ताऊ साप्ताहिक पत्रिका : अंक ११

प्रिय बहणों, भाईयों, भतीजों और भतीजियों आप सबका इस अंक मे स्वागत है. दूसरे राऊंड की प्रथम पहेली का रिजल्ट कल ही घोषित कर दिया गया था.  कुछ तकनिकी कारणों के चलते ऐसा किया गया है. बाकी के सभी स्तम्भ आप यहां पढ सकते हैं. और मेरिट लिस्ट यहां ब्लाग के दाहिनी तरफ़ लगा दी गई है.

 

 

paheli-10-11 हमने आपसे जो पहेली पूछी थी उसमे जो चित्र लगा था वो मदन महल जबलपुर का था. जबलपुर मध्यप्रदेश की संस्कार धानी तो है ही साथ मे यहां पर इतने रमणीक दृष्य हैं कि आप एक बार यहां चले गये तो बार बार जाने को दिल चाहेगा. हमारा अनगिनत बार वहां जाना हुआ है. हम जब भी जाते हैं वहां पर ग्वारीघाट पर मां नर्मदा में स्नान करना नही भूलते. अगर यूं कहा जाये कि जबलपुर वासी बल्कि कहिये कि हर नर्मदा किनारे रहने वाले प्राणी का दिल “हर हर नर्मदे” बोलते हुये ही धडकता है.

 

यहां का प्रवास आपको घर वापस लौटने नही देता. यहां आसपास मे ही अमरकंटक (नर्मदा का उदगम स्थान) कान्हा किसली पंचमढी ( मध्यप्रदेश का एक मात्र हिल स्टेशन) मैहर, खजुराहो बिल्कुल आसपास ही हैं. यानि आपको इस क्षेत्र मे घूमने के लिये हमेशा समय कम पडेगा.

 

और सबसे बडी बात तो यह है कि हमारे गुरुजी श्री समीरलालजी, बवाल भाई, श्री महेंद्र मिश्राजी और श्री बिल्लोरे जी भी यहीं जबलपुर से ही हैं. और श्री समीरलाल जी का बचपन का घर तो यहां से सिर्फ़ पांच मिनट की दुरी पर ही है. और एक बात आपको बताते हैं कि ब्लागरों के  हर दिल अजीज श्री अनूप जी शुक्ल यानि फ़ुरसतिया जी भी अपने सेवाकाल में अनेकों बार  जबलपुर प्रवास पर रहे हैं. और  शायद ये जगह उनको इतनी रमणीक लगती है कि श्री समीर लाल जी के सुपुत्र की शादी मे सम्मिलित होने की यादों को एक पुरी श्रंखला के रुप मे लिपिबद्ध कर दिया है.  जिसको आप विस्तृत रुप से उनके ब्लाग पर पढने का आनन्द ले सकते हैं 

 

कहते हैं तपस्या करने के लिये नर्मदा से अनुकुल जगह कलियुग मे कहीं नही है. जो भी नर्मदा के किनारे रहता है वो स्वत: ही योगी है. अमरकंटक में तो एक से बढ कर एक महान तपस्वी आज भी रहते हैं.आपको महाभारत के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा की याद हो तो सुना है कि आज भी वो मां नर्मदा के किनारे कई लोगों द्वारा देखा गया है.

 

जबलपुर मे भेडाघाट एक ऐसी जगह है जहां आप आश्चर्य चकित रह जायेंगे. मार्बल की चट्टानों के बीचो बीच बहती नर्मदा और वहां नाव मे सवार आप, और बीच धारा मे भुलभुलैया, क्या नजारा होता होगा? सोचिये. अगर नाविक नही हो तो आपको किधर जाना है ? यही नही सूझेगा.

 

इस बारे मे ताऊ पत्रिका की सलाहकार संपादक सुश्री अल्पना जी ने विस्तृत विव्रण दिया है सो आईये उनके स्तम्भ “मेरा पन्ना“ की और चलते हैं. 

 

-ताऊ रामपुरिया

 

 

 

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                             "मेरा पन्ना"



-अल्पना वर्मा


नमस्कार, आज फ़िर हम एक पहेली के बहाने मध्यप्रदेश के एक खूबसुरत शहर और
वहां की संस्कारधानी कहलाये जाने वाले शहर जबलपुर के बारे मे कुछ जानने की कोशीश करेंगे.

 

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 330 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है प्राचीन शहर जबलपुर। इस शहर को जबालिपुरम भी कहते हैं क्योंकि इसका सम्बन्ध महर्षि जाबालि से जोड़ा जाता है।रामायण एवं महाभारत की कथाएँ इस शहर से जुड़ी हुई हैं।


'बावन तालों का सुन्दर नगर 'जबलपुर , मनोहारी प्राकृतिक सुन्दरता की वजह से 12शताब्दी में गोंड राजाओं की राजधानी रहा, उसके बाद कालाचूडी राज्य के हाथ रहा और अन्तत: इसे मराठाओं ने जीत लिया और तब तक उनके पास रहा जब तक कि ब्रिटिशर्स ने 1817 में उनसे ले न लिया।

 

 

bhedaghat-marble-rock                                         भेडाघाट मे नौका विहार
        

 

भेडाघाट, जबलपुर विश्वप्रसिध्द मार्बलरॉक्स के लिए प्रसिध्द है,नर्मदा के दोनों दूर तक ओर 100-100 फीट ऊंची ये संगमरमरी चट्टानें बहुत सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करती हैं। यहां बहुत ही सुंदर जलप्रपात है जो धुंआधार के नाम से विख्यात है. फ़िल्म “जिस देश मे गंगा बहती है”  की अधिकांश शूटिंग इसी जगह भेडाघाट मे हुई थी.

