हमने आपसे जो पहेली पूछी थी उसमे जो चित्र लगा था वो मदन महल जबलपुर का था. जबलपुर मध्यप्रदेश की संस्कार धानी तो है ही साथ मे यहां पर इतने रमणीक दृष्य हैं कि आप एक बार यहां चले गये तो बार बार जाने को दिल चाहेगा. हमारा अनगिनत बार वहां जाना हुआ है. हम जब भी जाते हैं वहां पर ग्वारीघाट पर मां नर्मदा में स्नान करना नही भूलते. अगर यूं कहा जाये कि जबलपुर वासी बल्कि कहिये कि हर नर्मदा किनारे रहने वाले प्राणी का दिल “हर हर नर्मदे” बोलते हुये ही धडकता है.
यहां का प्रवास आपको घर वापस लौटने नही देता. यहां आसपास मे ही अमरकंटक (नर्मदा का उदगम स्थान) कान्हा किसली पंचमढी ( मध्यप्रदेश का एक मात्र हिल स्टेशन) मैहर, खजुराहो बिल्कुल आसपास ही हैं. यानि आपको इस क्षेत्र मे घूमने के लिये हमेशा समय कम पडेगा.
और सबसे बडी बात तो यह है कि हमारे गुरुजी श्री समीरलालजी, बवाल भाई, श्री महेंद्र मिश्राजी और श्री बिल्लोरे जी भी यहीं जबलपुर से ही हैं. और श्री समीरलाल जी का बचपन का घर तो यहां से सिर्फ़ पांच मिनट की दुरी पर ही है. और एक बात आपको बताते हैं कि ब्लागरों के हर दिल अजीज श्री अनूप जी शुक्ल यानि फ़ुरसतिया जी भी अपने सेवाकाल में अनेकों बार जबलपुर प्रवास पर रहे हैं. और शायद ये जगह उनको इतनी रमणीक लगती है कि श्री समीर लाल जी के सुपुत्र की शादी मे सम्मिलित होने की यादों को एक पुरी श्रंखला के रुप मे लिपिबद्ध कर दिया है. जिसको आप विस्तृत रुप से उनके ब्लाग पर पढने का आनन्द ले सकते हैं
कहते हैं तपस्या करने के लिये नर्मदा से अनुकुल जगह कलियुग मे कहीं नही है. जो भी नर्मदा के किनारे रहता है वो स्वत: ही योगी है. अमरकंटक में तो एक से बढ कर एक महान तपस्वी आज भी रहते हैं.आपको महाभारत के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा की याद हो तो सुना है कि आज भी वो मां नर्मदा के किनारे कई लोगों द्वारा देखा गया है.
जबलपुर मे भेडाघाट एक ऐसी जगह है जहां आप आश्चर्य चकित रह जायेंगे. मार्बल की चट्टानों के बीचो बीच बहती नर्मदा और वहां नाव मे सवार आप, और बीच धारा मे भुलभुलैया, क्या नजारा होता होगा? सोचिये. अगर नाविक नही हो तो आपको किधर जाना है ? यही नही सूझेगा.
इस बारे मे ताऊ पत्रिका की सलाहकार संपादक सुश्री अल्पना जी ने विस्तृत विव्रण दिया है सो आईये उनके स्तम्भ “मेरा पन्ना“ की और चलते हैं.
-ताऊ रामपुरिया
"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा नमस्कार, आज फ़िर हम एक पहेली के बहाने मध्यप्रदेश के एक खूबसुरत शहर और वहां की संस्कारधानी कहलाये जाने वाले शहर जबलपुर के बारे मे कुछ जानने की कोशीश करेंगे.
