स्कूल के सुनहरे दिन भाग-3

भाग-1 एवम  भाग-2  अब आगे पढिये....

अब तक आपने पढा कि कैसे गणित वाले मास्टर जी ने रामजीडे को पहले ही दिन कूट दिया और सब के मन मे दहशत भर दी. असल मे उस समय का हिसाब ही यही था कि बच्चों को जितना मारोगे, वो उतना ही होनहार और तेज याददास्त वाला बालक बनेगा.

शायद इसीलिये उस जमाने मे मास्साब लोगों को  खुली छूट थी, कि घर वाली से झगड कर स्कूल आवो और
पराये छोरों को कूट पीट कर अपना गुस्सा ठन्डा कर लो.  क्योंकि घर वाली तो जो आज के जमाने मे है वो ही उस जमाने मे थी.  यानि   कुम्हार अपनी  कुम्हारी से तो कुछ कह नही सकता था  और जाकर गधे की धुनाई करता था.... आज भी उतना ही खरा है.

असल मे रामजीडे को तो कुटना ही था.... क्यों कि हमारा सरदार तो वो ही था.  अगर सरदार को ही काबू कर लिया तो फ़िर बाकी तो काबू मे आ ही जायेंगे.  इसी रणनीति के तहत रामजीडे की जमकर  कुटाई हुयी थी. मास्टरजी को भी ये उम्मीद नही थी की पहले ही दिन हाथी को मारने का मौका मिल जायेगा.  पर रामजी लाल लंगडा नाम ही क्या ?...जो ऐसे  गुल नही खिलाये तो !

असल मे रामजीडा सब रत्नो मे उम्र मे काफ़ी बडा था. मुझे अच्छी तरह से याद है कि वो हमारे साथ प्राईमरी मे आया था. शायद वो तीसरी या चोथी क्लास की बात है.  हमारे स्कूल की टीम को जिताने के लिये इस लंगडे के भारी भरकम डीलडोल को देखते हुये इसकी उम्र कम लिखवा  कर इसे  हमारी क्लास मे भर्ती कर दिया गया था.

पर समस्या तो ये आ गयी की  बच्चनसिंह जी मास्साब  की लूगाई तो इनके साथ नही रहती थी वो रहती गांव में और मास्साब यहां स्कूल में अकेले रहते थे. और लंगडे रामजीडे ने मास्टरजी के गांव मे उनकी घर वाली
को ऐसा समाचार भिजवाया था की मास्टर जी को अब तक पता नही होगा की ये खेल रामजीडे का किया हुआ  था.  जीते जी तो मास्टर साब औरों पर ही शक शुबहा करते रहे , पर आज दशकों बाद गुमनाम नाम से मैं इस बात का खुलासा कर रहा हूं.

भाई रामजीडे तेरी दी हुयी कसम आज तोड रहा हूं.  क्यों की ना तो दशकों से तू मिला और मास्टर साब का तो सवाल ही नही.  पर ये बोझ अब उठाया नही जाता. और यार अब तो मास्टर जी परलोक जा चुके होंगे.  डर तो मास्साब की  आत्मा से ही लगता है. वो आज तक उस सवाल का जबाब नही ढुंढ पाये होंगे.  उनकी आत्मा भी स्वर्ग या नरक मे इसी का जवाब ढूंढ रही होगी.  और अगर अभी तक जिन्दा हैं तो वो  अब हम तक  पहुंच नहीं  पायेंगे.

कभी कभी तो इच्छा होती है कि उनको मास्साब को खोजकर   असलियत बता दी जाय जिससे वो शांतिपूर्वक  ये दुनियां छोड सकेंगे...वर्ना अगले जन्म में तो उनको पता चल ही जायेगा और एक नई कुटाई पिटाई की श्रंखला शुरू हो जायेगी.

पर मास्साब की  दहशत अब भी मन मे इतनी है कि उनके सामने जाना तो दूर, उनके  नाम से ही कपं कपीं छुट जाती है.  और ये भी पक्का है की अगर मास्टर साब को इस लोक मे या परलोक मे इसका खुलासा हो गया तो वो अगले सात जन्म तो हमसे बदला लेने के लिये ही पैदा होंगे.... ये सोच सोच के ही रुह कांप जाती है कि  क्यों ये मुर्ताख की. पुरे स्कूल समय मे पिटते रहे और अब ये जन्मों जन्मों का बैर मोल ले लिया.  अरे रामजीडे  हम सब ने तेरा क्या बिगाडा था?

इस वाकिये के पहले मैं हमारे नो रत्नों से आपका परिचय करवा दूं तो आपको आगे सहुलियत रहेगी । क्यों कि आगे आगे कहानी उलझती ही जायेगी. क्योंकी इस कहानी के पात्र बढते ही जायेंगे. असल में  अभी जितने पात्र इन्ट्री लेन्गे, उससे कम बाहर जायेंगे.

नौ रत्नों मे रामजीडे के बाद नम्बर आता था रामजीलाल बहरे का. और एक तीसरा रामजीलाल भी था । हमारी क्लास मे ये तीन रामजी लाल थे. शायद उस जमाने में रामजीलाल काफ़ी पापुलर नाम रहा होगा जैसे आजकल बबली डबली...चुन्नू..मुन्नू.....