 

 

और इस शहर के बारे मे जानिये – श्रीमती कृष्णा राजकपूर यहीं की हैं यहीं के सिनेमा व्यवसायी नाथ परिवार की बेटी हैं. यहां का एम्पायार थियेटर इसी परिवार की मालकियत का है. यह सिनेमा हिंदुस्थान के उस समय के सात लाजवाब सिनेमाओं की श्रंखला मे अपना स्थान रखता था. जहां आर्मी के लोग युद्धकाल के बाद मनोरंजन के लिये जाया करता थे. 

 

फ़िल्म अभिनेता प्रेमनाथ और नरेन्द्रनाथ श्रीमती कृष्णा कपूर जी के सगे भाई थे. उनके भाई  साहब प्रेमनाथ को तो आप सब अच्छी तरह जानते ही होगें. उनको भी इस शहर से इतना लगाव रहा कि  फ़िल्म  “जानी मेरा नाम“ के दिनों की चरम सफ़लता के दिनों मे वो यहा लौट आये थे और गेरुएं वस्त्र धारण कर लिये थे. और वहीं ग्वारीघाट मे आश्रम बनवाकर रहने लगे थे.

 

ओशो रजनीश और महर्षि महेश योगी इन दोनो विभुतियों को कौन नही जानता? ये दोनों भी यहीं की देन हैं. श्री हरीशंकर जी परसाई को कौन भूल सकता है? आप भी जबलपुर से ही थे. यानि इस शहर ने एक से बढ्कर एक  रत्न समाज और दुनियां को दिये हैं.   

      

एक बात इस शहर के बारे मे जानना शायद और अच्छी  लगेगी कि जबलपुर को संस्कारधानी नाम आचार्य बिनोवा भावे ने दिया था. 


जबलपुर का भौगोलिक क्षेत्र पथरीली, बंजर ज़मीन और पहाड़ों से आच्छादित है।

 

गोंडवाना क्षेत्र-

 

 

घने जंगलों का क्षेत्र, गोंडवाना अब मध्यप्रदेश का अंग है। पर एक जमाने में यह देश से अलग-थलग था और बाकी देश पर जो कुछ बीता उससे यह बहुत कुछ अछूता रहा। तथापि उत्तर के सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव से यह नहीं बच सका।

 

 

अनेक ऋषि-मुनियों ने यहाँ अपने आश्रम बनाये, क्योंकि यहाँ एकान्त भजन-पूजन के लिए बहुत उपयुक्त था। कभी यहाँ रानी दुर्गावती शासन करती थीं।

 

रानी दुर्गावती -


गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ा-मंडला सहित ५२ गढ़ों की शासक वीरांगना रानी दुर्गावती कालिंजर के चंदेल राजा कीर्तिसिंह की इकलौती संतान थी। उनका जनम 1524 A.D में हुआ था.


गोंडवाना शासक संग्राम सिंह के पुत्र दलपत शाह की सुन्दरता, वीरता और साहस की चर्चा धीरे धीरे दुर्गावती तक पहुँची परन्तु जाति भेद आड़े आ गया . फ़िर भी दुर्गावती और दलपत शाह दोनों के परस्पर आकर्षण ने अंततः उन्हें परिणय सूत्र में बाँध ही दिया.

 

 

सन् 1542 में अपने विवाह के उपरान्त  दलपतशाह को जब अपनी पैतृक राजधानी गढ़ा रुचिकर नहीं लगी तो उन्होंने सिंगौरगढ़ को राजधानी बनाया और वहाँ प्रासाद, जलाशय आदि विकसित कराये.

 

 

रानीदुर्गावती से विवाह होने के ४ वर्ष उपरांत ही दलपतशाह की मृत्यु हो गई और उनके ३ वर्षीय पुत्र वीरनारायण को उत्तराधिकारी घोषित किया गया.


रानी ने  सन् 1555 से 1560 तक  मालवा के सुल्तान बाजबहादुर तथा मियाना अफगानों के आक्रमणों को विफल किया। अकबर ने उसके दरबार में गोप कवि को भेजकर, दुर्गावती के दीवान आधार सिंह कायस्थ (आधारताल का निर्माता) को अपनी और मिलाने का कूटनीतिक प्रयास किया पर उसमें असफल रहा।


अंतिम युध्द जबलपुर की मंडला की सीमा पर नर्रई नाला पर 23 जून 1564 को हुआ। नाले में बाढ़ आ जाने से रानी सुरक्षित स्थान पर नहीं जा सकी।  रात्रि में धोखे से आक्रमण कर  आसफ खां ने रानी को कपटपूर्वक पराजित किया। परन्तु वीर रानी ने अपने हाथ से ही अपना प्राणांत कर,अपने शील व स्वाभिमान की रक्षा की।

 

 

इस तरह  रानी ने साहस और पराक्रम के साथ 1546 से 1564 तक गोंडवाना साम्राज्य का कुशल संचालन किया. इन्हीं के नाम पर जबलपुर में एक विश्वविद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा गया है.


 

यह तस्वीर  इस महल के 'क्लू ' में दिखाई गयी थीं अब जानिए उस  शिला के बारे में-जो मानव अंगुली की मोटाई के  बराबर सहारे पर टिकी हुई है.

