मठाधीष रामप्यारे और गधों की जमात

गधे आखिरकार गधे ही होते हैं और उन्हें अपने गधेपन से कभी भी संतुष्टि नहीं मिलती. इसीलिये गधे अपने आपको घोडे सिद्ध करने की कोशीश करते हैं. अब जो पुराने पाठक हैं वो ताऊ के रामप्यारे से तो अच्छी तरह वाकिफ़ ही होंगे. आज का यह किस्सा भी रामप्यारे  का ही है.

ब्लागिंग का जमाना खत्म हुआ और कोरोना काल के बेरोजगारों की तरह ताऊ, रामप्यारी और रामप्यारे भी बेरोजगार हो गये. ताऊ के पास तो पुराना लूटा हुआ काफ़ी माल था सो उसे कोई तकलीफ़ नहीं थी. ताऊ ने रामप्यारी को आगे पढने के लिये लंदन स्कूल आफ़ इकानामिक्स में भेज दिया और आप जानते हैं कि रामप्यारी बहुत जहीन दिमाग की है सो वो तो पढने लंदन चली गई.

ताऊ ने रामप्यारे को कहा कि अब तू भी कुछ काम धंधा करले, पढना तो तेरे वश की बात नहीं है. पर आप जानते ही हैं कि रामप्यारे सिर्फ़ गधेपने के काम कर सकता है. ताऊ ने बहुत कोशीश की कि रामप्यारे कुछ काम धंधे पर लग जाये. पर रामप्यारे ने तो ताऊ के साथ रहकर लूट, ऊठाईगिरी, ज्योतिष में लोगों को मूर्ख बनाकर माल ऐंठना ही सीखा था. उस ब्लागिंग के स्वर्णिम काल में रामप्यारे सोचता था यूं ही ठाठ से जिंदगी चलेगी पर ब्लागिंग का जमाना खत्म होते ही रामप्यारे के होश ठिकाने आ गये. ताऊ के लाख समझाने पर भी वो कोई काम धंधा करने को तैयार नहीं हुआ तो ताऊ ने भी उसे पूंछ पकड कर चलता कर दिया.

अब रामप्यारे को ताऊ की ज्योतिष याद आ गई, उसने समझा इससे ज्यादा आसान और माल कूटने का कोई और धंधा नहीं हो सकता. अब रामप्यारे ने ज्योतिष की दुकान लगा ली. अब उसके पास कुछ ज्ञान होता तो ज्योतिष की दुकान चलती भी पर वो ठहरा निरा गधा. सो दुकान चली नहीं.

रामप्यारे सोचने लगा अब क्या किया जाये? लीडरी कैसे की जाये?  तो उसने कुछ अधकचरे गधे ज्योतिषियों को इकठ्ठा किया और उनका एक ग्रूप बनाकर लीडरीका शौक पूरा करने लगा. अब ग्रूप में उसने चालीसेक गधे इकठ्ठे करके उन पर लीडरी झाडने लगा था. 

रामप्येयारे की यह  दुकान  चल निकली.... क्योंकि रामप्यारे ने यहां बढिया मजमा लगा दिया था. कुछ गधों को सेवादार नियुक्त किया गया....जो रामप्यारे के गुण गान करते और उसका महिमा मंडन करना ही उनका काम था.....रामप्यारे ने मठाधीष बनने की पूरी जोगाड कर ली. सुबह...सुबह सतसंग होता....फ़िर दोपहर में  धर्म चर्चा होती और उसके बाद कुंडलिनी जाग्रत करने की विधी समझाई जाती....और देर रात तक कुंडलिनी पर चर्चा चलती रहती. ये अलग बात है कि कुछ कुछ गधे गलत बात पर विरोध करते तो रामप्यारे उनको मठ से बाहर निकालने की धमकी देकर चुप करवा देता. कुछ को तो निकाल भी चुका था जिससे दूसरे गधे रामप्यारे से खौफ़ खाने लगा थे.. ताऊ से मठाधीषी के गुर तो वो पहले ही सीख चुका था, वो ही अब काम आ रहे थे.





रामप्यारे दिमाग का शातिर तो ताऊ के साथ रहकर हो ही चुका था. सो एक दिन उसने गधों से पैसे वसूलने के लिये शानदार गधा सम्मेलन करवाया. उसने गधों को सम्मेलन में बुलाकर छककर गुलाब जामुन, दही बडे और नाना प्रकार के व्यंजन खिलाये. गधे भी आखिर गधे ही थे सो गुलाब जामुन खाकर लोट पोट हो कर रामप्यारे के समर्थन में जमकर ढेंचू...ढेंचू का राग अलाप कर उसकी जमकर तारीफ़ की.

मौका ताक कर रामप्यारे ने उनको भविष्य की योजनाएं समझा कर कर माहवारी चंदा शुरू करने की स्कीम समझाई.... जिससे उसका कुछ खर्च पानी निकल सके.... कुछ गधों ने दे भी दिया.  कुछ तो यहां तक उत्साही हो गये कि संरक्षक बनने के नाम पर मोटा चंदा रामप्यारे के हवाले कर चुके थे. आखिर उन गधों को भी नकली घोडा बनने का शौक और अपने आपको विद्वान सिद्ध करने का चस्का लगा था. 

