जरा सी बात का इतिहास

नन्हीं सी बूंद एक
सीप मे समाते ही
बेशकीमती मोती बन निखर जाती है

एक सुई धागे से मिलकर
सी कर जोड देती है
अपने से भी अनंत गुना वस्त्र

जरा सा तेल और बाती
एक हो जब जलते हैं
भगा देते है मगरुर अंधेरे को

Diya


उसी तरह एक नन्हीं धूल का कण
बन जाता है
आंख की किरकिरी

और जरा सा व्यंग द्रौपदी का
रच जाता है
महाभारत सा इतिहास



उसपे जरासा स्नेह मां कुंती का
जिता जाता है पांडवों को
महाभारत की जंग

(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)

Comments

  1. बढ़िया, जरा - जरा सी बातें ही इतिहास बनाती है

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  2. बहुत सुंदर भाव हैं।

    जरा सा व्यंग द्रौपदी का
    रच जाता है
    महाभारत सा इतिहास

    बहूत खूब।

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  3. ज्ररा सी बात का इतिहास
    वाकई बहुत खास ।

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  4. मान गए ताऊ अब तुम कवि जमात में पूरी तरह शिरकत के काबिल हुए -यह कविता तो अंतिम राऊंड में निकाल दी तुम्हे ! बधायी !

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  5. जरा सी बात से ही युद्ध होते हैं बहुत भारी।
    जरा सी बात से ही क्रुद्ध होते हैं धनुर्धारी।।
    जरा सी बात ही माहौल में विष घोल देती है।
    जरा सी जीभ ही कड़ुए वचन को बोल देती है।।
    मगर हमको नही इसका कभी आभास होता है।
    अभी जो घट रहा कल का वही इतिहास होता है।।

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  6. बहुत सही..

    बहुत खुब... छोटी वस्तुओं का भी अपना महत्तव है.. नकार ्नहीं सकते..

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  7. और जरा सा व्यंग द्रौपदी का
    रच जाता है
    महाभारत सा इतिहास .


    -बहुत गहन!!उम्दा!!

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  8. सच में - जरा सी को जरा सी नहीं समझना चाहिये।

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  9. अच्छी कविता है.
    ज़रा सी बात..दिया -बाती,मोती -सीप......बहुत ही अच्छे बिम्बों के सहारे भाव अभिव्यक्त किये गए हैं.

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  10. बेहतरीन कविता के लिये धन्यवाद ।

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  11. बहुत ही उम्दा !

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  12. एक नन्ही सी टिप्पणी जन्म देती है होनहार ब्लॉगर को....


    छोटे को छोटा न समझे.

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  13. बहुत ही बढिया!!!!!!!!पूर्णत: सत्य कथन

    ताऊ तो कृ्ष्ण जी की तरह सोलह कलां सम्पूर्ण होता जा रहा है........

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  14. सच में जरा सी चिंगारी ही तो बन जाती है ज्वाला...
    तभी तो आज हमारा देश भी आजाद है...
    मीत

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  15. वाह ताऊ वाह..क्या अर्थपुर्ण बात कही है आज तो। बेहद लाजवाब।

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  16. वाह ताऊ..............कितनी गहरी बात लिखी है.......और अंत तो बहूत कुछ सोचने को मजबूर करता है..........आपने और सीमा जी ने lajawaab लिखा है

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  17. सुंदर कविता के लिये धन्यवाद.

    रामराम.

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  18. जरा सा व्यंग द्रौपदी का
    रच जाता है
    महाभारत सा इतिहास

    सुंदर बहुत ही सुंदर

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  19. जरा सा तेल और बाती
    एक हो जब जलते हैं
    भगा देते है मगरुर अंधेरे को

    बहुत सही उपमाएं दी हैं आपने. सुंदर

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  20. ताऊ छा गये आज तो. बेहद पसंद आई ये रचना. कितनी सटीक बाते कही हैं.

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  21. ताऊ छा गये आज तो. बेहद पसंद आई ये रचना. कितनी सटीक बाते कही हैं.

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  22. जरा जरा सी बात से ही सब कुछ हो जाता है ! वाह !

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  23. जरा सी बात सदियो की दुरिया पेदा कर देती है जी, बहुत सुंदर भाव लिये है यह कविता.
    राम राम जी की

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  24. नन्ही सी कविता में भरा है गहरा अर्थपूर्ण भाव..सरल और सहज लेकिन प्रभावशाली रचना

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  25. एक हो जब जलते हैं
    भगा देते है मगरुर अंधेरे को
    उम्दा!!
    बढ़िया!!
    बहूत खूब।
    बधायी !
    बेहतरीन
    बेहद लाजवाब।

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  26. भावाभिव्यक्ति सशक्त रही
    छोटी पँक्तियाँ...
    बहुत समेटे हुए
    - लावण्या

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  27. बेहतरीन कविता

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  28. अच्छी रचना ,बधाई सीमा जी को और प्रस्तुतीकरण के लिए आपको भी .

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  29. बहुत खूब....!!

    ये जरा से के कारनामें तो बहुत खूब गिनाये सीमा जी ने ....!!

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  30. उफ़्फ़्फ़्फ़...
    अनूठे बिम्ब ताऊ...

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  31. एक सुई धागे से मिलकर
    सी कर जोड देती है
    अपने से भी अनंत गुना वस्त्र

    Bahut achhi kavita

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  32. chha gaye tau wah
    एक सुई धागे से मिलकर
    सी कर जोड देती है
    अपने से भी अनंत गुना वस्त्र

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