 

 

 

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                                 इसे कहते हैं-संतुलित शिला (बैलेंस रॉक )

 

प्रागैतिहासिक पृथ्वी के संरचना के समय पहाड़ों में मदन महल की पहाड़ियाँ और चट्टानें गौड़ वान ट्रैक के नाम से जानी जाती हैं पुरातत्व शास्त्रियों  के अनुसार यह  सरंचना हिमालय से भी पुरानी है।

 

संतुलित शिला का इस गौड़्वाना ट्रैक में होना खुद इस बात क प्रमाण है कि यह  क्षेत्र करोड़ों वर्ष पुराना है। दो पत्थरों के बीच लाखों वर्षों तक पानी और हवा के बहाव से पैदा हुए कटाव द्वारा संतुलित शिला का   निर्माण होता है।खास बात यहाँ की  यह शिला  भूकंप में भी नहीं हिली।

 


'लाल [समीर जी]और बवाल' ब्लॉग पर इस की तस्वीर के साथ एक बार बवाल जी ने कुछ यूँ लिखा था-


उनकी अनुमति के  बिना यहाँ दे रही हूँ-


'ज़रा सा इनकी तरफ़ तो देखो, हैं दोनों आलम सँभाल रक्खे
औ’ तुमने पहली ही फ़ुरसतों में, उबल-उबल कर बवाल रक्खे

---बवाल

मदन महल-

 

 

यह कब बना? इस के बारे में कुछ भी साफ़ साफ़ नहीं कहा जा सकता है. अधिकतर सूत्रों के अनुसार  यह किला राजा मदन शाह ने १११६ में बनवाया था.

 

 

ज़मीन से लगभग ५०० मीटर की ऊँचाई पर बने इस 'मदन महल 'की पहाड़ी 150 करोड़ वर्ष पुरानी मानी जाती है | इसी पहाड़ी पर गौंड़ राजा मदन शाह द्वारा एक चौकी बनवायी गई ।इस किले की ईमारत को सेना अवलोकन पोस्ट के रूप में भी इस्तमाल किया जाता रहा होगा.

 

 

इस इमारत की बनावट में अनेक छोटे-छोटे  कमरों को देख कर ऐसा प्रतीत  होता है कि

यहाँ रहने वाले शासक के साथ सेना भी रहती होगी. शायद   इस भवन में दो खण्ड थे। इसमें एक आंगन था और अब आंगन के केवल दो ओर कमरे बचे हैं। छत की छपाई में  सुन्दर चित्रकारी है। यह छत फलक युक्त वर्गाकार स्तम्भों पर आश्रित है। माना जाता है ,इस महल में कई गुप्त सुरंगे भी हैं जो जबलपुर के 1000 AD में बने '६४ योगिनी 'मंदिर से जोड़ती हैं.

 

 

यह दसवें गोंड राजा मदन शाह का आराम गृह भी माना जाता है. यह अत्यन्त साधारण भवन है। परन्तु उस समय इस राज्य कि वैभवता बहुत थी. खजाना मुग़ल शासकों ने लूट लिया था.

 

गढ़ा-मंडला में आज भी एक दोहा प्रचलित है -

 

मदन महल की छाँव में, दो टोंगों के बीच .

जमा गड़ी नौं लाख की, दो सोने की ईंट.

 

इस महल के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिली-जो भी मिल सकी यहाँ प्रस्तुत की गई है. घटनाओं के  काल  में भी कई स्थान पर भिन्नता देखी गयी है.यहाँ दी गयी सभी जानकारी अंतरजाल पर पहले से प्रस्तुत सामग्री के आधार पर है.यह भवन अब भारतीय   पुरातत्व संस्थान की देख रेख में है.


-- जबलपुर एयरपोर्ट मध्यप्रदेश और पडोसी राज्यों के अनेक शहरों से वायुमार्ग द्वारा जुड़ा है। यह रेलवे स्टेशन भारत के प्रमुख शहरों से रेलमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।
-राज्य परिवहन की बसें  सभी मुख्य शहरों से  जबलपुर के लिए चलती हैं। एवम ठहरने के लिये होटले सभी स्तर की उपलब्ध हैं.

-अल्पना वर्मा

( सलाहकार संपादक, पर्यटन )

 

 

अब आईये ताऊ पत्रिका के तकनिकी संपादक श्री आशीष खंडेलवाल के स्तम्भ “ दुनिया मेरी नजर से” की और चलते हैं.

 

 

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                      “ दुनिया मेरी नजर से”





-आशीष खण्डेलवाल


नमस्कार आइए आज आपको उड़नतश्तरी दिखाएं.