पर हाये रे रामप्यारे की फ़ूटी किस्मत.......उसने जो गधे इकठ्ठे किये थे उनमें दो चार असली अरबी नस्ल के  घोडे थे, ज्ञानी भी थे और जानकार भी थे.....बस वो घोडे भी गधों को घोडा समझ कर गल्ती से वहां आ गये थे. आदत अनुसार रामप्यारे ने जब उनसे भी अन्य गधों जैसा सलूक शुरू किया तो उन्होंने रामप्यारे को उसकी औकात बता दी और रामप्यारे को अपनी लीडरी खतरे में नजर आने लगी.

अब मुश्किल यह हो गई है कि रामप्यारे ना तो उन घोडों को ग्रूप से बाहर कर पा रहा है और ना ही वो घोडे ग्रूप को  राजी खुशी छोडने को तैयार हैं.....रामप्यारे का आजकल दिन रात का चैन खराब हो गया ....कभी बीमारी का बहाना खोजकर मठ से गायब रहता है और उन अरबी घोडों से छुटकारा पाने की स्कीम सोचता रहता है. अब आप ही कोई उपाय हो तो रामप्यारे को सुझा सकते हैं....बेचारा बडी मुश्किल में फ़ंस गया है.    

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बरसात और सांप

बरसात का मौसम आते ही सांपों का बिलों में रहना मुश्किल हो जाता है. बिलों से बाहर निकलकर वो किसी सुरक्षित आश्रय के लिये अपनी यात्रा इधर उधर शुरू करते हैं. सांप कभी किसी को आगे होकर नहीं काटते वो तो सताये जाने पर ही डसते हैं. और मनुष्य उन्हें मारने पर उतारू हो जाते हैं. यह अच्छी बात नहीं है.

सांपों को एक तरह से डरावना और प्राण घातक समझ लिया गया है. जो सही नहीं है. किंतु इसके उलट कुछ मूर्ख लोग काटने को सांप का प्राकृतिक स्वभाव समझ कर उसे अपना लेते हैं. उन्हें नहीं मालूम कि सांप सताये जाने पर काटते हैं पर कुछ मूर्ख मनुष्य इसे अपना लेते हैं और लोगों को डसने में, उनको जलील करने में अपने को धन्य समझते हैं. आपको भी ऐसे लोगों से जीवन में अवश्य सामना हुआ होगा.

इन्हीं मनुष्यों को ध्यान में रखकर एक कविता अपने आप फ़ूट पडी. आप भी मजा लीजिये.

सांपों का घर नही होता
फकीरों का दर नही होता।
दोनो बंधे है अपनी आदत से
वरना यूँ ही कोई बेघर नही होता।
साँप माहिर हैं डसने में
फकीर दिलो में बसने में।
भले डरता है जमाना सांपों से
राम बचाए इन बापों से।
पर सुन बेटा साँप जरा सुन ले
अपने दिमाग मे ये बात धर ले
तेरे जहर की ताकत तभी तक है
जब तक तेरे दाँत नही उखाड़े जाते।  

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होली पर ताऊ का मुशायरा

प्यारे भतिजो और भतिजियो, होली की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं. इस मौके पर ताऊ द्वारा एक मुशायरे में पढी गई रचना का आनंद लीजीये.

होली पर था रंगारंग कार्यक्रम
पहुंचें सभी कवि शायर कलाकार।
दो हरियाणवी रागिनी गायक भी
शिरकत करने हो तैयार।
शायर पेश करते रहे अपना कलाम।
ओ इन ताऊओं की समझ हो रही थी नाकाम।
एक शायर ने कहा हजरात सलाम पेश करता हूँ।
आपकी दाद चाहूंगा लीजिए एक कलाम पेश करता हूँ।

ताऊ चुपचाप देखते रहे भौंचक्के
उर्दू का एक भी शब्द न पड़ा उनके पल्ले।।
शायर ने पहला मिसरा-ए-उला पढा
तालियों और वाह वाह का दौर परवान चढ़ा।।
बड़े उस्ताद जी ने शायर की पीठ थपथपाई।
जोश में भरकर शायर ने जब मिसरा-ए-सानी पढा।
और वाहवाही के जवाब में
झूमते हुए आ-दाब आ-दाब कहने लगा।।

पहला ताऊ दूसरे से यूँ बोला
अरै काले, यू सुसरे में देवी आगी दिखै
तभी तो कहरया सै आ दाब, आ दाब
खड्या हो भई मदद कर इसकी
नही तो यू मर ज्यागा

दोनो ताऊओ ने शायर को पकड़ कर नीचे गिरा लिया
और चढ़ बैठे उसके सीने पे।
घुटनो के नीचे दाब कर बोले
ले भई, दाब लिया, इब सुना शायरी....
देवी तेरा कुछ न बिगाड़ पाएगी।

शायर ताऊओ के घुटनों के नीचे पड़ा मरणासन्न सा हो गया
आयोजक आए दौड़े दौड़े,
ताऊओ से छुड़वाया और यूँ डांटने लगे।
बेवकूफों इसे तहजीब कहते है
और हरियाणवीयों को सब यूँ ही नहीं अजीब कहते हैं।

ताऊ बोले - हम तो इसकी मदद कर रहे थे
इसपे देवी चढगी थी
तभी तो यू चिल्लावै था
आ दाब आ दाब
और हमने दाब लिया इसको।

आयोजकों ने माथा पीट लिया
एक दूजे को आपस मे ही घसीट लिया।
एक बोला किसने कहा था
इन ताऊओ को बुलाने को
दूसरा बोला जी, गलती हो गई
भगाओ इन नादानों को ।।
ताऊ बोले भई म्हारी रागिनी तो सुन लो।
तुम सबको सुन सुनकर हमने सिर धुना है,
थोड़ा तुम भी धुन लो। 
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खोलकर दिखाऊँ क्या?