इनमे ये तीसरा जो था यही  प्रथम था... मतलब रामजीलाल (प्रथम), रामजीलाल (द्वितीय), रामजीलाल (ततीय)... क्यो की तीनों ही एक जमींदार जाति से थे.  तो हाजिरी लेते समय भी  ऐसे ही पुकारे जाते थे.  पर हम लोगों ने अपनी सुविधा के लिये पहला रामजीलाल जिसे हम सिर्फ़ रामजीलाल कहते थे.

जिस रामजीलाल का पीछे आप जिकर पढ आये हैं यानि रामजीडा और अब जिस रामजीलाल बहरे का आप किस्सा पढेंगे वो उसको हम लोग बुलाते थे  रमजू बहरा.. जी... ये बहरा कोई जाति नही है , ये वाकई कान से बहरा था.... शायद इसे कम सुनायी पडता था.  फ़ालतु की बात इसे कभी नही सुनायी देती थी. पर मतलब की बात सारी सुन लेता था.  जैसे आप इससे पूछो कि रमजु तेरे पास बीडी है क्या ?
तो ये कुछ भी रिएक्ट नही करेगा.. यानि पक्का बहरा !

और आप इससे पूछो --रमजु हुक्का पीवैगा ? सट से जवाब आवेगा .. ल्या भई एक दो घूंट खींच ल्यान्गे.
तो साब ये है हमारा रमजु बहरा... अगर आपने इसको बहरा समझ के धीरे से भी इसे  गाली दे दी तो ये इतनी जोर का झापड मारेगा की तीन दिन गाल लाल रहेंगे.

चौथा था एक सागर मल नाई.. यानि सागरिया... पढने मे तेज और इतना तेज के नौंवी तक क्लास मे पहला स्थान और करीब करीब हर साल क्लास का मानीटर पर इसनै भी नौ रत्नों का कभी  साथ नही छोडा.. जब आगे जाके दसवीं मे सारे रत्न फ़ेल हुये तो ये  भी फ़र्स्ट डिविजन फ़ैल हुआ था...यानि दोस्त मंडली का पक्का धर्म निभाया था.  इसका बापु कहा करता था की इसनै मैं इन्दिरा गांधी की जड मे बैठाउंगा और वो ही बात  सही भी  हुयी क्योंकि  ये  आजकल दिल्ली मे ही रहता है. यह वो समय था जब लालबहादुर शास्त्री जी के देहावसान के बाद राजनीति में इंदिरा गांधी का दखल और प्रभाव दोनों ही बढ चुके थे.

पांचवां सुरजमल यानि सुरज्या.. कोई विशेष बात नही , शान्त आत्मा पर अशान्ती पैदा करने मे माहिर.

छ्ठा लालचन्द यानि लालिया ढोल ... पूरी नौटंकी...यानि टाइम पास ... स्कूल से तडी के बाद मनोरंजन का ठेका या  जिम्मा इसी के पास था. यो बैरी पूरा का पूरा भांड ही था.

सातवां मूलचन्द गुज्जर... सीधा साधा छह फ़ुटा ....कोई ऐब नही पर नो रत्नों के पूरे असर मे आके बिगड गया.  और आगे जाके... दस साल तक विधायक भी  रहा.

आठंवा बोदुराम ... नाम से ही बोदु.. इसको हम बोदिया कहते थे...ये उमर मे सबसे बडा ... पढने मे कमजोर ... पूरा बैल....अक्ल से इसका ताल्लुक शायद पडा ही नही था.

और भई पाठको नौवां मै.. माफ़ करना मै अपना नाम पता हर्गिज नही बताउंगा. पहले तो एक बार फ़िर भी बता देता पर मास्टर साहब की आत्मा की शान्ति के लिये जो राज मेरे सीने मे दफ़न था, वो खोल रहा हूं इस लिये मैं इतनी बडी रिस्क तो नही ही लूंगा... चाहे आप राजी रहे चाहे आप नाराज हो जायें.

अगर आप को मेरा परिचय अन्य रत्नों जैसा ही चाहिये तो आपको मैं वो मास्टर साब की लूगाई वाली बात नही बताउंगा.... और इसके बिना इस कहानी मे आनंद नही आयेगा सो आप सोच लो और मुझे बता दो की आपको मेरा परिचय चाहिये या रामजीडे ने मास्टर साब के साथ ऐसा क्या और कैसे किया की मास्टर साब को पूरी उम्र भर भी पता नहीं चला.  मैं आपके मनोरंजन के लिये अपनी जान जोखिम मे डालने को तैयार नही हूं.   या तो राज पूछ लो या मेरा परिचय ।

शेष अगले भाग मे ...

Comments

  1. muje maff karna rampuria ji
    mene aapke about me ke content ka use liya
    mai iis field me bilkul nya hu
    isliye muje shama kare

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  2. वाह यार छोटे दोस्त ! मान गए तुमको , तुम तो बहुत बहादुर निकले ! तुमने गलती स्वीकार कर के साहस का परिचय दिया है ! बहुत आगे
    निकालोगे ! याद रखो , हर आदमी एक दिन नया होता है !

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  3. ओह, ताऊ इतना धोखा... अगला भाग लिखा ही नहीं... राज को छाती में दबा दिया.

    जय राम जी की.

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  4. :)आपने तो छात्र जीवन की जीवनी लिख दी। बेचारे मास्साब

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  5. अगला लिंक नहीं मिल रहा, मास्टर साब की लूगाई वाली बात कैसे पढ़े ?

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