 

 

अब आप कहेंगे कि हिन्दी चिट्ठा संसार तो समीर लाल जी की उड़नतश्तरी को रोजाना ही देखता है। इसमें नया क्या है? तो दोस्तों इसमे  नया यह है कि आज आपको इसे सचमुच में देखने का सौभाग्य मिल रहा है। आप इस लिंक पर चटका लगाएं और देख लें। यह रोमानिया का एक बगीचा है और यहां आप खुद ही देखिए कि क्या नजर आ रहा है।

 

http://googlesightseeing.com/maps?p=1564&c=&t=k&hl=en&ll=45.70334,21.301975&z=18

 

खा गए न धोखा!  यह उड़नतश्तरी नहीं है और गूगल अर्थ पर दिख रही डिस्क जैसी इस आकृति के कारण रोमानिया प्रशासन और गूगल की नींद उड़ी है। दरअसल यह रोमानिया के टिमिसोअरा शहर में पानी सप्लाई करने वाली एक पुरानी इमारत का नजारा है। लोग इसे गूगल अर्थ पर देखकर अफवाह फैला रहे हैं कि यह कोई यूएफओ (अनआइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट) है।

 

रोमानिया का प्रशासन और गूगल दोनों ही नेटिजंस से अपील कर रहे हैं कि कृपया वे बार-बार उन्हें इस बारे में सूचना नहीं दें। अब तकनीक है तो बेजा इस्तेमाल तो होगा ही।

 

Thanks and Regards

Ashish Khandelwal


 

 

और अब आईये चलते हैं सुश्री सीमा गुप्ता के स्तम्भ “मेरी कलम से” की और.

 

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               "मेरी कलम से"

            

 

 

 

 

 

 

 

--seema gupta

 

नमस्कार, ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के एक और अंक में आपका स्वागत है.

 

 

जीवन में कितना ही बडा काम करना हो यानि मंजिल कितनी ही दूर और और बडी

हो उसकी तरफ़ हमेशा एक छोटा सा पहला कदम ही बढाना पडता है. इसी तरह जीवन कोई बहुत बडी खुशियों से सुखी नही होता. उसके लिये हमको हमेशा छोटी छोटी

खुशियां ही बहुत बडी खुशी देती हैं.

 

 

आजकल इतना मंदी का माहोल और से गला काट स्पर्धा. ऐसे मे हर आदमी शाम को

घर वापसी पर बिल्कुल लस्त पस्त हो चुका होता है.

 

 

fatherऐसा ही एक आदमी काम से थका मांदा चिडचिडाता हुआ शाम को घर पहुंचा और अपने पॉँच साल के बेटे को  दरवाज़े पर इंतज़ार करता हुआ पाया.

 

बेटे ने पिता को देखते ही काहा  : "पिताजी, मैं आपसे  एक सवाल पूछ सकता हूँ ?"

 

पिताजी: "हाँ यकीनन , क्या पूछना है ?" पूछो  उस आदमी ने कहा.

बेटे: "पिताजी, आप  एक घंटे में कितना पैसा कमा लेते हैं?"

 

 

पिताजी: "ये जानना तुम्हारा  काम नहीं है. तुम क्यों इस तरह की  बात पूछ रहे हो ?" उस आदमी ने थोडा  गुस्से से कहा.

 

बेटा: "मैं सिर्फ जानना चाहता हूँ कि  आप  एक घंटे में कितना कमाते हैं? कृपया   मुझे बताईये?"

 

पिताजी: ", अगर तुम्हे जानना जरूरी है तो मैं एक घंटे में 100 रुपये कमाता हूँ.."

ओह," छोटे लड़के ने सर झुकाते हुए  उत्तर दिया,  और जमीन की तरफ देखते हुए पूछा क्या मै आपसे ५० रूपये उधार ले सकता हूँ?

 

 

पिता, क्रोधित था , अपने बेटे से बोला अगर तुम सोचते हो की इन पैसो से तुम कोई खिलौना या कुछ अन्य बकवास खरीदोगे तो भूल जाओ और अपने कमरे में जाकर सो जाओ.

 

 

कितने स्वार्थी हो तुम क्या मै हर रोज इतनी कड़ी मेहनत तुम्हारी इन बचकानी हरकतों को पूरा करने के लिए करता हूँ?

 

 

छोटा लड़का चुपचाप अपने कमरे में गया  और दरवाजा बंद कर लिया . वह आदमी अपने बेटे को कोसने लगा की उसकी हिम्मत कैसे हुई  कुछ पैसे  के लिए इस तरह के सवाल पूछने की ?

 

 

 

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एक घंटे के बाद वो व्यक्ति कुछ शांत हुआ और सोचने लगा की हो सकता है बच्चे  ने  कुछ काम के लिए ही पैसे मांगे हों क्योंकि वो अक्सर इस तरह तो कभी पैसे मांगता नही था.." यही सोच कर वो व्यक्ति अपने बेटे के कमरे की तरफ गया और धीरे से दरवाजा खोला..

 

बेटा क्या तुम सो रहे हो?" उसने पूछा.

 

नहीं पिताजी, मैं जाग रहा  हूँ, "उस लड़के ने उत्तर  दिया.

उस आदमी ने कहा : "मैं, शायद  तुम पर ज्यादा ही नाराज हो गया था. आज का दिन कुछ ज्यादा ही खराब  था  जो मैंने सारा गुस्सा तुम पर उतार दिया. ये लो ५० रूपये जो तुमने मांगे थे ."

 

अब बेटा खुशी से चिल्लाते हुये बोला : "ओह, पिताजी धन्यवाद!"

 

फ़िर उस बच्चे ने अपने तकिये के नीचे से कुछ मुडे तुडे रूपये निकाले, उस व्यक्ति ने देखा की इसके पास तो पहले से ही पैसे हैं तो उसे गुस्सा आने लगा.

 

उस बच्चे ने धीरे धीरे अपने सारे  पैसे गिने और अपने पिता की तरफ देखा.

 

अगर तुम्हारे पास पहले  से ही रुपये   थे तो और क्यों मांगे? "पिता गुर्र्राया .