हमारे एक मित्र हैं और उनकी बिटिया की शादी के लिये वो लड़का देख रहे थे। एक दिन हमारे सामने जिक्र कर बैठे तो हमने अपने एक परिचित के लडके का नाम सुझा दिया। उन्होंने लड़का भी चुपके से देख लिया, सब मालूमात भी कर ली, तबसे वो हमारे पीछे पड़ गए कि ये रिश्ता करवा दीजिये, दोनों की जोड़ी भी बढ़िया जम रही है, पैसे वैसे की भी समस्या नहीं है, जैसा आप कहोगे वैसा ही कर देंगे।

हमने प्रोग्राम सेट कर दिया और लड़की देखने लड़का, उसकी माँ और बहन उसके घर  चले गये।
लड़का भी बहुत खानदानी घर से था साथ ही ऊंचे ओहदे पर भी था लिहाजा खूब जमकर खातिरदारी की गई। यूं भी लड़की पक्ष आर्थिक रूप से अति सक्षम था।

अब लड़की की बहन का ध्यान लड़की की बाजू पर बंधी पट्टी पर गया, पट्टी कुछ कुछ कुर्ते की बाहों में छुपी हुई भी थी। लिहाजा लड़के की बहन को शक हुआ कि हो ना हो इसको कोई सफेद दाग होगा जिसे छुपाने की कोशिस की गई है।

लड़के की बहन ने अपनी माँ के कान में खुसुर पुसुर की और मां ने लड़की से पूछा - ये पट्टी क्यों लगा रखी है?

लड़की ने सीधेपन में बता दिया कि उसे यहाँ हल्की सी फुंसी हो गई है इसलिए पट्टी लगा रखी है।

अब तो माँ बेटी दोनों का शक और भी परवान चढ़ गया और दोनों ने अजीब सी दृष्टि लड़की पर डाली। अचानक...कोई और लड़की की तरफ से सफाई देता उसके पहले ही लड़की ने दोनों मां बेटी से नजर मिलाते हुए पूछा - खोलकर दिखाऊँ क्या?

मां बेटी दोनों ने नहीं नहीं कहते हुए चलने की परमिशन मांगी और चले गए।

फिर हमको फोन किया और सारा वाकया बताया। हमने कहा - कि लड़की को हम बचपन से जानते हैं उसको कोई दाग वाग नहीं है बड़ी सुंदर और सुशील लड़की है।

अब लड़की की माँ बोली - अरे ताऊ काहे की सुशील, बड़ी मुँहफट है, शादी के पहले ही बोलती है कि "खोल कर दिखाऊँ क्या" तो शादी के बाद क्या करेगी? हम तो यह रिश्ता नहीं करेंगे।

हमने लाख समझाया पर वो नहीं माने। अब इसमें कसूर किसका?


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मोदीजी को भगत ताऊ का खुला खत

आदरणीय मोदीजी रामराम
वर्तमान स्थितियों में आप अति व्यस्त होंगे फिर भी समय निकाल कर कृपया अविलम्ब गौर करें।

हाल यह है कि इतने दिनों से काम धंधे बन्द कर घर में बैठकर खाते हुए सब जमा पूंजी खत्म हो गयी है अब क्या करें?

आपने 20 लाख करोड़ का राहत पैकेज जब घोषित किया तो मन प्रसन्न हो गया और यक़ीन मानिए उस रात बिना नींद की गोली खाये ही मस्त नींद आयी।
पर अगले दिन जब बहन निर्मला सीतारमण जी ने जलेबी सी उतारना शुरू की और 5 दिन तक उतारती ही  रही तो समझ आगया की इन जलेबियों में चाशनी नहीं है।

पहली बात तो यह कि निर्मला जी पूरे 20 लाख करोड़ की जलेबी भी नहीं उतार पाई। यदि उनकी सारी जलेबियों का हिसाब भी जोड़ा जाए तो ये 13 या 13.5 लाख करोड़ की कीमत की ही बैठती हैं।
अब अगर RBI द्वारा पूर्व प्रदत्त लिक्विडिटी के 8 लाख करोड़ भी इसमें जोडलें तो यह आपके 20 की बजाय 21 या 21.5 लाख करोड़ का राहत पैकेज बन गया।

ताऊ कोई अर्थशास्त्र का ज्ञाता तो है नहीं, ताऊ है एकदम अंगूठा छाप,  पर एक बीघा में कितना किलो बीज लगेगा यह अच्छी तरह जानता समझता है।

आपके राहत पैकेज से जनता अनुमान लगाए बैठी थी कि सबके खाते में 15/16 हजार रुपये अब आये ही समझो। पर आपके इस पैकेज का लॉलीपॉप मुझे कुछ इस तरह समझ आया है कि -

रिजर्व बैंक ने जो 8 लाख करोड़ की लिक्विडिटी लोन के लिए दी थी वह पैसा भी बाजार में आ नही पाया क्योंकि लोन कोई क्यों लेगा? काम धंधा है नहीं, फोकट लोन लेकर कोई कर्ज का बोझ क्यों बढ़ाएगा? ऊंच नींच होगई तो आप विजय माल्या बनने नहीं दोगे।