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 330 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है प्राचीन शहर जबलपुर। इस शहर को जबालिपुरम भी कहते हैं क्योंकि इसका सम्बन्ध महर्षि जाबालि से जोड़ा जाता है।रामायण एवं महाभारत की कथाएँ इस शहर से जुड़ी हुई हैं। 'बावन तालों का सुन्दर नगर 'जबलपुर , मनोहारी प्राकृतिक सुन्दरता की वजह से 12शताब्दी में गोंड राजाओं की राजधानी रहा, उसके बाद कालाचूडी राज्य के हाथ रहा और अन्तत: इसे मराठाओं ने जीत लिया और तब तक उनके पास रहा जब तक कि ब्रिटिशर्स ने 1817 में उनसे ले न लिया।
भेडाघाट, जबलपुर विश्वप्रसिध्द मार्बलरॉक्स के लिए प्रसिध्द है,नर्मदा के दोनों दूर तक ओर 100-100 फीट ऊंची ये संगमरमरी चट्टानें बहुत सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करती हैं। यहां बहुत ही सुंदर जलप्रपात है जो धुंआधार के नाम से विख्यात है. फ़िल्म “जिस देश मे गंगा बहती है” की अधिकांश शूटिंग इसी जगह भेडाघाट मे हुई थी.
और इस शहर के बारे मे जानिये – श्रीमती कृष्णा राजकपूर यहीं की हैं यहीं के सिनेमा व्यवसायी नाथ परिवार की बेटी हैं. यहां का एम्पायार थियेटर इसी परिवार की मालकियत का है. यह सिनेमा हिंदुस्थान के उस समय के सात लाजवाब सिनेमाओं की श्रंखला मे अपना स्थान रखता था. जहां आर्मी के लोग युद्धकाल के बाद मनोरंजन के लिये जाया करता थे.
फ़िल्म अभिनेता प्रेमनाथ और नरेन्द्रनाथ श्रीमती कृष्णा कपूर जी के सगे भाई थे. उनके भाई साहब प्रेमनाथ को तो आप सब अच्छी तरह जानते ही होगें. उनको भी इस शहर से इतना लगाव रहा कि फ़िल्म “जानी मेरा नाम“ के दिनों की चरम सफ़लता के दिनों मे वो यहा लौट आये थे और गेरुएं वस्त्र धारण कर लिये थे. और वहीं ग्वारीघाट मे आश्रम बनवाकर रहने लगे थे.
ओशो रजनीश और महर्षि महेश योगी इन दोनो विभुतियों को कौन नही जानता? ये दोनों भी यहीं की देन हैं. श्री हरीशंकर जी परसाई को कौन भूल सकता है? आप भी जबलपुर से ही थे. यानि इस शहर ने एक से बढ्कर एक रत्न समाज और दुनियां को दिये हैं. एक बात इस शहर के बारे मे जानना शायद और अच्छी लगेगी कि जबलपुर को संस्कारधानी नाम आचार्य बिनोवा भावे ने दिया था. जबलपुर का भौगोलिक क्षेत्र पथरीली, बंजर ज़मीन और पहाड़ों से आच्छादित है।
गोंडवाना क्षेत्र-
घने जंगलों का क्षेत्र, गोंडवाना अब मध्यप्रदेश का अंग है। पर एक जमाने में यह देश से अलग-थलग था और बाकी देश पर जो कुछ बीता उससे यह बहुत कुछ अछूता रहा। तथापि उत्तर के सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव से यह नहीं बच सका।
अनेक ऋषि-मुनियों ने यहाँ अपने आश्रम बनाये, क्योंकि यहाँ एकान्त भजन-पूजन के लिए बहुत उपयुक्त था। कभी यहाँ रानी दुर्गावती शासन करती थीं।
रानी दुर्गावती - गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ा-मंडला सहित ५२ गढ़ों की शासक वीरांगना रानी दुर्गावती कालिंजर के चंदेल राजा कीर्तिसिंह की इकलौती संतान थी। उनका जनम 1524 A.D में हुआ था. गोंडवाना शासक संग्राम सिंह के पुत्र दलपत शाह की सुन्दरता, वीरता और साहस की चर्चा धीरे धीरे दुर्गावती तक पहुँची परन्तु जाति भेद आड़े आ गया . फ़िर भी दुर्गावती और दलपत शाह दोनों के परस्पर आकर्षण ने अंततः उन्हें परिणय सूत्र में बाँध ही दिया.