 

अब बेटा बोला - "क्योंकि ये पैसे  पर्याप्त नही थे मगर अब पूरे हैं." पिताजी कल आप एक घंटे घर जल्दी आना , अब मेरे पास १०० रुपये हैं और मै आपका एक घंटा खरीद सकता हूँ. उम्मीद है आप मेरे साथ रात का  भोजन करना पसंद करेंगे.

 

अब उस आदमी की शक्ल देखने लायक थी.

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" हम जिनके साथ रहते हैं या जिन्हें प्यार करते हैं उन्हें अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ  पल अवश्य देने चाहिए . ये एक छोटा सा reminder है सबके लिए जो अपने व्यवसाय की वजह बहुत व्यस्त जीवन गुजारते हैं...ऐसा न हो की जो हमारे दिल के बहुत करीब हैं, जिनकी हम चिंता करते हैं, उनके साथ समय बिताये बिना ही समय हमारे हाथो से फिसलता चला जाए....यही प्रबन्धन है..."

 

 

अगले सप्ताह फ़िर मिलते हैं तब तक के लिये अलविदा.

 

 

--सीमा गुप्ता

 

विशेष संपादक (प्रबंधन)

 

हमारे पहेली अंक - 9 के विजेता श्री काजल कुमार जी का साक्षात्कार आपसे करवायेंगे ५ मार्च 

गुरुवार को. अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी.

 

 

संपादक मंडल :-

 

मुख्य संपादक – ताऊ रामपुरिया

सलाहकार संपादक (पर्यटन) – सुश्री अल्पना वर्मा

विशेष संपादक (प्रबंधन) – सुश्री सीमा गुप्ता

तकनिकी संपादक –  श्री आशीष खंडेलवाल

 

सहायक गण :-

 

सहायक ( पहेली) – श्री बीनू फ़िरंगी

सहायक ( बोनस पहेली) – मिस. रामप्यारी

ताऊ की पाठशाला आफ़ सन्डे में पहेली का जवाब

प्रिय बहणों,  भाईयो, भतीजियों और भतीजों आप सबका ताऊ की रविवारिय क्लास मे घणा स्वागत सै. युं तो आज सिर्फ़ कल की पहेली का रिजल्ट घोषित करना है जो बीनू फ़िरंगी और  रामप्यारी बखूबी कर लेंगे. इन दोनों ही बच्चों को हमने काफ़ी ट्रेंड कर दिया है. सो लगता है ये हमारी जिम्मेदारी थोडी बहुत बांट लेंगे.

 

आज सुबह सूबह ही कहीं से एक मेल मिला जन्म दिन मुबारक हो. और इस मेल का वापसी उत्तर देने का कष्ट नही करें. बताईये अब हम भेजने वाले का आभार भी व्यक्त नही कर सकते? खैर साहब …क्या करें? उनकी मर्जी. वैसे भी आजकल जन्मदिन आप नही भी याद रखो तो बैंक और बीमे वाले एस.एम.एस. करके याद दिलवा देते हैं और बचे खुचे माल के स्टोर वाले कि भाई साहब आजाओ.

 

वैसे आज हमारे सारे परिवार के लोग इकठ्ठे हैं इस दिन को मनाने के लिये. क्योंकि आज छुट्टी है सो चम्पाकली भी सीधे चांद से आगई है, अनारकली बालीउड से लौट आई है. बीनू फ़िरंगी और सैम तो यहां हैं ही. रामप्यारी भी यहीं है. रामदयाल और उसकी चम्पा गधेडी भी आ चुके हैं. संतू गधे को भी हम कुंये से निकलवा लाये हैं.

 

हमारी प्यारी रामप्यारी ने हमसे कहा कि ताऊ इस मौके पर दो शब्द कहिये सो कह रहे हैं. वैसे हमारी इच्छा तो फ़ुरसतिया जी स्टाईल मे बीसेक हजार शब्द कहने की थी. पर क्या करें? आज कल के बच्चें हैं सो उन्होने दो शब्द बोलने का कहा तो ज्यादा से ज्यादा दौ सौ बोल लेंगे.

 

सबसे पहले तो हम कबीर साहब का ये दोहा अपने आप को ही सुना रहे हैं.

 

“कबिरा हम पैदा हुये जग हंसे हम रोये

ऐसी करणी कर चलो हम हंसे जग रोये”

 

 

वैसे आजकल बडा मुश्किल है भाई किसी को कुछ कहना. हम ठहरे देहाती आदमी. अब हम किसी किताब के दो पन्ने पढ कर उस पर बुद्धिजिवी के जैसा तो कमेंट नही ना कर सकते. और इतने बुद्धिजीवी भी नही हैं कि किसी उपन्यास के पन्ने बांचकर काफ़ी और सिगरेट फ़ूकंते नजर आयें.

 

भाई अपना तो फ़िर से आदर्श कबीर साहब ही हैं.

 

“कबिरा खडा बाजार मे लिये लुकाठी हाथ

जो घर   फ़ूंके   आपना     चले हमारे साथ”

 

अब हमारे साथ कौन अपना घर जलवायेगा? ईश्वर ताऊ का घर छोडकर सबका सलामत रखे. एक और साल पूरा हुआ. ब्लाग जगत मे आने के पहले लगने लगा था कि जगत से मोह माया कम होने लगी है पर अब मुझे लगने लगा है कि ये आभाशी जगत भी मुझे मोह ग्रस्त करने लगा है.  शायद आत्म मंथन की आवश्यकता है.