अब इस राहत पैकेज के 11 या 11.5 लाख करोड़ आपने MSMEs को लोन के लिए रखे हैं तो लोन का हाल आपको ऊपर बता ही चुका हूँ, इस तरह  पैकेज तो यहां पूरा हो गया।

हाँ, आपने जेब से करीब 1.5 लाख करोड़ के आस पास मनरेगा, जनधन व महिलाओं के लिए नगद खर्च किया है उसके लिए आपका आभार। आपने मनरेगा  बजट को 61 हजार करोड़ से  40 हजार करोड़ अतिरिक्त बढाया है उसके लिए भी आभार।

आपने जीडीपी के 10% का राहत पैकेज देने की घोषणा की थी जो कि सिर्फ 0.75% ही आपने दिया है।

पर इस 1.5 लाख करोड़ के सर्कुलेशन से तो अर्थव्यवस्था का पहिया नहीं दौड़ेगा। सर, अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए आपको नगदी माल जनता के हाथ में देना ही होगा। 1930 की अमेरिकी मंदी के समय भी वहां की सरकार ने खुले हाथों जनता को खर्चने के लिए डॉलर दिए थे और अर्थव्यवस्था को उबार लिया गया था।

अब आप कहेंगे कि पैसा क्या पेड़ पर लगता है जो जनता में बांट दूँ? कहाँ से लाऊं इतनी नगदी?
सर, पेड़ पर भी नहीं लगता, और आपकी जेब में भी नहीं है  पर आप उधार ले सकते हैं या बजट घाटा बढ़ा  बढ़ा सकते हैं, इन परिस्थितियों में ऐसा करने से कोई आफत नहीं आएगी, पर नगदी जनता को खर्चने के लिए व्यवस्था करें।

मां बाप अपने बच्चों को महंगी शिक्षा दिलाने के लिए उधार ले सकते हैं तो आप जनता की और अर्थव्यवस्था की भलाई के लिए उधार क्यों नहीं ले सकते? क्यों आप बजट घाटा नहीं बढ़ा सकते?

मेरी बातों पर ध्यान दिया जाए क्योंकि मुझे अब कल की चिंता में नींद आना बंद हो गई है। यदि राहत पैकेज का स्वरूप नहीं बदला गया तो मुझे कल बहुत ही भयानक दिख रहा है।

निवेदक
अंगूठा टेक ताऊ

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पटोला का असल मतलब क्या है?

पटोला शब्द कई मायनों में उपयोग होता है।  आइये पहले इसके सार्थक रूप को जानते हैं।

आपमें से कुछ ने शायद पटोला साड़ी पहनी हो और हर महिला की इच्छा अवश्य रहती है कि वह एक बार यह साड़ी जरूर पहने। कुछ ऑन लाइन साइट्स पर भी आपने पटोला साड़ी चार पांच हजार की कीमत में बिकती अक्सर देखी होगी। पर यह ओरिजिनल नहीं है। बस नाम ही पटोला साड़ी है वहां।

 पटोला एक सिल्क की साड़ी को कहते हैं जो मुख्यतया गुजरात के पाटन में तैयार की जाती है। 6/7 लोगों द्वारा एक साड़ी 6 से लेकर 12 महीनों में तैयार हो पाती है।

गुजरात के कुछ हिस्सों में  शादी में दुल्हन द्वारा पहने जाने वाले जोड़े के लिए भी पटोला शब्द का उपयोग होता है।

कुछ देशों में इस साड़ी का एक्सपोर्ट भी होता है पर बनाने वाले कम हैं इसलिए बहुतायत में नहीं। इंदिरा जी, अमिताभ, राजीव गांधी और भी नामचीन लोग   इसके मुरीद रहे हैं।

इसकी खासियत यही है कि इसे दोनों साईड से पहन सकते हैं। कीमत 2 लाख से शुरू होकर 8 लाख तक जाती है।

अब आप इस साड़ी का जलवा इसी से समझ लीजिए कि ताऊ ट्रम्प के साथ जब ताई मेलेनिया अहमदाबाद आई थी तब उनको यह साड़ी भेंट की गई थी और सुनने में आया है कि मोदीजी भी पटोले का साफा एक बार पहन चुके हैं।

पंजाब में  "गुड्डी पटोला" कहा जाता था गुड़िया को जो कपड़ों की चिन्दियों  से बनाकर बच्चियां उसे सिल्क के कपड़े से सजाकर खेला करती थी। अपनी गुड़िया की शादी में उसे पटोला सिल्क का जोड़ा पहनाया करती थी।

आजकल पटोला शब्द खूबसूरत लड़की के लिए प्रयुक्त होता है जो बहुत ही  सजी-संवरी हो। जो बहुत ही आकर्षक परिधान में विशेष सुंदर दिखती है यानी पूरे टोल में एकेली ऐसी खूबसूरत हो।  आपने इसी संदर्भ में यूट्यूब पर कई पंजाबी गाने भी सुने होंगे।

 अब इसके नकारात्मक पहलू को जान लेते हैं। आजकल पटोला शब्द का उपयोग  हरियाणा पंजाब में  किसी भी खूबसूरत लड़की को टारगेट करने के लिए होता है या समझ लें कि लड़की की सुंदरता की तरफ अभद्र इशारा करने के लिए पटोला शब्द का प्रयोग किया जाता है।

