"सोचता हूं"

सोचता हूं


sochata hoon 

जीवन को  मंजिल तक ले जाए
ऐसी राह कोई नजर आती नही
एक नज़र पीछे भी देखा तो सिर्फ़
मुरझाये फ़ूळ, झरे हुये पत्ते
sochata2
कांटे से भरी राहें अनगिनत और
एक लंबी सुनसान रात के बाद
सामने छटपटाती सी एक  सुबाह
सोचता हुं.....


रोज रोज की जलन से अच्छा है
सौ सुनार की और एक लुहार की
कहावत को ही मै सार्थक  कर लुं
और इस शरीर रूपी ताबुत मे
रात को दफ़न करने के पहले
म्रत्यु रूपी आखिरी कील ठोक दूं


(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)

Comments

  1. "जीवन को मंजिल तक ले जाए
    ऐसी राह कोई नजर आती नही .......
    सौ सुनार की और एक लुहार की......
    शरीर रूपी ताबुत मे
    रात को दफ़न करने के पहले
    म्रत्यु रूपी आखिरी कील ठोक दूं।"
    सुश्री सीमा गुप्ता जी।
    सत्य को उजागर करती हुई कविता।
    कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी आपने।
    ताऊ घणी राम-राम।

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  2. हे ताऊ ई तो खतरनाक चिंतन है भाई -देखो कुछ ऐसा वैसा न कर गुजरना .ताई वाई का ध्यान रहे ! और हमारा भी !
    और सीमा जी से शिकायत कैसे इसे उन्होंने अनुमोदित किया !

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  3. जीवन को मंजिल तक ले जाने की चाह ही इस सारी छटपटाहट की वजह है । क्या निरन्तर गति जीवन नहीं?

    जीवन को जीवन के घटते हुए सातत्य में निरखना और उससे एकमेक हो जाना ही जीवन के लक्ष्य तक जाने की राह है ।

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  4. और इस शरीर रूपी ताबुत मे
    रात को दफ़न करने के पहले
    म्रत्यु रूपी आखिरी कील ठोक दूं

    अक्सर जीवन में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं और यही बीज की पीडा है. आप इस वेदना को व्यक्त करने मे सफ़ल रहे हैं.

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  5. जीवन का यथार्थ या कहें अंतिम सत्य.

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  6. वाकई परम सत्य. पर ताऊश्री आप इतनी गहरी पीडा क्यों व्यक्त कर रहे हैं? आप तो अभी सबसे ज्यादा कमाऊ (टिपणियां) ब्लागर हो?:)

    आपकी भाषा मे ही रामराम

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  7. बहुत गहरी बात कही.

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  8. एक लंबी सुनसान रात के बाद
    सामने छटपटाती सी एक सुबाह
    सोचता हुं.....
    " जीवन के कुछ ऐसे पल जब जब सब निरर्थक लगे .....उन पालो की सोच को ताऊ जी आपके इन शब्दों ने यथार्त रूप प्रदान किया है......जीवन के एक कडवे सच को सार्थक करते शब्द ...ये भी जीवन का एक हिस्सा है.."

    regards

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  9. अच्छी लिखी गई है पर काहे इतनी निराशा।

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  10. 'रात को दफ़न करने के पहले
    म्रत्यु रूपी आखिरी कील ठोक दूं'
    ..
    अक्सर होता है ..आशा निराशा के बन्धनों से दूर उस दुनिया में जाने की चाह होती है,जहाँ सिर्फ परम सत्य से परिचय होता है.
    मन की गहन वेदना से उपजे शब्द ,अभिव्यक्ति की सफल प्रस्तुति कर रहे हैं.

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  11. यह सोचना सचमुच खतरनाक है.

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  12. रात को दफ़न करने के पहले
    क्यों न एक और सवेरा देख लूँ. :)

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  13. क्या वाह-वाह लगा रखी है सबने ?

    यह कविता नहीं सुसाईड नोट प्रतीत हो रहा है !

    अवसाद और निराशा में डूबी इस रचना का
    बायकाट करना चाहिए !