 

 

 

 

 

 

binu-firangi आदर्णीय देवियों और सज्जनों, ताऊ के भाइयो, बहणों, भतीजियों और भतीजो आप सबको बीनू फ़िरंगी का सादर प्रणाम. ताऊ पहेली राऊंड –२ के प्रथम अंक का रिजल्ट घोषित करते हुये मुझे  अपार हर्ष हो रहा है. और मैं अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं कि मुझे ये मौका मिला.

 

मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि मैं बिना किसी बेईमानी और बदमाशी के इमानदारी पुर्वक रिजल्ट घोषित करुंगा. और आशा है आप मेरे द्वारा तैयार रिजल्ट से संतुष्ट होंगे.

 

तो आईये अब चलते हैं रिजल्ट की तरफ़ :-  हमारी इस पहेली का सही जवाब है “मदन महल फ़ोर्ट” विजेता इस प्रकार रहे.

                         

 

 शुभम आर्य said...

 

Madan Mahal Fort, Jabalpur, .. madhya pradesh

 

घणी बधाई प्रथम स्थान के लिये. सर्वाधिक अंक प्रात किये १०१.

तालियां..... तालियां..... तालियां..... जोरदार

अब श्री शुभम आर्य को अगली बार जीतते ही हेट्रिक के साथ कुल पांच बार के विजेता  बनने का सुनहरा मौका है. विशेष बधाई…..

 


२. वरुण जायसवाल said...

Madan Mahal Fort, in Jabalpur, madhya pradesh

अंक १००

३. अल्पना वर्मा said...

 

Madan Mahal Fort, Jabalpur, Madhya Pradesh

अंक ९९

४.My Photo PN Subramanian said...

अरे भैय्या हम तो फंस जायेंगे. मदन महल, जबलपुर है. इसके बारे में बहुत ज्यादा तो मालुम नहीं है. यह ११०० ईसवी का है. किसने बनाया यह भी नहीं मालुम. मदन शाह (सिंह भी कहीं कहीं कहा गया है) जो रानी दुर्गावती का बेटा था, यहाँ आराम फरमाता था. यहाँ से दूर दूर तक नज़र राखी जा सकती है.

अंक ९८

 

५. seema gupta said...

Madan Mahal Fort Sitting pretty on top of a rocky hill, this 900 year old fort dominates the landscape. A view of the low-lying areas from the fort is scintillating and makes it worth your visit. The most characteristic feature of the Madan Mahal Fort is the simplicity of the fort itself. The fort was built by the Gond king Madan Shah in the year 1116 and since then it has become a landmark for Jabalpur City.
regards

अंक ९७

६. Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

 

मदन महल, जबलपुर


अंक ९६
७. pankajrago said...

Rani Durgawati Fort, Madan Mahal, Jabalpur

 

अंक ९५

८. हिमांशु । Himanshu said...

यह चित्र रानी दुर्गावती फ़ोर्ट, मदनमहल, जबलपुर का है. इसे गोंड शासक मदन शाह ने सन १११६ ई० में बनवाया था.

अब रामप्यारी का जवाब. अरे नहीं! अलग टिप्पणी कर रहा हूं.

अंक ९४

९. दिगम्बर नासवा said...

ताऊ राम राम


मन्ने तो लागे है कोई बावला ही होगा जो जिसने इतनी ऊँची और ऐसी जगह घर बनवा लिया जो हमारे गले की आफत बन गया, न जाते बनेगा न जवाब देते. पर जवाब तो जरूर दूंगा.......किसी और का तुक्का चोरी कर के


तो आज चोरी है जैसवाल जी का तुक्का............ये है ......रानी दुर्गावती फोर्ट जबलपुर.
और और अब राम प्यारी का जवाब.............१६ दिन में ख़तम हो जायेंगी साड़ी चोकें

 

अंक ९३

१०. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

 

ताऊ, पहले भी शक था मगर गांधी जी के FDC की वजह से तय नहीं कर पा रहा था. अब चित्र बदला है तो पक्का हो गया की यह जबलपुर का मदन महल है जिसे रानी दुर्गावती के पुत्र दसवें गोंड राजा मदन सिंह का आवास माना जाता है

 

अंक ९२

११. नितिन व्यास said...

 

ये तो उडनतश्तरी के जबलपुर का मदनमहल का किला है्

 

अंक ९१

१२. आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

 

Taau.. ye to Jabalpur ka Madan Mahal hai..


अंक ९०
१३. दिलीप कवठेकर said...

अरे, चित्र को क्लोज़ अप में देखा तो पहाडी के महल में उडन तश्तरी के समीर जी खिडकी पर बैठे दिख गये!!


तो ताऊ, ये है रानी दुर्गावती का किला , मदन महल ,जबलपुर.

 

अंक ८९

१४. प्रकाश गोविन्द said...

ANSWER :-
Madan Mahal Fort. Jabalpur    Madya Pradesh

 

अंक ८८

१५. प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

Madan Mahal Fort.   Jabalpur

अंक ८७

१६. Syed said...

रानी दुर्गावती फोर्ट, मदन महल, जबलपुर


अंक ८६
१७. राज भाटिय़ा said...