पटोला शब्द आज एक स्लैंग के तौर पर  प्रचलित हो गया है। पटोला शब्द पंजाबी फिल्मों तथा गानों में बहुतायत से उपयोग होता है परंतु मूल रूप से  इसका अभिप्राय  "गुड़िया को सजाने के लिए लड़कियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले सिल्क के कपडे" से ही है जिसे पटोला कहा जाता है।

शोहदे किस्म के लड़के पटोला शब्द का उपयोग लड़कियों को छेड़ने के लिए करते हैं इसी वजह से पटोला जैसा ख़ूबसूरत शब्द नकारात्मक हो चला है। यह शब्द आजकल एक तरह से छेड़खानी का पर्याय बन गया है।

कोई भी पुरुष अपनी घरवाली  या अंतरंग महिला मित्र के लिए प्रेम पूर्वक  निजी क्षणों में इसे उपयोग करे तो गलत नही है पर सावधान  इस शब्द का  प्रयोग आम बोल चाल में लड़की/महिला  की सुंदरता के कसीदे निकालने में किया जाता है तो  यह छेड़खानी की श्रेणी में आ सकता है। वैसे  निर्भर करता है कि सामने वाला इसे किस तरह से समझ पाता है। इसलिए ताऊ तो आपको यही सलाह देता है कि इस शब्द के प्रयोग के बचना चाहिए। 

वैसे भी यह शब्द आजकल सम्भ्रान्त समाज में हेय माना जाने लगा है और भले परिवारों में यह पटोला गाने भी नहीं चलते हैं।  वैसे युवाओं में आजकल यह शब्द और गाने ज्यादा पसंद किए जाते हैं।  अब मर्जी है आपकी, ताऊ को जो समझाना था वह समझा दिया।



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कोरोना लोक डाऊन और साबुन बनाने का शौक

लोक डाऊन के चलते सभी अपने घरों में बंद हो गये हैं और समय काटना मुश्किल हो गया है. सोशल मिडिया पर भी एक लिमिट के अंदर ही टाईम पास हो सकता है. कुछ लोग अपने पुराने काम निपटा रहे हैं कुछ लोग घर में आपस में ही भिट्टी भिडा रहे हैं जिसका जिक्र आपने सुना ही होगा कि घरेलू हिंसा के मामलों में शिकायते बढी हैं. हमारी समझ से यह खाली दिमाग का काम है.

जिन लोगों ने कुछ शौक पाल रखे हैं उनके लिये यह बढिया समय है. हमारे पास अब भी ज्यादा समय नहीं बचता क्योंकि मैं कैपीटल मार्केट से संबंध रखता हूं तो सोमवार से शुक्रवार शेयर बाजार चालू रहता है तो शाम के चार पांच तो आफ़िस में ही बज जाते है. मेरे लिये अच्छी बात यह है कि मेरा आफ़िस मेरे घर में ही ग्राऊंड फ़्लोर पर है और रेसीडेंस ऊपर है, सो कोई खिट खिट नहीं. अब शाम के 5 या 6 घंटे रोजना बचते हैं और हमेशा की तरह शनिवार रविवार तो है ही.

यूं तो हमारे बहुत सारे शौक हैं और उन्हीं में से एक है डिजाईनर साबुन बनाना. अब आप कहेंगे कि ये क्या बला है? घबराईये नहीं ये भी एक आर्ट है जिसकी कोई लिमिट नहीं है. जैसे एक पेंटर या चित्रकार अपनी कल्पना से कितनी ही पेंटिंग विभिन्न तरह की बना लेता है वैसे ही आप इस प्रोसेस से अनगिनत तरह के साबुन बना सकते हैं. इसमे मजे की बात यह है कि आप अपनी जरूरत के हिसाब से बना कर यूज कर सकते हैं, गिफ़्ट कर सकते हैं और बेच भी सकते हैं.

आजकल हैंड मेड साबुनों की डिमांड काफ़ी बढी है उसका कारण यह है कि ये कम नुक्सान देह हैं और ग्राहक अपनी जरूरत के हिसाब से आर्डर करता है. और उसी हिसाब से जो भी ग्राहक की डिमांड है, उस मुताबिक चीजे यूज करते हुये तैयार कर सकते हैं. इसमें आपने सही चीजे यूज की और परफ़ेक्शन बनाये रखा तो ग्राहक आपके पास बार बार लौट कर आयेगा ही.

अब ये समझ लिजीये कि साबुन किस प्रकार बनाये जाते हैं? आप जो बाजार से रेडीमेड साबुन खरीद कर लाते हैं अपने लिये,  वह ब्रांड एक निश्चित वस्तुओं से तैयार होता है, आप उसमे रदोबदल नहीं कर सकते. मान लिजीये आप एक ब्रांड का प्रयोग करते हैं तो हो सकता है वह ब्रांड गर्मी में आपको अच्छा काम देता है पर सर्दी आते ही उसी ब्रांड से आपकी त्वचा शुष्क होने लगती है. अब फ़िर कोई नया साबुन ढूंढो या मोईश्चराईजर ढूंढो...इसी वजह से साबुन के इतने सारे ब्रांड आप बदल रहते हैं.

