अब ताऊ का हाल चाल तो आपको मालूम ही है. चोरी, लूट, ठगी, डकैती और बेईमानी के धंधो मे इतना नाम कमा लिया कि कोई पास मे फ़टकने भी नही देता. अब खाली नाम से क्या होता है? पापी पेट को पालने के लिये रोकडा आजकल घणे जरुरी हैं. फ़िर ताऊ का कुणबा भी घणा ज्यादा बडा है ताई, रामप्यारी, सैम, बीनू फ़िरंगी, चंपाकली, अनारकली, हीरामन (हीरु) और पीटर (पीरु)...और इन सबके दोस्त रिश्तेदार अलग से.
ताऊ की बेरोजगारी की इस स्थिति से सबसे ज्यादा परेशान
समीर लाल जी और
राज भाटिया जी रहने लगे. ताऊ कुछ करता नही और उसके कुणबे का सारा खर्चा मजबूरन इनको ऊठाना पडता था....एक दिन अचानक राज भाटियाजी का फ़ोन समीर जी के पास आया और दोनों बात करने लगे.
राज भाटिया जी - हैल्लो ..हैल्लो समीरजी...मैं राज भाटिया बोलता हू,,
समीर जी - हां जी..हां..भाटिया जी...बोलो जी..कैसी है अब आपकी तबियत?
राज भाटिया जी - अजी मेरी तबियत तो अब ठीक है..आफ़िस भी जाने लग गया...आप सुनावो...
समीरजी - अजी भाटिया जी, यहां भी सब रामजी की मौज है..बेटे बहु आजकल कनाडा आये हुये हैं सो बडा आनंद है जी... आप बताईये आज कैसे याद किया ?
राज भाटिया जी - अजी मैने इस लिये फ़ोन किया कि वो ताऊ आजकल कुछ ज्यादा ही परेशान करने लगा है..पहले तो थोडे बहुत रुपये देने से उसका काम चल जाता था आजकल दुनियां भर के खर्चे बढा लिये और मुझे परेशान करता है....उसके लिये एक काम ढूंढा था...
समीरजी - अरे भाटीया जी आपके मुंह में घी शक्कर...उसने तो मुझे भी परेशान कर रखा है...अब कितनी मदद करें उसकी....पर काम मिल गया है तो दिलवा दो..आपका और मेरा, दोनों का पीछा छूटेगा.
भाटिया जी - अजी पीछा तो तब छूटेगा जब वो नौकरी पा जायेगा..और उसके लिये आपको एक सर्टीफ़िकेट भी देना पडेगा उसको.
समीरजी - अरे आप जो बोलो वो दूंगा...मैं तो सी.ए. आदमी हूं..बोलो वर्थ सर्टीफ़िकेट भी दे दूंगा और अगर दो चाहिये तो अपने
शिव मिश्रा जी से दिलवा दूंगा.
भाटिया जी - अरे नही जी...ये मामला आप समझ रहे हैं वो नही है. असल मे आजकल बादशाह अकबर यहां मेरे पडौस के मकान मे ही रहने आ गये हैं..और उनको एक ऐसा बुद्धिमान आदमी चाहिये जो उसके सवालों का जवाब देकर उसके दिमाग की खुजली मिटाता रहे...
समीरजी - भाटियाजी..एक मिनट..एक मिनट...आपकी तबियत तो ठीक है?
भाटियाजी - क्युं मेरी तबियत तो ठीक है..अभी तो बताया था.
समीरजी - मुझे आपकी तबियत ठीक नही लग रही है...बादशाह अकबर को एक बुद्धिमान आदमी चाहिये और उसके लिये आप ताऊ को भेजना चाहते हैं? अब आप ये बताओ कि
ताऊ और बुद्धि का आपस मे कोई रिश्ता दिखा आज तक आपको?
भाटीयाजी - अरे समीरजी...आपकी बात तो सही है..
पर मुझे ये मालूम है कि इन कामों मे लफ़्फ़ाजी की जरुरत होती है और ताऊ बचपन से मेरा दोस्त रहा है..इन कामों मे घणी मास्टरी है उसकी....पर इस नौकरी के लिये एक सर्टीफ़िकेट चाहिये ...यह दिखाने के लिये कि ताऊ की बुद्धि बहुत आर पार है...और आप समझ लो कि एक बार ताऊ ये नौकरी पा गया तो बादशाह सलामत का सारा माल ताऊ का होगा..फ़िर तो हम अपनी पिछली उधारी भी ताऊ से वसूल ही लेंगे.