 

ताऊ मेने तो लगे यह तेरा ही घर है, जब राजस्थान मै भयंकर बाढ आई थी, तो तुमने झट से मध्य प्रदेश मै मदन लाल से एक ऊंचे पहाड पर अपना झोपडा बना लिय था, फ़िर गोटू सुनार को चुना लगाया, सेठ को लुटा, भाटिया को चुना लगाया, ओर पता नही किस किस को चुना लगाया, ओर फ़िर झटपट इस बडे से पत्थर पर मदन महल बना लिया, अब बिजली का बिल तो देना ही नही, क्यो कि उडे तो चारो ओर से हवा आती है, ओर जब लाईट चाहिये तो टले ते कुंडी मार लो तारो मे, वेसे अपना जबाब तो सही नही हो सकता , क्योकि यह तो नकल मारी है, पाप से बचने के लिये पहले ही बता दे.
राम राम जी की

 

अंक ८५

१८. दीपक "तिवारी साहब" said...

ताऊ ये जबलपुर से पहला ही रेल्वे स्टेशन है जिसका नाम मदन महल है. वहीं स्टेशन से ये किला दिखता है.

 

अंक ८४

१९. makrand said...

ये जब्लपुर का दुर्गावती फ़ोर्ट है मदन महल मे.


अंक ८३
२०. Anil Pusadkar said...

 

इतने लोगो ने बताया नही भी होता तो भी मै ईमानदारी से बिना नकल के बता देता देता ये मदन महल है,जबलपुर का।अब तक़दीर ही खराब है जो आज देर से ईधर आया,वर्ना कई-कई बार झांको तो भी जवाब का पता नही रहता।आज थोड़ा देर क्या हूई सब के सब पेल दिये हैं।देखना ताऊजी ईमानदारी का खयाल रखना।

 

अंक ८२

२१. सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

ताऊ जी, पहले अपनी पहेली का जवाब सुन लो.
यह चित्र जबलपुर, मध्य प्रदेश के मदन महल के किले का है जिसे १११६ ई. में गोंड शासक मदन शाह ने बनवाया था. बाद में यह रानी दुर्गावती का महल बना जिन्होंने मुग़ल शासक अकबर की सेना से लड़ते हुए अपने प्राण दे दिए. यह किला एक चट्टानी पहाडी पर बना है जहां से शहर और आसपास का पूरा इलाका दिखाई पड़ता है. इसे शायद इलाके की निगरानी के लिए सैनिकों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था. वैसे तो इस इमारत में किसी ख़ास वास्तुकला या कलाकृति का प्रयोग नहीं किया गया है पर इसकी "स्थिति" और साधारणता ही इसे ख़ूबसूरत और अद्वितीय बना देती है.

 

अंक ८१

२२. Udan Tashtari said...

HUm to train me the varna apna shahar na pahchante aisa kaise ho sakta hai..hume grace di jaye...madan mahal ka kila, jabalpur answer ke liye.
Abhi Delhi se aaya hun 5 minute pahle.

 

अंक ८०

 

 

 


इसके अलावा श्री अरविंद मिश्रा, श्री सुशील कुमार जी छोंक्कर, सु. रंजना [रंजू भाटिया]

सु. कविता वाचक्नवी, श्री महामंत्री तस्लीम, श्री नीरज गोस्वामी, श्री भैरव, सु. इन्द्राणी ,

श्री संजय बैंगाणी, श्री शाश्त्री, श्री योगिंद्र मौदगिल, श्री विनय, श्री पी.डी.,

डा. रुपचन्द्र शाश्त्री मयंक, सु पल्लवी त्रिवेदी, श्री राजीव ने भी हमारा उत्साह वर्धन

किया.

आप सभी का हार्दिक आभार.


 

 

 

  अब आईये रामप्यारी की क्लास में:-

 

 

 

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        रामप्यारी की क्लास में :-






आप सबको रामप्यारी की नमस्ते. आप कितने अच्छे हैं ना? नीचे मैं उन सभी के नाम दे रही हूं जिन्होने मुझे मार खाने से बचाया. आप सभी का बहुत धन्यवाद. और हां वादे के मुताबिक मैने आप सबके खाते मे तीस तीस  नम्बर जमा कर दिये हैं.

पर आपसे निवेदन है कि अगर कोई गलती हो तो मुझे बता दिजियेगा. क्युंकि मैं जरा गणित मे कमजोर हूं. 

श्री शुभम आर्य, श्री वरुण जयसवाल, श्री काजल कुमार ( कार्टून वाले अंकल) , सु सीमा गुप्ता जी, ( धन्यवाद आंटी, आपने पिटने से बचा लिया, वर्ना एक बार तो मुझे पिटवा ही दिया था), 

श्री तरुण, श्री पंकज रागो, श्री आलोक सिंह, श्री अंतर सोहिल, श्री हिमांशु, श्री नितिन व्यास, श्री मुसाफ़िर जाट ( लडकी छेडने वाले अंकल),

और श्री राज भाटिया अंकल ( ताऊ की टांग खींचने वाले अंकल),  और श्री प्रकाश गोविंद अंकल,

सु अल्पना वर्माजी ( शुक्रिया आपने मुझे बचाया अपना जवाब सुधार कर वर्ना अगर
मैं आपकी सलाह मानकर पहले वाला जवाब दे देती तो मेरी पिटाई पक्की थी)

श्री मकरंद अंकल ( अंकल कुछ स्कूल से तडी मारने का फ़ार्मुला बताओ ना)

श्री प्रवीण त्रिवेदी ( स्कूळ के प्रिंसीपल सर…. सर मुझे स्कूल से रेस्टिकेट करवा दो ना जिससे झंझट ही खत्म हो जाये)

श्री सतीशचन्द्र सत्यार्थि, प. डी. के> शर्मा “वत्स”, श्री  उडन तश्तरि अंकल…अंकल कैसी रही आपकी दिल्ली की यात्रा..? अब अगली बार देर मत करना..अगर आप नही आते तो कल स्कूळ मे मेरी पिटाई पक्की थी. सब के सब उल्टे सीधे जवाब दे कर मुझे कन्फ़्युज कर रहे थे. और सबसे आखिरी मे आये श्री स्मार्ट ईंडियन..क्या अंकल इतनी लेट आये आप? मुझे स्कूल का होम वर्क भी तो करना
है ना. अगली बार जरा जल्दी आईयेगा.        