यह बाजार में बिकने वाले साबुन CP यानि कोल्ड प्रोसेस से बने होते हैं यानि कास्टिक सोडा और तेलों के मिश्रण से. इनको तैयार होने के बाद कम से कम 30/40 दिन saponification के लिये खुला रखना होता है, और जितने ज्यादा दिन इनका saponification होगा उतना ही कम नुक्सान देह होंगे. सिंपल भाषा में समझाऊं तो  saponification से तात्पर्य यह है कि साबुन तैयार होने के बाद भी काष्टिक सोडा अपनी क्रिया करता रहता है जिसे पूरा होने में एक डेढ महिना लग जाता है.

अब जो हैंडमेड साबुन होते हैं ये hot process कहलाते हैं. इनमे आपको सोप बेस लेना होता है और उसको मेल्ट करके मन चाहे आकार में वापस शेप देना होता है. soap base कई तरह के आते हैं और आसानी से आपके लोकल मार्केट या आन लाईन साईट्स पर मिल जाते हैं. इनमे saponification की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी होती है इसलिये ये त्वचा के लिये हानिकारक नहीं होते.

आईये अब मैंने कल जो फ़ेसबुक पर साबुन की तस्वीरें डाली थी उनको कैसे तैयार किया? इसकी पूरी जानकारी देता हूं. आपमें से कईयों ने इसके बारे में जिज्ञासा जाहिर की थी इसी वजह से यह पोस्ट लिख रहा हूं. और मेरे पास विडियों एडीटर का जुगाड हो गया तो जल्दी ही विडियो भी डाल दूंगा. फ़ेसबुक पर विस्तृत विवरण से नहीं समझाया जा सकता इसलिये ब्लागर पर यह पोस्ट लिख रहा हूं.




यह एक सोप बार तकरीबन 1500 ग्राम का तैयार किया. आईये देखते हैं इसको कैसे बनाया? 

1. सबसे पहले एक मोल्ड लिया. अब सबसे शुरूआती पर्त नीले रंग वाली (goat milk soap base +shea butter soap base+blue soap colour 2 or 3 drops) मेल्ट करके डाल दी. डालते ही इसमे हल्के झाग आते हैं जो फ़िनिश साबुन पर भी  अच्छे नहीं लगते और इस तरह के कई बार में बनाने वाली पर्ते आपस में जुड जायें इसके लिये rubbing alcohol का स्प्रे तुरंत कर दिया. 

2. अब जो सफ़ेद मोटी पर्त दिखाई दे रही है उसकी तैयारी करते हैं. इसमे आपको एक लाल रंग का हार्ट दिखाई दे रहा होगा. यह हार्ट शेप वाले मोल्ड में "हनी ग्लिसरीन सोप बेस" में रेड सोप कलर की कुछ बूंदे डालकर पहले ही तैयार कर रखा था. नीली पर्त पर इस हार्ट शेप वाले बार को रख दिया.
इसके बाद जो मोटी सफ़ेद पर्त दिख रही है उसके लिये (goat milk soap base+cocoa soap base+black berry essential oil सुगंध के लिये + vitamin E oil capsul के 7 कैपसूल) मेल्ट कर लिया.
यहां ध्यान रहे कि इसको नीली पर्त पर डालने के पहले नीली पर्त पर rubbing alcohol का अच्छे से स्प्रे करना है. यही rubbing alcohol इन पर्तों को जोडने का भी काम करेगा वर्ना कटिंग के समय सारी पर्ते अलग अलग हाथ में आ जायेंगी. सफ़ेद की पर्त मोल्ड में डालकर फ़िर rubbing alcohol का स्प्रे करके झाग खत्म कर दिये.

3. अब तीसरी पर्त के लिये यहां (goat milk soap base+purpal soap color+olive oil+black berry essential oil) को मेल्ट करके ऊपर बताये गये अनुसार rubbing alcohol का यूज करते हुये मोल्ड में डाल दिया.

4. अब इसमें आपको आखिरी हरी पर्त दिख रही होगी. इसमे ग्लिसरीन सोप बेस में हरा सोप कलर मिलाकर मेल्ट करके डाल दिया. और इस मोल्ड को रात भर छोड दिया. वैसे यह चार पांच घंटे में ही तैयार हो जाता है.

इसके बाद इसको चाकू से बराबर निशान लगाते हुये काट लिया. तो जो तैयार हुआ वो नीचे देखिये.



अब देखिये कितना सुंदर और एक रिच साबुन हमारे हाथ में आ गया. आज हमने कुछ और बनाये हैं जिनकी तस्वीर नीचे दे रहे हैं. 


यह नीम की प्राकृतिक पत्तियों से बना है.


यह ओटमिल से बना है.


यह कुछ अलग अलग डिजाईन में बने हैं.


यह पिस्ता सोप है.


यह बच्चों के लिये फ़न बाल सोप

coffe soap for exfoliation purpose

super rich girl soap with sweet almond oil


तो, आज की कार्यशाला खत्म, कुछ पूछना हो तो कमेंट में पूछ सकते हैं. आपको बताकर ताऊ को प्रसन्नता  होगी. यदि जुगाड जमा तो विडियो भी बनायेंगे. शेष अगली पोस्ट में.