समीरजी - एक मिनट सोचने दिजिये...हां एक काम करता हूं.
.मैं एक प्रमाणपत्र लिख देता हूं कि ताऊ मेरा चेला है और अब गुरु को गुड का गुड छोडकर खुद शक्कर हो गया है....और भी लिख देता हूं जमा कर..
भाटिया जी - अरे वाह..क्या आईडिया है आपका? बस आप तो ये काम कर डालो और समझो कि ये काम होगया.
समीरलाल जी ने वो प्रमाणपत्र लिख दिया और इन दोनो ने मिलकर ताऊ को बादशाह अकबर के यहां नौकरी दिलाने की पक्की जुगाड भिडा दी. थोडे समय बाद साक्षात्कार के लिये लेटर आगया और नियत दिन भाटिया जी ने ताऊ को साथ लिया और बादशाह सलामत के दरबार मे पहुंच गये...
ताऊ जैसे ही बादशाह सलामत के सामने पहुंचा तो वहां के ठाठ बाट देखकर सिट्टी पिट्टी भूल गया.
शेष अगले भाग में.....
इब खुंटे पै पढो :-
ताऊ को नींद मे चलने की बीमारी थी.. एक दिन दोपहर मे ताऊ सोते सोते सपना देखने लाग ग्या कि वो स्कूल का इंसपेक्टर है सो वो नींद मे ही चलते हुये इंस्पेक्टर बन कर सीधा स्कूल मे घुस गया और एक क्लास म्ह पहुंच गया.
सब छात्र उधम मचा रहे थे, सो ताऊ ने घणी जोर से डांट मारके पूछ्या ..अर यो मानीटर कुण सै?
एक छोरा आया और बोल्या - जी मैं हूं मानीटर तो....
ताऊ घणी जोर से डाट लगाता हुआ बोल्या - रे कूंगर..तू कैसा मानीटर सै? ये सारे बालक आडै रोला करण लाग रे?
वो मानीटर बना लडका घबरा गया और बोल्या जी - जी नसपेटर साहब, मैं तो बाहर नीम के नीचे आली चाय की दुकान पर कप धोने का काम करता हूं...मानीटर छूट्टी गया तो बोला आज क्लास तू संभाल लिये। मैं तो इस लिये आगया था क्लास में.
यह सुनकर तो ताऊ घणे छोह (गुस्सा) म्ह आगया और चिल्लाकर मास्टर को बुलवाया और बोला - यो के हो रहा सै मास्टर? क्लास म्ह मानीटर भी नकली? और सारे बच्चे उधम कर रहे हैं?
वो मास्टर भी घबराया और बोल्या जी -- मैं तो मास्टर कोनी...मेरी तो स्कूल के बाहर नाई की दूकान सै....मास्टर जी को आज खेत मे पानी देना था सो मुझको कह गये कि आज क्लास तू संभाल लिये...शाम को सौ रपिये दे दूंगा.
अब तो ताऊ घणा ही छोह म्ह आगया और चिल्लाकर हैडमास्टर को बुलवाया और नु बोल्या - अरे हैड मास्टर यो के रासा रोप राख्या सै? मानीटर नकली, मास्टर नकली...ना तू तो यो बता, के यो के चाल्हा पाड राख्या सै तन्नै आडै?
इब ताऊ की डांट फ़टकार से वो भी डर गया और बोल्या - जी मैं आडै पास म्ह ही ढोर डांगरा का (पशुओं) डाक्टर सूं...हैड मास्टर तो अपनी ससुराल गया सै उसकी साली के ब्याह म्ह....और मन्नै न्यूं कह गया था कि चार पांच दिन स्कूल नै संभाल लिये.
इब यो जवाब सुनकै ताऊ बोल्या - हद हो गई भाई यो तो. आडै तो मानिटर नकली, मास्टर नकली और हेडमास्टर भी नकली , इन सारा नै सस्पेंड कर देता अभी की अभी, यदि मैं असली इंस्पेक्टर होता तो.