताया है, दशानन रावण के विमान का नाम था पुष्पुक और यह उन्होने अपने सौतेले बडे भाई कुबेर को घर बदर करके हथियाया था. असल मे उन्होने कुबेर को अल्कापुरी मे निवास करने के लिये विवश कर दिया था.

तो आज सबसे पहले आई सीमा आंटी, फ़िर बहुत दिनों बाद पधारे शुभम अंकल, फ़िर वकील साहब अरे वो ही अपने भाया ! बैल बगाग्यो वाले ! जिनका इस गुरुवार को ताऊ द्वारा लिया गया साक्षात्कार भी परिचयनामा में प्रकाशित होगा !

अरे मैं भी कहां की बात कहां ले उडी? हां फ़िर M.A.Sharma "सेहर" आंटी आई, फ़िर स्मार्ट ईंडियन अंकल, और फ़िर महक आंटी आई ..एक दम सही सही सोलह आने का जवाब लेकर.

फ़िर अपने संजय बेंगाणी अंकल, अंतर सोहिल अंकल और पंडीतजी अरे वो ही डी.कॆ. शर्मा "वत्स" अंकल भी सही जवाब के साथ आये.

इसके बाद आये जीतेंद्र अंकल, संजय तिवारी "संजू" अंकल, फ़िर दिलिप कवठेकर अंकल, और लो आज तो उडनतश्तरी अंकल भी आ पहुंचे बहुत दिनों बाद. क्या अंकल गब्बर का असर आगया क्या? जो विमान ही झपटने के चक्कर मे हैं?
बेचारे रावण को कितने पापड बेलेने के बाद मिला था और वो भी राम जी ले उडे थे.

फ़िर आये अभिषेक ओझा अंकल, विवेक रस्तोगी अंकल और सबसे आखिर मे आई निर्मला कपिला आंटी...चलो आंटी अब आपने नकल पट्टी करके ही जवाब दिया है तो पूरे तीस नम्बर आपको भी दिये. वैसे आप घबराओ मत...ताऊ की दूकान मे तो नकलपट्टी की पूरी छूट है. और ताऊ तो खुद नकलपट्टी का चैंपियन है.

आप सबके खाते में तीस तीस नम्बर मैने जमा करवा दिये हैं.

अब रामप्यारी की तरफ़ से रामराम…अगले शनीवार फ़िर से यही मिलेंगें. वैसे आजकल शाम ६ बजे मैं ताऊजी डाट काम पर रोज ही मिल जाती हूं. ..और हां आपका आज से शुरु होने वाला सप्ताह शुभ हो.



हीरू और पीरू यानि हीरामन और पीटर की मनोरंजक टिपणियां यहां पढिये.
"आपकी सेवा में हीरू और पीरु"

 

अरे हीरू देख ये हरी अंकल को क्या हो गया?

कंई हुई ग्यो पीरु भिया?

देख देख..ये केवे के रावण कनै उणको  ही विमान थो, न वापस मांगि  रह्या हे. ले देख…

 

hari said...

रामप्यारीजी रावण जी के पास मेरा विमान था, मुझे वापस दिलाया जाये.:)

September 12, 2009 1:23 PM

Blogger Udan Tashtari said...

अरे, ये जगह ही तो देखने से रह गई थी जब गंगटोक गया था. बस ५०-६० किमी जाना था पहाड़ पर मगर ऐसी बरफ गिरी कि रास्ते बंद और बाबा के दर्शन ही रह गये. काश, कोई पुष्पक विमान मैने भी छुड़ा लिया होता उस कुबेरवा से, तो उसी में चला जाता बैठ कर.

Blogger मीत said...

ताऊ आज तो थारी पहेली ने मजो चखा दियो...
मीत

September 12, 2009 1:08

 

चल निकल ले भिया..यां नी रहणो अब तो…बाढ आई री हे….

हां चल भिया....


अच्छा अब नमस्ते.सभी प्रतिभागियों को इस प्रतियोगिता मे हमारा उत्साह वर्धन करने के लिये हार्दिक धन्यवाद. ताऊ पहेली – 39 का आयोजन एवम संचालन ताऊ रामपुरिया और सुश्री अल्पना वर्मा ने किया.