  
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कोरोना काल और 1965 भारत पाक युद्ध का समय

मेरी इस बात को वो लोग ज्यादा अच्छी तरह समझ पाएंगे जो हमारे जैसे सख्त लोक डाऊन एरियाज में रह रहे हैं।

आज आटा समाप्त हो गया, 3 दिन पहले ही आर्डर लिखवाया था पर अभी तक नहीं आया, शायद शाम तक आ जायेगा। हमारे यहां आटा, दाल, चावल की सप्लाई प्रशासन करवा रहा है बस थोड़ी देर सवेर होती है जो स्थितियों को देखते हुए खराब नहीं कही जा सकती।

आज के हालात में अनायास ही 1965 कि याद आगई जब एक तरफ भारत पाकिस्तान युद्ध का बिगुल बजा हुआ था और दूसरी तरफ महा अकाल पड़ा था।

अमेरिका से PL480 के तहत गेंहू आता था जिसे गेंहूँ कहना भी गेंहूँ का अपमान ही माना जाना चाहिए। रंग ऐसा लाल की रोटी का रंग भी गहरा लाल ही होता था। आटे को लगाकर उसकी लोई को खींचो तो च्युंगम भी शरमा जाए। रोटी तोड़कर मुंह में डालकर चबाओ तो मुंह में ही घूमती रहे। और यह गेंहूँ भी गांव से 10 किलोमीटर दूर से सर पर रख कर लाना पड़ता था।

अभी भी याद है कि हमारे दिवंगत प्रधान मन्त्री स्व. लाल बहादुर शास्त्रीजी ने अनाज बचाने के लिए सभी को एक उपवास रखने की अपील की थी। ज्यादातर लोग सोमवार का उपवास रखते थे पर हम ठहरे ताऊ सो हमने मंगलवार को बजरंग बली का उपवास रखना शुरू कर दिया। हालांकि दस ग्यारह साल के बच्चे थे पर सभी में जज्बा था।

आज भी कोरोना काल में खासकर रेड जोन में रहने वालों से निवेदन है, जहां अभी नार्मल सप्लाई नहीं है, उन सभी से निवेदन है कि अपनी आवश्यकताएं कम करें, यहां आपके पैसे की कोई पूछ नही है वह जेब में ही रखा रह जायेगा। घर में जो भी उपलब्ध है उसी से काम चलाएं और घर में ही बने रहें। यह अंधकार भी छंट जाएगा।

हमारे यहां दूध की कोई दिक्कत नहीं है सो आज ब्रेकफास्ट में दही की लस्सी पी ली। और डिनर में आज खीर बनाकर खाई जाएगी। व्रत भी होगया और खीर भी शाम को मिल ही जाएगी।

दोस्तों, दुख और सुख दोनों अस्थाई हैं, यह तकलीफ का समय है ये भी बीत ही जायेगा। वैसे जिनके घर में छोटे बच्चे हैं उनकी तकलीफ समझी जा सकती है। पर याद रखिये यह तकलीफ 1965 से ज्यादा बड़ी नहीं है। जिन्होंने भी PL480 का गेंहूँ खाया है उनको तो यह पीड़ा कुछ भी नहीं लग रही होगी, थोड़ी बहुत तकलीफ बर्गर पिज़्ज़ा वाली पीढ़ी को अवश्य महसूस हो रही होगी।

घर में रहें, शांत रहे, घर में आपस में सर ना भिड़ाये। फेसबुक व ब्लाग पर भी हंसी मजाक को प्रमुखता दें, स्वस्थ चुहलबाजी आधी तकलीफ कम कर देती है।

प्रेम से रहेंगे तो आनन्द पूर्वक समय निकल जायेगा और सर टकराएंगे तो समय निकलना मुश्किल होगा। मर्जी आपकी, ताऊ का काम आपसे निवेदन करने का था सो कर दिया।

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बाबाश्री ताऊ महाराज द्वारा "क रोना" का शर्तिया ग्यारंटेड ईलाज

भक्तजनो, ह्में मालूम है कि कोरोना काल में आपके कष्ट बहुत बढे हुये हैं. और बाबाश्री तो सदैव से आपके कष्टों का शमन करते आये हैं. इन दिनों काफ़ी भक्तों के समाचार आ रहे हैं कि वो कष्ट में हैं. आपमें से कई "क रोना" से पीडित हैं. कुछ भक्त पत्नियों से पीडित हैं मार खा खा कर मोटू पतलू वाले पतलू जैसी हालात में पहुंच गये हैं.


                                                    मोबाईल पर "क रोना" झाडा देते बाबाश्री

कुछ पति भी पत्नियों पर अत्याचार कर रहे हैं जिसकी वजह से पुलिस भी परेशान है. अब पुलिस लोक डाऊन को मैनेज करे या इन खूसट पतियों की खबर ले? चारों तरफ़ हालत बहुत ही नाजुक और दयनीय हैं.

आपको इन कष्टों से छुटकारा दिलाने के लिये बाबाश्री ताऊ महाराज ने अचूक उपाय खोज निकाले हैं. और कोरोना के लोक डाऊन को देखते हुये आपको बाबाश्री के पास आने की आवश्यकता भी नहीं है बल्कि मोबाईल पर ही आपका ग्यारंटेड इलाज उपलब्ध करवा दिया जायेगा.