अच्छा तो अब अगले सप्ताह मिलते हैं तब तक के लिये नमस्ते. और धन्यवाद..क्योंकि अब मेरा होमवर्क पूरा होगया और मैं कल  स्कूल जा रही हूं.

- आपकी रामप्यारी


 

 

पाठकों ने कहा “

 

seema-gupta-2

seema gupta said...

 

Jabalpur – An Overview


Jabalpur also known as Sanskardhani is a prominent city in Madhya Pradesh, India. It is located in the Mahakaushal region in the geographic centre in India.

It was the 27th largest urban conglomeration in India in 2001 (2001 Census) and was the 325th largest city in the world in 2006. Jabalpur is the first district in India which has obtained comprehensive ISO 9001 Certificate in April 2007.

The current population is about 15 lakhs.
The city dates back to 19th Century and is famous for its magnificent collection of Marble Rocks called Bhedaghat bordering the holy Narmada River. Jabalpur has many important Defence establishments including the Area Headquarters and Ordnance factories, the Headquarters of West Central Railway Zone, the Madhya Pradesh State Electricity Board, and the Madhya Pradesh High Court. It is also known for giving spiritual leaders of world fame like Maharishi Mahesh Yogi of Transcendental Meditation and Acharya Rajneesh.


History


Jabalpur is said to have derived its name from an Arabic word ‘Jabi’ meaning ‘rocky mountain’ on account of an impressive and awe inspiring rocky formation on the southern periphery of the city. Yet another version claims that the city is named after Rishi Jabali who sanctified the area and penanced on the banks of river Narmada in ancient times.


The historical records of Tripuri inscriptions and of the Kalachuris refer to it as ‘Jabalipattan’. The boundaries of the old city were fairly small in contrast to the expansion that has taken place over the centuries. The remnants of gates and pillars of ancient walled city can be seen even today in the form of Hanuman Phatak, Gurha Phatak and at Garha representing the pristine glory of the bygone years.


Under the British Raj, Jabalpur became the capital of the Saugor and Nerbudda Territories as part of the British North-Western Province. During those days, it became infamous for the Thuggee murders, but was made more famous by the man who suppressed thugee, Col. Sleeman, who was also appointed commissioner at Jabalpur. An important landmark event was the holding of the Tripuri Congress session in 1939 which was presided over by Subhash Chandra Bose. Famous Congress session was held at Tripuri (Jabalpur) in 1939 when Subhash Chandra Bose was elected the Congress President against the wishes of Mahatma Gandhi. Methodology of two thoughts to achieve freedom was formulated in this session.

Climate


The city has the typical hot and dry temperate climate of the Great Indian Plateau. Jabalpur is hot during summers with temperature going up to 47 degree Celsius but the winters are mild and pleasant. The July to September months bring heavy rains with the onset of the South Western monsoon.

Culture


The presence of the Narmada and the rule of Gond and Maratha dynasties for a long period have led to primarily a Hindu majority population in the area. The Mughal rule subsequently brought in a sizable Muslim population also. Thus it is characterized by a mixed culture of people of all castes and creeds living in harmony.


Hindi is the first language of the state and spoken and understood in the city. The Mughals brought Urdu and the influence of Maratha rulers has given Marathi to the multilingual culture of Jabalpur.

The art and crafts of Jabalpur are an important part of the cultural life of this city. One of the most well known Jabalpur crafts is durry designing. The unique designs and color of the durries make them very popular.

The inhabitants of the region enthusiastically take part in the festivals of Jabalpur. Almost all the major festivals of India are celebrated in this city. Different forms of dance like Gond, Matki, Phulpati and Giridaand are an integral part of the celebration during these festivals.

Transport


Air
Jabalpur has a small airport called Dumna at a distance of about 20 kms from the city center. It is connected with direct flights to Delhi and to the major airports in South and West through Indore.

Road
Jabalpur is well connected to Nagpur, Bhopal, Allahabad and Jaipur. The city is connected with three National Highways -
NH-7 (Varanasi - Kanyakumari
NH-12 (Jabalpur - Jaipur)
NH-2A (Simga, Chattisgarh-NH-26 near Jhansi)
 

Rail
Jabalpur is the Headquarter of West Central Railways and is well connected with mail and super-fast trains from places like Mumbai, New Delhi, Ahmedabad, Bhopal, Kolkata, Patna, Lucknow, Chennai, Bangalore, Nagpur, Kota, Jaipur, Jammu and Hyderabad.

regards

 

अच्छा अब नमस्ते. कल सोमवार को ताऊ साप्ताहिक पत्रिका मे सिर्फ़ रिजल्ट वाला हिस्सा

छोडकर बाकी सब स्तम्भ यथावत प्रकाशित होंगे.