    "रुक जाना नहीं तू कहीं हार के
    काँटों पे चल के मिलेंगे साये बहार के "

    [ बेहतर होगा आप गुरू रवि शंकर के
    'आर्ट आफ लिविंग' कार्यक्रम में हो आईये ]

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  14. कहावत को ही मै सार्थक कर लुं
    और इस शरीर रूपी ताबुत मे
    रात को दफ़न करने के पहले
    म्रत्यु रूपी आखिरी कील ठोक दूं
    itana gehra dard samaya hai rachana mein,sach jeevan ka ujagar ho gaya,aakhari satya wahi hai,padhnewalon ke dil mein aisi tis paida ki hai ke laga saara jeevan nirarrthak sa hai,yahi is kavita ki kamyaabi.badhai.

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  15. ताऊ ये तो घनी चोखी बात लिख डाली...
    बहुत सुंदर लिखी है...
    मीत

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  16. एक लंबी सुनसान रात के बाद
    सामने छटपटाती सी एक सुबाह

    bahut gahan pida ke bhav hai.

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  17. गहन अभिव्यक्ति. कभी कभी ऐसा होना भी स्वाभाविक है.

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  18. ताऊ आपके मूंह से ऐसी गहन वेदना की कविता सुनकर आश्चर्य होता है. आपतो हमेशा हंसते हंसाते रहते हो. आज क्या बात है? सब खैर तो है?

    कहीं ताई ने ज्यादा लठ्ठ वठ्ठ तो नही मार दिये.
    :)

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  19. ताऊ आपके मूंह से ऐसी गहन वेदना की कविता सुनकर आश्चर्य होता है. आपतो हमेशा हंसते हंसाते रहते हो. आज क्या बात है? सब खैर तो है?

    कहीं ताई ने ज्यादा लठ्ठ वठ्ठ तो नही मार दिये.
    :)

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  20. ताऊ जी राम-राम।
    ब्लॉग खोलते ही लगा मैने किसी और का ब्लॉग खोल दिया आज क्या बात हो गई जो ताऊ जी इतनी वेदनापूंर्ण रचना लिखने लगे।
    आप हसंते हंसता अच्छे लगते हो, हमें वही ताऊ जी चाहिए। लेकिन आपने लिखा बहुत अच्छा है। आप हमेशा मुस्कुराते रहें यही दुआ करती हूं।

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  21. एक लंबी सुनसान रात के बाद
    सामने छटपटाती सी एक सुबाह
    सोचता हुं.....

    मन के गहन अंधकार से निकले ये पीडादायक शब्द शायद जीवन वेदना की उपज हैं.

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  22. और इस शरीर रूपी ताबुत मे
    रात को दफ़न करने के पहले
    म्रत्यु रूपी आखिरी कील ठोक दूं


    --बहुत सही.

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  23. बहुत गहरे भाव लिए है यह रचना ..पर इतनी निराशा क्यों ? किस लिए ? उम्मीद और आशा का दीप जलाए रखना चाहिए ..

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  24. बिल्कुल नहीं जी। ऐसा खतरनाक काम न करियेगा। वैसे भी सेनसेक्स तो चढ़ने लगा है।

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  25. जीवन और मंजिल तो मेरे हिसाब से दो अलग अलग चीजों का नाम है, जीवन जहाँ चलता रहता है , मंजिल वहीँ थमी होती है . और यदि पीछे मुड़ने पर मुरझाएं हुए फूल, झरे हुए पत्ते नज़र आयें तो ये ख़ुशी कि बात है कि अब मौसम बदलने वाला है .
    मन में पीडा हुई के इस कविता में जीवन से ऊबने जैसे विचार तो आते हैं पर इस तरह जीवन का अंत का विचार क्यों ?

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  26. सौ सुनार की और एक लुहार की
    -------------------------
    कविता पसँद आई सीमा जी और मुहावरे का प्रयोग
    इसे अनूठा बना रहा है
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  27. मेरे गुरू जी कहा करते हैं कि कविता में पलायनवादिता नहीं होनी चाहिये...

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  28. अरे क्यों डिप्रेस करते हैं :-)

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