इस ईलाज की न्यौछावर फ़ीस बहुत ही मामूली रखी है. आप यह न्यौछावर फ़ीस आन-लाईन "बाबाश्री ताऊ महाराज 420 अपर्माथिक ट्रस्ट"  के अकाऊंट में ट्रांसफ़र करवाये और मिस समीरा टेडी  (Finance Controller) से फ़ोन पर अपाईंटमैंट लेकर फ़ोन करें. आपको ईलाज उपलब्ध करवा दिया जायेगा.

            मर्ज का नाम                                               न्यौछावर फ़ीस
1.   "करो ना" झाडा                                                     रूपये 21,001/  मात्र           

2.  "करो ना" ऊपरी फ़ेंट बचाव                                      रूपये 17,501/   मात्र       

3. "करो ना" आपसी गृह क्लेश                                     रूपये 25,001/= मात्र

4. "करो ना" पतिकूट यंत्र                                              रूपये 27,501/  मात्र                  

5. "क रोना" पत्नी पीडा बचाव यंत्र                              रूपये 31,001/  मात्र

6. "क रोना" घर में मन लगाऊ झाडा                              रूपये 16,501/  मात्र  

7. " क रोना" समस्त असाध्य बाधा पीडा यंत्र                 रूपये 38,501/  मात्र

हमारे सभी ईलाज जांचे हुये और शर्तिया ग्यारंटेड हैं. ईलाज करवाने वाले की जानकारी गुप्त रखी जाती है. ईलाज किसी कारणवश फ़ेल होने की स्थिति में आपका जमा रूपया वापस नहीं करने की हमारी पक्की ग्यारंटी रहेगी.


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अरै सत्यानाशी कोरोना तू ताऊ के घर क्यूंकर आया?

जैसे ही कोरोना के चलते मोदीजी ने लोक डाऊन की घोषणा की, ताऊ की बांछे खिल गई। अब 3 सप्ताह का पूरा आराम, ना जल्दी उठना, ना आफिस जाना और ना ही घर का कोई सामान लेने बाजार जाना... वाह, यह आराम तो पृथ्वी पर शायद वर्तमान काल के मनुष्यों के अलावा किसी ने ही भोगा होगा अब तक। 

ताऊ का दिल बाग बाग हो रहा था तभी ताई की आवाज आई - सुणै सै के?
ताई बोली - ईब कल तैं झाड़ू पौंछे वाली, रोटी बनाने वाली कोई नही आएगी। 
ताऊ बोला - चिंता क्यों करती हो, हम मिल जुलकर घर का सब काम कर लेंगे।



ताई बोली - मुझे मालूम है तुम कितने भले हो। हम अपने अपने काम का बंटवारा कर लेते है। 
ताऊ बोला यह भी ठीक है। बताओ मुझे क्या क्या करना है?

ताई बोली - सुबह उठते ही चाय बनाने का काम तुम्हारा और पीने का काम मेरा। फिर  मंजन ब्रश करके योगा करने का काम मेरा तब तक झाड़ू बुहारी और पौंछा करने का काम तुम्हारा।

ताई काम का यह सब बंटवारा लठ्ठ पास में रखकर ही कर रही थी सो ताऊ चुपचाप हाँ में गर्दन हिलाते हुए बोला - ठीक है और कुछ?

ताई बोली - अभी तो सारे दिन के काम बाकी पड़े हैं...इसके बाद बाथरूम में नहाने का काम मेरा, फिर बाथरूम साफ करने और लत्ते (कपड़े) धोने का काम तुम्हारा।

नहा धोकर भगवान की दिया बत्ती करने का काम मेरा  तब तक रोटी सब्जी बनाने का काम तुम्हारा. 
इसके बाद खाना टेबल पर लगाने का काम तुम्हारा और खाने का काम मेरा.
खाना खाने के बाद आराम करने का काम मेरा तब तक झूंठे बर्तन भांडे साफ़ करने का काम तुम्हारा.

अब तक ताऊ समझ गया था कि मन गया उसका तो लोक डाऊन......

ताई गंगाराम (लठ्ठ) पर हाथ फ़िराते हुये बोली - दोपहर में टीवी देखने और आराम का काम मेरा और तब तक घर के गार्डन की सफ़ाई का काम तुम्हारा. फ़िर शाम को चाय नाश्ता बनाने का काम तुम्हारा और नाश्ता करने और चाय पीने का काम मेरा. इसी तरह रात को खाना बनाने का काम तुम्हारा और खाने का काम मेरा.

ताऊ का सारा उत्साह काफ़ूर हो चुका था. मन ही मन बोला - अरे मोदी जी....ये लोक डाऊन से तो अच्छा था कि ताऊ की घेट्टी (गला) ही दबा देता. इतने काम करके तो वैसे ही कोरोना हो जायेगा.

ताऊ सर पकड कर ताई के पास बैठने लगा तो ताई ने लठ्ठ फ़टकारते हुये कहा - "परै नै मर ले"   (दूर होकर बैठ)....पता नहीं है क्या? मोदीजी ने कहा है कि कम से कम दो मीटर दूर होकर बैठना है...

ताऊ बोला - हो गया सब काम का बंटवारा या कुछ बाकी रह गया? 
ताई लठ्ठ उठाते हुये बोली - ज्यादा बकबास मत कर, यह तो शुकर मना कि तुम्हारे हिस्से मैंने सब सीधे सरल काम ही रखे हैं. अब एक रात का काम बाकी बचा है,  रात को लेटकर टीवी देखने का काम मेरा और मेरे सोने तक पांव दबाने का काम तुम्हारा.

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