सन् 1542 में अपने विवाह के उपरान्त दलपतशाह को जब अपनी पैतृक राजधानी गढ़ा रुचिकर नहीं लगी तो उन्होंने सिंगौरगढ़ को राजधानी बनाया और वहाँ प्रासाद, जलाशय आदि विकसित कराये.
रानीदुर्गावती से विवाह होने के ४ वर्ष उपरांत ही दलपतशाह की मृत्यु हो गई और उनके ३ वर्षीय पुत्र वीरनारायण को उत्तराधिकारी घोषित किया गया. रानी ने सन् 1555 से 1560 तक मालवा के सुल्तान बाजबहादुर तथा मियाना अफगानों के आक्रमणों को विफल किया। अकबर ने उसके दरबार में गोप कवि को भेजकर, दुर्गावती के दीवान आधार सिंह कायस्थ (आधारताल का निर्माता) को अपनी और मिलाने का कूटनीतिक प्रयास किया पर उसमें असफल रहा। अंतिम युध्द जबलपुर की मंडला की सीमा पर नर्रई नाला पर 23 जून 1564 को हुआ। नाले में बाढ़ आ जाने से रानी सुरक्षित स्थान पर नहीं जा सकी। रात्रि में धोखे से आक्रमण कर आसफ खां ने रानी को कपटपूर्वक पराजित किया। परन्तु वीर रानी ने अपने हाथ से ही अपना प्राणांत कर,अपने शील व स्वाभिमान की रक्षा की।
इस तरह रानी ने साहस और पराक्रम के साथ 1546 से 1564 तक गोंडवाना साम्राज्य का कुशल संचालन किया. इन्हीं के नाम पर जबलपुर में एक विश्वविद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा गया है.
यह तस्वीर इस महल के 'क्लू ' में दिखाई गयी थीं अब जानिए उस शिला के बारे में-जो मानव अंगुली की मोटाई के बराबर सहारे पर टिकी हुई है.
इसे कहते हैं-संतुलित शिला (बैलेंस रॉक )
प्रागैतिहासिक पृथ्वी के संरचना के समय पहाड़ों में मदन महल की पहाड़ियाँ और चट्टानें गौड़ वान ट्रैक के नाम से जानी जाती हैं पुरातत्व शास्त्रियों के अनुसार यह सरंचना हिमालय से भी पुरानी है।
संतुलित शिला का इस गौड़्वाना ट्रैक में होना खुद इस बात क प्रमाण है कि यह क्षेत्र करोड़ों वर्ष पुराना है। दो पत्थरों के बीच लाखों वर्षों तक पानी और हवा के बहाव से पैदा हुए कटाव द्वारा संतुलित शिला का निर्माण होता है।खास बात यहाँ की यह शिला भूकंप में भी नहीं हिली।
'ज़रा सा इनकी तरफ़ तो देखो, हैं दोनों आलम सँभाल रक्खे
---बवाल
मदन महल-
यह कब बना? इस के बारे में कुछ भी साफ़ साफ़ नहीं कहा जा सकता है. अधिकतर सूत्रों के अनुसार यह किला राजा मदन शाह ने १११६ में बनवाया था.
ज़मीन से लगभग ५०० मीटर की ऊँचाई पर बने इस 'मदन महल 'की पहाड़ी 150 करोड़ वर्ष पुरानी मानी जाती है | इसी पहाड़ी पर गौंड़ राजा मदन शाह द्वारा एक चौकी बनवायी गई ।इस किले की ईमारत को सेना अवलोकन पोस्ट के रूप में भी इस्तमाल किया जाता रहा होगा.
इस इमारत की बनावट में अनेक छोटे-छोटे कमरों को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ रहने वाले शासक के साथ सेना भी रहती होगी. शायद इस भवन में दो खण्ड थे। इसमें एक आंगन था और अब आंगन के केवल दो ओर कमरे बचे हैं। छत की छपाई में सुन्दर चित्रकारी है। यह छत फलक युक्त वर्गाकार स्तम्भों पर आश्रित है। माना जाता है ,इस महल में कई गुप्त सुरंगे भी हैं जो जबलपुर के 1000 AD में बने '६४ योगिनी 'मंदिर से जोड़ती हैं.
यह दसवें गोंड राजा मदन शाह का आराम गृह भी माना जाता है. यह अत्यन्त साधारण भवन है। परन्तु उस समय इस राज्य कि वैभवता बहुत थी. खजाना मुग़ल शासकों ने लूट लिया था.
गढ़ा-मंडला में आज भी एक दोहा प्रचलित है - मदन महल की छाँव में, दो टोंगों के बीच . जमा गड़ी नौं लाख की, दो सोने की ईंट.
इस महल के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिली-जो भी मिल सकी यहाँ प्रस्तुत की गई है. घटनाओं के काल में भी कई स्थान पर भिन्नता देखी गयी है.यहाँ दी गयी सभी जानकारी अंतरजाल पर पहले से प्रस्तुत सामग्री के आधार पर है.यह भवन अब भारतीय पुरातत्व संस्थान की देख रेख में है. ( सलाहकार संपादक, पर्यटन ) |
अब आईये ताऊ पत्रिका के तकनिकी संपादक श्री आशीष खंडेलवाल के स्तम्भ “ दुनिया मेरी नजर से” की और चलते हैं.
“ दुनिया मेरी नजर से” -आशीष खण्डेलवाल नमस्कार आइए आज आपको उड़नतश्तरी दिखाएं.
अब आप कहेंगे कि हिन्दी चिट्ठा संसार तो समीर लाल जी की उड़नतश्तरी को रोजाना ही देखता है। इसमें नया क्या है? तो दोस्तों इसमे नया यह है कि आज आपको इसे सचमुच में देखने का सौभाग्य मिल रहा है। आप इस लिंक पर चटका लगाएं और देख लें। यह रोमानिया का एक बगीचा है और यहां आप खुद ही देखिए कि क्या नजर आ रहा है।
http://googlesightseeing.com/maps?p=1564&c=&t=k&hl=en&ll=45.70334,21.301975&z=18
खा गए न धोखा! यह उड़नतश्तरी नहीं है और गूगल अर्थ पर दिख रही डिस्क जैसी इस आकृति के कारण रोमानिया प्रशासन और गूगल की नींद उड़ी है। दरअसल यह रोमानिया के टिमिसोअरा शहर में पानी सप्लाई करने वाली एक पुरानी इमारत का नजारा है। लोग इसे गूगल अर्थ पर देखकर अफवाह फैला रहे हैं कि यह कोई यूएफओ (अनआइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट) है।
रोमानिया का प्रशासन और गूगल दोनों ही नेटिजंस से अपील कर रहे हैं कि कृपया वे बार-बार उन्हें इस बारे में सूचना नहीं दें। अब तकनीक है तो बेजा इस्तेमाल तो होगा ही।
Thanks and Regards Ashish Khandelwal |
और अब आईये चलते हैं सुश्री सीमा गुप्ता के स्तम्भ “मेरी कलम से” की और.
हमारे पहेली अंक - 9 के विजेता श्री काजल कुमार जी का साक्षात्कार आपसे करवायेंगे ५ मार्च
गुरुवार को. अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी.
संपादक मंडल :-
मुख्य संपादक – ताऊ रामपुरिया
सलाहकार संपादक (पर्यटन) – सुश्री अल्पना वर्मा
विशेष संपादक (प्रबंधन) – सुश्री सीमा गुप्ता
तकनिकी संपादक – श्री आशीष खंडेलवाल
सहायक गण :-
सहायक ( पहेली) – श्री बीनू फ़िरंगी
सहायक ( बोनस पहेली) – मिस. रामप्यारी



